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उत्तर : (घ) उपरोक्त सभी
किसी देश के विकास का सही आकलन करने के लिए केवल एक पैमाना पर्याप्त नहीं होता। प्रति व्यक्ति आय, औसत साक्षरता दर और लोगों के स्वास्थ्य का स्तर – इन तीनों कारकों को मिलाकर ही विकास की स्पष्ट तस्वीर मिलती है। इसलिए सही विकल्प ‘उपरोक्त सभी’ है।
उत्तर : (ख) श्रीलंका
मानव विकास सूचकांक (HDI) के आधार पर देखा जाए तो हमारे पड़ोसी देशों में श्रीलंका की स्थिति भारत से बेहतर है। श्रीलंका ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है, जिसके कारण उसका HDI रैंक भारत से ऊँचा है।
उत्तर : (घ) 6000 रूपये
प्रति व्यक्ति आय 5,000 रुपये है और परिवारों की संख्या 4 है। इसलिए,
चारों परिवारों की कुल आय = 5,000 × 4 = 20,000 रुपये
तीन परिवारों की कुल आय = 4,000 + 7,000 + 3,000 = 14,000 रुपये
अतः, चौथे परिवार की आय = 20,000 – 14,000 = 6,000 रुपये
उत्तर :
विश्व बैंक विभिन्न देशों का वर्गीकरण (जैसे निम्न आय, मध्यम आय वाले देश) करने के लिए मुख्य रूप से प्रति व्यक्ति आय या औसत आय के मापदंड का प्रयोग करता है।
इस मापदंड की सीमाएँ निम्नलिखित हैं:
1. यह हमें यह नहीं बताता कि देश के अंदर आय का वितरण कैसा है। एक देश में आय समान रूप से बँटी हो सकती है, जबकि दूसरे में अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन दोनों की प्रति व्यक्ति आय समान हो सकती है।
2. यह मापदंड स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वतंत्रता, सुरक्षा जैसे जीवन की गुणवत्ता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर देता है।
3. केवल आय के आधार पर वर्गीकरण विकास का पूरा और सही चित्र प्रस्तुत नहीं करता।
उत्तर :
विकास मापने का यू.एन.डी.पी. (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम) का मापदंड विश्व बैंक के मापदंड से निम्नलिखित पहलुओं में अलग है:
1. बहुआयामी दृष्टिकोण: यू.एन.डी.पी. केवल आय पर निर्भर नहीं करता। यह तीन समान रूप से महत्वपूर्ण कारकों का संयोजन देखता है:
- स्वास्थ्य: जन्म के समय जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy)।
- शिक्षा: शिक्षा के वर्षों (स्कूली शिक्षा की औसत आयु और अपेक्षित वर्ष)।
- आय: प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI)।
2. मानव विकास सूचकांक (HDI): यू.एन.डी.पी. इन तीनों कारकों को मिलाकर एक सूचकांक बनाता है, जिसे HDI कहते हैं। यह 0 से 1 के बीच का स्कोर होता है।
निष्कर्ष: विश्व बैंक का मापदंड संकीर्ण है जो सिर्फ आय पर केंद्रित है, जबकि यू.एन.डी.पी. का मापदंड व्यापक है जो मानव कल्याण के स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को भी शामिल करता है।
उत्तर :
औसत का प्रयोग करने के कारण:
हम औसत का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि यह एक बड़े समूह के बारे में सरल और त्वरित जानकारी देता है। यह तुलना करने में आसान बनाता है।
उदाहरण: किसी राज्य की ‘प्रति व्यक्ति आय’ की गणना करके हम आसानी से अन्य राज्यों से उसकी तुलना कर सकते हैं।
औसत के प्रयोग की सीमाएँ:
औसत अक्सर समूह के भीतर मौजूद असमानताओं और भिन्नताओं को छिपा देता है।
उदाहरण:
1. आय में असमानता: मान लीजिए एक गाँव में 9 लोगों की आय 1,000 रुपये प्रति माह है और 1 व्यक्ति की आय 91,000 रुपये प्रति माह है। औसत आय होगी (9×1000 + 1×91000)/10 = 10,000 रुपये। यह औसत दिखाता है कि सबकी आय अच्छी है, जबकि हकीकत में 90% लोग गरीब हैं।
2. लैंगिक असमानता: किसी राज्य की ‘साक्षरता दर’ 80% हो सकती है। लेकिन यह औसत हमें यह नहीं बताता कि पुरुष साक्षरता दर 90% और महिला साक्षरता दर केवल 70% है। औसत के पीछे छिपी यह लैंगिक असमानता विकास की राह में बड़ी बाधा है।
उत्तर :
मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत नहीं हूँ। यह सही है कि केवल प्रति व्यक्ति आय विकास का एकमात्र या पूर्ण मापदंड नहीं है, जैसा कि केरल और हरियाणा के उदाहरण से स्पष्ट है। केरल ने स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिक ध्यान देकर बेहतर HDI हासिल किया है, भले ही उसकी प्रति व्यक्ति आय हरियाणा से कम है।
हालाँकि, इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि प्रति व्यक्ति आय एक बेकार मापदंड है। आय भी एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि:
1. आर्थिक संसाधन बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अच्छा जीवन स्तर हासिल करने में सहायक होते हैं।
2. राज्यों की आर्थिक प्रगति और उत्पादकता को मापने के लिए यह एक उपयोगी संकेतक है।
निष्कर्ष: प्रति व्यक्ति आय एक आवश्यक मापदंड है, लेकिन पर्याप्त अकेला नहीं है। राज्यों की तुलना के लिए हमें HDI जैसे व्यापक मापदंड का उपयोग करना चाहिए, जिसमें आय के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा भी शामिल हों। आय को पूरी तरह नकारना सही नहीं होगा।
उत्तर :
भारत में ऊर्जा के वर्तमान प्रमुख स्रोत:
1. बिजली (विद्युत): घरों, उद्योगों, परिवहन एवं प्रकाश के लिए मुख्य ऊर्जा स्रोत। यह कोयला, जल, परमाणु, गैस आदि से बनती है।
2. कोयला: थर्मल पावर प्लांट्स में बिजली बनाने और कुछ उद्योगों में ईंधन के रूप में प्रयोग।
3. पेट्रोलियम उत्पाद (कच्चा तेल): वाहनों के लिए पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस (LPG), और उद्योगों में ईंधन के रूप में।
4. प्राकृतिक गैस: घरेलू ईंधन, परिवहन (CNG) और उद्योगों में।
5. जैव-मात्रा (बायोमास): ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी, उपले और कृषि अवशेष ईंधन के रूप में।
6. नवीकरणीय स्रोत: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे जल-विद्युत संयंत्रों का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
अब से 50 वर्ष बाद की संभावनाएँ:
1. नवीकरणीय ऊर्जा का वर्चस्व: कोयला, पेट्रोल जैसे सीमित स्रोत घटने के कारण सौर, पवन, जल और भू-तापीय ऊर्जा का बहुत अधिक प्रयोग होगा।
2. हाइड्रोजन ऊर्जा: हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने वाले वाहन और उद्योग आम हो सकते हैं।
3. जैव ईंधन: एथेनॉल और बायोडीजल का परिवहन में व्यापक उपयोग।
4. अधिक कुशल तकनीक: ऊर्जा का भंडारण और उपयोग अधिक कुशल तरीके से होगा, जिससे बर्बादी कम होगी।
5. परमाणु ऊर्जा: उन्नत और सुरक्षित तकनीक के साथ परमाणु ऊर्जा की भूमिका बढ़ सकती है।
उत्तर :
धारणीयता (Sustainable Development) का मतलब है ऐसा विकास जो वर्तमान की जरूरतों को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतें पूरी करने की क्षमता से समझौता न करे।
यह विकास के लिए इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:
1. संसाधनों का संरक्षण: यदि हम आज प्रकृति के संसाधनों (जल, वन, खनिज) का अंधाधुंध दोहन करेंगे, तो भविष्य में ये समाप्त हो जाएँगे और विकास रुक जाएगा।
2. पर्यावरण संरक्षण: प्रदूषण फैलाकर और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाकर किया गया विकास दीर्घकाल में मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक साबित होता है।
3. दीर्घकालिक समृद्धि: धारणीय विकास यह सुनिश्चित करता है कि आज की प्रगति भविष्य में भी जारी रहे। यह केवल अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक समृद्धि पर केंद्रित है।
4. नैतिक जिम्मेदारी: हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रहने लायक स्वस्थ ग्रह छोड़कर जाएँ।
उत्तर :
महात्मा गांधी के इस कथन का विकास की चर्चा में गहरा संबंध है। यह हमें विकास के उद्देश्य और तरीके के बारे में सोचने पर मजबूर करता है।
प्रासंगिकता:
1. आवश्यकता बनाम लालच: विकास का लक्ष्य सभी लोगों की बुनियादी आवश्यकताएँ (रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य) पूरी करना होना चाहिए, न कि कुछ लोगों की अतिरिक्त वस्तुओं और विलासिता की भूख (लालच) को बढ़ावा देना।
2. संसाधनों का असमान वितरण: आज दुनिया में संसाधन पर्याप्त हैं, लेकिन उनका वितरण असमान है। कुछ लोग/देश अत्यधिक संपन्न हैं तो बहुत से लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। यह असमानता अधिकांश समस्याओं की जड़ है।
3. धारणीयता की चुनौती: अगर विकास का मॉडल ‘लालच’ पर आधारित है, जहाँ हर व्यक्ति अधिक से अधिक उपभोग करना चाहता है, तो संसाधनों का अंधाधुंध दोहन होगा, प्रदूषण बढ़ेगा और विकास अधारणीय (Unsustainable) हो जाएगा।
4. सामूहिक कल्याण पर बल: यह कथन हमें याद दिलाता है कि सच्चा विकास सामूहिक कल्याण में निहित है। जब विकास की नीतियाँ सभी की आवश्यकताओं पर केंद्रित होंगी, तभी समाज में स्थिरता और शांति आएगी।
उत्तर :
हमारे आस-पास देखी जाने वाली पर्यावरणीय गिरावट (Environmental Degradation) के कुछ सामान्य उदाहरण हैं:
1. वायु प्रदूषण:
- वाहनों और कारखानों से निकलने वाला काला धुआँ और हानिकारक गैसें।
- निर्माण कार्य और सड़क की धूल से हवा का गंदा होना।
- फसल कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने से धुएँ का गुबार।
2. जल प्रदूषण:
- नदियों और नालों में कारखानों का रासायनिक कचरा और शहरों का गंदा पानी (सीवेज) बहाना।
- नदी तटों पर प्लास्टिक, कचरा और पूजा सामग्री का जमा होना।
- कृषि में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बहकर जल स्रोतों में मिलना।
3. भूमि प्रदूषण / क्षरण:
- खुले स्थानों, सड़क किनारे और खाली प्लॉट में कूड़े-कचरे के ढेर लगना।
- प्लास्टिक की थैलियों और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे का जमीन में दबे रहना।
- अत्यधिक खेती और वनों की कटाई से मिट्टी की उर्वरता कम होना।
4. ध्वनि प्रदूषण:
- वाहनों के हॉर्न, लाउडस्पीकरों से शोर, और औद्योगिक क्षेत्रों की तेज आवाजें।
5. हरियाली में कमी:
- शहरों में पेड़ काटकर इमारतें और सड़कें बनाना, जिससे पार्क और हरित क्षेत्र घट रहे हैं।
उत्तर :
दी गई तालिका के आधार पर (मान लेते हैं कि तालिका 1.6 में भारत और उसके पड़ोसी देशों के आँकड़े हैं):
1. प्रति व्यक्ति आय (अमेरिकी डॉलर में):
- सबसे ऊपर (उच्चतम): श्रीलंका
- सबसे नीचे (निम्नतम): नेपाल
2. जन्म के समय जीवन प्रत्याशा (वर्षों में):
- सबसे ऊपर (उच्चतम): श्रीलंका
- सबसे नीचे (निम्नतम): पाकिस्तान
3. 25 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की विद्यालयी औसत आयु (वर्षों में):
- सबसे ऊपर (उच्चतम): श्रीलंका
- सबसे नीचे (निम्नतम): नेपाल
4. मानव विकास सूचकांक (HDI) में विश्व रैंक:
- सबसे ऊपर (सर्वोत्तम रैंक/संख्या कम): श्रीलंका
- सबसे नीचे (सबसे खराब रैंक/संख्या अधिक): नेपाल
उत्तर :
तालिका के आँकड़ों के आधार पर केरल और मध्य प्रदेश के पोषण स्तर की तुलना:
1. केरल: यहाँ केवल 8.5% पुरुष और 10% महिलाएँ ही अल्पपोषित (कम BMI वाले) हैं। यह प्रतिशत राष्ट्रीय औसत (पुरुष 20%, महिला 23%) से काफी कम है। इससे स्पष्ट है कि केरल में लोगों का पोषण स्तर बहुत अच्छा है।
2. मध्य प्रदेश: यहाँ 28% पुरुष और 28% महिलाएँ अल्पपोषित हैं। यह प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है। इससे पता चलता है कि मध्य प्रदेश में पोषण स्तर चिंताजनक है और यहाँ अल्पपोषण एक गंभीर समस्या है।
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