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UP Board class 8 History (11. राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन) solution PDF

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UP Board class 8 History (11. राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन) solution

UP Board class 8 History 11. राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन Hindi Medium Solutions - PDF

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UP Board Solutions for Class 8 History (हमारे अतीत -III)

अध्याय 11: राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन

प्रश्न 1। 1870 और 1880 के दशकों में लोग ब्रिटिश शासन से क्यों असंतुष्ट थे ?

उत्तर : 1870 और 1880 के दशकों में भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा असंतोष पनप रहा था। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:

  1. आर्म्स एक्ट (1878): इस कानून के तहत भारतीयों के हथियार रखने के अधिकार पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया गया, जबकि अंग्रेजों के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था। इसे भारतीयों पर अविश्वास और भेदभावपूर्ण नीति के रूप में देखा गया।
  2. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878): इस कानून के माध्यम से भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर कड़ी सेंसरशिप लगा दी गई। सरकार किसी भी समाचार पत्र को बिना कारण बताए जब्त कर सकती थी। इससे राष्ट्रीय विचारों के प्रसार पर रोक लगाने का प्रयास किया गया।
  3. इल्बर्ट बिल विवाद (1883): इस बिल का उद्देश्य भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीय नागरिकों के मुकदमे सुनने का अधिकार देना था, ताकि कानून के समक्ष सबकी समानता स्थापित हो सके। लेकिन यूरोपीय समुदाय के तीव्र विरोध के कारण सरकार ने इस बिल को वापस ले लिया। इससे भारतीय बुद्धिजीवियों को स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश शासन में समान न्याय का सिद्धांत नहीं है।
  4. राजनीतिक संगठनों का उदय: इन अन्यायपूर्ण नीतियों के विरोध में देश के विभिन्न भागों में राजनीतिक संगठन स्थापित होने लगे, जैसे कि बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन, इंडियन एसोसिएशन आदि। ये संगठन ब्रिटिश नीतियों का विरोध करने लगे।

प्रश्न 2: भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस किन लोगों के पक्ष में बोल रही थी ?

उत्तर : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का मूल उद्देश्य ही सभी भारतीयों के हितों का प्रतिनिधित्व करना था। यह संगठन किसी एक वर्ग, धर्म या क्षेत्र के पक्ष में नहीं बोल रहा था। कांग्रेस का दावा था कि वह सम्पूर्ण भारतीय जनता की आवाज है। इसने सभी धर्मों के लोगों, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों की समस्याओं को उठाया और उनके लिए न्याय व अधिकारों की माँग की। शुरुआत में इसके नेता मुख्यतः शिक्षित वर्ग से थे, लेकिन उनकी माँगें पूरे देश के हित में थीं।

प्रश्न 3: पहले विश्व युद्ध से भारत पर कौन से आर्थिक असर पड़े ?

उत्तर : प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) का भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ा:

  1. सरकारी व्यय में भारी वृद्धि: युद्ध के खर्चे को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत पर नए कर लगाए। आयकर बढ़ा दिया गया और व्यापारिक लाभ पर भी अतिरिक्त कर लगाया गया।
  2. महँगाई और आम जनता की कठिनाइयाँ: युद्ध सामग्री की आपूर्ति और सेना के खर्चों के कारण देश में तेजी से महँगाई बढ़ी। रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं जैसे अनाज, कपड़ा, तेल आदि की कीमतें आसमान छूने लगीं, जिससे आम लोगों का जीवन दूभर हो गया।
  3. उद्योगों को लाभ और आयात में कमी: युद्ध के कारण ब्रिटेन और अन्य देशों से आने वाले सामान (जैसे कपड़ा, रेल की पटरियाँ) का आयात कम हो गया। इससे भारतीय उद्योगों (जैसे टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी) को फायदा हुआ और उत्पादन बढ़ाने का मौका मिला।
  4. कृषि पर दबाव: सेना के लिए अनाज और जूट जैसी चीजों की माँग बढ़ने से किसानों पर अधिक उत्पादन का दबाव पड़ा, लेकिन इसका लाभ उन्हें नहीं मिल पाया।

प्रश्न 4. 1940 के मुस्लिम लीग के प्रस्ताव में क्या माँग की गई थी ?

उत्तर : मार्च 1940 में लाहौर में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे 'लाहौर प्रस्ताव' या 'पाकिस्तान प्रस्ताव' कहा जाता है। इस प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से 'पाकिस्तान' शब्द का उल्लेख नहीं था, लेकिन माँग की गई थी कि:

"भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों में, जहाँ मुसलमान बहुमत में हैं, को एकत्रित करके स्वतंत्र राज्यों का निर्माण किया जाए, जिनमें घटक इकाइयाँ स्वायत्त और प्रभुत्वसम्पन्न हों।"

इस प्रकार, इस प्रस्ताव में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए पृथक और स्वायत्त राज्य/राज्यों की माँग की गई थी, जो आगे चलकर पाकिस्तान के निर्माण की आधारशिला बनी।

प्रश्न 5: मध्यमार्गी कौन थे ? वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ किस तरह का संघर्ष करना चाहते थे?

उत्तर : मध्यमार्गी (जिन्हें नरम दल भी कहा जाता है) कांग्रेस के वे प्रारंभिक नेता थे जो संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से ब्रिटिश सरकार के सामने अपनी माँगें रखते थे। दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी आदि इसके प्रमुख नेता थे।

वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ निम्नलिखित तरीके से संघर्ष करना चाहते थे:

  1. जन जागरण: वे जनता को ब्रिटिश शासन की शोषणकारी और अन्यायपूर्ण नीतियों से अवगत कराना चाहते थे।
  2. माँगपत्र और प्रार्थना: उनका मुख्य तरीका सरकार के सामने तथ्यों और तर्कों के साथ प्रार्थनापत्र (मेमोरेंडम) पेश करना था। वे विश्वास करते थे कि ब्रिटिश न्यायप्रिय हैं और उनकी न्यायोचित माँगें मान ली जाएँगी।
  3. जनमत का निर्माण: इसके लिए उन्होंने देश भर में अखबार निकाले, भाषण दिए और प्रतिनिधिमंडल भेजे। उनका उद्देश्य एक मजबूत राष्ट्रीय जनमत तैयार करना था।
  4. विधान परिषदों में भागीदारी: वे विधान परिषदों के चुनाव लड़कर उनमें शामिल होते थे ताकि अंदर से सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकें और सुधार ला सकें।

प्रश्न 6: कांग्रेस के आमूल परिवर्तनवादी धड़े की राजनीती मध्यमार्गी धड़े की राजनीती से किस तरह भिन्न थी ?

उत्तर : कांग्रेस के आमूल परिवर्तनवादी (गरम दल) धड़े के नेता, जैसे बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल, मध्यमार्गियों (नरम दल) से अपने विचार और कार्यशैली में बिल्कुल भिन्न थे। मुख्य अंतर निम्नलिखित थे:

मध्यमार्गी (नरम दल) आमूल परिवर्तनवादी (गरम दल)
वे ब्रिटिश सरकार से प्रार्थना और निवेदन करके सुधार चाहते थे। वे स्वराज (स्वशासन) की माँग करते थे और निवेदन की राजनीति का विरोध करते थे।
उनका विश्वास था कि ब्रिटिश न्यायप्रिय हैं और उनके साथ सहयोग से काम चल सकता है। उनका नारा था – "प्रार्थना से अधिकार नहीं मिलते, छीनने पड़ते हैं।"
वे सिर्फ शिक्षित वर्ग तक सीमित रहना चाहते थे। वे जनता को सीधे संघर्ष में शामिल करना चाहते थे और जन-आंदोलन खड़ा करना चाहते थे।
उनकी लड़ाई मुख्यतः कानूनी और संवैधानिक थी। उन्होंने बहिष्कार (विदेशी वस्तुओं, स्कूलों, अदालतों का) और स्वदेशी के कार्यक्रम को बढ़ावा दिया।

प्रश्न 7: चर्चा करें कि भारत के विभिन्न भागों में असहयोग आन्दोलन ने किस-किस तरह के रूप ग्रहण किए ? लोग गाँधीजी के बारे में क्या समझते थे ?

उत्तर : असहयोग आंदोलन (1920-22) पूरे देश में फैला, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों और समस्याओं के अनुसार इसने विभिन्न रूप धारण किए:

  1. गुजरात (खेड़ा): यहाँ पाटीदार किसानों ने अंग्रेजों द्वारा लगाए गए भारी लगान के विरोध में सत्याग्रह चलाया।
  2. आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु: तटीय इलाकों में लोगों ने शराब की दुकानों की घेराबंदी की, क्योंकि शराब को साम्राज्यवादी शोषण का प्रतीक माना जाता था।
  3. आंध्र प्रदेश (गुंटूर जिला): यहाँ के आदिवासियों ने वन कानूनों के विरोध में "वन सत्याग्रह" चलाए, क्योंकि नए कानूनों ने उनके वन अधिकार छीन लिए थे।
  4. पंजाब: सिखों का अकाली आंदोलन (गुरुद्वारा सुधार) असहयोग आंदोलन से जुड़ गया। अकाली सत्याग्रहियों ने गुरुद्वारों का प्रबंधन महंतों के हाथों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया।
  5. असम: चाय बागानों के मजदूरों ने यह समझकर कि गाँधीजी उन्हें स्वदेश भेज देंगे, बागान छोड़ दिए और "गाँधी महाराज की जय" के नारे लगाते हुए घर लौटने लगे।

लोग गाँधीजी के बारे में क्या सोचते थे?
आम जनता के लिए महात्मा गाँधी केवल एक नेता नहीं थे। वे उन्हें एक मसीहा, महान साधु या अवतार के रूप में देखने लगे थे। लोगों का विश्वास था कि गाँधीजी में उनकी सभी परेशानियों – गरीबी, जमींदारों का अत्याचार, भारी कर – से छुटकारा दिलाने की शक्ति है। उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की थी जो न्याय लाएगा और एक नए युग की शुरुआत करेगा।

प्रश्न 8: गाँधीजी ने नमक कानून तोड़ने का फैसला क्यों लिया ?

उत्तर : गाँधीजी ने नमक कानून तोड़ने (सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत) का फैसला निम्नलिखित कारणों से लिया:

  1. सार्वभौमिक और प्रतीकात्मक मुद्दा: नमक एक ऐसी वस्तु है जिसका उपयोग अमीर-गरीब, सभी जाति-धर्म के लोग रोजाना करते हैं। नमक पर कर को लोगों के जीवन में सरकारी हस्तक्षेप का सबसे दमनकारी प्रतीक माना गया।
  2. नैतिक आधार: गाँधीजी का मानना था कि प्रकृति प्रदत्त इस बुनियादी जरूरत पर कर लगाना एक पाप और अनैतिक कार्य है। यह माँग नैतिक रूप से बिल्कुल सही और न्यायसंगत थी।
  3. जन-संघर्ष का शक्तिशाली हथियार: गाँधीजी जानते थे कि इस मुद्दे के माध्यम से वह देश के करोड़ों गरीब और साधारण लोगों को आंदोलन से सीधे जोड़ सकते हैं। समुद्र तट पर नमक बनाना एक ऐसा साधन था जिसमें हर कोई भाग ले सकता था।
  4. ब्रिटिश एकाधिकार को चुनौती: नमक बनाने पर सरकार का कानूनी एकाधिकार था। नमक कानून तोड़कर गाँधीजी सीधे तौर पर ब्रिटिश सरकार की कानूनी वैधता को चुनौती दे रहे थे और लोगों को दिखा रहे थे कि उन्हें अन्यायपूर्ण कानूनों का पालन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 9: 1937-47 की उन घटनाओं पर चर्चा करें जिनके फलस्वरूप पाकिस्तान का जन्म हुआ ?

उत्तर : 1937 से 1947 के बीच की निम्नलिखित घटनाओं ने धीरे-धीरे देश के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण का रास्ता तैयार किया:

  1. 1937 के प्रांतीय चुनाव और कांग्रेस-लीग तनाव: इन चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला, जबकि मुस्लिम लीग की हार हुई। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बनाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इससे लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना को लगा कि लोकतंत्र में मुसलमानों के हित सुरक्षित नहीं रहेंगे।
  2. द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का उदय: मुस्लिम लीग ने यह विचार फैलाना शुरू किया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, जिनके रीति-रिवाज, संस्कृति और धर्म भिन्न हैं। इसलिए उनका एक साथ रहना असंभव है।
  3. 1940 का लाहौर प्रस्ताव: इस प्रस्ताव में पहली बार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए अलग 'राज्यों' की माँग की गई, जो पाकिस्तान की माँग का औपचारिक आधार बना।
  4. 1942 का क्रिप्स मिशन विफलता: ब्रिटिश मंत्रिमंडल के सदस्य सर स्टैफोर्ड क्रिप्स का भारत आना और उनका प्रस्ताव असफल रहा। इससे मुस्लिम लीग को यकीन हो गया कि अलग राष्ट्र के बिना उनकी माँगें पूरी नहीं होंगी।
  5. 1945-46 के चुनाव और सीधी कार्रवाई: 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर भारी जीत दर्ज की और खुद को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि साबित किया। 'पाकिस्तान' की माँग मुस्लिम जनता का नारा बन गई।
  6. 16 अगस्त 1946 - प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस: मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग मनवाने के लिए यह दिवस मनाया। इस दिन कलकत्ता में भयानक सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें हजारों लोग मारे गए। इसने विभाजन की प्रक्रिया को अटल बना दिया।
  7. माउंटबेटन योजना और अंतिम फैसला: आखिरकार, बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और अराजकता के कारण, अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने जून 1947 में विभाजन की योजना पेश की, जिसके तहत 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने।

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Other Chapters of class 8 History
1. कैसे कब और कहाँ
2. व्यापार से साम्राज्य तक
3. ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना
4. आदिवासी दिकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना
5. जब जनता बगावत करती है
6. उपनिवेशवाद और शहर एक शाही राजधानी की कहानी
7. बुनकर लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक
8. देशी जनता को सभ्य बनाने और राष्ट्र को शिक्षित करना
9. महिलाएं जाति एवं सुधार
10. दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया
11. राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन
12. स्वतंत्रता के बाद
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