UP Board Class 12 Political Science 4. सत्ता के वैकल्पिक केंद्र is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
(क) विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश
(ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना
(ग) यूरोपीय संघ की स्थापना
(घ) आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना
सही क्रम:
1. यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना (1957)
2. आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना (1994)
3. यूरोपीय संघ की स्थापना (1992, मास्ट्रिच संधि)
4. विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश (2001)
(क) आसियान के सदस्य देशों की जीवन शैली है
(ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज की शैली को कहा जाता है।
(ग) आसियान सदस्यों की रक्षानीति है।
(घ) सभी आसियान सदस्य देशों को जोड़ने वाली सड़क है।
(ख) आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज की शैली को कहा जाता है।
(क) चीन
(ख) यूरोपीय संघ
(ग) जापान
(घ) अमरीका
(क) चीन ने 1978 के बाद आर्थिक सुधारों के तहत "खुले द्वार" की नीति अपनाई।
(क) 1962 में भारत और चीन के बीच .................... और .................... को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
(ख) आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में .................... और .................... करना शामिल है।
(ग) चीन ने 1972 में .................... के साथ दोतरफा संबंध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
(घ) .................... योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
(ङ) .................... आसियान का एक स्तम्भ है जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।
(क) 1962 में भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश के कुछ इलाकों और लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र को लेकर सीमावर्ती लड़ाई हुई थी।
(ख) आसियान क्षेत्रीय मंच के कामों में आर्थिक विकास को तेज करना और सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास प्राप्त करना शामिल है।
(ग) चीन ने 1972 में अमेरिका के साथ दोतरफा संबंध शुरू करके अपना एकांतवास समाप्त किया।
(घ) मार्शल योजना के प्रभाव से 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना हुई।
(ङ) आसियान सुरक्षा समुदाय आसियान का एक स्तम्भ है जो इसके सदस्य देशों की सुरक्षा के मामले देखता है।
क्षेत्रीय संगठनों की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के नए केंद्र बनाना: ये संगठन अमेरिका जैसी एकल महाशक्ति के प्रभुत्व को सीमित करने का काम करते हैं।
2. सामूहिक आर्थिक विकास और सहयोग: सदस्य देश आपसी व्यापार, निवेश और आर्थिक नीतियों में समन्वय से लाभ प्राप्त करते हैं।
3. क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता: ये संगठन आपसी विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने और क्षेत्र में शांति बनाए रखने का मंच प्रदान करते हैं।
4. सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास: शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति और मानवाधिकारों के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना।
5. वैश्विक मंच पर सामूहिक पहचान एवं प्रभाव: अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक सामूहिक और मजबूत आवाज के साथ उभरना।
भौगोलिक निकटता क्षेत्रीय संगठनों के गठन का एक मूल आधार है। इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं:
• समान चुनौतियाँ एवं अवसर: पड़ोसी देशों पर जलवायु, पर्यावरण, सुरक्षा, व्यापार मार्गों जैसी समान चुनौतियाँ और अवसर होते हैं, जिनका सामूहिक रूप से सामना किया जा सकता है।
• सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक समानता: निकटवर्ती देशों में अक्सर सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक समानताएँ पाई जाती हैं, जो आपसी विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देती हैं।
• आसान संपर्क एवं संचार: भौगोलिक निकटता से परिवहन, संचार और लोगों के आपसी आवागमन की लागत कम होती है, जिससे आर्थिक और सामाजिक एकीकरण आसान हो जाता है।
• क्षेत्रीय सुरक्षा जरूरतें: पड़ोसी देशों के बीच सीमा विवाद या सुरक्षा खतरे जैसे मुद्दे हो सकते हैं। एक संगठन के तहत इन मुद्दों पर बातचीत और सहयोग का एक औपचारिक मंच उपलब्ध होता है।
• उदाहरण: यूरोपीय संघ और आसियान दोनों ही भौगोलिक रूप से निकटवर्ती देशों के समूह हैं, जिन्होंने अपनी समान जरूरतों और लक्ष्यों के आधार पर मजबूत संगठनों का रूप ले लिया है।
आसियान विजन 2020 (जिसे आसियान विजन 2020 भी कहा जाता है) दिसंबर 1997 में अपनाया गया एक रोडमैप था। इसके प्रमुख घटक/लक्ष्य थे:
1. एक मजबूत आसियान समुदाय की स्थापना: आसियान को एक शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध क्षेत्र के रूप में देखना, जहाँ सदस्य देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग हो।
2. बाहरी संबंधों को मजबूत करना: अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका स्थापित करना।
3. संघर्ष समाधान एवं शांति को बढ़ावा: "आसियान वे" के अनुरूप, संवाद और सहमति के माध्यम से क्षेत्रीय संघर्षों (जैसे कंबोडिया संकट, पूर्वी तिमोर मुद्दा) को सुलझाने की नीति को जारी रखना।
4. व्यापक सहयोग: आसियान प्लस थ्री (चीन, जापान, दक्षिण कोरिया) और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन जैसे मंचों के माध्यम से व्यापक क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
आसियान समुदाय तीन स्तंभों (Three Pillars) पर आधारित है:
| स्तंभ | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|
| 1. आसियान राजनीतिक-सुरक्षा समुदाय (APSC) | क्षेत्र में शांति, स्थिरता और लचीलापन बढ़ाना। राजनीतिक संवाद, संघर्ष निवारण, आपदा प्रबंधन और गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों (जैसे आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा) पर सहयोग को बढ़ावा देना। |
| 2. आसियान आर्थिक समुदाय (AEC) | एकीकृत और प्रतिस्पर्धी बाजार बनाना ताकि सदस्य देशों के बीच माल, सेवाओं, निवेश, कुशल श्रम का स्वतंत्र प्रवाह और पूंजी का अधिक प्रवाह हो सके। |
| 3. आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय (ASCC) | मानव विकास, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देना। इसका लक्ष्य "लोगों-केंद्रित" आसियान बनाना है जो अपने नागरिकों के कल्याण पर ध्यान दे। |
1978 से पहले की नियंत्रित/सोवियत-शैली की अर्थव्यवस्था और वर्तमान की अर्थव्यवस्था में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
| नियंत्रित अर्थव्यवस्था (1949-1978) | वर्तमान चीनी अर्थव्यवस्था (1978 के बाद) |
|---|---|
| • केंद्रीय नियोजन: सभी आर्थिक गतिविधियाँ राज्य द्वारा तय की जाती थीं। | • बाजार का प्रभाव: "समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था" जहाँ बाजार की ताकतों को महत्व दिया जाता है, हालाँकि राज्य का नियंत्रण बना रहता है। |
| • सार्वजनिक स्वामित्व: उद्योग और कृषि पर राज्य का पूर्ण स्वामित्व और नियंत्रण। | • निजीकरण एवं विदेशी निवेश: निजी उद्यमों और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को अनुमति एवं प्रोत्साहन। |
| • आत्मनिर्भरता: आयात पर प्रतिबंध, घरेलू उत्पादन पर जोर। | • वैश्विक एकीकरण: "खुले द्वार" की नीति, निर्यात-उन्मुख विकास, WTO जैसे वैश्विक संस्थानों में सदस्यता। |
| • भारी उद्योग पर जोर: लोहा, इस्पात जैसे उद्योगों को प्राथमिकता। | • विविधीकरण: विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र और उच्च तकनीक उद्योगों में विस्तार। |
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप विनाश, आर्थिक पतन और राजनीतिक अविश्वास से जूझ रहा था। इन समस्याओं के समाधान और यूरोपीय संघ के गठन की ओर ले जाने वाले प्रमुख प्रयास इस प्रकार थे:
1. मार्शल योजना (1948): अमेरिकी सहायता से यूरोप का आर्थिक पुनर्निर्माण शुरू हुआ, जिसके लिए यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन (OEEC) का गठन किया गया।
2. कोयला और इस्पात समुदाय (ECSC, 1951): फ्रांस और जर्मनी समेत 6 देशों ने कोयला और इस्पात के उत्पादन पर साझा नियंत्रण स्थापित किया ताकि युद्ध की आधारशिला को हटाया जा सके। यह पहला अति-राष्ट्रीय संगठन था।
3. रोम की संधि (1957): इसी के तहत यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) और यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय (Euratom) की स्थापना हुई। EEC का लक्ष्य एक सामान्य बाजार स्थापित करना था।
4. मास्ट्रिच संधि (1992): यह सबसे महत्वपूर्ण कदम था, जिसने यूरोपीय संघ (EU) की औपचारिक स्थापना की। इसने नागरिकता, सामान्य विदेश एवं सुरक्षा नीति, और आर्थिक एवं मौद्रिक संघ (यूरो मुद्रा) की नींव रखी।
इन प्रयासों का मूल उद्देश्य यूरोपीय देशों के बीच आर्थिक एकीकरण और अंतर्निर्भरता पैदा करना था, ताकि युद्ध की संभावना को खत्म किया जा सके और सामूहिक शक्ति के साथ वैश्विक मंच पर उभरा जा सके।
यूरोपीय संघ की प्रभावशाली स्थिति निम्नलिखित कारकों से बनती है:
1. विशाल आर्थिक शक्ति: यूरोपीय संघ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसका सामूहिक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और विश्व व्यापार में हिस्सा बहुत बड़ा है।
2. राजनीतिक एवं कूटनीतिक प्रभाव: अंतरराष्ट्रीय संगठनों और वैश्विक मुद्दों (जैसे जलवायु परिवर्तन, परमाणु अप्रसार) पर यूरोपीय संघ एक मजबूत और एकजुट आवाज के रूप में उभरता है।
3. सॉफ्ट पावर: अपने लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों, उदारवादी संस्थानों और उच्च जीवन स्तर के कारण यूरोपीय संघ की वैश्विक पहचान और आकर्षण है।
4. एकल बाजार एवं मुद्रा (यूरो): आंतरिक सीमाओं के बिना माल, सेवाओं, पूंजी और लोगों की आवाजाही ने एक शक्तिशाली आर्थिक ब्लॉक बनाया है।
5. वैश्विक विकास सहायता: यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे बड़ा विकास सहायता दाता है, जिससे विकासशील देशों पर इसका प्रभाव बढ़ता है।
हाँ, इस कथन से सहमति जताई जा सकती है। चीन और भारत के उदय ने अमेरिका के नेतृत्व वाले एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती दी है और एक बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में योगदान दिया है।
चीन की भूमिका:
• चीन पहले ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।
• इसकी सैन्य शक्ति और तकनीकी क्षमता (5G, AI) तेजी से बढ़ रही है।
• बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) जैसी परियोजनाओं के माध्यम से एशिया, अफ्रीका और यूरोप में इसका आर्थिक एवं रणनीतिक प्रभाव बढ़ा है।
भारत की भूमिका:
• भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
• एक परमाणु शक्ति और बड़ी सैन्य शक्ति के रूप में इसकी स्थिति मजबूत है।
• लोकतंत्र, डिजिटल इनोवेशन और सॉफ्ट पावर के मामले में इसकी वैश्विक पहचान है। भारत QUAD जैसे समूहों के माध्यम से भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
निष्कर्ष: दोनों देश वैश्विक शासन, व्यापार नियमों और जलवायु वार्ता जैसे मंचों पर अपनी आवाज मजबूत कर रहे हैं। हालाँकि, अभी भी अमेरिका की शक्ति से उनकी तुलना की जा सकती है, लेकिन निस्संदेह उनके संयुक्त और व्यक्तिगत उदय ने विश्व राजनीति के केंद्र में नए सत्ता केंद्र स्थापित कर दिए हैं।
यह कथन पूर्णतः सही है। क्षेत्रीय आर्थिक संगठन शांति और समृद्धि के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होते हैं:
1. समृद्धि (आर्थिक विकास) के लिए:
• बाजार का विस्तार: सदस्य देशों को एक बड़े बाजार तक पहुँच मिलती है, जिससे व्यापार और निवेश बढ़ता है।
• आर्थिक दक्षता: सं
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