UP Board Class 12 Political Science 8. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति – राज्य
(क) सामाजिक-धार्मिक पहचान के आधार पर राज्य का निर्माण – (i) नगालैंड/मिजोरम
(ख) भाषायी पहचान और केंद्र के साथ तनाव – (ii) तमिलनाडु
(ग) क्षेत्रीय असंतुलन के फलस्वरूप राज्य का निर्माण – (iii) झारखंड/छत्तीसगढ़
(घ) आदिवासी पहचान के आधार पर अलगाववादी माँग – (iv) पंजाब
अलग देश बनाने की माँग: नागालैंड तथा मिज़ोरम ने की थी। कालांतर में मिजोरम स्वायत्त राज्य बनने के लिए राजी हो गया।
स्वायत्तता की माँग: मणिपुर-त्रिपुरा (असमी भाषा को लादने के खिलाफ)। नए राज्य बने: मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल। त्रिपुरा और मणिपुर को राज्य का दर्जा दिया गया। अब भी कुछ छोटे समुदायों द्वारा स्वायत्तता की माँग रखी जा रही है जैसे करबी और दिमगा, बोडो जनजाति को भी स्वायत्त परिषद् का दर्जा दिया गया है।
अलगाववादी आदोलन: मिजोरम का समाधान हो गया है। (असम सरकार द्वारा 1959 में मिजो पर्वतीय राज्य में अकाल से निपटने की असफलता के कारण ऐसी भयंकर नौबत आई थी)। नागालैंड: नागालैंड में अलगाववाद की समस्या का पूर्ण समाधान अब भी नहीं हुआ है। वह बातचीत के अनेक प्रस्ताव ठुकरा चुका है। कुछ अल्प समूह ने भारत सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन पूर्ण समाधान होना बाकी है।
उत्तर: राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अकाली दल के नरमपंथी नेताओं से बातचीत शुरू की और सिक्ख समुदाय को संतुष्ट करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल और राजीव गांधी के बीच समझौता हुआ। इसे पंजाब समझौता भी कहा जाता है। इसके आधार पर अकाली दल 1985 में होने वाले चुनावों में भाग लेने को तैयार हुआ। पंजाब में स्थिति को सामान्य बनाने की ओर यह एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे:
1985 के चुनावों में अकाली दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और इसकी सरकार बनी। परन्तु कुछ समय बाद अकाली दल में दरार पैदा हुई और प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में एक गुट इससे अलग हो गया तथा वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू पड़ा। राजीव-गाँधी और लोंगोवाल के समझौते के बाद भी पंजाब की स्थिति सामान्य नहीं हुई और वहाँ उग्रवादी तथा हिंसात्मक गतिविधियाँ जारी रहीं।
क्या ये प्रावधान तनाव बढ़ाने के कारण बन सकते थे? हाँ, कुछ प्रावधान पड़ोसी राज्यों के साथ तनाव का कारण बन सकते थे। उदाहरण के लिए, चंडीगढ़ को पंजाब को देने का प्रावधान हरियाणा के लिए चिंता का विषय था। इसी प्रकार, नदी जल बँटवारे का मुद्दा भी हरियाणा और राजस्थान के साथ विवाद का कारण बन सकता था। हालाँकि, समझौते का उद्देश्य शांति स्थापित करना था, लेकिन कुछ मुद्दों पर पड़ोसी राज्यों की आशंकाएँ तनाव का कारण बन सकती थीं।
उत्तर: 1970 के दशक में अकालियों को कांग्रेस पार्टी से पंजाब में चिढ़ हो गई क्योंकि वह सिख और हिन्दू दोनों धर्मों के दलितों के बीच अधिक समर्थन प्राप्त करने में सफल हो गई थी। इसी दशक में अकालियों के एक समूह ने पंजाब के लिए स्वायत्तता की माँग उठाई। 1973 में, आनंदपुर साहिब में हुए एक सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव पारित हुआ। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में क्षेत्रीय स्वायत्तता की बात उठायी गई थी। प्रस्ताव की माँगों में केन्द्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की बात भी शामिल थी। इस प्रस्ताव में सिख 'कौम' (नेशन या समुदाय) की आकांक्षाओं पर जोर देते हुए सिखों के 'बोलबाला' (प्रभुत्व या वर्चस्व) का एलान किया गया। यह प्रस्ताव संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है लेकिन इसे एक अलग सिख राष्ट्र की माँग के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इसी कारण यह प्रस्ताव विवादास्पद हो गया।
उत्तर:
(i) जम्मू-कश्मीर की आंतरिक विभिन्नताएँ: जम्मू एवं कश्मीर में तीन राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र शामिल हैं-जम्मू, कश्मीर और लद्दाख। कश्मीर घाटी को कश्मीर के दिल के रूप में देखा जाता है। कश्मीरी बोली बोलने वाले ज्यादातर लोग मुस्लिम हैं। बहरहाल, कश्मीरी भाषी लोगों में अल्पसंख्यक हिन्दू भी शामिल हैं। जम्मू क्षेत्र पहाड़ी तलहटी एवं मैदानी इलाके का संयोजन है, जहाँ हिन्दू, मुस्लिम और सिख यानी कई धर्म और भाषाओं के लोग रहते हैं। लद्दाख पर्वतीय इलाका है, जहाँ बौद्ध एवं मुस्लिमों की आबादी है, लेकिन यह आबादी बहुत कम है।
(ii) आकांक्षाओं का सिर उठाना:
(क) धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने की शेख अब्दुल्ला की आकांक्षा: 1947 से पहले जम्मू एवं कश्मीर में राजशाही थी। इसके हिन्दू शासक हरि सिंह भारत में शामिल होना नहीं चाहते थे और उन्होंने अपने स्वतंत्र राज्य के लिए भारत और पाकिस्तान के साथ समझौता करने की कोशिश की। पाकिस्तानी नेता सोचते थे कि कश्मीर, पाकिस्तान से संबद्ध है, क्योंकि राज्य की अधिकांश आबादी मुस्लिम है। बहरहाल यहाँ के लोग स्थिति को अलग नजरिए से देखते थे। वे अपने को कश्मीरी सबसे पहले, कुछ और बाद में मानते थे। राज्य में नेशनल कांफ्रेंस के शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में जन-आंदोलन चला। शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि महाराजा पद छोड़ें, लेकिन वे पाकिस्तान में शामिल होने के खिलाफ थे। नेशनल कांफ्रेंस एक धर्मनिरपेक्ष संगठन था और इसका कांग्रेस के साथ काफी समय तक गठबंधन रहा।
(ख) आक्रमणकारियों से प्रतिरक्षा कराने की आकांक्षा, चुनाव और लोकतंत्र स्थापना की आकांक्षा: अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कबायली घुसपैठियों को अपनी तरफ से कश्मीर पर कब्जा करने भेजा। ऐसे में महाराजा भारतीय सेना से मदद माँगने को मजबूर हुए। भारत ने सैन्य मदद उपलब्ध कराई और कश्मीर घाटी से घुसपैठियों को खदेड़ा। इससे पहले भारत सरकार ने महाराजा से भारत संघ में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए। इस पर सहमति जताई गई कि स्थिति सामान्य होने पर जम्मू-कश्मीर की नियति का फैसला जनमत सर्वेक्षण के द्वारा होगा। मार्च 1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रधानमंत्री बने (राज्य में सरकार के मुखिया को तब प्रधानमंत्री कहा जाता था।) भारत, जम्मू एवं कश्मीर की स्वायत्तता को बनाए रखने पर सहमत हो गया। इसे संविधान में धारा 370 का प्रावधान करके संवैधानिक दर्जा दिया गया।
उत्तर: कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष:
पहला पक्ष: समस्त राज्य को केन्द्र के अत्यधिक नियंत्रण से मुक्ति मिले और उसे अपने आंतरिक मामलों में अधिक-से-अधिक स्वायत्तता मिले और वह अपने निर्णय बिना केंद्रीय हस्तक्षेप के कर सके तथा उन्हें लागू कर सके। धारा 370 को पूरी तरह लागू किया जाए।
दूसरा पक्ष: जम्मू-कश्मीर की आंतरिक स्वायत्तता से संबंधित है। जम्मू-कश्मीर के अंदर भी विभिन्न आधारों पर क्षेत्रीय विभिन्नताएँ हैं और इसके तीन क्षेत्र अपनी अलग-अलग पहचान रखते हैं: कश्मीर घाटी, जम्मू तथा लद्दाख। जम्मू तथा लद्दाख के लोगों का आरोप है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने सदा ही उनके हितों की अनदेखी की है और ध्यान कश्मीर घाटी के विकास की ओर लगाया है तथा इन दोनों क्षेत्रों का कुछ भी विकास नहीं हुआ है। अत: इन क्षेत्रों को भी जम्मू-कश्मीर की सरकार के नियंत्रण से मुक्ति मिलनी चाहिए और इन्हें आंतरिक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए। इसी माँग के संदर्भ में लद्दाख स्वायत्त परिषद् की स्थापना की गई थी।
निजी राय: मुझे लगता है कि संविधान की धारा 370 के तहत दी गई स्वायत्तता का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए, साथ ही राज्य के भीतर जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के विकास और उनकी पहचान को भी उचित महत्व देना चाहिए। इससे राज्य के सभी क्षेत्रों में संतुलन बना रहेगा और अलगाववादी भावनाओं को कम करने में मदद मिलेगी। भारत की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए लचीलेपन और समझदारी के साथ कश्मीर के मुद्दे को हल करना आवश्यक है।
उत्तर: असम आंदोलन: उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों, विशेषकर असम राज्य में बाहरी लोगों के विरुद्ध आंदोलन हुआ है। बाहरी लोगों से अभिप्राय केवल विदेशी नहीं वल्कि वे सभी लोग माने जाते हैं जो या तो किसी दूसरे देश से आए या भारत के ही किसी अन्य क्षेत्र अथवा दूसरे राज्य से आए हैं। ऐसे दोनों प्रकार के लोगों को यहाँ की जनता बाहरी लोग कह कर पुकारती है। असम राज्य में बाहरी लोगों के विरुद्ध आंदोलन चला तथा उसने हिंसात्मक रूप भी धारण किया।
असम में देश के दूसरे क्षेत्रों से आए लोगों के खिलाफ वहाँ के लोगों का गुस्सा इतना अधिक नहीं था जितना कि बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत आए विदेशियों के कारण था। इन बांग्लादेशियों ने यहाँ आकर स्थायी रूप से रहना आरंभ कर दिया था और अपने आपको मतदाता के रूप में भी रजिस्टर करवा लिया था। स्थानीय तथा क्षेत्रीय सुविधाओं पर दबाव पड़ने के साथ-साथ यहाँ के लोगों को यह खतरा महसूस होने लगा था कि वे इनकी बढ़ती हुई संख्या के कारण अल्पमत में आ जाएंगे। असम में तेल के भंडार थे, कोयले की खानें थीं और चाय के बागान थे फिर भी लोगों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी और गरीबी का वातावरण था। लोगों को विश्वास हो गया था कि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ असम के लोगों को नहीं मिलता बल्कि बाहरी लोगों को मिलता है। उनमें 'धरती पुत्र' की भावना जागृत और विकसित हुई। अर्थात् असम केवल असम के मूलवासियों के लिए है, बाहरी लोगों के लिए नहीं और बाहरी लोगों को असम से बाहर निकाला जाए।
1979 में वहाँ युवा छात्रों ने अपना एक संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) बनाया और लोगों का विरोध शुरू किया। इस आंदोलन की माँगें थीं:
1985 में राजीव गांधी ने आंदोलनकारियों के साथ समझौता किया, जिसे असम समझौता कहा जाता है। इस समझौते ने वहाँ की स्थिति को सामान्य बनाया। इस प्रकार असम आंदोलन सांस्कृतिक अभिमान (असमिया पहचान की रक्षा) और आर्थिक पिछड़ेपन (संसाधनों पर बाहरी लोगों के अधिकार के खिलाफ) की मिली-जुली अभिव्यक्ति था।
उत्तर: प्रत्येक क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी माँग की ओर अग्रसर नहीं होता: किसी भी समाज में क्षेत्रीय आकांक्षाओं का उभरना स्वाभाविक होता है और क्षेत्र के लोग उनकी पूर्ति की माँग करने लगते हैं। परंतु सभी क्षेत्रीय आंदोलन आगे चलकर अलगाववादी प्रकृति अपना लेते हैं, ऐसी बात नहीं। यदि क्षेत्रीय आंदोलनों की ओर आरंभ में ही ध्यान दे दिया जाए, बात-चीत के द्वारा क्षेत्रीय आकांक्षाओं तथा माँगों की पूर्ति के प्रयास किए जाएँ तो क्षेत्रीय आंदोलन शांतिपूर्वक ही समाप्त हो जाते हैं और स्थिति सामान्य होने लगती है।
उदाहरण:
इस प्रकार, अधिकतर क्षेत्रीय आंदोलन क्षेत्रीय स्वायत्तता, नदी जल बँटवारे, क्षेत्रीय विकास, भाषा तथा संस्कृति के प्रश्न आदि के आधार पर खड़े होते हैं और सभी क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी नहीं होते। आपसी बातचीत तथा शीघ्रता से किया गया हल उन्हें हिंसात्मक तथा उग्रवादी नहीं होने देता।
उत्तर: हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ कि भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय माँगों से “विविधता में एकता' के सिद्धांत की अभिव्यक्ति होती है।
तर्क: भारत एक बहुलवादी समाज है और कई प्रकार की विविधताओं वाला राष्ट्र है। ये विविधताएँ भाषा, धर्म, क्षेत्र आदि के आधार पर बनी हुई हैं। इनके कारण क्षेत्रीय आकांक्षाएँ उभरती रहती हैं, बढ़ती रहती हैं। सभी क्षेत्रों की माँगें एक समान नहीं होतीं, कई बार वे एक-दूसरे की विरोधी भी होती हैं जैसे कि किसी नदी के जल के बाँटवारे से संबंधित विवाद, किसी बड़े उद्योग को किस राज्य या क्षेत्र में लगाया जाए इसके संबंध में विवाद आदि। परंतु इन विविधताओं के होते हुए भी राष्ट्रीय एकता बनी हुई है।
भारत की एक अलग पहचान है जिसमें अहिंसा, विश्वशांति, विश्वबंधुत्व आदि प्रमुख विशेषताएँ हैं। भारत के अंदर बेशक कोई कहे कि वह पंजाबी है या तमिल है, मराठी है या गुजराती है, परंतु जब दो भारतीय अमेरिका या कनाडा, इंग्लैंड या पेरिस में एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं तो उनमें यह भावना सबसे पहले प्रकट होती है कि हम भारतीय हैं। विदेशों में सभी भारतीय एकजुट होकर राष्ट्र का अंग होने और राष्ट्रीय सम्मान तथा हितों की रक्षा के लिए एकता का उदाहरण रखते हैं। भारत-पाक युद्धों के समय सभी दलों, सभी वर्गों, सभी क्षेत्रों के लोगों ने राष्ट्रीय एकता का परिचय दिया और उसकी रक्षा के लिए एकजुट हो गए।
इस प्रकार, क्षेत्रीय माँगों से भारतीय राष्ट्र के विभाजन का अनुमान नहीं होता बल्कि विविधता में एकता का ज्ञान होता है। ये माँगें लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और संविधान के ढाँचे के भीतर ही उठती व सुलझाई जाती हैं।
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