UP Board Class 7 Social Studies 5. औरतों ने बदली दुनिया is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 7 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
UP Board Solutions for Class 7 Social Studies सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन - 5
उत्तर: ऐसे कई व्यवसाय हैं जहाँ पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक है। इनमें से कुछ प्रमुख हैं: पुलिस बल, सेना, ट्रक या बस ड्राइवर, पेट्रोल पंप के कर्मचारी, रेलवे इंजन ड्राइवर, हवाई जहाज के पायलट, बड़े व्यापार, खेती-किसानी, वैज्ञानिक अनुसंधान और भारी उद्योगों में मजदूरी का काम। इन क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से पुरुषों का वर्चस्व रहा है, हालाँकि अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है।
उत्तर: नर्सिंग के पेशे में महिलाओं की संख्या अधिक होने के पीछे समाज की एक रूढ़िवादी सोच है। यह माना जाता है कि महिलाएँ स्वभाव से अधिक सहनशील, देखभाल करने वाली और विनम्र होती हैं, जो एक नर्स के गुण हैं। इसे परिवार में महिला की देखभाल करने वाली भूमिका से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि बीमार व्यक्ति को घर जैसा प्यार और सेवा-भाव चाहिए, जो महिलाओं में स्वाभाविक रूप से मौजूद होता है। हालाँकि, यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि पुरुष भी अच्छे नर्स हो सकते हैं।
उत्तर: हाँ, महिला किसानों की संख्या पुरुषों की तुलना में कम है। इसके कई कारण हैं:
1. खेती के कई काम, जैसे हल चलाना, भारी बोझ ढोना, या मशीनें चलाना, शारीरिक रूप से बहुत मेहनत के हैं। समाज में यह धारणा है कि पुरुषों का शरीर इन कठिन कामों के लिए अधिक मजबूत होता है।
2. अक्सर खेत की ज़मीन का मालिकाना हक पुरुषों के नाम पर होता है, इसलिए उन्हें ही मुख्य किसान माना जाता है, भले ही महिलाएँ खेत में बराबर का श्रम करती हों।
3. गाँवों में लड़कियों की पढ़ाई पर कम ध्यान दिया जाता है, जिससे उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी नहीं मिल पाती।
उत्तर (क): यदि हम जेवियर होते तो अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनते। कोई भी विषय स्वयं में खराब नहीं होता। अगर किसी विषय में हमारी दिलचस्पी है और हम मेहनत से पढ़ते हैं, तो उसमें भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं और एक सफल करियर बना सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि विषय का चुनाव दबाव में आकर नहीं, बल्कि अपनी योग्यता और रुचि के आधार पर करना चाहिए।
उत्तर (ख): लड़कों को भी समाज के कई दबावों का सामना करना पड़ता है, जैसे:
1. माता-पिता और परिवार से हमेशा अच्छे अंक लाने और टॉप करने का दबाव।
2. अपनी पसंद के विषय न चुन पाने का दबाव, क्योंकि परिवार उन्हें केवल विज्ञान या वाणिज्य जैसे विषय ही पढ़ाना चाहता है।
3. परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने और एक 'अच्छी' व स्थिर नौकरी पाने का दबाव।
4. 'मर्द बनो' या 'रोना मत' जैसी भावनाओं को दबाने के दबाव, जिससे वे अपनी भावनाएँ खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते।
उत्तर: माध्यमिक स्कूल स्तर (कक्षा 9-10) पर लगभग 52 प्रतिशत बच्चे स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। यह आँकड़ा विभिन्न समूहों में अलग-अलग है:
- अनुसूचित जाति के 57 प्रतिशत लड़के।
- अनुसूचित जनजाति के 69 प्रतिशत लड़के।
- अनुसूचित जाति की 62 प्रतिशत लड़कियाँ।
- अनुसूचित जनजाति की 71 प्रतिशत लड़कियाँ।
यह आँकड़े दर्शाते हैं कि समाज के वंचित वर्गों के बच्चों, विशेषकर लड़कियों के लिए शिक्षा पूरी करना एक बड़ी चुनौती है।
उत्तर: शिक्षा के उच्च माध्यमिक स्तर (कक्षा 11-12) पर सबसे अधिक बच्चे स्कूल छोड़ते हुए दिखाई देते हैं। इस स्तर पर लगभग 63 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं। विभिन्न समूहों के आँकड़े इस प्रकार हैं:
- अनुसूचित जाति के 71 प्रतिशत लड़के।
- अनुसूचित जनजाति के 78 प्रतिशत लड़के।
- अनुसूचित जाति की 76 प्रतिशत लड़कियाँ।
- अनुसूचित जनजाति की 81 प्रतिशत लड़कियाँ।
इससे स्पष्ट है कि जैसे-जैसे कक्षा का स्तर बढ़ता है, ड्रॉप-आउट (स्कूल छोड़ने) की दर भी बढ़ती जाती है।
उत्तर: अन्य वर्गों की तुलना में आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) लड़के-लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर अधिक होने के प्रमुख कारण हैं:
1. स्कूलों की कमी: आदिवासी इलाके अक्सर दूर-दराज के जंगलों या पहाड़ों में होते हैं, जहाँ स्कूलों की संख्या बहुत कम है। बच्चों को पढ़ने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है, जो खतरनाक और कठिन है।
2. गरीबी: आदिवासी समुदायों में गरीबी अधिक है। परिवार के सदस्यों को कम उम्र में ही काम करके पैसे कमाने पड़ते हैं। पढ़ाई का थोड़ा-बहुत खर्च (जैसे कॉपी-किताब, यूनिफॉर्म) भी वहन नहीं कर पाते।
3. भाषा की बाधा: स्कूल में पढ़ाई की भाषा (हिंदी/अंग्रेजी) अक्सर उनकी मातृभाषा से अलग होती है, जिससे उन्हें समझने में दिक्कत होती है और पढ़ाई में रुचि कम हो जाती है।
4. भेदभाव: कई बार स्कूल में अन्य बच्चों या शिक्षकों द्वारा उनके साथ भेदभाव किया जाता है, जिससे वे असहज महसूस करते हैं और स्कूल जाना छोड़ देते हैं।
उत्तर: नीचे दिए गए आँकड़ों के आधार पर एक सरल दंडारेख (बार ग्राफ) बनाया गया है। यह ग्राफ प्राथमिक कक्षाओं में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का प्रतिशत दर्शाता है।
| श्रेणी | सभी लड़के | अनु. जाति के लड़के | अनु. जनजाति के लड़के | सभी लड़कियाँ | अनु. जाति की लड़कियाँ | अनु. जनजाति की लड़कियाँ |
|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रतिशत (%) | 34 | 37 | 49 | 29 | 36 | 49 |
दंडारेख का विवरण:
इस दंडारेख में X-अक्ष (क्षैतिज रेखा) पर विभिन्न श्रेणियों के नाम (जैसे सभी लड़के, अनु. जाति के लड़के आदि) लिखे जाएँगे। Y-अक्ष (ऊर्ध्वाधर रेखा) पर 0 से 100 तक का प्रतिशत पैमाना होगा। प्रत्येक श्रेणी के ऊपर उसके प्रतिशत के बराबर ऊँचाई वाला एक दंड (आयत) बनाया जाएगा। उदाहरण के लिए, 'सभी लड़के' के ऊपर 34% की ऊँचाई वाला दंड और 'अनुसूचित जनजाति की लड़कियाँ' के ऊपर 49% की ऊँचाई वाला दंड बनेगा। ग्राफ से स्पष्ट है कि अनुसूचित जनजाति के बच्चों (लड़के और लड़कियाँ दोनों) में ड्रॉप-आउट दर सबसे अधिक (49%) है।
उत्तर: महिलाओं के बारे में प्रचलित रूढ़िवादी धारणाएँ उनके समानता के अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं:
1. शिक्षा पर प्रभाव: यह माना जाता है कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है। इसलिए उन्हें केवल स्थानीय स्कूल तक ही पढ़ने दिया जाता है। उच्च शिक्षा या दूर के कॉलेज में भेजने से परहेज किया जाता है।
2. स्वतंत्रता पर पाबंदी: 'लड़कियों को चारदीवारी में रहना चाहिए' जैसी सोच के कारण उनकी आवाजाही और फैसले लेने की आजादी सीमित कर दी जाती है। पर्दा प्रथा और कम उम्र में शादी इसी सोच का नतीजा है।
3. भेदभावपूर्ण परवरिश: लड़कियों को 'पराया धन' और लड़कों को 'वंश चलाने वाला' माना जाता है। इसलिए लड़कों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण पर अधिक खर्च किया जाता है, जो लैंगिक असमानता को बढ़ाता है।
4. करियर के विकल्प सीमित करना: यह माना जाता है कि लड़कियों का मुख्य काम घर संभालना है। इसलिए उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक जैसे पेशों के बजाय सिलाई-कढ़ाई या शिक्षण जैसे 'उपयुक्त' क्षेत्रों की ओर ही प्रेरित किया जाता है।
उत्तर: राससुंदरी देवी, रमाबाई और रुकैया हुसैन के लिए अक्षर ज्ञान इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि उस जमाने में लड़कियों को पढ़ने-लिखने की इजाजत नहीं थी। पढ़ना उनके लिए आजादी पाने और अपने बारे में फैसले लेने का एक साधन था। यह उनके लिए ज्ञान का दरवाजा खोलता था, जिससे वे दुनिया को समझ सकें, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें और समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठा सकें। उनके लिए शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का रास्ता था।
उत्तर: यह कथन बिल्कुल गलत है। निर्धन बालिकाएँ पढ़ाई बीच में इसलिए नहीं छोड़तीं क्योंकि उनकी रुचि नहीं है, बल्कि उनके सामने ऐसी कई बाधाएँ होती हैं जो उनकी पढ़ाई जारी रखने में रुकावट बनती हैं:
1. स्कूलों की कमी और दूरी: गरीब इलाकों, खासकर गाँवों में, अच्छे स्कूल और शिक्षकों की कमी होती है। अगर स्कूल दूर है और सुरक्षित यातायात की सुविधा नहीं है, तो माता-पिता लड़कियों को भेजने से डरते हैं।
2. गरीबी: गरीब परिवार सभी बच्चों की फीस और अन्य खर्चे नहीं उठा पाते। अक्सर लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है और लड़कियों को घर के कामों में लगा दिया जाता है या उनकी शादी कर दी जाती है।
3. भेदभाव: दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों के साथ स्कूल में शिक्षक या सहपाठी भेदभाव करते हैं, जिससे वे असहज महसूस करती हैं और स्कूल जाना छोड़ देती हैं।
इसलिए, उनकी पढ़ाई छूटने का कारण उनकी 'अरुचि' नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ हैं।
उत्तर: महिला आंदोलन द्वारा अपनाए गए संघर्ष के दो प्रमुख तरीके हैं:
1. जागरूकता फैलाना: लोगों को महिलाओं के अधिकारों, कानूनों और समानता के महत्व के बारे में शिक्षित करना।
2. सीधा विरोध और आवाज उठाना: भेदभावपूर्ण या हिंसक घटनाओं का शांतिपूर्ण विरोध करना, धरना-प्रदर्शन करना और मीडिया के माध्यम से मुद्दे उठाना।
यदि हमें रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष करना पड़े, तो हम पहले तरीके यानी जागरूकता फैलाने का उपयोग करेंगे।
कारण: क्योंकि अधिकांश भेदभाव और रूढ़ियाँ अज्ञानता और गलत धारणाओं से पैदा होती हैं। लोगों को समझाकर, चर्चा करके और उदाहरणों के जरिए यह बताना कि महिलाएँ हर क्षेत्र में सफल हो सकती हैं, समाज की सोच को धीरे-धीरे बदला जा सकता है। यह तरीका टिकाऊ बदलाव लाता है और लोगों के दिल-दिमाग को बदलने में मदद करता है। हिंसा या जबरदस्ती के बजाय शिक्षा और संवाद से किया गया संघर्ष अधिक प्रभावी होता है।
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