UP Board class 8 History 7. बुनकर लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 8 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: यूरोप में भारत से निर्यात होने वाले कई प्रकार के उत्तम कपड़ों की बहुत अधिक माँग थी। इनमें बारीक मलमल (मुस्लिन), चमकीले रंगों वाले छींट (चिंट्ज़), सुंदर बुनाई वाले जामदानी और छापेदार बांडाना जैसे कपड़े शामिल थे। ये कपड़े अपनी गुणवत्ता, डिज़ाइन और कारीगरी के लिए पूरे यूरोप में प्रसिद्ध थे।
उत्तर: जामदानी एक विशेष प्रकार का बारीक सूती कपड़ा है, जो मुख्य रूप से सफेद या हल्के सलेटी रंग का होता है। इसकी खासियत यह है कि इस पर बुनाई के दौरान ही सूती, रेशम या कभी-कभी सोने के धागों से सजावटी और ज्यामितीय नमूने (पैटर्न) बुने जाते हैं। यह एक बहुत ही महीन और कीमती कपड़ा होता था, जिसे अक्सर विशेष अवसरों पर पहना जाता था।
उत्तर: बांडाना एक चटकीले रंग का छापेदार (प्रिंटेड) कपड़ा होता है, जिसे आमतौर पर सिर पर पगड़ी के रूप में या गले में गुलबंद के रूप में बांधा जाता है। इसका नाम हिंदी के शब्द 'बांधना' से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'बाँधना'। यह कपड़ा अपने जीवंत रंगों और बड़े-बड़े फूलों या बूटों के डिज़ाइन के लिए जाना जाता था।
उत्तर: अगरिया भारत के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में रहने वाले लोहा बनाने वाले लोगों का एक विशेष समुदाय था। ये लोग लोहा गलाने (पिघलाने) और उससे उपकरण बनाने की पारंपरिक कला में बहुत निपुण थे। वे जंगलों से लौह अयस्क (आयरन ओर) प्राप्त करते थे और छोटी भट्टियों में उसे गलाकर शुद्ध लोहा तैयार करते थे।
उत्तर:
(क) अंग्रेजी का शिट्ज़ शब्द हिंदी के छींट शब्द से निकला है।
(ख) टीपू की तलवार वूट्ज़ स्टील से बनी थी।
(ग) भारत का कपड़ा निर्यात 19वीं सदी में गिरने लगा।
उत्तर: विभिन्न कपड़ों के नाम उनके व्यापारिक मार्गों, उत्पत्ति स्थानों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इतिहास के बारे में बताते हैं:
(i) मुसलिन (मलमल): यूरोपीय व्यापारियों ने सबसे पहले इस बारीक सूती कपड़े को इराक के मोसूल शहर में अरब व्यापारियों के पास देखा। इसलिए, उन्होंने इस प्रकार के सभी बारीक कपड़ों को 'मुसलिन' कहना शुरू कर दिया, जो बाद में भारत में 'मलमल' बन गया।
(ii) शिट्ज़: यह नाम हिंदी के शब्द 'छींट' से लिया गया है, जो एक प्रकार के छपे हुए सूती कपड़े को कहते हैं। यह भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संपर्क को दर्शाता है।
(iii) बांडाना: इसका नाम हिंदी के शब्द 'बांधना' से आया है, जो इसके उपयोग (सिर या गले पर बांधना) को दर्शाता है।
(iv) कैलिको: जब पुर्तगाली व्यापारी भारत आए, तो उन्होंने दक्षिण-पश्चिमी तट पर कालीकट बंदरगाह पर डेरा डाला। वहाँ से वे मसालों के साथ-साथ सूती कपड़ा भी ले गए, जिसे उन्होंने उस बंदरगाह के नाम पर 'कैलिको' कहा।
उत्तर: इंग्लैंड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने भारतीय कपड़ों के आयात का विरोध निम्नलिखित कारणों से किया:
1. उस समय इंग्लैंड में अपना कपड़ा उद्योग विकसित हो रहा था। भारतीय कपड़े सस्ते, उच्च गुणवत्ता वाले और लोकप्रिय थे, जिससे ब्रिटिश उत्पादक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे थे।
2. वे चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार भारतीय कपड़ों पर प्रतिबंध लगाकर या भारी कर लगाकर, घरेलू बाजार को उनके लिए सुरक्षित कर दे।
3. इसी दबाव के कारण, ब्रिटिश सरकार ने 1720 में एक कानून बनाकर छपे हुए सूती कपड़े (शिट्ज़) के इस्तेमाल पर रोक लगा दी, ताकि ब्रिटिश ऊन और रेशम उद्योग को बचाया जा सके।
उत्तर: ब्रिटेन में कपास उद्योग के मशीनीकरण और विकास का भारतीय बुनकरों और कपड़ा उत्पादकों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा:
1. निर्यात में गिरावट: भारतीय कपड़ों को अब यूरोप और अमेरिका के बाजारों में ब्रिटेन में मशीनों से बने सस्ते कपड़ों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कपड़ों पर भारी आयात शुल्क लगा दिए, जिससे निर्यात बहुत मुश्किल हो गया।
2. बेरोजगारी: विदेशी बाजारों से हाथ धोने के कारण हजारों भारतीय बुनकर और कारीगर बेरोजगार हो गए। उन्हें काम नहीं मिलता था।
3. पेशगी रोकी गई: व्यापारी और कंपनियाँ, जो बुनकरों को कच्चा माल और पेशगी राशि देकर कपड़ा बुनवाती थीं, उन्होंने यह सहायता देना बंद कर दिया।
4. बाजार हानि: धीरे-धीरे भारतीय कपड़ों को विदेशी बाजारों से बाहर कर दिया गया और उनकी जगह ब्रिटिश कपड़ों ने ले ली।
उत्तर: उन्नीसवीं सदी में भारतीय लौह प्रगलन (आयरन स्मेल्टिंग) उद्योग के पतन के मुख्य कारण ये थे:
1. राजनीतिक परिवर्तन: अंग्रेजों द्वारा भारत पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के बाद, स्थानीय शासकों और सेनाओं का अंत हो गया। इससे तलवारों, भालों और अन्य हथियारों की माँग खत्म हो गई, जो इस उद्योग का एक बड़ा आधार थी।
2. ब्रिटिश आयात: ब्रिटेन से मशीनों द्वारा बना सस्ता लोहा और इस्पात भारत आने लगा। यह भारतीय कारीगरों द्वारा पारंपरिक तरीके से बनाए गए लोहे से सस्ता और प्रतिस्पर्धी था।
3. नीतिगत उपेक्षा: औपनिवेशिक सरकार ने भारत के पारंपरिक लौह उद्योग को बचाने या विकसित करने के लिए कोई संरक्षण या सहायता नहीं दी।
उत्तर: भारत में आधुनिक कपड़ा मिलों की शुरुआत में निम्नलिखित गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा:
1. ब्रिटिश प्रतिस्पर्धा: सबसे बड़ी चुनौती ब्रिटेन से आने वाले सस्ते मशीनी कपड़ों की थी, जिनसे मुकाबला करना मुश्किल था।
2. सरकारी समर्थन का अभाव: जबकि ब्रिटेन और अन्य देशों ने अपने नए उद्योगों को सब्सिडी और संरक्षण दिया, भारत की औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय मिल मालिकों की कोई मदद नहीं की।
3. निर्यात में बाधाएँ: ब्रिटिश उत्पादकों के दबाव में, ब्रिटिश सरकार ने भारत से निर्यात होने वाले कपड़ों पर भारी सीमा शुल्क लगा दिए, जिससे भारतीय कपड़ों के लिए ब्रिटेन या अन्य बाजारों में बेचना मुश्किल हो गया।
उत्तर: प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) के उत्पादन बढ़ाने में निम्नलिखित बातों से मदद मिली:
1. ब्रिटिश आयात में कमी: युद्ध के कारण ब्रिटेन को अपना सारा इस्पात यूरोप में युद्ध सामग्री बनाने में लगाना पड़ा। इसलिए, भारत को ब्रिटेन से इस्पात का आयात बहुत कम हो गया।
2. सरकारी माँग में वृद्धि: भारतीय रेलवे को अब पटरियों की आपूर्ति के लिए TISCO की ओर रुख करना पड़ा।
3. युद्ध सामग्री का ठेका: युद्ध लंबा खिंचने पर, ब्रिटिश भारत सरकार ने TISCO को गोलों के खोल, रेलगाड़ियों के पहिए और अन्य सैन्य सामान बनाने का ठेका दिया।
4. निश्चित बाजार: 1919 तक, TISCO द्वारा बनाए गए इस्पात का लगभग 90% भाग सीधे भारत सरकार ही खरीदने लगी थी। इस निश्चित माँग ने कंपनी को तेजी से विस्तार करने और उत्पादन बढ़ाने में मदद की।
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