UP Board प्रश्न-उत्तर
कक्षा 12 - समाजशास्त्र
पाठ - 6: सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ
1. सांस्कृतिक विविधता का क्या अर्थ है? भारत को एक अत्यंत विविधतापूर्ण देश क्यों कहा जाता है?
उत्तर: सांस्कृतिक विविधता से तात्पर्य विभिन्नता से है। भारत एक विविधताओं वाला देश है, जहाँ विभिन्न प्रकार के समुदाय निवास करते हैं। भारत में सांस्कृतिक विभिन्नता भाषा, धर्म, कुल, जाति, पंथ आदि के रूप में प्रतिबिंबित होती है।
- भारत एक बहुलतावादी समाज है, जहाँ विविधता में एकता देखी जा सकती है।
- विभिन्न समुदाय (भाषागत, धार्मिक, सांप्रदायिक) जब एक राष्ट्र के रूप में समाहित होते हैं, तो उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना भी उत्पन्न हो सकती है।
- सांस्कृतिक विविधता एक चुनौती का रूप ले सकती है, क्योंकि सांस्कृतिक पहचान बहुत शक्तिशाली होती है और यह गहन उत्तेजना की स्थिति पैदा कर सकती है।
- कभी-कभी यह विभिन्नता आर्थिक व सामाजिक अवमानना के कारण भी उत्पन्न होती है, जिससे सामाजिक जटिलता बढ़ती है।
- भारत में 1632 से अधिक भाषाएँ व बोलियाँ, विविध धर्म, मौसम और प्राकृतिक संरचना पाई जाती है, जो इसे अत्यंत विविधतापूर्ण बनाती हैं और यही विविधता एक बड़ी चुनौती भी है।
2. सामुदायिक पहचान क्या होती है और वह कैसे बनती है?
उत्तर: सामुदायिक पहचान जन्म तथा अपनापन पर आधारित होती है। यह एक प्रदत्त पहचान है, जिससे मुक्ति पाना कठिन होता है।
- परिवार, रिश्तेदारी, जाति, भाषा आदि सामुदायिक संबंध हमें एक सार्थक पहचान प्रदान करते हैं।
- समुदाय हमें मातृभाषा, मूल्य एवं संस्कृति प्रदान करता है, जिसके माध्यम से हम विश्व को समझते हैं।
- सामुदायिक प्रतिद्वंद्विता से निपटना कठिन होता है, क्योंकि प्रत्येक पक्ष दूसरे को अपना विरोधी मानने लगता है और अपनी अच्छाइयों तथा दूसरों की बुराइयों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है।
- पहचान के द्वंद्व की स्थिति में परस्पर सहमत सच्चाई स्थापित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
3. राष्ट्र को परिभाषित करना क्यों कठिन है? आधुनिक समाज में राष्ट्र और राज्य कैसे संबंधित हैं?
उत्तर: राष्ट्र एक अनूठे प्रकार का समुदाय है, जिसका वर्णन आसान है परन्तु परिभाषित करना कठिन। राष्ट्र वह समुदाय है जिसके पास अपना राज्य होता है।
- राष्ट्र साझे धर्म, नृजातीयता, इतिहास, भाषा या क्षेत्रीय संस्कृति जैसी साझी विरासत पर आधारित हो सकते हैं, लेकिन हर कसौटी के अपवाद भी मिलते हैं।
- सरल शब्दों में, राष्ट्र समुदायों का समुदाय है। आधुनिक युग में राष्ट्र और राज्य के बीच एकैक (एक-एक) का संबंध माना जाता है, यह एक नया विकास है।
- उदाहरण के लिए, सोवियत संघ कई राष्ट्रों का संघ था। वहीं, जमैका जैसे राष्ट्र के बाहर रहने वाले लोगों की संख्या देश के भीतर रहने वालों से अधिक हो सकती है।
- दोहरी नागरिकता की स्थिति भी संभव है, जैसे यहूदी अमेरिकी एक साथ इजराइल और अमेरिका के नागरिक हो सकते हैं।
- आधुनिक युग में लोकतंत्र और राष्ट्रवाद राजनीतिक वैधता के प्रमुख स्रोत हैं। एक राज्य के लिए राष्ट्र सर्वाधिक स्वीकृत आधार बन गया है।
4. राज्य अकसर सांस्कृतिक विविधता के बारे में शंकालु क्यों होते हैं?
उत्तर: राज्य अक्सर सांस्कृतिक विविधता के प्रति शंकालु रहते हैं, क्योंकि:
- राज्य राष्ट्र-निर्माण की रणनीतियों के माध्यम से अपनी राजनीतिक वैधता स्थापित करना चाहते हैं।
- वे आत्मसात्करण और एकीकरण की नीतियों द्वारा नागरिकों की निष्ठा व आज्ञाकारिता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
- अधिकांश राज्य सांस्कृतिक विविधता को खतरनाक मानते थे और इसे खत्म या कम करने का प्रयास करते रहे। उन्हें डर था कि नृजातीय, भाषाई या धार्मिक विविधता को मान्यता देने से सामाजिक विखंडन होगा और समरस समाज के निर्माण में बाधा आएगी।
- इस प्रकार के अंतरों को समायोजित करना राजनीतिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण होता है, इसीलिए कई राज्यों ने इन विभिन्न पहचानों को दबाने का प्रयास किया।
5. क्षेत्रवाद क्या होता है? आमतौर पर यह किन कारकों पर आधारित होता है?
उत्तर: क्षेत्रवाद एक ऐसी भावना है जिसमें एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र के लोग अपनी अलग पहचान, हित और अधिकारों की माँग करते हैं।
- भारत में क्षेत्रवाद की जड़ें विविध भाषाओं, संस्कृतियों, जनजातियों और धर्मों में निहित हैं।
- 'प्रेसीडेंसी से राज्य तक का सफर': स्वतंत्रता के बाद प्रारंभ में ब्रिटिशकालीन बड़े प्रांत (प्रेसीडेंसी) ही बने रहे, जैसे मद्रास, कलकत्ता और बंबई।
- धर्म के बजाय भाषा ने क्षेत्रीय व जनजातीय पहचान के साथ मिलकर नृजातीय-राष्ट्रीय पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- तीव्र जन आंदोलनों के कारण इन इकाइयों का पुनर्गठन कर भाषाई राज्यों का निर्माण किया गया। हालाँकि, सभी भाषाई समुदायों को अलग राज्य नहीं मिला।
- छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड जैसे राज्यों के निर्माण में भाषा की नहीं, बल्कि जनजातीय पहचान, क्षेत्रीय वंचना और पारिस्थितिकी जैसे कारकों की प्रमुख भूमिका थी।
6. आपकी राय में, राज्यों के भाषाई पुनर्गठन ने भारत का हित या अहित किया है?
उत्तर: भारत में भाषाई पुनर्गठन ने मुख्य रूप से देश का हित किया है।
- भाषा ने क्षेत्रीय व जनजातीय पहचान के साथ मिलकर नृजातीय-राष्ट्रीय पहचान बनाने में एक सशक्त माध्यम का काम किया।
- इससे संवाद सुगम हुआ और प्रशासन अधिक प्रभावकारी बना।
- राज्य पुनर्गठन आयोग (1956) की रिपोर्ट ने राष्ट्र को राजनीतिक व संस्थागत जीवन की एक नई दिशा दी। कन्नड़ और भारतीय, तमिल और भारतीय जैसी दोहरी पहचान के बीच एकात्मकता बनी रही।
- 1953 में पोट्टी श्रीरामुलु के अनशन के बाद हुई हिंसा के कारण आंध्र प्रदेश के गठन और फिर राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना हुई, जिसने भाषा आधारित राज्यों के सिद्धांत को औपचारिक मान्यता दी।
- भाषा आधारित राज्यों के बीच कभी-कभी विवाद होते हैं, परन्तु यह स्थिति और भी खराब हो सकती थी। वर्तमान में 29 राज्य और 7 केंद्रशासित प्रदेश भारतीय राष्ट्र-राज्य का हिस्सा हैं, जो इसकी सफलता को दर्शाता है।
7. 'अल्पसंख्यक' (वर्ग) क्या होता है? अल्पसंख्यक वर्गों को राज्य से संरक्षण की क्यों ज़रूरत होती है?
उत्तर: अल्पसंख्यक आमतौर पर सुविधावंचित समूह होता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, अल्पसंख्यक समूह के सदस्यों में सामूहिकता, एकता और आपसी घनिष्ठता की भावना होती है।
- यह समूह सुविधाओं से वंचित होता है और पूर्वाग्रह व भेदभाव का शिकार होता है, जिससे उनकी अंतर-सामूहिक निष्ठा बढ़ जाती है।
- केवल सांख्यिकीय अल्पसंख्यक (जैसे बाएँ हाथ से काम करने वाले) समाजशास्त्रीय अल्पसंख्यक नहीं होते, क्योंकि उनमें सामूहिकता का भाव नहीं होता।
- धार्मिक व सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के प्रभुत्व के कारण संरक्षण की आवश्यकता होती है। वे राजनीतिक रूप से भी असुरक्षित महसूस करते हैं कि कहीं बहुसंख्यक सत्ता पर कब्ज़ा करके उनकी सांस्कृतिक व धार्मिक स्वतंत्रता को दबा न दें।
- अपवाद: पारसी या सिख जैसे आर्थिक रूप से संपन्न समुदाय भी सांस्कृतिक दृष्टि से अल्पसंख्यक हैं, क्योंकि उनकी संख्या बहुत कम है।
- राज्य की चुनौती यह है कि वह एक ओर धर्मनिरपेक्षता की बात करता है और दूसरी ओर अल्पसंख्यक संरक्षण की। संरक्षण के समर्थकों का मानना है कि बिना इसके अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के मूल्य थोपने पड़ेंगे।
8. सांप्रदायवाद या सांप्रदायिकता क्या है?
उत्तर: सांप्रदायिकता एक धार्मिक आधार पर आक्रामक राजनीतिक विचारधारा है।
- यह अपनी धार्मिक पहचान के रास्ते में आने वाली हर चीज़ को रौंद देने की मानसिकता है और यह विभिन्न समूहों को एक सजातीय पहचान में बाँधने का प्रयास करती है।
- सांप्रदायिकता का सरोकार मुख्यतः राजनीति से है। एक संप्रदायवादी व्यक्ति धार्मिक रूप से श्रद्धालु हो भी सकता है और नहीं भी।
- संप्रदायवादी आक्रामक राजनीतिक पहचान बनाते हैं और उन सभी की निंदा या उन पर आक्रमण करने को तैयार रहते हैं जो उनकी पहचान साझा नहीं करते।
- भारत में 1984 के सिख-विरोधी दंगे और 2002 के गुजरात दंगे सांप्रदायिक हिंसा के उदाहरण हैं।
- हालाँकि, भारत में धार्मिक बहुलवाद और समन्वयवाद की भी एक सुदीर्घ परंपरा रही है, जो भक्ति और सूफी आंदोलनों के साहित्य में स्पष्ट दिखती है।
9. भारत में वह विभिन्न भाव (अर्थ) कौन से हैं, जिनमें धर्मनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षतावाद को समझा जाता है?
उत्तर: भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता के अर्थ पश्चिमी अर्थ से भिन्न हैं।
- पश्चिमी अर्थ: इसमें धर्मनिरपेक्षता का अर्थ चर्च और राज्य का पूर्ण अलगाव है। यहाँ धर्म को सार्वजनिक जीवन से हटाकर एक स्वैच्छिक व्यक्तिगत विश्वास बना दिया गया। यह आधुनिकता, विज्ञान और तर्क के उदय से जुड़ा है।
- भारतीय अर्थ: भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों को समान सम्मान और संरक्षण देगा। यह धर्म से दूरी बनाने के बजाय सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार की वकालत करती है।
- तनाव का कारण: तनाव तब पैदा होता है जब पश्चिमी मॉडल (धर्म से पृथक्करण) और भारतीय मॉडल (सभी धर्मों के प्रति समानता) के बीच अंतर को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
10. आज नागरिक समाज संगठनों की क्या प्रासंगिकता है?
उत्तर: नागरिक समाज परिवार (निजी क्षेत्र) और राज्य व बाजार (सार्वजनिक क्षेत्र) के बीच का वह स्थान है जहाँ लोग स्वेच्छा से संगठन बनाकर सामूहिक हितों के लिए कार्य करते हैं।
- इसमें राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन, मीडिया, मजदूर संघ, गैर-सरकारी संगठन (NGO) आदि शामिल हैं।
- इसकी प्रमुख शर्त यह है कि यह न तो राज्य द्वारा नियंत्रित हो और न ही केवल लाभ कमाने वाली संस्था हो।
- 1975-77 के आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन ने नागरिक समाज की महत्ता को रेखांकित किया।
- वर्तमान प्रासंगिकता:
- नागरिक समाज संगठनों की गतिविधियाँ अब राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विस्तृत हो चुकी हैं।
- जनसंचार माध्यमों ने इनकी भूमिका को और सशक्त बनाया है।
- ये संगठन जनजातीय अधिकार, नगरीय शासन, महिला हिंसा, शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों को उठाते हैं।
- सूचना का अधिकार (RTI) आंदोलन इसका एक शानदार उदाहरण है, जो राजस्थान के गाँवों से शुरू होकर एक राष्ट्रीय कानून बन गया और नागरिकों को सरकारी कार्यों में पारदर्शिता का अधिकार दिलाया।
--- पाठ के प्रश्नोत्तर समाप्त ---