UP Board Class 11 Political Science 4. सामाजिक न्याय is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: न्याय शब्द की उत्पत्ति 'जस' से हुई है जिसका अर्थ है "किसी को देना"। परन्तु किसी को देने की अवधारणा समाज में विभिन्न होती है। उदाहरण के लिए, समय के एक बिंदु पर महिलाओं को समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, परन्तु कालांतर में इसकी उपेक्षा की गई और उनकी स्थिति ख़राब हो गयी तथा विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाने लगी। अब न्याय के विचार के लिए सत्यता, ईमानदारी, निष्पक्षता, समान अवसर, समान व्यवहार और आवश्यकताओं की पूर्ति आदि आवश्यक माने गए हैं।
प्लेटो के अनुसार, न्याय के अंतर्गत प्रत्येक वर्ग को अपने क्षेत्र में कार्यों की उपलब्धि और दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप न करना ही न्याय है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार, न्याय की अवधारणा की दृष्टि अलग है। वह पूँजीवादी व्यवस्था से अच्छी तरह से परिचित था जो अन्याय पर आधारित थी। इसलिए उसने न्याय की अलग आवश्यकताएं बताई। उसने अपनी न्याय की योजना में सुझाव दिया कि उत्पादन के साधनों और वितरण पर सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए। इसी के साथ प्रत्येक व्यक्ति की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए।
वर्तमान में न्याय की अवधारणा में कुछ तथ्यों का समावेश हो गया है। आज न्याय न केवल सामाजिक-आर्थिक पक्ष की व्याख्या करता है बल्कि नैतिक, मनोवैज्ञानिक, आत्मिक और मानववादी पक्ष की व्याख्या करता है।
उत्तर: विभिन्न प्रकार के न्याय के लिए अनेक सिद्धांत बनाए गए हैं, जो निम्नलिखित हैं:
1. समान के लिए समान व्यवहार: यह अति महत्वपूर्ण और आवश्यक माना जाता है। यह स्वीकार किया जाता है कि व्यक्ति कुछ विशेषताएं मानव जाति के रूप में दिखाता है, इसलिए प्रत्येक समान दशाओं में समान व्यवहार कायम करता है। अधिकांश क्षेत्रों में जहाँ हम समान व्यवहार की आशा करते हैं, वे हैं - नागरिक अधिकार, सामाजिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार। इसका एक अन्य पहलू यह है कि वर्ग, जाति या लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी प्रतिभा और कौशल के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
2. आनुपातिक न्याय: आनुपातिक न्याय से तात्पर्य यह है कि लोगों को वेतन और गुण में एक अनुपात होना चाहिए। कर्तव्य और पुरस्कार का निर्धारण इसी आधार पर होना चाहिए। वास्तविक न्याय के लिए आधुनिक समाज में समान व्यवहार का सिद्धांत आनुपातिक सिद्धांत से संतुलित करने की आवश्यकता है। उदाहरण: एक कठिन और विशेषज्ञता वाले काम के लिए अधिक वेतन दिया जाना।
3. विशेष आवश्यकता की पहचान: यह लोगों की विशेष आवश्यकताओं के संदर्भ में पहचान करती है। जब किसी को पुरस्कार या कार्य वितरित किया जाता है, तो कभी-कभी हमें न्याय के लिए संशोधित उपायों का सहारा लेना पड़ता है और लोगों के साथ विशेष व्यवहार करना पड़ता है। इसे ही विशेष आवश्यकता की पहचान कहते हैं। इसे असंतुलन को संतुलित करना भी कहा जाता है। उदाहरण: दिव्यांग छात्रों के लिए परीक्षा में अतिरिक्त समय देना।
उत्तर: नहीं, विशेष ज़रूरतों का सिद्धांत समान बरताव के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह उसकी पूरक है। समान व्यवहार तभी सार्थक होता है जब सभी समान स्थिति में हों। शारीरिक योग्यताएं, आयु, शिक्षा या स्वास्थ्य की कमी जैसे कारक कुछ लोगों को विशेष सहायता की आवश्यकता में डाल सकते हैं। उदाहरण के लिए, सामान्य लोग और दिव्यांग व्यक्तियों को यदि समान अवसर देना है, तो दिव्यांगों के लिए विशेष सुविधाएं (जैसे रैंप, ब्रेल लिपि) प्रदान करना आवश्यक है। यह विशेष व्यवहार वास्तविक समानता और न्याय स्थापित करने के लिए है, न कि भेदभाव के लिए।
उत्तर: जॉन रॉल्स ने निष्पक्ष और न्यायसंगत नियम तक पहुँचने के लिए 'अज्ञानता के आवरण' की अवधारणा प्रस्तुत की। उनका तर्क है कि यदि हमें यह नहीं पता हो कि भविष्य के समाज में हम किस परिवार (धनी/गरीब, उच्च/निम्न जाति, सुविधा-संपन्न/सुविधाहीन) में जन्म लेंगे, तो हम समाज के नियम ऐसे बनाएंगे जो सभी के लिए, विशेषकर सबसे कमजोर वर्ग के लिए, उचित होंगे।
अज्ञानता के आवरण में, व्यक्ति अपने वास्तविक स्वार्थ को नहीं जानता, इसलिए वह ऐसे नियमों का समर्थन करेगा जो सबसे खराब स्थिति में पैदा होने वाले व्यक्ति के लिए भी न्यूनतम न्याय सुनिश्चित करें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसे महत्वपूर्ण संसाधन सभी लोगों को, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, प्राप्त हों। इस प्रकार यह विचार निष्पक्षता का एक तर्कसंगत आधार प्रदान करता है।
उत्तर: एक स्वस्थ और उत्पादक जीवन जीने के लिए व्यक्ति की न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतों में शामिल हैं: पोषणयुक्त भोजन, साफ पेयजल, पर्याप्त आवास, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और एक सम्मानजनक न्यूनतम मजदूरी।
इस न्यूनतम को सुनिश्चित करने में सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी है। एक न्यायपूर्ण समाज का लक्ष्य यही होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की इन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो, ताकि वह सुरक्षित, स्वस्थ जीवन जी सके और अपनी प्रतिभा का विकास कर सके। सरकार को नीतियाँ बनाकर, कानून लागू करके और सार्वजनिक सेवाओं के माध्यम से इन सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय संगठन जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इन मानकों को स्थापित करने में मदद करते हैं।
(क) गरीब और ज़रूरतमंदों को निशुल्क सेवाएँ देना एक धर्म कार्य के रूप में न्यायोचित है।
उत्तर: यह तर्क पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि यह राज्य के कर्तव्य को केवल दान या धर्म से जोड़ता है, जबकि यह एक मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय का विषय है।
(ख) सभी नागरिकों को जीवन का न्यूनतम बुनियादी स्तर उपलब्ध करवाना अवसरों की समानता सुनिश्चित करने का एक तरीका है।
उत्तर: यह तर्क पूर्णतः वाजिब और सही है। बिना बुनियादी सुविधाओं के, अवसर की समानता एक खोखला सिद्धांत रह जाता है।
(ग) कुछ लोग प्राकृतिक रूप से आलसी होते हैं और हमें उनके प्रति दयालु होना चाहिए।
उत्तर: यह तर्क अनुचित और पूर्वाग्रह से भरा है। बुनियादी सुविधाएं दयालुता के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और अधिकार के आधार पर दी जानी चाहिए।
(घ) सभी के लिए बुनियादी सुविधाएँ और न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करना साझी मानवता और मानव अधिकारों की स्वीकृति है।
उत्तर: यह तर्क भी पूर्णतः सही और वाजिब है। यह तर्क मानवाधिकारों और सार्वभौमिक मानवीय गरिमा पर जोर देता है, जो एक लोकतांत्रिक राज्य का मूल आधार है।
उत्तर: आनुपातिक न्याय का अर्थ है कि पुरस्कार (जैसे वेतन, सम्मान) और कर्तव्यों का वितरण व्यक्ति के योगदान, कौशल, प्रयास और जिम्मेदारी के अनुपात में होना चाहिए। यह सिद्धांत मानता है कि सभी को समान नहीं, बल्कि उनके गुणों और कार्य के अनुसार प्राप्त होना चाहिए। उदाहरण के लिए, एक डॉक्टर और एक क्लर्क का वेतन उनकी शिक्षा, प्रशिक्षण और कार्य की प्रकृति के आधार पर भिन्न हो सकता है।
उत्तर: सामाजिक न्याय का अर्थ है एक ऐसा समाज जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव (जाति, धर्म, लिंग, वर्ग आदि के आधार पर) समान अवसर, समान गरिमा और समान अधिकार प्राप्त हों। इसका लक्ष्य ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित समूहों (जैसे दलित, आदिवासी, महिलाएं) को मुख्यधारा में लाना और एक समतामूलक समाज की स्थापना करना है। भारत में दास प्रथा, छुआछूत, लैंगिक असमानता आदि सामाजिक अन्याय के उदाहरण हैं।
उत्तर: भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय और समानता स्थापित करने के लिए निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं:
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