UP Board Class 10 Social Science 4. जाति धर्म और लैंगिक मसले is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर : भारत में महिलाओं के साथ विभिन्न क्षेत्रों में भेदभाव और असमानता देखी जाती है, जिसके कारण वे अक्सर कमजोर स्थिति में रहती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:
1. शिक्षा में असमानता: लड़कियों को अक्सर लड़कों के बराबर शैक्षिक अवसर नहीं मिलते। कई परिवार सीमित संसाधनों को लड़कों की उच्च शिक्षा पर खर्च करना ज्यादा महत्वपूर्ण समझते हैं, जिसके कारण लड़कियों का ड्रॉप-आउट रेट अधिक होता है और उच्च शिक्षा तक पहुँच कम होती है।
2. आर्थिक भेदभाव: महिलाओं द्वारा किया जाने वाला बहुत सारा कार्य (जैसे घरेलू काम) अवैतनिक होता है। वेतनभोगी कार्यों में भी, समान योग्यता और काम के बावजूद, उन्हें पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी दी जाती है।
3. स्वास्थ्य एवं पोषण: लड़के की चाहत के कारण कई क्षेत्रों में कन्या भ्रूण हत्या और लिंग-चयनात्मक गर्भपात की प्रथा है। इसके अलावा, परिवार में भोजन और स्वास्थ्य सुविधाओं का वितरण भी अक्सर लड़कों के पक्ष में होता है।
4. हिंसा एवं उत्पीड़न: महिलाएँ घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली हिंसा का शिकार होती हैं। इन मामलों में न्याय पाना अक्सर मुश्किल और लंबी प्रक्रिया वाला होता है।
5. सामाजिक रूढ़िवादिता: समाज अक्सर महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिकाएँ निर्धारित करता है। महिलाओं को मुख्य रूप से घर और परिवार की जिम्मेदारी संभालने वाली माना जाता है, जबकि पुरुषों को आजीविका कमाने वाला और निर्णय लेने वाला समझा जाता है।
उत्तर : सांप्रदायिक राजनीति धर्म के आधार पर समाज को बाँटने और राजनीतिक लाभ हासिल करने की प्रक्रिया है। इसके विभिन्न रूप और उदाहरण इस प्रकार हैं:
1. रोजमर्रा की मान्यताओं में सांप्रदायिक भावनाएँ: इसमें एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ मानना, दूसरे धर्म के प्रति पूर्वाग्रह रखना और धार्मिक रूढ़िवादिता शामिल है। उदाहरण: कुछ कट्टरपंथी समूहों द्वारा अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताना और दूसरे धर्मों के प्रति नफरत फैलाना।
2. राजनीतिक प्रभुत्व की इच्छा: इसमें एक विशेष धार्मिक समुदाय का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से दबदबा स्थापित करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण: कुछ क्षेत्रीय दल या नेता जो केवल एक ही धर्म के लोगों के हितों की बात करते हैं और अलग राष्ट्र या स्वायत्त क्षेत्र की माँग करते हैं।
3. राजनीति में धर्म का इस्तेमाल: चुनावों के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए धार्मिक प्रतीकों, नेताओं और भावनात्मक मुद्दों का इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण: किसी पार्टी द्वारा चुनावी रैली में धर्मगुरुओं को बुलाना या धार्मिक त्योहारों के दौरान विशेष रूप से प्रचार करना।
4. सांप्रदायिक हिंसा: यह सांप्रदायिक राजनीति का सबसे खतरनाक रूप है, जिसमें दो धार्मिक समुदायों के बीच हिंसक झड़पें या दंगे होते हैं। उदाहरण: वर्ष 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगे इसका एक दुखद उदाहरण हैं।
उत्तर : भारत एक आधुनिक लोकतंत्र है, फिर भी यहाँ जाति के आधार पर असमानताएँ और भेदभाव अभी भी विभिन्न रूपों में मौजूद हैं:
1. सामाजिक भेदभाव: अंतरजातीय विवाह आज भी समाज में आसानी से स्वीकार्य नहीं हैं। कई जगहों पर अलग-अलग जातियों के लोग एक साथ बैठकर भोजन नहीं करते। 'दलित' या 'अनुसूचित जाति' के लोगों के साथ छुआछूत का व्यवहार कहीं-कहीं जारी है।
2. शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन: ऐतिहासिक रूप से शिक्षा और संसाधनों से वंचित रखी गई जातियाँ आज भी शिक्षा और रोजगार के मामले में पिछड़ी हुई हैं। हालाँकि आरक्षण जैसी नीतियों से स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन समानता पूरी तरह से हासिल नहीं हुई है।
3. राजनीति में जातिवाद: राजनीतिक दल अक्सर चुनावी रणनीति बनाते समय विभिन्न जाति समूहों के मतों का हिसाब रखते हैं। उम्मीदवारों का चयन भी कई बार उनकी जाति के आधार पर किया जाता है, जो दर्शाता है कि जाति राजनीति में एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है।
उत्तर : भारत में चुनावी परिणाम केवल जाति के आधार पर तय नहीं हो सकते, इसके दो प्रमुख कारण हैं:
1. किसी एक चुनाव क्षेत्र में एक जाति का बहुमत न होना: भारत के किसी भी संसदीय या विधानसभा क्षेत्र में ऐसा नहीं है कि किसी एक जाति के मतदाता इतने अधिक हों कि वे अकेले चुनाव का परिणाम तय कर सकें। हर क्षेत्र में विभिन्न जातियों, धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं। इसलिए, जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार या दल को विभिन्न जाति समूहों का समर्थन हासिल करना पड़ता है।
2. मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताएँ: आज का मतदाता केवल जाति के आधार पर वोट नहीं देता। विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और सुरक्षा जैसे मुद्दे भी उसके निर्णय को प्रभावित करते हैं। कोई भी राजनीतिक दल अगर केवल जातीय अपील पर निर्भर रहता है और विकास के मुद्दों को नजरअंदाज करता है, तो वह चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सकता।
उत्तर : भारत की राष्ट्रीय और राज्य स्तर की विधायिकाओं (संसद और विधानसभाओं) में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दुनिया के कई देशों की तुलना में काफी कम है।
राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर: लोकसभा में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व अब तक 15% से भी कम रहा है। इसी तरह, विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में भी यह आँकड़ा 10% के आसपास ही रहता है। यह दर्शाता है कि राजनीतिक निर्णय लेने की सर्वोच्च संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बहुत सीमित है।
स्थानीय स्तर पर बेहतर स्थिति: इसके विपरीत, स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं (पंचायतों और नगर निकायों) में स्थिति बेहतर है। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के तहत इन संस्थाओं में एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इस नीति के कारण आज देश भर में स्थानीय निकायों में 10 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि कार्यरत हैं, जो एक सकारात्मक कदम है।
महिला आरक्षण विधेयक: लंबे समय से महिला संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की माँग कर रहे हैं। इसके लिए 'महिला आरक्षण विधेयक' संसद में लंबित है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है।
उत्तर : भारत का संविधान इसे एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य का अपना कोई आधिकारिक धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों के प्रति तटस्थ रवैया रखता है। इस सिद्धांत को स्थापित करने वाले दो मुख्य संवैधानिक प्रावधान ये हैं:
1. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को 'अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार' देता है। इसका मतलब है कि हर व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने, उसके अनुसार पूजा-पाठ करने और उसका प्रचार करने की आजादी है।
2. धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15): संविधान का अनुच्छेद 15 राज्य को किसी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थानों या सार्वजनिक स्थानों पर किसी के साथ उसके धर्म के कारण भेदभाव नहीं किया जाएगा।
उत्तर : (ख) समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ
उत्तर : (घ) पंचायती राज की संस्थाएँ
उत्तर : (ग) अ और स
उत्तर : (ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बताता है |
उत्तर : जाति पर आधारित सामाजिक विभाजन सिर्फ़ भारत में ही है।
उत्तर : 1 - (ख), 2 - (क), 3 - (घ), 4 - (ग)
सही कोड: (ख) (क) (घ) (ग)
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