UP Board class 12 Biology (15. जैव विविधता एवं संरक्षण) solution PDF
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UP Board class 12 Biology 15. जैव विविधता एवं संरक्षण Hindi Medium Solutions - PDF
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अध्याय 15: जैव विविधता एवं संरक्षण
(Biodiversity and Conservation)
UP Board पाठ्यपुस्तक के अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. जैव विविधता के तीन आवश्यक घटकों (कम्पोनेन्ट) के नाम बताइए।
उत्तर: जैव विविधता के तीन आवश्यक घटक निम्नलिखित हैं:
- आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) - एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों के जीनों में पायी जाने वाली विभिन्नता।
- प्रजातीय विविधता (Species Diversity) - किसी क्षेत्र विशेष में पायी जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या और उनकी बहुतायत।
- पारिस्थितिक तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity) - किसी क्षेत्र में पाये जाने वाले विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों (जैसे वन, घास के मैदान, मरुस्थल, आर्द्रभूमि) की विविधता।
प्रश्न 2. पारिस्थितिकीविद् किस प्रकार विश्व की कुल जातियों का आकलन करते हैं?
उत्तर: पारिस्थितिकीविद् विश्व की कुल प्रजातियों का अनुमान लगाने के लिए अप्रत्यक्ष विधियों का उपयोग करते हैं। एक प्रमुख विधि है सांख्यिकीय तुलना। वे उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण क्षेत्रों में अच्छी तरह अध्ययन की गई कीट प्रजातियों की समृद्धता के आँकड़ों की तुलना करते हैं। इस तुलना के आधार पर अन्य जीवों की संख्या का अनुमान लगाया जाता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, पृथ्वी पर प्रजातियों की अनुमानित संख्या 20 से 50 मिलियन के बीच हो सकती है। हालाँकि, रॉबर्ट मे जैसे वैज्ञानिकों का यथार्थवादी अनुमान लगभग 7 मिलियन प्रजातियों का है, जिनमें से अभी बहुत सी खोजी जानी बाकी हैं।
प्रश्न 3. उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में सबसे अधिक स्तर की जाति-समृद्धता क्यों मिलती है? इसकी तीन परिकल्पनाएँ दीजिए।
उत्तर: उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिकतम जाति समृद्धि के लिए निम्नलिखित तीन प्रमुख परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गई हैं:
- विकास के लिए लंबा समय (Evolutionary Time Hypothesis): उष्णकटिबंधीय क्षेत्र लाखों वर्षों से स्थिर और अबाधित रहे हैं, जबकि शीतोष्ण क्षेत्र बार-बार हिमयुगों से प्रभावित हुए हैं। इस लंबे स्थिर समय ने प्रजातियों के विविधता में विकसित होने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान किए।
- स्थिर पर्यावरण (Stable Environment Hypothesis): उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मौसमी परिवर्तन बहुत कम होते हैं। यह स्थिरता प्रजातियों के विशेषीकरण और समृद्धि को बढ़ावा देती है।
- अधिक सौर ऊर्जा (Greater Solar Energy Hypothesis): उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में साल भर पर्याप्त सौर ऊर्जा उपलब्ध रहती है, जिससे प्राथमिक उत्पादन (पौधों की वृद्धि) अधिक होता है। यह अधिक उत्पादन अधिक जटिल खाद्य जालों का आधार बनता है, जो अंततः अधिक जैव विविधता को समर्थन देता है।
प्रश्न 4. जातीय क्षेत्र सम्बन्ध में समाश्रयण (रिग्रेशन) की ढलान का क्या महत्त्व है?
उत्तर: प्रजाति-क्षेत्र संबंध (Species-Area Relationship) का अध्ययन करने के लिए समाश्रयण (रिग्रेशन) रेखा की ढलान (slope) एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है।
- छोटे क्षेत्रों (जैसे द्वीप) के लिए इस ढलान का मान लगभग 0.1 से 0.2 के बीच होता है, जो अपेक्षाकृत स्थिर रहता है।
- लेकिन बहुत बड़े क्षेत्रों (जैसे महाद्वीपों) के लिए यह ढलान बढ़कर 0.6 से 1.2 तक हो जाती है।
इस ढलान में वृद्धि का अर्थ है कि क्षेत्रफल बढ़ने के साथ-साथ प्रजातियों की संख्या में होने वाली वृद्धि की दर भी बदलती है। यह ढलान हमें यह समझने में मदद करती है कि किसी क्षेत्र के आकार और उसमें मौजूद प्रजाति समृद्धि के बीच कैसा गणितीय संबंध है।
प्रश्न 5. किसी भौगोलिक क्षेत्र में जाति क्षति के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर: किसी भी क्षेत्र में प्रजातियों के विलुप्त होने या उनकी संख्या में कमी (जाति क्षति) के चार मुख्य कारण हैं:
- आवास नष्टीकरण एवं विखंडन: वनों की कटाई, शहरीकरण, खनन और कृषि विस्तार के कारण जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट या छोटे-छोटे टुकड़ों (विखंडन) में बंट जाते हैं। यह विलुप्ति का सबसे बड़ा कारण है।
- अतिदोहन: मानव द्वारा आवश्यकता से अधिक शिकार, मछली पकड़ना या वनस्पति संग्रहण। उदाहरण: स्टेलर सी काउ, यात्री कबूतर (पैसेन्जर पिजन) का विलुप्त होना।
- विदेशी आक्रामक प्रजातियों का प्रवेश: जब किसी नए क्षेत्र में बाहरी प्रजातियाँ लाई जाती हैं, तो कभी-कभी वे स्थानीय प्रजातियों के लिए प्रतिस्पर्धा बनकर या उन्हें खाकर उनके अस्तित्व को खतरे में डाल देती हैं। उदाहरण: गाजर घास (पार्थेनियम), नीलकंथ (आइकॉर्निया), अफ्रीकी कैटफिश।
- सह-विलुप्ति: जब एक प्रजाति विलुप्त होती है, तो उस पर निर्भर अन्य प्रजातियाँ भी खतरे में पड़ जाती हैं या विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण: एक विशेष पौधे के परागण करने वाली मक्खी के लुप्त होने से वह पौधा भी लुप्त हो सकता है।
प्रश्न 6. पारितन्त्र के कार्यों के लिए जैवविविधता कैसे उपयोगी है?
उत्तर: जैव विविधता पारिस्थितिक तंत्र के सुचारू संचालन और उसकी उत्पादकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- उत्पादकता एवं स्थिरता: अधिक प्रजातियों वाले पारितंत्र अधिक उत्पादक और समय के साथ अधिक स्थिर होते हैं। डेविड टिलमैन के प्रयोगों से पता चला कि विविधता बढ़ने से पारितंत्र का कुल जैवभार और उत्पादकता बढ़ती है।
- अपशिष्ट निस्तारण एवं पोषक चक्र: सूक्ष्मजीवों, कवकों और अपघटकों की विविधता मृत जीवों के अपघटन और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को कुशलतापूर्वक संपन्न करती है।
- पारितंत्र सेवाएँ: जैव विविधता वायुमंडल की गैस संरचना को नियंत्रित करने, जलवायु विनियमन, बाढ़ नियंत्रण, मृदा संरक्षण और परागण जैसी अनगिनत सेवाएँ प्रदान करती है, जिन पर मानव सभ्यता निर्भर है।
प्रश्न 7. पवित्र उपवन क्या हैं? उनकी संरक्षण में क्या भूमिका है?
उत्तर: पवित्र उपवन (Sacred Groves) वनों के वे छोटे-छोटे क्षेत्र हैं जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण संरक्षित रखा गया है। इनमें पेड़ों को काटना या वन्यजीवों का शिकार करना वर्जित होता है।
संरक्षण में भूमिका:
- ये प्राकृतिक जैव विविधता के 'हॉटस्पॉट' के रूप में कार्य करते हैं।
- ये कई दुर्लभ, संकटग्रस्त और स्थानिक (एंडेमिक) पादप व जंतु प्रजातियों की अंतिम शरणस्थली हैं।
- मेघालय (खासी और जयंतिया पहाड़ियाँ), राजस्थान (अरावली), पश्चिमी घाट आदि क्षेत्रों में पवित्र उपवन पाए जाते हैं।
- ये सांस्कृतिक परंपरा के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
प्रश्न 8. पारितन्त्र सेवा के अन्तर्गत बाढ़ व भू-अपरदन नियन्त्रण आते हैं। यह किस प्रकार पारितन्त्र के जीवीय घटकों द्वारा पूर्ण होते हैं?
उत्तर: पारितंत्र के जैविक घटक (विशेषकर पौधे) बाढ़ और मृदा अपरदन के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
- मृदा अपरदन रोकना: पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी के कणों को बाँधकर रखती हैं, जिससे वर्षा के पानी या हवा द्वारा मिट्टी का बहाव रुकता है। पत्तियों की छतरी (कैनोपी) वर्षा की बूंदों की गतिज ऊर्जा को कम कर देती है, जिससे वे धीरे से जमीन पर गिरती हैं और मिट्टी को कम नुकसान पहुँचाती हैं।
- बाढ़ नियंत्रण: वनस्पति से आच्छादित क्षेत्र वर्षा के पानी को अवशोषित करके भूजल को रिचार्ज करते हैं और सतही बहाव को कम करते हैं। पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों में वनों की कटाई से वर्षा का पानी तेजी से नीचे उतरता है, जिससे मैदानी इलाकों में अचानक बाढ़ आ जाती है। वृक्षारोपण इस प्रक्रिया को उलटकर बाढ़ की तीव्रता को कम कर सकता है।
प्रश्न 9. पादपों की जाति विविधता (22 प्रतिशत), जन्तुओं (72 प्रतिशत) की अपेक्षा बहुत कम है। क्या कारण है कि जन्तुओं में अधिक विविधता मिलती है?
उत्तर: जंतुओं में पादपों की तुलना में अधिक विविधता के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
- गतिशीलता: जंतु गतिशील होते हैं, जिससे वे विभिन्न प्रकार के आवासों में जा सकते हैं और नए वातावरण के अनुसार स्वयं को ढाल सकते हैं। पौधे स्थिर होने के कारण ऐसा नहीं कर पाते।
- पोषण की विधि: सभी पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं, इसलिए उनकी मूल पोषण विधि एक जैसी है। जंतु विषमपोषी होते हैं और भोजन प्राप्त करने के लिए अलग-अलग तरीके (शिकारी, परजीवी, मृतभक्षी आदि) विकसित करते हैं, जिससे विविधता बढ़ती है।
- विशिष्ट अनुकूलन: प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए जंतुओं ने विभिन्न प्रकार के मुखांग, चोंच, पंजे आदि विकसित किए हैं (जैसे अलग-अलग आकार की चोंच वाले पक्षी), जिससे वे विभिन्न स्रोतों से भोजन प्राप्त कर सकें।
- तंत्रिका तंत्र: जंतुओं में विकसित तंत्रिका तंत्र और संवेदी अंग होते हैं, जो उन्हें पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों का त्वरित जवाब देने और नए अनुकूलन विकसित करने में सहायता करते हैं।
प्रश्न 10. क्या आप ऐसी स्थिति के बारे में सोच सकते हैं, जहाँ पर हम जान-बूझकर किसी जाति को विलुप्त करना चाहते हैं? क्या आप इसे उचित समझते हैं?
उत्तर:
(क) हाँ, ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं: मनुष्य अक्सर हानिकारक मानी जाने वाली प्रजातियों को पूरी तरह समाप्त करना चाहता है। उदाहरण के लिए:
- मलेरिया फैलाने वाले मच्छर (एनोफिलीज)।
- फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीट पीड़क।
- बीमारी फैलाने वाले जीव (जैसे चूहा, कॉकरोच)।
(ख) क्या यह उचित है? नहीं, किसी भी प्रजाति को जानबूझकर पूरी तरह विलुप्त करना उचित नहीं है। इसके दो प्रमुख कारण हैं:
- पारिस्थितिक महत्व: प्रकृति में हर जीव का कहीं न कहीं एक भूमिका होती है। एक प्रजाति के पूरी तरह लुप्त होने से खाद्य जाल टूट सकता है, जिसके अप्रत्याशित दुष्परिणाम हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक कीट पीड़क के लुप्त होने से उसे खाने वाला पक्षी भी प्रभावित हो सकता है।
- नैतिक दायित्व: मनुष्य को यह नैतिक अधिकार नहीं है कि वह किसी अन्य प्रजाति के अस्तित्व को ही मिटा दे। प्रत्येक प्रजाति आनुवंशिक विविधता का एक भंडार है, जो भविष्य में वैज्ञानिक अनुसंधान या जैव प्रौद्योगिकी के लिए उपयोगी हो सकती है।
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