UP Board Solutions for Class 8 History (हमारे अतीत -III) Chapter 5
01. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की अंग्रेजों से ऐसी कया माँग थी जिसे अंग्रेजों ने ठुकरा दिया ?
उत्तर: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से यह माँग की थी कि उनके पति, महाराज गंगाधर राव की मृत्यु के बाद, उनके द्वारा गोद लिए गए पुत्र दामोदर राव को झाँसी का वैध उत्तराधिकारी और शासक मान लिया जाए। उनकी यह माँग अंग्रेजों की 'हड़प नीति' (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) के कारण ठुकरा दी गई। इस नीति के अनुसार, यदि किसी देशी रियासत का शासक बिना किसी स्वाभाविक पुत्र के मर जाता था, तो अंग्रेज उस रियासत को अपने साम्राज्य में मिला लेते थे। इसी आधार पर अंग्रेजों ने झाँसी पर भी कब्जा करने का फैसला किया।
02. ईसाई धर्म अपनाने वालों के हितों की रक्षा के लिए अंग्रेजों ने क्या किया ?
उत्तर: भारतीयों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से, अंग्रेजों ने 1850 में एक नया कानून बनाया। इस कानून के अनुसार, यदि कोई भारतीय व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो उसे अपने पूर्वजों की संपत्ति पर उसी तरह का अधिकार बना रहेगा, जैसा कि पहले था। इससे पहले, हिंदू और मुस्लिम कानून के अनुसार, धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति का पैतृक संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता था। इस नए कानून ने धर्म परिवर्तन करने वालों को संपत्ति के अधिकार की सुरक्षा दी।
03. सिपाहियों को नए कारतूसों पर क्यों ऐतराज था ?
उत्तर: सिपाहियों को नए कारतूसों पर ऐतराज इसलिए था क्योंकि उनमें एक गंभीर धार्मिक समस्या निहित थी। उस समय की एनफील्ड राइफल में कारतूस डालने से पहले उसके ऊपर लगे कागज के खोल को मुँह से काटकर खोलना पड़ता था। यह अफवाह फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है। गाय हिंदुओं के लिए पवित्र पशु है और सूअर मुसलमानों के लिए अशुद्ध (हराम) है। इसलिए, इन कारतूसों का मुँह से छूना दोनों धर्मों के सिपाहियों के लिए अपने धर्म के विरुद्ध और अपमानजनक था। यही कारण था कि सिपाहियों ने इन कारतूसों का इस्तेमाल करने से साफ इनकार कर दिया।
04. अंतिम मुग़ल बादशाह ने अपने आखिरी साल किस तरह बिताए ?
उत्तर: अंतिम मुगल बादशाह, बहादुर शाह जफर ने अपने जीवन के आखिरी साल बहुत ही दुख और अपमान के साथ बिताए। 1857 के विद्रोह के दमन के बाद, अंग्रेजों ने उन्हें और उनके परिवार को गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें देश निकाला देकर रंगून (अब म्यांमार) भेज दिया गया। वहाँ उन्हें एक जेल में कैद करके रखा गया। अपने जीवन के ये अंतिम वर्ष उन्होंने एक बंदी के रूप में, अपनी पुरानी शानो-शौकत से दूर, कठिन परिस्थितियों में बिताए। अंततः 1862 में उसी जेल में उनकी मृत्यु हो गई।
05. मई 1857 से पहले भारत में अपनी स्थित को लेकर अंग्रेज शासकों के आत्मविश्वास के क्या कारण थे ?
उत्तर: मई 1857 के विद्रोह से पहले अंग्रेज शासक भारत में अपनी स्थिति को लेकर बहुत आत्मविश्वासी थे। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
- भारतीय सैनिकों पर विश्वास: अंग्रेजों को लगता था कि भारतीय सिपाही उनके प्रति पूरी तरह वफादार हैं। उन्हीं की मदद से उन्होंने भारत में एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया था।
- पिछली जीत: प्लासी और बक्सर जैसी महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ जीतकर भारतीय सैनिकों ने ही अंग्रेजों की ताकत बढ़ाई थी, इसलिए उन्हें सिपाहियों पर पूरा भरोसा था।
- स्थानीय शासकों का समर्थन: अंग्रेज जानते थे कि बहुत से भारतीय राजा, नवाब और जमींदार उनके शासन को बनाए रखने में उनका साथ दे रहे हैं, क्योंकि इससे उनका अपना फायदा जुड़ा हुआ था।
- सैन्य ताकत: अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार और एक अनुशासित सेना थी, जिसके बल पर वे किसी भी विद्रोह को दबा सकते थे।
- राजनीतिक फूट: भारत के विभिन्न राज्य आपस में एकजुट नहीं थे, जिससे अंग्रेजों को उन पर आसानी से नियंत्रण पाने में मदद मिलती थी।
06. बहादुर शाह जफ़र द्वारा विद्रोहियों को समर्थन दे देने से जनता और राज-परिवारों पर क्या असर पड़ा ?
उत्तर: बहादुर शाह जफर द्वारा 1857 के विद्रोहियों को समर्थन देने का जनता और राजपरिवारों पर गहरा असर पड़ा:
- जनता में उत्साह: मुगल बादशाह के समर्थन से विद्रोह को एक केंद्रीय नेतृत्व और वैधता मिल गई। आम जनता में यह उम्मीद और उत्साह पैदा हुआ कि अब अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका जा सकेगा और पुरानी व्यवस्था फिर से लौट आएगी।
- राजपरिवारों को प्रोत्साहन: वे सभी राजा-रजवाड़े जो अंग्रेजों की हड़प नीति और अन्य कार्यों से नाराज थे, उन्हें बहादुर शाह के नेतृत्व में एक संगठित विद्रोह का मौका दिखाई दिया। उन्हें लगने लगा कि अब उनकी खोई हुई रियासतें वापस मिल सकती हैं।
- विद्रोह का विस्तार: बादशाह के समर्थन से यह विद्रोह केवल एक सैनिक विद्रोह न रहकर एक जन-विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम का रूप लेने लगा। दिल्ली विद्रोह का केंद्र बन गई और देश के अन्य हिस्सों से भी विद्रोही वहाँ एकत्रित होने लगे।
07. अवध के बागी भू-स्वामियों से समर्पण करवाने के लिए अंग्रेजों ने क्या किया ?
उत्तर: अवध के बागी (विद्रोही) भू-स्वामियों (तालुकदारों) को समर्पण के लिए मनाने और विद्रोह खत्म करने के लिए अंग्रेजों ने कई कदम उठाए:
- पुरस्कार और सुरक्षा का वादा: अंग्रेजों ने घोषणा की कि जो भू-स्वामी विद्रोह छोड़कर अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादार बने रहेंगे, उनकी जान और जमीन की सुरक्षा की गारंटी दी जाएगी। उन्हें अपनी जमीन पर पारंपरिक अधिकार बनाए रखने की अनुमति दी गई।
- दंड और मुकदमे: दूसरी ओर, जिन भू-स्वामियों ने विद्रोह जारी रखा और विशेषकर जिन पर अंग्रेजों की हत्या का आरोप था, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की गई। उन पर मुकदमे चलाए गए और कईयों को फाँसी जैसी सजा दी गई।
- समर्पण की शर्तें: अंग्रेजों ने यह भी कहा कि यदि कोई विद्रोही भू-स्वामी बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण कर देता है और उसने किसी अंग्रेज की हत्या नहीं की है, तो उसे क्षमा कर दिया जाएगा और उसकी संपत्ति जब्त नहीं की जाएगी।
08. 1857 की वागवत के फलस्वरूप अंग्रेजों ने अपनी नीतियां किस तरह बदली ?
उत्तर: 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने यह समझ लिया कि पुराने तरीकों से भारत पर शासन नहीं चलाया जा सकता। इसलिए उन्होंने अपनी नीतियों में निम्नलिखित बदलाव किए:
- शासन का हस्तांतरण: ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म करके भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज (रानी विक्टोरिया) के अधीन कर दिया गया।
- रियासतों के प्रति नीति: देशी रियासतों को यह आश्वासन दिया गया कि भविष्य में उन पर हड़प नीति लागू नहीं की जाएगी। गोद लेने की परंपरा को मान्यता दी गई। शासकों को उनके अधिकारों की गारंटी दी गई ताकि वे अंग्रेजों के विरुद्ध न हों।
- सेना में बदलाव: सेना में भारतीय सिपाहियों की संख्या कम कर दी गई और यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई। तोपखाना पूरी तरह यूरोपीय सैनिकों के हाथ में दे दिया गया। सिख, गोरखा और पठानों को सेना में भर्ती करने पर जोर दिया गया, क्योंकि उन्होंने 1857 में अंग्रेजों का साथ दिया था।
- धर्म और समाज के प्रति रवैया: अंग्रेजों ने भारतीयों के धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया। अब वे 'गैर-हस्तक्षेप' की नीति अपनाने लगे ताकि लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत न हों।
- जमींदारों का समर्थन: जमींदारों और तालुकदारों को जमीन पर उनके अधिकारों की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया, ताकि वे अंग्रेजी शासन के समर्थक बने रहें और ग्रामीण इलाकों में शांति बनी रहे।
- मुसलमानों के प्रति रवैया: चूंकि विद्रोह में मुसलमानों की महत्वपूर्ण भूमिका थी, इसलिए अंग्रेज उन पर संदेह की नजर से देखने लगे। कई मुसलमान नेताओं की संपत्ति जब्त कर ली गई।
09. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में और पता लगाए | आप उन्हें अपने समय की विलक्षण महिला क्यों मानते है ?
उत्तर: रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को वाराणसी में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था और प्यार से उन्हें 'मनु' कहा जाता था। 1842 में उनका विवाह झाँसी के महाराज गंगाधर राव नेवालकर से हुआ। 1851 में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन तीन महीने बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। 1853 में महाराज गंगाधर राव ने अपने एक रिश्तेदार के पुत्र दामोदर राव को गोद ले लिया, लेकिन कुछ ही समय बाद उनकी भी मृत्यु हो गई।
रानी लक्ष्मीबाई को अपने समय की एक विलक्षण (असाधारण) महिला माना जाता है, क्योंकि:
- दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस: अंग्रेजों द्वारा झाँसी हड़प लिए जाने और उन्हें किला छोड़ने के आदेश के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ने का फैसला किया, जो उस समय की एक स्त्री के लिए अत्यंत साहसिक कदम था।
- कुशल सेनानायक: उन्होंने न केवल युद्ध की योजना बनाई, बल्कि स्वयं घोड़े पर सवार होकर, तलवार हाथ में लेकर अपनी सेना का नेतृत्व किया। उन्होंने एक ऐसी सेना तैयार की जिसमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी शामिल थीं।
- राजनीतिक समझ: उन्होंने अंग्रेजों की हड़प नीति की चुनौती को समझा और अपने दत्तक पुत्र के अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। विफल होने पर भी उन्होंने हथियार उठाने में संकोच नहीं किया।
- अंतिम समय तक संघर्ष: झाँसी की रक्षा के लिए उन्होंने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया। झाँसी के पतन के बाद भी वे कालपी और फिर ग्वालियर पहुँचीं और वहाँ भी अंग्रेजों से लड़ते हुए 17 जून, 1858 को वीरगति को प्राप्त हुईं। उनका यह अदम्य साहस और बलिदान उन्हें इतिहास में एक विलक्षण नायिका का दर्जा दिलाता है।
अतिरिक्त प्रश्नोत्तर
प्रश्न: नील ठगाने वाले किसानो की क्या समसस््याएँ थी ?
उत्तर: नील की खेती (नील की रैयत) करने वाले किसानों की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित थीं:
- किसानों को अपनी उपजाऊ जमीन का एक बड़ा हिस्सा नील की खेती के लिए देने को मजबूर किया जाता था, जिससे उनके लिए खाद्यान्न पैदा करना मुश्किल हो जाता था।
- नील के बागान मालिक (प्लांटर्स) किसानों को बहुत कम और तय कीमत पर नील बेचने के लिए मजबूर करते थे, जिससे किसानों को घाटा होता था।
- खेती के लिए आवश्यक उपकरण, बीज आदि के लिए किसानों को बागान मालिकों से ऊँचे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता था, जिसके चक्कर में वे कर्ज के जाल में फँस जाते थे।
- कर्ज न चुका पाने पर किसानों के साथ मारपीट और उनकी जमीन जब्त करने जैसी ज्यादतियाँ की जाती थीं।
प्रश्न: 1857 ई0 की क्रांति के विफलता के क्या कारण थें ?
उत्तर: 1857 के विद्रोह की विफलता के प्रमुख कारण थे:
- एकता और केंद्रीय नेतृत्व का अभाव: विद्रोह देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर शुरू हुआ। सभी विद्रोही नेताओं के बीच समन्वय और एक साझा योजना का अभाव था। कोई एक केंद्रीय नेतृत्व नहीं था जो पूरे आंदोलन को संचालित कर सके।
- सीमित संसाधन और आधुनिक हथियारों की कमी: विद्रोहियों के पास अंग्रेजों जितने आधुनिक हथियार, गोला-बारूद और तोपखाना नहीं था। अंग्रेजों के पास बेहतर संचार और रसद (सप्लाई) की व्यवस्था थी।
- सभी वर्गों का समर्थन न मिलना: देश के सभी वर्गों, जैसे कि पंजाब, सिंध, मद्रास और बंगाल के बहुत से लोगों ने इस विद्रोह में हिस्सा नहीं लिया। कई शासकों और जमींदारों ने तो अंग्रेजों का साथ दिया।
- अंग्रेजों की सैन्य शक्ति और अनुभव: अंग्रेजों के पास एक अनुशासित, प्रशिक्षित और अच्छी तरह से संगठित सेना थी। उनके पास युद्ध का अनुभव और बेहतर रणनीति थी।
प्रश्न: 1857 ई0 की क्रांति के मुख्य कारण क्या थें ?
उत्तर: 1857 के विद्रोह के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
- राजनीतिक कारण: लॉर्ड डलहौजी की 'हड़प नीति' (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) के कारण सतारा, नागपुर, झाँसी जैसी रियासतों का विलय कर लिया गया। अवध का सीधा विलय (1856) भारतीय शासकों में रोष पैदा करने वाला प्रमुख कारण था।
- आर्थिक कारण: अंग्रेजों की भारी भू-राजस्व नीति, किसानों और जमींदारों पर करों का बोझ, शिल्प उद्योगों का विनाश, जिससे बेरोजगारी और गरीबी फैली।
- सामाजिक-धार्मिक कारण: अंग्रेजों द्वारा सती प्रथा पर रोक, विधवा पुनर्विवाह कानून, ईसाई मिशनरियों को प्रोत्साहन और 1850 का धर्म परिवर्तन कानून जैसे कदमों को भारतीय धर्म और संस्कृति पर हमला माना गया।
- सैनिक कारण: भारतीय सिपाहियों को यूरोपीय सैनिकों की तुलना में कम वेतन और पदोन्नति मिलती थी। सेवा शर्तें कठोर थीं। नए कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी की अफवाह ने विद्रोह के लिए तात्कालिक चिंगारी का काम किया।
- मुगल सम्राट की दुर्दशा: मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को केवल दिल्ली के लाल किले तक सीमित कर दिया गया था और यह घोषणा की गई थी कि उनके बाद उनके वंशजों को बादशाह नहीं माना जाएगा। इससे मुसलमानों की भावनाएं आहत हुईं।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: अंग्रेजों के कब्जे में जाने वाली आखिरी रियासत कौन सी थी ?
उत्तर: अवध अंग्रेजों के कब्जे में जाने वाली आखिरी प्रमुख रियासत थी।
प्रश्न 2: अंग्रेजों ने अवध का विलय किस आधार पर किया ?
उत्तर: अंग्रेजों ने अवध का विलय 'कुशासन' के आरोप के आधार पर किया। गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने यह ऐलान किया कि अवध का शासन ठीक से नहीं चल रहा है और वहाँ अराजकता फैली हुई है। इसलिए, प्रजा के कल्याण और शासन को दुरुस्त करने के नाम पर 1856 में अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। यह तर्क दिया गया कि सहायक संधि (1801) के तहत अंग्रेजों का यह अधिकार था।
प्रश्न : अंग्रेजों ने मुगल शासन को पूरी तरह ख़त्म करने के लिए क्या किया ?
उत्तर: मुगल साम्राज्य की प्रतीकात्मक सत्ता को पूरी तरह समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने निम्नलिखित कदम उठाए:
- कंपनी द्वारा जारी किए जाने वाले सिक्कों पर से मुगल बादशाह का नाम हटा दिया गया।
- 1849 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने घोषणा की कि बहादुर शाह जफर के बाद उनके उत्तराधिकारियों को लाल किला छोड़कर दिल्ली में कहीं और रहना होगा।
- 1856 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड कैनिंग ने यह फैसला किया कि बहादुर शाह जफर अंतिम मुगल बादशाह होंगे। उनकी मृत्यु के बाद उनके वंशजों को केवल 'शाहजादा' (राजकुमार) कहा जाएगा, 'बादशाह' नहीं।
- 1857 के विद्रोह के बाद बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून निर्वासित कर दिया गया, जिससे मुगल वंश की शक्ति का पूर्ण रूप से अंत हो गया।