UP Board Solutions for Class 11 Economics
भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास
पाठ - 6: ग्रामीण विकास
प्रश्न 1. ग्रामीण विकास का क्या अर्थ है? ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्नों को स्पष्ट करें।
उत्तर : ग्रामीण विकास एक व्यापक शब्द है जो गाँव के चहुँमुखी विकास में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने पर केंद्रित है। ग्रामीण विकास से जुड़े मुख्य प्रश्न इस प्रकार हैं:
- आधारिक संरचना का विकास: यह ग्रामीण विकास का प्राथमिक प्रश्न है। इसमें साख सुविधाएँ, ग्रामीण बाजारों का विकास, परिवहन, संचार, बैंकिंग, बीमा, बिजली, सिंचाई के साधन और कृषि अनुसंधान की सुविधाएँ शामिल हैं।
- मानव पूँजी निर्माण: भारत के ग्रामीण क्षेत्र शिशु मृत्यु दर, निरक्षरता, निर्धनता, बेरोजगारी और कम पोषण स्तर जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, जो मानव पूँजी के विकास में बाधा हैं।
- निर्धनता उन्मूलन: ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक संसाधनों की पहचान करके उनका विकास करना और गैर-कृषि गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है। मौसमी एवं प्रच्छन्न बेरोजगारी को दूर करना भी आवश्यक है।
- भू-सुधार: भूमि का अधिक समान वितरण और भू-सुधार के उपाय ग्रामीण विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक हैं।
प्रश्न 2. ग्रामीण विकास में साख के महत्त्व पर चर्चा करें।
उत्तर : कृषि में फसल की बुआई से लेकर आय प्राप्ति तक एक लंबा समय लगता है, इसलिए किसानों को ऋण की बहुत आवश्यकता होती है। बीज, उर्वरक, औजार खरीदने तथा पारिवारिक खर्चों के लिए, विशेषकर मौसमी बेरोजगारी के दौरान, उन्हें धन चाहिए होता है। अतः साख ग्रामीण विकास का एक मुख्य कारक है। यदि संस्थागत स्रोत (जैसे बैंक) ऋण नहीं देंगे, तो किसान गैर-संस्थागत स्रोतों (साहूकारों) से महँगा ऋण लेंगे, जिससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और उनकी आर्थिक स्थिति खराब होगी।
प्रश्न 3. गरीबों की ऋण आवश्यकताएँ पूरी करने में अतिलघु साख व्यवस्था (स्वयं सहायता समूह) की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर : स्वयं सहायता समूह (एस.एच.जी.) ग्रामीण ऋण व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी भूमिका इस प्रकार है:
- ये समूह ग्रामीण परिवारों में बचत की आदत को बढ़ावा देते हैं।
- सदस्यों की छोटी-छोटी बचतों को जमा करके, समूह अपने सदस्यों को बिना किसी गिरवी के कम ब्याज दर पर ऋण देता है।
- यह ऋण औपचारिक बैंक ऋण की तुलना में अधिक सुविधाजनक है क्योंकि इसमें कम कागजी कार्यवाही होती है।
- यह व्यवस्था निर्धन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है, जिनके पास ऋण के लिए कोई जमानत नहीं होती।
प्रश्न 4. सरकार द्वारा ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए किए गए प्रयासों की व्याख्या करें।
उत्तर : सरकार ने ग्रामीण बाजारों के विकास के लिए निम्नलिखित प्रयास किए हैं:
- बाजारों का विनियमन: व्यवस्थित और पारदर्शी विपणन सुनिश्चित करने के लिए बाजारों को नियमित किया गया।
- भौतिक आधारिक संरचना: सड़कें, रेलवे, भंडारण गृह, कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयाँ विकसित की गईं।
- सहकारी विपणन: सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य दिलाने का प्रयास किया गया, जैसे दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ।
- नीतिगत साधन:
- कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) निर्धारित करना।
- भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा गेहूँ और चावल के भंडार का रखरखाव।
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से गरीबों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना।
प्रश्न 5. आजीविका को धारणीय बनाने के लिए कृषि का विविधीकरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर : आजीविका को टिकाऊ (धारणीय) बनाने के लिए कृषि विविधीकरण आवश्यक है क्योंकि:
- कृषि एक मौसमी गतिविधि है, इसलिए अन्य गतिविधियों द्वारा इसे पूरक बनाना जरूरी है।
- केवल खेती पर निर्भर रहना जोखिम भरा है, क्योंकि फसल खराब होने पर आय का कोई दूसरा स्रोत नहीं होता।
- विविधीकरण ग्रामीण लोगों को अतिरिक्त रोजगार और आय के नए स्रोत प्रदान करके निर्धनता दूर करने में मदद करता है।
प्रश्न 6. भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
उत्तर : ग्रामीण बैंकिंग ने कृषि उत्पादन, आय और रोजगार पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। हरित क्रांति के बाद ऋण सुविधाओं ने किसानों की मदद की। हालाँकि, कई समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं:
- अपर्याप्तता: ग्रामीण साख की उपलब्धता माँग से कम है।
- अपर्याप्त कवरेज: संस्थागत ऋण व्यवस्था सभी ग्रामीण किसानों तक नहीं पहुँच पाई है।
- कम ऋण राशि: किसानों को मंजूर ऋण की राशि अक्सर उनकी जरूरतों के अनुरूप नहीं होती।
- गरीब किसानों की उपेक्षा: सीमांत और निर्धन किसानों की ऋण आवश्यकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
- बढ़ती देय राशि (NPA): कृषि ऋण में चुकौती न कर पाने की दर चिंताजनक है, जो बैंकिंग प्रणाली के लिए खतरा है।
सुधार के उपाय: बैंकों को केवल ऋणदाता न रहकर वित्तीय साझेदार बनना चाहिए। किसानों को बचत और वित्तीय संसाधनों के कुशल उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
प्रश्न 7. कृषि विपणन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर : कृषि विपणन वह प्रक्रिया है जिसमें कृषि उत्पादों का संग्रह, भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, वर्गीकरण और वितरण शामिल है। भारत में कृषि बाजार अभी भी अकुशल और पारंपरिक हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी नीतियाँ मुख्यतः गेहूँ और चावल तक सीमित हैं, और संसाधन-संपन्न क्षेत्रों को अधिक लाभ मिला है, जबकि पिछड़े क्षेत्रों में विपणन संरचनाएँ कमजोर हैं।
प्रश्न 8. कृषि विपणन प्रक्रिया की कुछ बाधाएँ बताइए।
उत्तर : कृषि विपणन की प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं:
- निजी क्षेत्र का प्रभुत्व: अधिकांश कृषि विपणन पर निजी व्यापारियों का नियंत्रण है, सहकारी समितियों का हिस्सा बहुत कम है।
- भंडारण सुविधाओं का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में उचित भंडारण की कमी के कारण हर साल बहुत सारा उत्पादन बर्बाद हो जाता है।
- परिवहन की कमी: सड़कों की खराब दशा के कारण किसान अपना माल समय पर बाजार तक नहीं पहुँचा पाते और कम दाम पर बेचने को मजबूर होते हैं।
- बाजार सूचना का अभाव: किसानों को बाजार में उत्पादों की वर्तमान कीमतों की सही जानकारी नहीं होती, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है।
प्रश्न 9. कृषि विपणन की कुछ उपलब्ध वैकल्पिक माध्यमों के उदाहरण सहित चर्चा करें।
उत्तर : कृषि विपणन के कुछ वैकल्पिक माध्यम इस प्रकार हैं:
- प्रत्यक्ष बाजार (Direct Marketing): इसमें किसान सीधे उपभोक्ता को अपना उत्पाद बेचते हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है। उदाहरण: पंजाब, हरियाणा में 'अपनी मंडी' और पुणे की 'हाडपसार मंडी'।
- कंपनियों के साथ गठबंधन (Contract Farming): किसान बहुराष्ट्रीय या बड़ी भारतीय कंपनियों के साथ अनुबंध करते हैं। कंपनियाँ पूर्व निर्धारित कीमत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद खरीदने का आश्वासन देती हैं और कभी-कभी बीज, उर्वरक और बीमा भी उपलब्ध कराती हैं। इससे किसानों का जोखिम कम होता है।
प्रश्न 10. 'स्वर्णिम क्रांति' और 'हरित क्रांति' में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर :
| आधार |
हरित क्रांति |
स्वर्णिम क्रांति |
| समय |
1960 के दशक में शुरू हुई। |
1991-2003 की अवधि को कहा जाता है। |
| क्षेत्र |
मुख्यतः खाद्यान्न उत्पादन (गेहूँ, चावल)। |
बागवानी (फल, सब्जियाँ, फूल, मसाले)। |
| उद्देश्य |
उच्च उपज वाली किस्मों, रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई के माध्यम से खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना। |
बागवानी क्षेत्र में उत्पादन और निर्यात बढ़ाकर आय के वैकल्पिक स्रोत पैदा करना। |
प्रश्न 11. क्या सरकार द्वारा कृषि विपणन सुधार के लिए अपनाए गए विभिन्न उपाय पर्याप्त हैं? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : नहीं, सरकार द्वारा किए गए उपाय पूरी तरह पर्याप्त नहीं हैं। इसके कारण हैं:
- भारतीय कृषि बाजार अभी भी अकुशल और पारंपरिक हैं।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी नीतियाँ मुख्यतः गेहूँ और चावल तक सीमित हैं, अन्य फसलों को कम लाभ मिलता है।
- व्यावसायिक कृषि ने संसाधन-संपन्न क्षेत्रों को अधिक लाभान्वित किया है।
- पिछड़े क्षेत्रों में विपणन संरचनाएँ अभी भी कमजोर हैं और पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही हैं।
अतः अधिक व्यापक और समावेशी सुधारों की आवश्यकता है।
प्रश्न 12. ग्रामीण विविधीकरण में गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व बताइए।
उत्तर : ग्रामीण विविधीकरण का अर्थ केवल फसल बदलना नहीं, बल्कि कृषि से गैर-कृषि गतिविधियों की ओर बढ़ना है। गैर-कृषि रोजगार का महत्त्व इस प्रकार है:
- यह कृषि पर निर्भरता कम करके आय के नए और स्थिर स्रोत पैदा करता है।
- इसमें खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, चमड़ा उद्योग, पर्यटन, मिट्टी के बर्तन बनाना आदि गतिविधियाँ शामिल हैं, जो रोजगार के नए अवसर देती हैं।
- यह मौसमी बेरोजगारी की समस्या को कम करता है।
- यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है और गाँवों से शहरों की ओर पलायन को रोकने में मदद कर सकता है।
प्रश्न 13. विविधीकरण के स्रोत के रूप में पशुपालन, मत्स्यपालन और बागवानी के महत्त्व पर टिप्पणी करें।
उत्तर :
- पशुपालन: यह देश के लाखों छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय का एक स्थिर स्रोत है। यह दूध, मांस, अंडे, खाद और ईंधन प्रदान करता है। 'ऑपरेशन फ्लड' के कारण भारत दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।
- मत्स्यपालन: यह क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 1.4% का योगदान देता है। यह तटीय और अंतर्देशीय क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करता है। महिलाएँ मछली बेचने और प्रसंस्करण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- बागवानी (उद्यान विज्ञान): 1991-2003 की 'स्वर्णिम क्रांति' के दौरान इस क्षेत्र ने उल्लेखनीय वृद्धि की। भारत आम, केला, नारियल और मसालों के उत्पादन में विश्व में अग्रणी है। यह किसानों के लिए एक टिकाऊ और लाभकारी विकल्प बन गया है।
प्रश्न 14. 'सूचना प्रौद्योगिकी, धारणीय विकास तथा खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।' टिप्पणी करें।
उत्तर : सूचना प्रौद्योगिकी (IT) खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ विकास प्राप्त करने में निम्नलिखित तरीकों से योगदान कर सकती है:
- इसकी मदद से सरकार खाद्य असुरक्षा के खतरे वाले क्षेत्रों का पहले ही पता लगा सकती है और समय रहते कदम उठा सकती है।
- किसानों को मौसम का पूर्वानुमान, बाजार भाव, नई तकनीकों और मिट्टी की गुणवत्ता की जानकारी मोबाइल या इंटरनेट के माध्यम से मिल सकती है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में IT सेवाएँ प्रदान करने से नए रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
- इसका लक्ष्य प्रत्येक गाँव को एक डिजिटल ज्ञान केंद्र बनाना है, जिससे शिक्षा और सूचना का प्रसार हो सके।
प्रश्न 15. जैविक कृषि क्या है? यह धारणीय विकास को किस प्रकार बढ़ावा देती है?
उत्तर : जैविक कृषि वह विधि है जिसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग किए बिना, प्राकृतिक तरीकों से फसलें उगाई जाती हैं।
धारणीय विकास वह विकास है जो भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को प्रभावित किए बिना वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करता है।
जैविक कृषि धारणीय विकास को इस प्रकार बढ़ावा देती है:
- यह मिट्टी की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखती है और भूमि क्षरण को रोकती है।
- यह पर्यावरण को रसायनों के प्रदूषण से बचाती है।
- यह महँगे रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करके स्थानीय संसाधनों के उपयोग को प्रोत्साहित करती है।
- यह स्वास्थ्यवर्धक भोजन उपलब्ध कराती है।
प्रश्न 16. जैविक कृषि के लाभ और सीमाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाभ:
- यह महँगे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करती है, जिससे लागत घट सकती है।
- विश्व बाजार में जैविक उत्पादों की माँग बढ़ रही है, जिससे निर्यात के अवसर बढ़े हैं।
- यह अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यकर भोजन प्रदान करती है।
- यह पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ है।
- यह छोटे किसानों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है जो महँगे रसायन नहीं खरीद सकते।
सीमाएँ:
- शुरुआती वर्षों में उत्पादन पारंपरिक कृषि की तुलना में कम हो सकता है।
- इसके लिए किसानों को नई तकनीक सीखने और अपनाने की जरूरत होती है।
- जैविक उत्पादों के लिए अलग से विपणन और प्रमाणन की सुविधाएँ सीमित हैं।
- जैविक रूप से उगाए गए खाद्य पदार्थ अक्सर महँगे होते हैं, जो गरीब उपभोक्ताओं की पहुँच से दूर हो सकते हैं।
प्रश्न 17. जैविक कृषि का प्रयोग करने वाले किसानों को प्रारंभिक वर्षों में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर : जैविक कृषि शुरू करने वाले किसानों को प्रारंभिक वर्षों में निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:
- शुरुआत में उत्पादन में कमी आ सकती है, जिससे आय प्रभावित होती है।
- जैविक उत्पादों के लिए बाजार और उचित मूल्य प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।
- जैविक प्रमाणन की प्रक्रिया जटिल और खर्चीली हो सकती है।
- रासायनिक कृषि से जैविक कृषि में बदलाव के लिए विशेष ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
- जैविक उत्पादों के भंडारण और परिवहन में विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि वे जल्दी खराब हो सकते हैं।