UP Board Solutions for Class 10 History
पाठ -2 भारत में राष्ट्रवाद
1. व्याख्या करें-
(क) उपनिवेशो में राष्ट्रवाद के उदय की प्रक्रिया उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से जुड़ी हुई क्यों थी
उत्तर- उपनिवेशों में राष्ट्रवाद का उदय सीधे तौर पर उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से जुड़ा हुआ था। ब्रिटिश जैसी औपनिवेशिक शक्तियों ने आर्थिक शोषण, सामाजिक भेदभाव और राजनीतिक दमन के माध्यम से लोगों की स्वतंत्रता छीन ली थी। इस उत्पीड़न ने विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों के बीच एक साझा दुश्मन पैदा किया। औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई ने लोगों को एकजुट किया और एक सामूहिक राष्ट्रीय पहचान की भावना को जन्म दिया। इस प्रकार, राष्ट्रवादी भावना औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने के संघर्ष का ही एक प्राकृतिक परिणाम थी।
(ख) पहले विश्व युद्ध में भारत ने राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में किस प्रकार योगदान दिया
उत्तर- प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:
- जबरन भर्ती एवं कर: युद्ध के लिए धन और सैनिक जुटाने हेतु ब्रिटिश सरकार ने गाँवों से जबरन भर्ती की और नए कर (जैसे आयकर) लगाए, जिससे जनता में रोष फैला।
- आर्थिक संकट: युद्ध के कारण महँगाई बढ़ी और कई क्षेत्रों में अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिससे लोगों का जीवन दूभर हो गया।
- टूटे वादे: युद्ध में भारत के समर्थन के बदले स्वशासन का जो वादा किया गया था, उसे पूरा नहीं किया गया। इससे भारतीयों में विश्वासघात की भावना पैदा हुई और उन्होंने संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग करना शुरू कर दिया।
इन सभी कारणों ने ब्रिटिश शासन के प्रति व्यापक असंतोष पैदा किया और राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई गति व दिशा प्रदान की।
(ग) भारत के लोग रौलट एक्ट के विरोध में क्यों थे
उत्तर- भारतीय रौलट एक्ट (1919) के कड़े विरोधी थे क्योंकि यह अधिनियम मौलिक अधिकारों और न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध था:
- इस कानून के तहत ब्रिटिश सरकार किसी भी भारतीय को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में बंद रख सकती थी।
- यह एक दमनकारी और अलोकतांत्रिक कानून था जिसे 'काला कानून' कहा गया। इसने नागरिक स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचल दिया।
- इसे इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद जल्दबाजी में पारित किया गया था, जिससे भारतीयों को लगा कि उनकी राय का कोई मूल्य नहीं है।
इस प्रकार, रौलट एक्ट ने भारतीयों की राष्ट्रीय गरिमा को ठेस पहुँचाई और व्यापक विरोध को जन्म दिया।
(घ) गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का फैसला क्यों लिया?
उत्तर- महात्मा गांधी ने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया, मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से:
- चौरी-चौरा की घटना: उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा में 5 फरवरी 1922 को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें क्रोधित भीड़ ने एक पुलिस थाने में आग लगा दी, जिससे 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।
- अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन: गांधीजी का पूरा आंदोलन अहिंसा (सत्याग्रह) के सिद्धांत पर आधारित था। चौरी चौरा की हिंसा ने इस मूलभूत सिद्धांत को तोड़ दिया।
- जनता की तैयारी का अभाव: गांधीजी ने महसूस किया कि देश की जनता अभी पूर्ण अहिंसक संघर्ष के लिए पर्याप्त रूप से अनुशासित और तैयार नहीं थी। उन्हें लगा कि आंदोलन को जारी रखने से और हिंसा फैल सकती है।
इसलिए, उन्होंने आंदोलन को वापस लेकर लोगों को अहिंसक संघर्ष के लिए फिर से शिक्षित व तैयार करने का निर्णय लिया।
2. सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?
उत्तर- सत्याग्रह महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित एक अनूठी और शक्तिशाली विधि है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'सत्य के प्रति आग्रह' या 'सत्य की शक्ति'। इसके मुख्य सिद्धांत इस प्रकार हैं:
- यह अहिंसक प्रतिरोध पर आधारित है। इसमें शारीरिक बल या आक्रामकता का प्रयोग नहीं किया जाता।
- सत्याग्रह का उद्देश्य विरोधी की अंतरात्मा को जगाना और उसे अन्याय का एहसास कराना है, न कि उसे शारीरिक रूप से हराना।
- यह अन्याय सहन करने से इनकार करने और उसका डटकर सामना करने का साहस माँगता है, चाहे उसके लिए कष्ट या यातना ही क्यों न सहनी पड़े।
- गांधीजी का मानना था कि सत्याग्रह न केवल एक राजनीतिक हथियार है, बल्कि यह व्यक्ति के नैतिक व आध्यात्मिक विकास का मार्ग भी है, जो पूरे राष्ट्र को एकजुट कर सकता है।
3. निम्नलिखित पर अखबार के लिए रिपोर्ट लिखें -
(क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड
(ख) साइमन कमीशन
उत्तर- (क) जलियाँवाला बाग हत्याकांड
एक काला दिन: जलियाँवाला बाग में निर्दोषों का संहार
अमृतसर, 14 अप्रैल 1919। 13 अप्रैल, बैसाखी के पावन पर्व के दिन, यहाँ के जलियाँवाला बाग में एक भीषण त्रासदी घटित हुई। ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने उस सभा पर
अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं, जहाँ रौलट एक्ट का शांतिपूर्ण विरोध करने और मेले में शामिल होने के लिए हजारों निर्दोष पुरुष, महिलाएँ और बच्चे एकत्र थे। बाग के चारों ओर ऊँची दीवारें और केवल एक संकरा रास्ता होने के कारण लोग भाग नहीं सके। सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। इस नृशंस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है और ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा रोष पैदा किया है। यह दिन भारतीय इतिहास में औपनिवेशिक बर्बरता के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा।
(ख) साइमन कमीशन
'साइमन कमीशन वापस जाओ' - पूरे देश में गूँज रहा है नारा
नवंबर 1928। भारत में संवैधानिक सुधारों का अध्ययन करने के लिए बनी साइमन कमीशन का पूरे देश में
जबरदस्त विरोध हो रहा है। इस सात-सदस्यीय आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं है, जो भारतीयों के लिए एक गहरा अपमान है। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित सभी दलों ने इसका बहिष्कार किया है। जहाँ कहीं भी यह कमीशन गया, काले झंडे और "गो बैक साइमन" के नारों से उसका स्वागत हुआ। लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस की लाठीचार्ज से हुई चोटों के कारण देहांत हो गया, जिससे जनआक्रोश और बढ़ गया है। इस विरोध ने भारत को पूर्ण स्वराज की माँग के लिए और अधिक एकजुट कर दिया है।
4. इस अध्याय में दी गई भारत माता की छवि और अध्याय 1 में दी गई जर्मेनिया की छवि की तुलना कीजिए |
उत्तर- भारत माता और जर्मेनिया की छवियाँ दोनों ही राष्ट्र को एक नारी के रूप में प्रस्तुत करती हैं, लेकिन उनके चित्रण में महत्वपूर्ण अंतर हैं:
- भारत माता (अबनिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा चित्रित): इस छवि में भारत माता को एक शांत, दैवीय और पोषण करने वाली माता के रूप में दिखाया गया है। वह सफेद वस्त्र धारण किए हुए हैं, उनके एक हाथ में माला (ज्ञान) है और दूसरे हाथ में चावल की गठरी (संपन्नता) है। उनके पीछे चार हाथ हैं जिनमें वे पुस्तक, माला, सफेद कपड़ा और फसल की पोटली पकड़े हुए हैं। यह छवि शांति, ज्ञान, देना और समृद्धि पर जोर देती है।
- जर्मेनिया (फिलिप वीट द्वारा चित्रित): जर्मेनिया को एक योद्धा नारी के रूप में चित्रित किया गया है। उनके सिर पर ओक की पत्तियों का मुकुट (वीरता) है, एक हाथ में तलवार (शक्ति) है और दूसरे हाथ में जर्मन झंडा है। उनकी नजर सीधी और चुनौतीपूर्ण है। यह छवि सैन्य शक्ति, साहस और युद्ध के लिए तत्परता का प्रतीक है।
निष्कर्ष: जहाँ जर्मेनिया का चित्रण आक्रामक राष्ट्रवाद और सैन्य शक्ति को दर्शाता है, वहीं भारत माता का चित्रण शांतिपूर्ण, पोषण करने वाले और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का प्रतीक है।
चर्चा करें
1. 1921 में आंदोलन में शामिल होने वाले सभी सामाजिक समूहों की सूची बनाइए | इसके बाद उनकी आशाओं के बारे में लिखते हुए आंदोलन में शामिल हुए
उत्तर- 1921 के असहयोग आंदोलन में निम्नलिखित सामाजिक समूह शामिल हुए और प्रत्येक की अपनी विशेष आशाएँ थीं:
- शहरी मध्य वर्ग (वकील, शिक्षक, छात्र): इन्होंने सरकारी नौकरियों, पदवियों और शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया। इनकी आशा थी कि इससे ब्रिटिश प्रशासन ठप्प हो जाएगा और स्वराज मिलेगा।
- किसान (उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश आदि में): उन्होंने जमींदारों और तालुकदारों द्वारा लगाए जा रहे अत्यधिक लगान और बेगार प्रथा के खिलाफ विद्रोह किया। उनकी आशा थी कि 'गांधी राज' आने पर सभी लगान माफ हो जाएँगे और उन्हें न्याय मिलेगा।
- आदिवासी समुदाय (जंगल क्षेत्रों में): वे ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए वन कानूनों के विरोध में उठ खड़े हुए, जिनके कारण उन्हें जंगल में चराई, लकड़ी काटने आदि के पारंपरिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा।
- वृक्षारोपण मजदूर (असम के चाय बागानों में): उन्होंने काम छोड़ दिया और अपने पैतृक गाँवों को लौटने की माँग की। उनकी आशा थी कि आंदोलन से उन्हें बागानों से निकलने और घर जाने की स्वतंत्रता मिलेगी।
इस प्रकार, हर समूह ने अपनी स्थानीय समस्याओं से मुक्ति पाने की आशा में राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया, जिससे यह एक जन-आंदोलन बन गया।
2. नमक यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करें कि यह उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक था
उत्तर- नमक यात्रा (दांडी मार्च, 1930) उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक अत्यंत प्रभावी प्रतीक बन गई, निम्नलिखित कारणों से:
- सार्वभौमिक प्रतीक: नमक एक ऐसी वस्तु है जिसका उपयोग अमीर-गरीब, सभी जाति और धर्म के लोग करते हैं। नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकार का एकाधिकार सीधे हर भारतीय पर प्रभाव डालता था। इसलिए, इसके विरोध से सभी वर्ग जुड़ सके।
- सरल एवं प्रतीकात्मक कार्यवाही: समुद्र के पानी को उबालकर नमक बनाना एक सरल कार्य था, लेकिन यह ब्रिटिश कानून को तोड़ने का एक शक्तिशाली प्रतीकात्मक कार्य था। इसने दिखाया कि कैसे एक साधारण कार्य भी अन्यायपूर्ण कानून को चुनौती दे सकता है।
- जन-जुड़ाव: गांधीजी के 240 मील लंबे मार्च के दौरान हजारों लोग उनसे जुड़ते गए। इसने आंदोलन को व्यापक प्रचार दिया और पूरे देश को एक सूत्र में बाँध दिया।
- अहिंसक सविनय अवज्ञा का आदर्श उदाहरण: पूरी यात्रा और नमक बनाने की कार्रवाई पूर्णतः अहिंसक थी। इसने दुनिया के सामने यह प्रमाणित किया कि बिना हिंसा के भी ताकतवर साम्राज्य को चुनौती दी जा सकती है।
इस प्रकार, नमक यात्रा ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ऊँचाई दी और वैश्विक स्तर पर एक प्रेरणा बन गई।
3. कल्पना कीजिए कि आप सिविल नाफरमानी आंदोलन में हिस्सा लेने वाली महिला है | बताइए कि इन अनुभव का आपके जीवन में क्या अर्थ होता ?
उत्तर- (कल्पनात्मक उत्तर - एक महिला सत्याग्रही के दृष्टिकोण से) "सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने का अनुभव मेरे जीवन में एक क्रांतिकारी मोड़ लेकर आया। घर की चारदीवारी से निकलकर सार्वजनिक जीवन में आने का यह मेरा पहला अवसर था। मैंने नमक बनाया, विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया और शराब की दुकानों का विरोध किया। जेल जाने का डर भी था, लेकिन साथियों का साथ और स्वराज का सपना उस डर से बड़ा था। इस आंदोलन ने मुझे यह एहसास कराया कि देश की सेवा केवल पुरुषों का ही नहीं, बल्कि हम महिलाओं का भी पवित्र कर्तव्य है। इसने मुझे आत्मविश्वास, साहस और एक नई पहचान दी। अब मैं केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाली एक सक्रिय नागरिक हूँ।"
4. राजनीतिक नेता पृथक निर्वाचक के सवाल पर क्यों बँटे हुए थे ?
उत्तर- पृथक निर्वाचकों (अलग मतदाता मंडल) के प्रश्न पर राजनीतिक नेताओं में गहरा मतभेद था, जिसके मुख्य कारण ये थे:
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर और दलित नेताओं का पक्ष: उनका मानना था कि सामाजिक रूप से पिछड़े दलितों को सामान्य मतदाताओं के बीच उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा। उन्होंने दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की माँग की ताकि वे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुन सकें और इस राजनीतिक सशक्तिकरण से उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार हो।
- महात्मा गांधी और कांग्रेस के एक वर्ग का पक्ष: गांधीजी का मानना था कि पृथक निर्वाचक मंडल दलितों को समाज की मुख्यधारा से अलग और हाशिए पर धकेल देगा। उनका विश्वास था कि सामाजिक भेदभाव को सुधार के प्रयासों और हृदय परिवर्तन से दूर किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक अलगाव से।
- राष्ट्रीय एकता को खतरा: कई नेताओं को आशंका थी कि यदि दलितों को अलग मतदाता मंडल दिया गया, तो अन्य समुदाय (जैसे सिख, ईसाई) भी ऐसी ही माँग करेंगे। इससे देश टुकड़ों में बँट जाएगा और राष्ट्रीय एकता को ठेस पहुँचेगी।
इस मतभेद के समाधान के लिए ही पूना पैक्ट (1932) हुआ, जिसमें दलितों के लिए संयुक्त मतदाता मंडल में आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई।