UP Board class 11 Economics 2. भारतीय अर्थव्यवस्था (1950 1990) is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: योजना एक ऐसी प्रक्रिया है जो यह व्याख्या करती है कि देश के सीमित संसाधनों का प्रयोग विभिन्न उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किस प्रकार किया जाना चाहिए। यह भविष्य के लिए एक रूपरेखा तैयार करती है।
उत्तर: स्वतंत्रता के समय भारत की स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण थी। अंग्रेजों ने भारत को विभाजन की समस्याओं के साथ-साथ एक स्थिर और खोखली अर्थव्यवस्था के रूप में छोड़ दिया था। देश में गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ेपन की भारी समस्याएँ थीं। यदि अर्थव्यवस्था को निजी हाथों में छोड़ दिया जाता तो वे लाभ के उद्देश्य से काम करते और गरीबी व बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर ध्यान नहीं देते। इसलिए, देश के सर्वांगीण विकास के लिए एक बड़े पैमाने पर एकीकृत योजना की आवश्यकता थी, जो केवल सरकार द्वारा आर्थिक योजना प्रणाली के माध्यम से ही संभव थी। इसीलिए भारत ने योजनाबद्ध विकास का मार्ग चुना।
उत्तर: बिना लक्ष्यों के कोई भी योजना अर्थहीन होती है। प्रत्येक योजना के स्पष्ट और विशिष्ट लक्ष्य होने चाहिए। इन लक्ष्यों को सामान्य और विशिष्ट लक्ष्यों में वर्गीकृत किया जा सकता है। जिस प्रकार एक छात्र परीक्षा की तैयारी के लिए योजना बनाता है और उसके लक्ष्य होते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं के भी लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, जैसे आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन आदि।
उत्तर: उच्च पैदावार वाली किस्म (HYV) के बीज वे विशेष बीज होते हैं जो पर्याप्त पानी, उर्वरक, कीटनाशक और अन्य आधुनिक सुविधाएँ मिलने पर पारंपरिक बीजों की तुलना में बहुत अधिक उत्पादन देते हैं। ये बीज हरित क्रांति की आधारशिला थे।
उत्तर: किसान द्वारा उत्पादित कुल उपज का वह अंश जो स्वयं के उपभोग के बाद बचता है और बाजार में बेचा जाता है, उसे विक्रय अधिशेष कहते हैं।
उत्तर:
भूमि सुधारों की आवश्यकता:
उत्तर:
हरित क्रांति: 1960 के दशक के मध्य में शुरू की गई एक रणनीति थी जिसमें उच्च उपज वाले बीज (HYV), रासायनिक उर्वरकों, सिंचाई और आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि की गई।
लागू करने के कारण:
उत्तर: "समानता के साथ संवृद्धि" का अर्थ है आर्थिक विकास (संवृद्धि) के साथ-साथ आय और धन के वितरण में समानता लाना। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना था कि ये दोनों उद्देश्य एक-दूसरे के विरोधी हैं। उनके अनुसार, यदि आय समान रूप से वितरित की जाएगी तो लोगों में काम करने की प्रेरणा कम होगी और बचत का स्तर गिरेगा। कम बचत का मतलब कम निवेश और फलस्वरूप आर्थिक विकास दर में कमी होगी। हालाँकि, भारत की योजनाओं का लक्ष्य इन दोनों के बीच संतुलन बनाना था ताकि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँच सके।
उत्तर: प्रारंभिक दृष्टि से, आधुनिकीकरण और रोजगार सृजन के बीच विरोधाभास दिखाई देता है। आधुनिकीकरण का अर्थ उत्पादन की नवीनतम और अधिक कुशल तकनीकों का प्रयोग है। ये तकनीकें अक्सर पूँजी-गहन होती हैं, अर्थात् मशीनों पर निर्भर होती हैं, जिससे श्रम की आवश्यकता कम हो जाती है और तत्काल रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं। इसलिए, अल्पकाल में आधुनिकीकरण पर जोर देने से रोजगार सृजन कम हो सकता है। हालाँकि, दीर्घकाल में आधुनिकीकरण से नए उद्योगों का विकास होता है, अर्थव्यवस्था विविधतापूर्ण बनती है और उच्च कौशल वाले रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। चुनौती यह है कि श्रमशक्ति को इन नए अवसरों के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
उत्तर: स्वतंत्रता के बाद भारत एक गरीब और पिछड़ी अर्थव्यवस्था थी। खाद्यान्नों सहित कई वस्तुओं का भारी मात्रा में आयात किया जाता था। ऐसी स्थिति में आत्मनिर्भरता अपनाना अत्यंत आवश्यक था, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं:
उत्तर:
क्षेत्रक गठन: एक अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में प्राथमिक (कृषि), द्वितीयक (उद्योग) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्रों के सापेक्षिक योगदान को उस अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक गठन कहते हैं।
सेवा क्षेत्रक का सर्वाधिक योगदान: यह आवश्यक नहीं है, लेकिन यह विकास के एक पैटर्न को दर्शाता है। आमतौर पर, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सेवा क्षेत्रक का GDP में योगदान सबसे अधिक (50-70% या अधिक) होता है। भारत में भी अब सेवा क्षेत्रक का योगदान सबसे अधिक है, जो आर्थिक परिवर्तन का संकेत है। हालाँकि, यह तभी सतत विकास का संकेत है जब कृषि और उद्योग क्षेत्र भी मजबूत हों, क्योंकि सभी क्षेत्र एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
उत्तर: स्वतंत्रता के बाद निजी क्षेत्र के पास पर्याप्त पूँजी और इच्छाशक्ति का अभाव था कि वह भारी उद्योगों और बुनियादी ढाँचे में निवेश कर सके। इसलिए औद्योगिक विकास में अग्रणी भूमिका सार्वजनिक क्षेत्र को सौंपी गई, ताकि वह निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभा सके:
उत्तर: हरित क्रांति से पहले भारत खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं था और अक्सर सूखे या संकट के समय अमेरिका से गेहूँ आयात करना पड़ता था। हरित क्रांति के बाद, विशेषकर गेहूँ और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए, गेहूँ का उत्पादन 1960-61 में लगभग 1.1 करोड़ टन से बढ़कर 1990-91 में लगभग 5.5 करोड़ टन हो गया। इस अधिशेष उत्पादन के कारण सरकार किसानों से खाद्यान्न खरीद (प्रापण) करने में सक्षम हुई और एक विशाल सुरक्षित भंडार तैयार किया। यह भंडार सूखे, बाढ़ या किसी अन्य संकट के समय देश की खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक बफर के रूप में काम आता था, जिससे देश में खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई।
उत्तर: सहायिकी (Subsidy) सरकार द्वारा दी जाने वाली वह वित्तीय सहायता है जो किसानों को उर्वरक, बीज, बिजली आदि सस्ते दामों पर उपलब्ध कराकर नई तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
सहायिकी के पक्ष में तर्क:
उत्तर: हरित क्रांति के बावजूद 1990 तक भारत की लगभग 65% जनसंख्या कृषि पर निर्भर रही। इसके प्रमुख कारण थे:
उत्तर: यह सच है कि कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs) घाटे में चल रहे हैं, लेकिन केवल लाभ-हानि के आधार पर ही उनकी उपयोगिता को नहीं आँका जा सकता। इनकी स्थापना का प्राथमिक उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण और राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को पूरा करना था।
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की उपयोगिता:
उत्तर: आयात प्रतिस्थापन एक नीति है जिसमें घरेलू स्तर पर उन वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है जिनका पहले आयात किया जाता था। यह नीति निम्नलिखित तरीकों से घरेलू उद्योगों की रक्षा करती है:
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