UP Board Solutions for Class 9 Social Science (अर्थशास्त्र)
पाठ 3: निर्धनता : एक चुनौती
प्रश्न: भारत में निर्धनता रेखा का आकलन कैसे किया जाता है ?
उत्तर: भारत में निर्धनता रेखा का आकलन एक विशेष प्रक्रिया के तहत किया जाता है, जिसमें व्यक्ति के जीवन निर्वाह की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के प्रमुख चरण इस प्रकार हैं:
- सबसे पहले, एक व्यक्ति के लिए आवश्यक मूलभूत वस्तुओं जैसे भोजन, कपड़े, जूते, ईंधन, प्रकाश, शिक्षा और चिकित्सा आदि की एक सूची तैयार की जाती है।
- इन सभी वस्तुओं की आवश्यक मात्रा का पता लगाया जाता है। भोजन की आवश्यकता का निर्धारण कैलोरी के आधार पर किया जाता है।
- इन भौतिक मात्राओं को उनकी वर्तमान बाजार कीमत से गुणा करके रुपये में मूल्य निकाला जाता है। इस प्रकार प्राप्त राशि ही निर्धनता रेखा का मापदंड बनती है।
- वर्तमान में, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी (नोट: सामान्यतः 2100 कैलोरी मानी जाती है) को आधार माना जाता है।
- इस कैलोरी आवश्यकता को पूरा करने के लिए आवश्यक राशि के आधार पर ही निर्धनता रेखा निर्धारित की जाती है। उदाहरण के लिए, पुराने आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय ₹328 और शहरी क्षेत्र में ₹454 से कम होने पर व्यक्ति को निर्धन माना जाता था। यह राशि समय के साथ बदलती रहती है।
प्रश्न: क्या आप समझते हैं कि निर्धनता आकलन का वर्त्तमान तरीका सही है ?
उत्तर: नहीं, निर्धनता आकलन का वर्तमान तरीका पूर्ण रूप से सही नहीं माना जा सकता। इसकी कई सीमाएँ हैं:
- यह तरीका मुख्य रूप से खाद्यान्न (कैलोरी) की उपलब्धता और आय पर केंद्रित है, जबकि निर्धनता का अर्थ केवल भोजन की कमी नहीं है।
- इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच, स्वच्छ पेयजल, सुरक्षा, सामाजिक भेदभाव जैसे अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
- यह विधि निर्धनता के गुणात्मक पहलुओं जैसे असुरक्षा, भय और सामाजिक बहिष्कार को नहीं माप पाती।
- कैलोरी आवश्यकता और बाजार मूल्यों का आकलन भी हमेशा सटीक नहीं होता, जिससे गलत अनुमान लग सकते हैं।
इसलिए, निर्धनता के व्यापक और बहुआयामी स्वरूप को समझने के लिए एक अधिक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
प्रश्न: भारत में 1973 से निर्धनता की प्रवृतियों की चर्चा करें |
उत्तर: 1973 से लेकर अब तक भारत में निर्धनता के अनुपात में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, लेकिन समग्र रूप से इसमें गिरावट की प्रवृत्ति रही है:
- 1973 में देश की लगभग 55% आबादी निर्धनता रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही थी।
- 1993-94 तक यह आंकड़ा घटकर लगभग 36% रह गया। हालाँकि, इस दौरान निर्धनों की कुल संख्या लगभग 32 करोड़ के आसपास स्थिर बनी रही, क्योंकि जनसंख्या भी तेजी से बढ़ रही थी।
- 1999-2000 में निर्धनता अनुपात और गिरकर लगभग 26% पर पहुँच गया। इस बार निर्धनों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी आई और यह घटकर लगभग 26 करोड़ रह गई।
- इस गिरावट का श्रेय आर्थिक विकास, कृषि उत्पादन में वृद्धि (हरित क्रांति), और विभिन्न सरकारी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को दिया जा सकता है।
- यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो भविष्य में निर्धनता अनुपात 20% से भी नीचे आ सकता है।
प्रश्न: भारत में निर्धनता में अंतर-राज्य असमानताओं का एक विवरण प्रस्तुत करें |
उत्तर: भारत के विभिन्न राज्यों में निर्धनता का स्तर एक समान नहीं है। कुछ राज्यों ने इसे कम करने में उल्लेखनीय सफलता पाई है, जबकि कुछ में यह अभी भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है:
- उच्च निर्धनता वाले राज्य: उड़ीसा (ओडिशा), बिहार, असम, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश में निर्धनता एक गंभीर समस्या है। उड़ीसा और बिहार सबसे अधिक निर्धनता दर (क्रमशः लगभग 47% और 43%) वाले राज्य रहे हैं। इन राज्यों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में निर्धनता अधिक है।
- निर्धनता में उल्लेखनीय गिरावट वाले राज्य: केरल, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने निर्धनता कम करने में अच्छी प्रगति की है।
- सफलता के कारण:
- पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य उच्च कृषि वृद्धि के कारण निर्धनता कम करने में सफल रहे।
- पश्चिम बंगाल में भूमि सुधारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के प्रभावी क्रियान्वयन से सुधार हुआ।
- लगभग 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निर्धनता दर राष्ट्रीय औसत से कम है।
प्रश्न: उन सामाजिक और आर्थिक समूहों की पहचान करें जो भारत में निर्धनता के समक्ष निरुपाय हैं |
उत्तर: भारत में कुछ विशेष सामाजिक एवं आर्थिक समूह निर्धनता के प्रति अधिक संवेदनशील और असुरक्षित हैं। ये समूह हैं:
- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST): सामाजिक भेदभाव, शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ेपन के कारण इन समुदायों में निर्धनता का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है।
- ग्रामीण क्षेत्रों के श्रमिक परिवार: इनमें भूमिहीन कृषि मजदूर, छोटे और सीमांत किसान शामिल हैं, जिनकी आय अनियमित और कम होती है।
- नगरीय अनियमित मजदूर परिवार: शहरों में रिक्शा चालक, फेरीवाले, निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार आदि जो किसी स्थायी रोजगार या सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं, निर्धनता के शिकार हैं।
- अन्य: इनके अलावा, बुजुर्ग, विधवाएँ, विकलांग व्यक्ति और महिला प्रमुखित परिवार भी आर्थिक रूप से अत्यधिक असुरक्षित श्रेणी में आते हैं।
प्रश्न: भारत में अंतर्राज्यीय निर्धनता में विभिन्नता के कारण बताइए |
उत्तर: भारत के विभिन्न राज्यों में निर्धनता के स्तर में भिन्नता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- ऐतिहासिक कारण: ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में असमान आर्थिक नीतियों के कारण कुछ क्षेत्रों का विकास अवरुद्ध रहा, जिसका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।
- प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता: असम, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों में भूमि और जल जैसे संसाधनों की कमी निर्धनता का एक बड़ा कारण है।
- कृषि विकास का असमान प्रसार: सिंचाई सुविधाओं और हरित क्रांति का लाभ केवल पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों तक ही सीमित रहा। शेष राज्यों में कृषि पिछड़ी रही।
- औद्योगिकीकरण और रोजगार के अवसर: औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों (जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु) में रोजगार के अधिक अवसर हैं, जबकि अन्य राज्यों में सार्वजनिक व निजी क्षेत्र द्वारा सृजित रोजगार पर्याप्त नहीं हैं।
- सामाजिक-सांस्कृतिक कारक: कुछ क्षेत्रों में निरक्षरता, ऋणग्रस्तता और सामाजिक रीति-रिवाजों पर अत्यधिक खर्च भी निर्धनता को बढ़ावा देते हैं।
- राज्य सरकारों की नीतियाँ: कुछ राज्यों में हस्तशिल्प, लघु उद्योग और कृषि के विकास के लिए प्रभावी नीतियाँ नहीं बनाई गईं, जिससे आर्थिक विकास धीमा रहा।
प्रश्न: वैश्विक निर्धनता की प्रवृतियों की चर्चा करें |
उत्तर: विश्व बैंक के मानक के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन 1.90 अमेरिकी डॉलर (क्रय शक्ति समानता के आधार पर) से कम पर जीवन यापन करता है, उसे अत्यंत निर्धन माना जाता है। वैश्विक निर्धनता की प्रवृत्तियाँ इस प्रकार हैं:
- सकारात्मक प्रवृत्ति (गिरावट): वैश्विक स्तर पर अत्यंत निर्धन लोगों का प्रतिशत 1990 में 36% से गिरकर 2015 के आसपास 10% से भी नीचे आ गया है। निर्धनों की संख्या भी काफी घटी है। यह सुधार मुख्य रूप से चीन और पूर्वी एशिया में तेज आर्थिक वृद्धि के कारण हुआ है।
- दक्षिण एशिया की स्थिति: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देशों में निर्धनता के प्रतिशत में तो गिरावट आई है, लेकिन निर्धनों की पूर्ण संख्या में कमी उतनी तीव्र नहीं रही है क्योंकि जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है।
- उप-सहारा अफ्रीका: यह क्षेत्र अभी भी निर्धनता की चुनौती से सबसे अधिक जूझ रहा है। यहाँ निर्धनता दर विश्व में सबसे अधिक है।
- नए निर्धनता क्षेत्र: रूस जैसे पूर्व सोवियत देशों में, जहाँ पहले आधिकारिक तौर पर निर्धनता नहीं थी, आर्थिक संक्रमण के दौरान निर्धनता पुनः उभरी है। इसी तरह, लैटिन अमेरिका में निर्धनता का स्तर लगभग स्थिर बना हुआ है।
प्रश्न: निर्धनता उन्मूलन की वर्त्तमान सरकारी रणनीति की चर्चा करें |
उत्तर: भारत सरकार निर्धनता उन्मूलन के लिए आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ विभिन्न लक्षित योजनाएँ भी चला रही है। इनमें से प्रमुख योजनाएँ निम्नलिखित हैं:
- महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005: यह ग्रामीण परिवारों को प्रतिवर्ष 100 दिन का अकुशल शारीरिक श्रम का रोजगार देने की कानूनी गारंटी देता है।
- प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY): इसका उद्देश्य शिक्षित बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के अवसर सृजित करने में सहायता करना है।
- स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) - अब दीन दयाल अन्त्योदय योजना (DAY-NRLM): इसका लक्ष्य गरीब परिवारों के स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें बैंक ऋण और सरकारी सहायता से स्वरोजगार के लिए सशक्त बनाना है।
- प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (PMGY): इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास पर जोर दिया जाता है।
- राष्ट्रीय काम के बदले अनाज योजना: इस योजना के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को उनके श्रम के बदले खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता था।
- अन्त्योदय अन्न योजना (AAY): इसका उद्देश्य देश के सबसे गरीब परिवारों को अत्यधिक रियायती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना है।
इन योजनाओं का समग्र लक्ष्य गरीबों को रोजगार, आय और सुरक्षा प्रदान करके उन्हें निर्धनता रेखा से ऊपर उठाना है।
प्रश्न: निम्नलिखित प्रश्नों का संक्षेप में उत्तर दे : (क) मानव निर्धनता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर (क): मानव निर्धनता का अर्थ केवल आय की कमी नहीं है। यह एक व्यापक अवधारणा है जिसमें व्यक्ति के जीवन के लिए आवश्यक बुनियादी अवसरों और विकल्पों का अभाव शामिल है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- आर्थिक अभाव: भोजन, कपड़ा, आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त आय या संसाधन न होना।
- सामाजिक अभाव: शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच न होना।
- सशक्तिकरण का अभाव: निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी न होना, असुरक्षा और सामाजिक भेदभाव का शिकार होना।
अतः, मानव निर्धनता वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति एक सुखी, स्वस्थ और सार्थक जीवन जीने के अवसरों से वंचित रह जाता है।
(ख) निर्धनों में भी सबसे निर्धन कौन हैं ?
उत्तर (ख): निर्धन समुदाय के भीतर कुछ वर्ग विशेष रूप से अधिक असुरक्षित और निर्धन होते हैं, क्योंकि उनके पास आय के स्वयं के स्रोत नहीं होते और वे दूसरों पर निर्भर रहते हैं। ये हैं:
- बच्चे (विशेषकर बालिकाएँ): कुपोषण, शिक्षा से वंचितता और बाल श्रम का शिकार होने के कारण।
- वृद्धजन: काम करने की क्षमता समाप्त होने पर उनकी देखभाल और आजीविका का कोई साधन नहीं रहता।
- महिलाएँ (विशेषकर विधवा या परित्यक्ता): सामाजिक रूढ़िवादिता, संपत्ति के अधिकार में कमी और रोजगार के सीमित अवसरों के कारण।
- गंभीर रूप से बीमार या विकलांग व्यक्ति: इनकी देखभाल पर अतिरिक्त खर्च होता है और कमाने की क्षमता सीमित होती है।
(ग) राष्ट्रिय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं ?
उत्तर (ग): महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) 2005 की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार के वयस्क सदस्यों को प्रति वित्तीय वर्ष 100 दिन का अकुशल शारीरिक श्रम का रोजगार देने की कानूनी गारंटी प्रदान करता है।
- इस योजना में कम से कम एक-तिहाई (33%) रोजगार महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
- यदि आवेदन करने के 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं दिया जाता, तो सरकार द्वारा बेरोजगारी भत्ता दिया जाना अनिवार्य है।
- मजदूरी का भुगतान सीधे श्रमिक के बैंक या डाकघर खाते में किया जाता है, जिससे पारदर्शिता बढ़ती है।
- काम मुख्य रूप से जल संरक्षण, सूखा प्रबंधन, सिंचाई नहरें, सड़क निर्माण आदि जैसे सार्वजनिक कार्यों पर दिया जाता है, जिससे ग्रामीण बुनियादी ढाँचा भी मजबूत होता है।
- इस योजना को लागू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कोष की स्थापना की गई है।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न - निर्धनता से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर - निर्धनता या गरीबी एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति या परिवार अपने जीवन की न्यूनतम मानवीय आवश्यकताओं जैसे कि पौष्टिक भोजन, पर्याप्त वस्त्र, सुरक्षित आवास, बुनियादी शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को प्राप्त करने में असमर्थ होता है। यह केवल आय की कमी नहीं, बल्कि अवसरों, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित होने की अवस्था है।
प्रश्न - प्रधानमंत्री रोजगार योजना का प्रारंभ कब किया गया तथा इसके प्रमुख दो उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर - प्रधानमंत्री रोजगार योजना (PMRY) की शुरुआत 2 अक्टूबर, 1993 को की गई थी।
इसके दो प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षित बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार के अवसर सृजित करने में सहायता प्रदान करना, ताकि बेरोजगारी कम हो सके।
- छोटे व्यवसाय और उद्योग स्थापित करने के लिए बैंक ऋण और सरकारी सब्सिडी