UP Board समाधान
कक्षा 12 - समाजशास्त्र
पाठ-11: औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास
प्रश्न 1. अपने आसपास वाले किसी भी व्यवसाय को चुनिए और उसका वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में दीजिए:
(क) कार्य शक्ति का सामाजिक संगठन-जाति, लिंग, आयु, क्षेत्र।
(ख) मजदूर प्रक्रिया-काम किस तरह से किया जाता है।
(ग) वेतन तथा अन्य सुविधाएँ
(घ) कार्यावस्था - सुरक्षा, आराम का समय, कार्य के घंटे इत्यादि।
उत्तर:
हम एक छोटे पैमाने के कपड़ा निर्माण कारखाने का उदाहरण लेकर इसका वर्णन कर सकते हैं।
(क) कार्य शक्ति का सामाजिक संगठन:
- जाति: अधिकांश कामगार एक विशिष्ट जाति या समुदाय से आते हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से सिलाई या बुनाई का काम करने का अनुभव होता है।
- लिंग: कटाई और सिलाई जैसे कार्यों में पुरुष और महिलाएँ दोनों काम करते हैं, लेकिन मशीन ऑपरेटर का काम अक्सर पुरुष ही करते हैं।
- आयु: कारखाने में 18 से 50 वर्ष तक के लोग काम करते हैं। कानूनन बाल श्रम प्रतिबंधित है।
- क्षेत्र: अधिकांश श्रमिक आस-पास के ग्रामीण इलाकों या छोटे शहरों से आते हैं, जहाँ रोजगार के अन्य साधन सीमित हैं।
(ख) मजदूर प्रक्रिया:
- काम की शुरुआत एक ठेकेदार या सुपरवाइजर द्वारा होती है, जो कपड़े काटने से लेकर सिलाई और पैकिंग तक का काम बाँटता है।
- कार्य एक असेम्बली लाइन के रूप में होता है, जहाँ हर श्रमिक एक विशिष्ट कार्य (जैसे कॉलर लगाना, बटन सिलना) करता है।
- काम मुख्यतः मशीनों पर होता है, जिसमें श्रमिकों को लगातार एक ही स्थिति में बैठकर काम करना पड़ता है।
(ग) वेतन तथा अन्य सुविधाएँ:
- श्रमिकों को प्रतिदिन के हिसाब से या प्रति टुकड़े के हिसाब से मजदूरी मिलती है।
- स्थायी कर्मचारियों को महीने का वेतन और कभी-कभार चिकित्सा भत्ता मिलता है।
- अस्थायी या ठेका श्रमिकों को केवल मूल मजदूरी ही मिलती है, कोई अतिरिक्त भत्ता नहीं।
(घ) कार्यावस्था:
- सुरक्षा: सुरक्षा मानक अक्सर ढीले होते हैं। मशीनों के पास सुरक्षा गार्ड नहीं होते, और धूल व रसायनों से बचाव के उपाय नगण्य होते हैं।
- कार्य के घंटे: सामान्यतः 8-10 घंटे का कार्यदिवस होता है, लेकिन ऑर्डर की मांग के समय अतिरिक्त समय तक काम करना पड़ सकता है।
- आराम का समय: दोपहर में आधे घंटे का लंच ब्रेक और चाय के लिए दो छोटे ब्रेक दिए जाते हैं।
- कार्यस्थल पर्याप्त रोशनी और हवादार नहीं होता, जिससे थकान और स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं।
इस प्रकार, यह उद्योग असंगठित क्षेत्र का एक उदाहरण है, जहाँ काम की परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हैं और श्रमिकों के अधिकार सीमित हैं।
प्रश्न 2. ईंटें बनाने, बीड़ी रोल करने, सॉफ्टवेयर इंजीनियर या खदान के काम जो बॉक्स में वर्णित किए गए हैं, के कामगारों के सामाजिक संघटन का वर्णन कीजिए। कार्यावस्थाएँ कैसी हैं और उपलब्ध सुविधाएँ कैसी हैं? मधु जैसी लड़कियाँ अपने काम के बारे में क्या सोचती हैं?
उत्तर:
विभिन्न व्यवसायों में कामगारों का सामाजिक संघटन और कार्य दशाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं:
1. ईंट भट्ठा श्रमिक:
- सामाजिक संघटन: ये अक्सर आदिवासी या दलित समुदायों से आते हैं। पूरा परिवार—पुरुष, महिलाएँ और बच्चे—सामूहिक रूप से काम करते हैं।
- कार्यावस्था व सुविधाएँ: भीषण गर्मी, धूल और प्रदूषण में काम। कोई सुरक्षा उपकरण नहीं। मजदूरी बहुत कम और अक्सर ऋण-बंधुआगीरी के चक्र में फँसे होते हैं। आवास बेहद खराब।
2. बीड़ी रोल करने वाले श्रमिक:
- सामाजिक संघटन: अधिकांश कामगार महिलाएँ हैं, जो अपने घरों में बैठकर यह काम करती हैं। यह काम अक्सर विशिष्ट समुदायों तक सीमित होता है।
- कार्यावस्था व सुविधाएँ: काम घर पर होने से लचीलापन है, लेकिन मजदूरी प्रति बीड़ी के हिसाब से बहुत कम मिलती है। लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठने से स्वास्थ्य समस्याएँ (पीठ दर्द, आँखों में तकलीफ) होती हैं। कोई सामाजिक सुरक्षा (भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा) नहीं मिलता।
- मधु जैसी लड़कियों की सोच: मधु जैसी लड़कियाँ इस काम को पारिवारिक आय में योगदान और साथियों के साथ गपशप करने का मौका मानती हैं। हालाँकि, वे अक्सर थकान और पीठ दर्द की शिकायत करती हैं और उनमें से कई पढ़ाई जारी रखने या बेहतर नौकरी पाने की इच्छा रखती हैं।
3. सॉफ्टवेयर इंजीनियर:
- सामाजिक संघटन: ये ज्यादातर शहरी, उच्च शिक्षित मध्यम वर्ग से आते हैं। लिंग अनुपात पारंपरिक व्यवसायों की तुलना में बेहतर है।
- कार्यावस्था व सुविधाएँ: वातानुकूलित कार्यालय, अच्छा वेतन, स्वास्थ्य बीमा, भोजन व परिवहन सुविधाएँ। हालाँकि, मानसिक तनाव अधिक होता है और लंबे, अनियमित घंटे काम करने पड़ सकते हैं।
4. खदान श्रमिक:
- सामाजिक संगठन: अक्सर आदिवासी और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों से जुड़े होते हैं।
- कार्यावस्था व सुविधाएँ: यह सबसे खतरनाक व्यवसायों में से एक है। गैस रिसाव, छत गिरना, साँस की बीमारियाँ आम खतरे हैं। सुरक्षा मानकों का पालन अक्सर नहीं होता। वेतन संगठित क्षेत्र में बेहतर हो सकता है, लेकिन अनुबंध श्रमिकों की स्थिति दयनीय होती है।
प्रश्न 3. उदारीकरण ने रोजगार के प्रतिमानों को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर:
1990 के दशक में शुरू की गई उदारीकरण की नीतियों ने भारत में रोजगार के प्रतिमानों को गहराई से प्रभावित किया है। इसके मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं:
- संगठित क्षेत्र में स्थायी नौकरियों में कमी: कंपनियाँ अब स्थायी कर्मचारियों की संख्या कम कर रही हैं और अनुबंध या अस्थायी श्रमिकों को नियुक्त करना पसंद कर रही हैं। इससे नौकरी की सुरक्षा कम हुई है।
- आउटसोर्सिंग और बह्मस्रोत (Outsourcing) का विस्तार: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत जैसे देशों में, जहाँ श्रम सस्ता है, अपने कई कार्य (जैसे कॉल सेंटर, आईटी सेवाएँ) आउटसोर्स कर रही हैं। इसने सेवा क्षेत्र में नए रोजगार पैदा किए हैं, लेकिन ये नौकरियाँ अक्सर तनावपूर्ण और अनिश्चित होती हैं।
- पारंपरिक और कुटीर उद्योगों पर दबाव: सस्ते आयातित सामान और बड़ी कंपनियों (जैसे मॉल, बड़े ब्रांड्स) के प्रवेश से हस्तशिल्प, छोटे दुकानदारों और हॉकरों के रोजगार पर संकट आया है।
- विनिवेश और सार्वजनिक क्षेत्र का सिकुड़ना: सरकारी उपक्रमों (PSUs) के विनिवेश से सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों के अवसर कम हुए हैं, जो पहले सुरक्षित रोजगार का एक प्रमुख स्रोत थे।
- श्रम संगठनों का कमजोर होना: छोटी-छोटी इकाइयों और अनुबंध श्रम में काम करने वाले श्रमिकों के लिए संगठित होना और अपने अधिकारों की माँग करना मुश्किल हो गया है, जिससे श्रम संघों का प्रभाव कम हुआ है।
- रोजगार में गुणात्मक बदलाव: एक ओर उच्च कौशल वाले (आईटी, वित्त) रोजगार बढ़े हैं, तो दूसरी ओर अकुशल, अनौपचारिक क्षेत्र में असुरक्षित रोजगार भी बढ़े हैं। कृषि क्षेत्र में रोजगार घटा है।
संक्षेप में, उदारीकरण ने रोजगार बाजार को अधिक लचीला और प्रतिस्पर्धी बनाया है, लेकिन साथ ही नौकरी की असुरक्षा और असमानता भी बढ़ाई है।
--- यूपी बोर्ड समाधान समाप्त ---