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भारतीय संसद के दो सदन होते हैं:
एसईबीसी का पूरा नाम सोशली एंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लासेज (Socially and Educationally Backward Classes) है। यह उन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है जिन्हें संवैधानिक मान्यता प्राप्त है।
1980 में गठित मंडल आयोग की एक प्रमुख सिफारिश यह थी कि केंद्र सरकार की नौकरियों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। यह सिफारिश अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए पहले से मौजूद आरक्षण के अतिरिक्त थी।
सरकारी निर्णयों से उत्पन्न होने वाले विवादों या कानूनी चुनौतियों का निपटारा न्यायपालिका करती है। विशेष रूप से, सर्वोच्च न्यायालय (राष्ट्रीय स्तर पर) और उच्च न्यायालय (राज्य स्तर पर) इन मामलों की सुनवाई करते हैं और अंतिम निर्णय देते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 34 न्यायाधीश हो सकते हैं। प्रश्न के संदर्भ में, यदि "सबसे वरिष्ठ" से तात्पर्य मुख्य न्यायाधीश और उनके बाद के वरिष्ठ न्यायाधीशों से है, तो उनकी संख्या निश्चित नहीं है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय के बेंच (पीठ) में महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई अक्सर 5, 7, या 9 जैसी विषम संख्या में वरिष्ठ न्यायाधीशों की पीठ करती है।
मंडल आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन में विभिन्न संस्थाओं की भूमिका इस प्रकार थी:
सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों या अधिकार प्राप्त सरकारी अधिकारियों द्वारा सर्कुलर (परिपत्र) जारी किए जाते हैं। ये सर्कुलर नए नियमों, नीतियों, प्रक्रियाओं या सरकारी निर्देशों को सभी संबंधित कार्यालयों और कर्मचारियों तक पहुँचाने का औपचारिक माध्यम होते हैं।
प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे आवश्यक शर्त यह है कि उस व्यक्ति को लोकसभा के बहुमत दल या गठबंधन का नेता होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उसे लोकसभा के अधिकांश सदस्यों का विश्वास और समर्थन प्राप्त होना चाहिए। संवैधानिक रूप से, राष्ट्रपति उसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं जो लोकसभा में बहुमत साबित कर सके।
मंडल आयोग (आधिकारिक नाम: सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों का दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग) को निम्नलिखित जिम्मेदारियाँ सौंपी गई थीं:
कार्मिक मंत्रालय का यह आदेश, जिसे ओ.एम. (ऑफिस मेमोरेंडम) नंबर 36012/31/90 कहा जाता है, 13 अगस्त, 1990 को तैयार हुआ था। इसी आदेश के माध्यम से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की औपचारिक घोषणा की थी।
लोकतांत्रिक सरकार पर नागरिकों के प्रति अनेक मौलिक जिम्मेदारियाँ होती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
संस्थाएँ वे स्थापित और औपचारिक व्यवस्थाएँ या निकाय हैं जो किसी देश या समाज के शासन और प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बनाई जाती हैं। ये नियमों, प्रक्रियाओं और परंपराओं पर आधारित होती हैं, जैसे संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग आदि। इनका मुख्य उद्देश्य सत्ता के संतुलन को बनाए रखना और सरकार के कामकाज को व्यवस्थित व पारदर्शी बनाना है।
सर्वोच्च न्यायालय भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। यह वह संस्था है जहाँ नागरिकों और सरकार के बीच, विभिन्न राज्यों के बीच, या किसी भी पक्ष के बीच उत्पन्न होने वाले कानूनी वाद-विवादों का अंतिम निपटारा किया जाता है। इसके निर्णय सभी के लिए बाध्यकारी होते हैं।
लोकतांत्रिक सरकारें इसलिए संस्थाओं पर अधिक जोर देती हैं क्योंकि:
हर लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सभा (जैसे भारत में संसद और विधानसभाएँ) ही जनता की ओर से सर्वोच्च राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग करती है। ये निर्वाचित प्रतिनिधि ही कानून बनाते हैं, सरकार के कामकाज पर नजर रखते हैं और जनहित में महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।
किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून बनाने का सबसे बड़ा और मौलिक अधिकार उस देश की विधायिका (संसद या कांग्रेस जैसी संस्था) का होता है। भारत में यह अधिकार संसद के पास है, जो जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
विधायिका सरकार का वह अंग है जिसका प्राथमिक कार्य देश के लिए कानूनों का निर्माण (विधि निर्माण) करना है। चूंकि यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए संसद और विधानसभाओं को सामूहिक रूप से 'विधायिका' कहा जाता है।
संसदीय व्यवस्था में, विधायिका (कानून बनाने वाली संस्था) के विभिन्न भागों या इकाइयों को 'चेंबर' या 'सदन' कहते हैं। उदाहरण के लिए, भारत की संसद दो सदनों – लोकसभा (निचला सदन) और राज्यसभा (उच्च सदन) – में बंटी हुई है।
दूसरे सदन (जैसे राज्यसभा) का सामान्य काम संघीय ढाँचे वाले देश में विभिन्न राज्यों, क्षेत्रों या संघ की इकाइयों के हितों की रक्षा और निगरानी करना होता है। यह सदन केंद्र सरकार के एकतरफा फैसलों पर अंकुश लगाता है और विधेयकों पर गहन विचार-विमर्श के लिए एक और मंच प्रदान करता है।
राज्य सभा को अंग्रेजी में "अपर हाउस" (Upper House) या उच्च सदन कहा जाता है।
लोक सभा को अंग्रेजी में "लोअर हाउस" (Lower House) या निम्न सदन कहा जाता है।
लोकसभा, मंत्रिपरिषद (कैबिनेट) को नियंत्रित करती है। चूंकि मंत्रिपरिषद लोकसभा के बहुमत के समर्थन पर ही बनी रहती है, इसलिए लोकसभा उसके कामकाज पर नजर रखती है, प्रश्न पूछती है और अविश्वास प्रस्ताव पारित करके उसे हटा भी सकती है।
सभी मंत्रियों के समूह को मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) कहा जाता है। इसमें कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार वाले) और उपमंत्री शामिल होते हैं।
संसद के सभी फैसले (विधेयक) राष्ट्रपति की मंजूरी (हस्ताक्षर) के बाद ही कानून बनते हैं, क्योंकि भारत का राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है। संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा मिलकर भारत की संसद का गठन करते हैं। इसलिए, किसी भी विधेयक को कानून का रूप लेने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।
किसी लोकतांत्रिक देश में कार्यपालिका (सरकार चलाने वाला अंग) के दो मुख्य भाग होते हैं:
सिविल सर्वेंट या नौकरशाह वे प्रशिक्षित और स्थायी अधिकारी होते हैं जो सरकार की विभिन्न लोक सेवाओं में काम करते हैं। ये राजनीतिक रूप से तटस्थ होते हैं और अपनी तकनीकी विशेषज्ञता के आधार पर सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने का काम करते हैं। उदाहरण: आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अधिकारी।
हालाँकि नौकरशाह अक्सर अपने विभाग के तकनीकी पहलुओं के बारे में मंत्री से अधिक जानकारी और विशेषज्ञता रखते हैं (जैसे वित्त मंत्रालय का अर्थशास्त्री), फिर भी मंत्री अधिक प्रभावशाली होता है क्योंकि:
मंत्री ही अंतिम फैसले करता है क्योंकि:
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है: एक विशेषज्ञ (नौकरशाह) किसी यात्रा के रास्ते और वाहन के बारे में सलाह दे सकता है, लेकिन मंजिल (लक्ष्य) तय करने का फैसला व्यापक नजरिया रखने वाले व्यक्ति (मंत्री) का होता है। ठीक उसी तरह, निर्वाचित मंत्री विभिन्न विशेषज्ञों की सलाह लेकर, पूरे समाज के हित, राजनीतिक दृष्टिकोण और संसाधनों को ध्यान में रखते हुए अंतिम नीतिगत लक्ष्य तय करता है। वह केवल तकनीकी पहलू नहीं, बल्कि समग्र चित्र देखता है।
राष्ट्रपति उस
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| Other Chapters of class 9 Political Science | |
| 1. समकालिक विश्व में लोकतंत्र | |
| 2. लोकतंत्र क्या लोकतंत्र क्यों | |
| 3. संविधान निर्माण | |
| 4. चुनावी राजनीति | |
| 5. संस्थाओं का कामकाज | |
| 6. लोकतांत्रिक अधिकार |