UP Board Class 7 Social Studies 9. बाजार में एक कमीज is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 7 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: नहीं, स्वप्ना को रूई का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण यह था कि उसने एक स्थानीय व्यापारी से 2500 रुपये ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लिया था। कर्ज लेते समय व्यापारी ने स्वप्ना को एक शर्त मानने के लिए राजी कर लिया कि वह अपनी पूरी रूई केवल उसी व्यापारी को बेचेगी। जब रूई तैयार हुई, तो व्यापारी ने बाजार भाव से कम कीमत देकर उसे खरीद लिया। बाजार में रूई का भाव 1800 रुपये प्रति क्विंटल था, लेकिन व्यापारी ने स्वप्ना को केवल 1000 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से भुगतान किया। इस प्रकार, कर्ज और बाध्यता के कारण स्वप्ना को नुकसान उठाना पड़ा।
उत्तर: व्यापारी ने स्वप्ना को कम मूल्य दिया क्योंकि उसने स्वप्ना पर दो तरह से नियंत्रण स्थापित कर लिया था। पहला, उसने स्वप्ना को ऊँचे ब्याज पर कर्ज दिया था। दूसरा, कर्ज देते समय ही उसने यह शर्त लगा दी थी कि स्वप्ना अपनी सारी रूई केवल उसे ही बेचेगी। इस शर्त के कारण स्वप्ना के पास रूई बेचने के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। व्यापारी इस स्थिति का फायदा उठाकर बाजार भाव से काफी कम कीमत पर रूई खरीद सका।
उत्तर: हमारे विचार से, बड़े किसान अपनी रूई सीधे बड़े बाजार या मंडी में ले जाकर बेचेंगे, जहाँ उन्हें अच्छा दाम मिलने की संभावना अधिक होती है। उनकी स्थिति स्वप्ना से निम्नलिखित तरीकों से भिन्न है:
1. आर्थिक स्वतंत्रता: बड़े किसान आमतौर पर छोटे किसानों की तरह कर्ज के बंधन में नहीं बंधे होते। इसलिए वे किसी एक व्यापारी के साथ बाध्यकारी समझौता करने के लिए मजबूर नहीं होते।
2. विकल्प की स्वतंत्रता: उनके पास अपनी फसल बेचने के लिए कई व्यापारियों या मंडियों के बीच चयन करने की स्वतंत्रता होती है। वे सबसे अच्छी कीमत देने वाले खरीदार को चुन सकते हैं।
3. पैमाने का लाभ: चूंकि उनकी पैदावार अधिक होती है, इसलिए परिवहन लागत और अन्य खर्चों को वहन करना उनके लिए आसान होता है, जिससे सीधे बड़े बाजार तक पहुँचना संभव हो पाता है।
उत्तर: इरोड के कपड़ा बाजार में विभिन्न लोगों के कार्य इस प्रकार हैं:
व्यापारी: इरोड के कपड़ा बाजार में व्यापारी का मुख्य काम बुनकरों से कपड़ा खरीदना और उसे आगे बेचना है। वे बुनकरों को सूत उपलब्ध कराते हैं और उनसे तैयार कपड़ा लेते हैं। फिर वे इस कपड़े को देश के अन्य शहरों के व्यापारियों या सीधे निर्यातक कारखानों को बेचते हैं।
बुनकर: बुनकर व्यापारियों से सूत प्राप्त करते हैं और उससे कपड़ा बुनने का काम करते हैं। वे व्यापारियों के दिए गए डिजाइन और आदेश के अनुसार कपड़ा तैयार करते हैं और तैयार माल वापस व्यापारी को ही दे देते हैं। उनकी आय मुख्य रूप से मजदूरी के रूप में होती है।
निर्यातक: निर्यातक वे बड़े व्यवसायी या कंपनियाँ हैं जो इरोड के व्यापारियों से कपड़ा खरीदती हैं। वे इस कपड़े का उपयोग दिल्ली या अन्य शहरों में स्थित अपने कारखानों में कपड़े (जैसे कमीजें) सिलने के लिए करते हैं। तैयार कपड़ों को वे अमेरिका, यूरोप आदि देशों के खरीदारों को निर्यात करते हैं।
उत्तर: बुनकर व्यापारियों पर निम्नलिखित तरीकों से पूरी तरह निर्भर हैं:
1. कच्चे माल के लिए: बुनकरों के पास खुद सूत खरीदने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं होती। इसलिए वे कच्चा माल (सूत) व्यापारियों से ही प्राप्त करते हैं।
2. काम के आदेश के लिए: बुनकरों को काम व्यापारियों द्वारा ही दिया जाता है। व्यापारी ही तय करते हैं कि कितना कपड़ा, किस डिजाइन का और कब तक बनाना है।
3. तैयार माल की बिक्री के लिए: बुनकर अपना बुना हुआ कपड़ा सीधे बाजार में नहीं बेच पाते। उन्हें तैयार कपड़ा वापस उसी व्यापारी को बेचना पड़ता है जिसने सूत दिया था।
4. पूंजी/ऋण के लिए: करघा खरीदने या मरम्मत कराने जैसे बड़े खर्चों के लिए भी बुनकरों को व्यापारियों से ही ऊँचे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है, जो उनकी निर्भरता को और बढ़ा देता है।
उत्तर: यह सैद्धांतिक रूप से संभव है, लेकिन व्यवहार में बुनकरों के लिए यह बहुत मुश्किल है। यदि बुनकर खुद सूत खरीदकर कपड़ा बुनें और फिर उसे सीधे बाजार में बेचें, तो व्यापारी के बीच के मुनाफे का हिस्सा भी उन्हें मिल सकता है, जिससे उनकी आय दोगुनी या तीन गुना तक बढ़ सकती है। हालाँकि, इसमें आने वाली चुनौतियाँ हैं:
- पूंजी की कमी: सूत खरीदने और करघे चलाने के लिए पर्याप्त पूंजी की जरूरत होती है, जो अधिकांश बुनकरों के पास नहीं होती।
- बाजार तक पहुँच का अभाव: बुनकरों के पास तैयार कपड़े को बेचने के लिए बाजारों या ग्राहकों तक सीधी पहुँच नहीं होती। उन्हें नहीं पता होता कि कपड़ा कहाँ और किस दाम पर बिकेगा।
- जोखिम: सूत खरीदने और कपड़ा बुनने के बाद अगर कपड़ा नहीं बिकता या उचित दाम नहीं मिलता, तो बुनकर को भारी नुकसान हो सकता है। व्यापारी की मध्यस्थता इस जोखिम को कम करती है।
- दादन प्रथा: कर्ज और कच्चे माल की आपूर्ति के बंधन के कारण बुनकर व्यापारियों से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाते।
उत्तर: हाँ, दादन व्यवस्था (जहाँ व्यापारी कच्चा माल देता है और तैयार माल वापस लेता है) पापड़, बीड़ी, मसाले बनाने जैसे कई अन्य घरेलू और छोटे उद्योगों में भी देखने को मिलती है। हमारे इलाके में इस तरह की व्यवस्था के उदाहरण इस प्रकार हैं:
1. पापड़ बनाने में: एक बड़ा व्यापारी या कंपनी आलू, मसाले, दाल का आटा आदि कच्चा माल महिलाओं के समूह या घरेलू कारीगरों को देती है। वे लोग घर पर ही पापड़ बेलकर और सुखाकर तैयार करते हैं। तैयार पापड़ व्यापारी को वापस कर देते हैं और उसके बदले में उन्हें मजदूरी मिलती है।
2. बीड़ी बनाने में: बीड़ी कारखाने का मालिक तेंदू पत्ता और तम्बाकू बीड़ी बनाने वाले श्रमिकों को देता है। श्रमिक घर बैठे बीड़ी बनाते हैं और तैयार बीड़ी गिनती के हिसाब से कारखाने को लौटा देते हैं। उन्हें प्रति हजार बीड़ी के हिसाब से मजदूरी मिलती है।
3. मसाले बनाने में: व्यापारी सूखी हल्दी, धनिया, मिर्च आदि कच्चे मसाले देता है। कारीगर उन्हें पीसकर, मिलाकर तैयार मसाला पाउडर बनाते हैं और व्यापारी को दे देते हैं। व्यापारी उसे अच्छी पैकिंग में डालकर बाजार में ऊँचे दाम पर बेचता है।
उत्तर: सहकारी संस्थाएँ छोटे उत्पादकों, किसानों और दुकानदारों के सामूहिक हित और लाभ के लिए स्थापित की गई हैं। इनका मुख्य उद्देश्य बिचौलियों को हटाकर उत्पादकों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य दिलाना है। हमारे इलाके में:
- दूध सहकारी समिति: छोटे और मझोले डेयरी किसान मिलकर एक सहकारी समिति बनाते हैं। वे सभी अपना दूध इसी समिति को देते हैं। समिति दूध को एकत्र करके, उसकी गुणवत्ता जाँच करके बड़े शहरों की डेयरियों या सरकारी संस्थाओं को सीधे बेचती है। इससे किसानों को नियमित और उचित दाम मिलता है और व्यक्तिगत रूप से बिचौलियों से होने वाले शोषण से बचाव होता है।
- किराना/धान सहकारी समिति: किसान अपनी फसल (जैसे धान, गेहूँ) अलग-अलग बेचने की बजाय सहकारी समिति को बेचते हैं। समिति बड़ी मात्रा में एकत्रित फसल को सीधे बाजार समिति या सरकारी खरीद केंद्रों पर बेचती है। इससे किसानों को एक सामूहिक सौदेबाजी की ताकत मिलती है और उनकी फसल का बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।
उत्तर: विदेशी खरीदार (जैसे अमेरिका या यूरोप के बड़े स्टोर चेन) वस्त्र निर्यातकों से निम्नलिखित मुख्य अपेक्षाएँ रखते हैं:
1. न्यूनतम कीमत: वे सबसे कम संभव कीमत पर उच्च गुणवत्ता का माल खरीदना चाहते हैं।
2. उच्च गुणवत्ता: कपड़े और कमीजों की सिलाई, रंग, डिजाइन आदि में किसी प्रकार का दोष बर्दाश्त नहीं किया जाता।
3. समय पर डिलीवरी: माल एक निश्चित तिथि तक पहुँच जाना चाहिए, किसी भी प्रकार की देरी स्वीकार्य नहीं है।
वस्त्र निर्यातक इन कठोर शर्तों को निम्न कारणों से स्वीकार कर लेते हैं:
- विदेशी खरीदार बहुत बड़े ऑर्डर देते हैं, जिससे निर्यातक को अच्छा मुनाफा होता है।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक है। अगर एक निर्यातक ये शर्तें नहीं मानेगा, तो खरीदार दूसरे निर्यातक से सौदा कर लेगा।
- इन शक्तिशाली ग्राहकों के साथ लंबे समय तक व्यापार चलाने के लिए उनकी शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है।
उत्तर: वस्त्र निर्यातक विदेशी खरीदारों की कठोर शर्तों को पूरा करने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाते हैं:
1. कम लागत पर उत्पादन: न्यूनतम कीमत की शर्त पूरी करने के लिए वे अपने यहाँ उत्पादन लागत को कम से कम रखने की कोशिश करते हैं। वे बुनकरों और कारखाने के मजदूरों को कम से कम मजदूरी देते हैं और सस्ते कपड़े खरीदते हैं।
2. गुणवत्ता नियंत्रण: उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कारखाने में हर चरण पर कपड़े और कमीजों की कड़ी जाँच की जाती है। दोषयुक्त सामान को अलग कर दिया जाता है।
3. समय प्रबंधन: समय पर डिलीवरी के लिए वे कारखाने में लगातार काम चलाते हैं और कई बार मजदूरों से अतिरिक्त समय तक काम करवाते हैं ताकि ऑर्डर समय पर पूरा हो सके।
4. लचीला कार्यबल: वे अधिकांश कर्मचारियों को अस्थायी रखते हैं। जब ऑर्डर अधिक होता है तो अधिक मजदूर रख लेते हैं और ऑर्डर पूरा होने पर उन्हें हटा देते हैं। इससे उन पर स्थायी वेतन का बोझ नहीं पड़ता।
उत्तर: इम्पेक्स गार्मेण्ट फैक्टरी में अधिक संख्या में महिलाओं को काम पर रखने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ फैक्टरी मालिक के फायदे से जुड़े हैं:
1. कम मजदूरी: अक्सर महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है, भले ही वही काम कर रही हों। इससे फैक्टरी मालिक की लागत कम होती है।
2. लचीला रोजगार: महिलाओं को ज्यादातर अस्थायी या अनुबंध के आधार पर रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर उनसे अतिरिक्त समय तक काम लिया जा सकता है और जरूरत न होने पर आसानी से हटाया जा सकता है।
3. कुछ विशेष कौशल: सिलाई, कढ़ाई, बटन लगाना, इस्तरी करना, पैकिंग जैसे कामों में महिलाओं को अधिक निपुण या सावधानी बरतने वाला माना जाता है।
4. कम विरोध: ऐसा माना जाता है कि महिलाएँ कठिन परिस्थितियों या कम मजदूरी के खिलाफ पुरुषों की तुलना में कम संगठित होती हैं या विरोध कम करती हैं, जिससे प्रबंधन को नियंत्रण में रखना आसान होता है।
उत्तर: व्यवसायी (जैसे कपड़ा व्यापारी या निर्यातक) बाजार में ऊँचा मुनाफा निम्नलिखित कारणों से कमा पाते हैं:
1. उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की खाई: वे उत्पादक (किसान, बुनकर) से बहुत कम कीमत पर माल खरीदते हैं और उसे उपभोक्ता को बहुत ऊँची कीमत पर बेचते हैं। इस बीच के अंतर से ही उनका मुख्य मुनाफा होता है।
2. श्रम की कम लागत: वे बुनकरों और कारखाने के मजदूरों को बहुत कम मजदूरी देते हैं, कई बार न्यूनतम मजदूरी से भी कम। इससे उत्पादन लागत कम रहती है।
3. बाजार पर नियंत्रण: उनके पास पूंजी, भंडारण और बाजार तक पहुँच होती है, जबकि छोटे उत्पादकों के पास यह नहीं होती। इस एकाधिकार के कारण वे कीमत तय करने की शक्ति रखते हैं।
4. व्यापार श्रृंखला में बिचौलिये: बाजार में कई स्तर के बिचौलिये (जैसे थोक व्यापारी, फुटकर व्यापारी) होते हैं, जिनमें से हर एक मुनाफा कमाता है। अंतिम उपभोक्ता को यह सारा मुनाफा चुकाना पड़ता है।
उत्तर: स्वप्ना ने अपनी रूई कुर्नूल के बड़े रूई बाजार में न जाकर स्थानीय व्यापारी को ही बेच दी, क्योंकि वह उस व्यापारी के साथ एक बाध्यकारी समझौते में बंधी हुई थी। खेती की जरूरतों के लिए स्वप्ना ने उसी व्यापारी से 2500 रुपये का कर्ज ऊँचे ब्याज पर लिया था। कर्ज लेते समय व्यापारी ने स्वप्ना से यह वादा करवा लिया था कि वह अपनी पूरी रूई की फसल केवल उसे ही बेचेगी। इस शर्त के कारण स्वप्ना के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। अगर वह कर्नूल के बाजार में रूई बेचने जाती, तो उसे शायद बेहतर दाम मिलता, लेकिन कर्ज और वादे के बंधन ने उसे व्यापारी पर निर्भर बना दिया था।
उत्तर: वस्त्र निर्यातक कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के काम के हालात और मजदूरी निम्नलिखित हैं:
काम के हालात:
- अधिकांश मजदूर अस्थायी हैं। उन्हें केवल तब तक रखा जाता है जब तक ऑर्डर पूरा होता है।
- उनसे लंबे समय तक काम लिया जा सकता है, लेकिन अतिरिक्त काम के लिए उचित भुगतान नहीं मिलता।
- नौकरी की सुरक्षा नहीं होती। मालिक किसी भी समय बिना किसी नोटिस के उन्हें नौकरी से निकाल सकता है।
मजदूरी:
- मजदूरी बहुत कम है और काम के प्रकार के अनुसार अलग-अलग है।
- दर्जी (जो कमीज सिलता है) को सबसे अधिक लगभग 3000 रुपये प्रति माह मिलते हैं।
- सहायक के रूप में काम करने वाली महिलाओं को बहुत कम मजदूरी मिलती है। उदाहरण के लिए, प्रति कमीज इस्तरी करने के सिर्फ 1.50 रुपये मिलते हैं।
- कपड़े की जाँच करने वाले को लगभग 2000 रुपये प्रति माह मिलते हैं।
- धागा काटने और बटन लगाने वाले को लगभग 1500 रुपये प्रति माह मिलते हैं।
क्या मजदूरों के साथ न्याय होता है? नहीं, हमारे विचार से मजदूरों के साथ न्याय नहीं होता। उन्हें उनके काम के अनुरूप पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलती। अस्थायी नौकरी के कारण उनकी आजीविका अनिश्चित रहती है।
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