UP Board class 9 Social Science 3. नात्सीवाद और हिटलर का उदय is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 9 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: हिटलर के विचारों पर चार्ल्स डार्विन के 'योग्यतम की उत्तरजीविता' के सिद्धांत और हर्बर्ट स्पेंसर के सामाजिक डार्विनवाद का गहरा प्रभाव था। इन विचारों का दुरुपयोग करके नात्सियों ने यह सिद्ध करने की कोशिश की कि जर्मन आर्य नस्ल सबसे 'योग्य' और 'श्रेष्ठ' है।
उत्तर: जर्मनी के तत्कालीन राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग ने 30 जनवरी 1933 को हिटलर को चांसलर (प्रधानमंत्री) पद की शपथ दिलाई और उसे सरकार बनाने का निमंत्रण दिया।
उत्तर: नात्सी शासन ने अपनी नस्लवादी और दमनकारी नीतियों के तहत 52 विभिन्न प्रकार के लोगों को निशाना बनाया। इनमें यहूदी, जिप्सी, समलैंगिक, विकलांग, राजनीतिक विरोधी (कम्युनिस्ट, सामाजिक लोकतंत्रवादी) और धार्मिक विरोधी (जैसे जेहोवाह विटनेस) शामिल थे।
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल जून 1941 में सोवियत संघ (रूस) पर आक्रमण (ऑपरेशन बार्बरोसा) करना था। यह एक ऐतिहासिक गलती मानी जाती है क्योंकि इसने जर्मनी को दो मोर्चों पर युद्ध लड़ने के संकट में डाल दिया और अंततः सोवियत संघ की कठोर सर्दी एवं जबरदस्त प्रतिरोध के आगे जर्मन सेना की हार हुई।
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी का साथ मुख्य रूप से इटली और जापान ने दिया। इन तीनों देशों के गठबंधन को ‘धूरी राष्ट्र’ (Axis Powers) कहा जाता है। बाद में कुछ अन्य देश भी इस गठबंधन में शामिल हुए।
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध में धूरी राष्ट्रों का विरोध करने वाले प्रमुख देशों के समूह को ‘मित्र राष्ट्र’ (Allied Powers) कहा जाता है। इनमें ब्रिटेन (इंग्लैंड), फ्रांस, सोवियत संघ (रूस), संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन जैसे देश शामिल थे।
उत्तर: हिटलर ने जर्मनी को आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के संकट से निकालने के लिए युद्ध की तैयारी और सैन्यीकरण (मिलिटराइजेशन) का विकल्प चुना। उसका मानना था कि युद्ध से हथियारों का उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार मिलेगा, और विजित देशों के संसाधन लूटकर जर्मन अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
उत्तर: नात्सी शासन में यहूदियों को मुख्य समाज से अलग-थलग करके तंग, गंदी और घिरी हुई बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया गया। इन्हीं बस्तियों को ‘घेटो’ (Ghetto) या ‘दड़बा’ कहा जाता था। यहाँ यहूदी भीषण गरीबी, भुखमरी और बीमारी के बीच जीवन व्यतीत करते थे।
उत्तर: प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर नवंबर 1918 में जर्मनी ने आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद स्थापित हुए वाइमर गणराज्य के समर्थकों और नेताओं को दक्षिणपंथी ताकतों (जैसे नात्सी) द्वारा युद्ध हारने और राष्ट्र को ‘शर्म’ दिलाने का दोषी ठहराया गया। उन्हें ही अपमानजनक तरीके से ‘नवंबर के अपराधी’ कहकर बुलाया जाता था।
उत्तर: नात्सीवाद एक कट्टर राष्ट्रवादी, सैन्यवादी, तानाशाही और नस्लवादी विचारधारा थी, जिसका जनक एडोल्फ हिटलर को माना जाता है। यह सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करने वाली एक सम्पूर्ण व्यवस्था थी। इसका उद्देश्य एक शुद्ध ‘आर्य’ जाति के नेतृत्व में सर्वशक्तिमान जर्मन साम्राज्य का निर्माण करना था, जिसमें लोकतंत्र, समाजवाद, यहूदीवाद आदि के लिए कोई स्थान नहीं था।
उत्तर: नात्सियों का विश्व दृष्टिकोण मुख्य रूप से दो सिद्धांतों पर आधारित था:
1. नस्लीय श्रेष्ठता का सिद्धांत: उनका मानना था कि दुनिया की विभिन्न नस्लें एक-दूसरे के बराबर नहीं हैं। जर्मन ‘आर्य’ नस्ल सबसे शुद्ध और श्रेष्ठ है, जबकि यहूदी, जिप्सी आदि नस्लें निम्न और हानिकारक हैं। श्रेष्ठ नस्ल को जीने का अधिकार है और निम्न नस्लों को समाप्त किया जाना चाहिए।
2. ‘जीवन-परिधि’ (Lebensraum) का सिद्धांत: उनका मानना था कि श्रेष्ठ जर्मन जाति के विस्तार और विकास के लिए अधिक भूमि (रहने की जगह) प्राप्त करना आवश्यक है। इसीलिए पड़ोसी देशों पर आक्रमण करके उन पर कब्जा करना और वहाँ जर्मनों को बसाना उनकी नीति का हिस्सा था।
उत्तर: हिटलर का उदय प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में पैदा हुए राजनीतिक और आर्थिक संकट की वजह से हुआ।
शुरुआत: 1919 में हिटलर एक छोटी ‘जर्मन वर्कर्स पार्टी’ में शामिल हुआ और जल्द ही उसका नेता बन गया। उसने इसका नाम बदलकर ‘नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी’ (नात्सी पार्टी) रखा।
लोकप्रियता का कारण: 1929 की वैश्विक महामंदी ने जर्मनी को बुरी तरह प्रभावित किया। बेरोजगारी, गरीबी और हताशा फैल गई। हिटलर ने अपने जोशीले भाषणों और प्रभावशाली प्रचार के जरिए लोगों को एक मजबूत जर्मनी, रोजगार और खोई हुई प्रतिष्ठा वापस दिलाने का वादा किया।
सत्ता में आना: जनता ने उसके वादों पर विश्वास किया। जुलाई 1932 के चुनाव में नात्सी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अंततः 30 जनवरी 1933 को राष्ट्रपति हिंडनबर्ग ने हिटलर को चांसलर नियुक्त किया।
उत्तर: हिटलर की राजनीतिक शैली आडंबरपूर्ण, प्रचार-प्रधान और जनता की भावनाओं को भड़काने वाली थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं:
1. भव्य प्रदर्शन एवं रैलियाँ: वह विशाल रैलियों, मशाल जुलूसों और सभाओं का आयोजन करता था, जिससे लोगों में एकता और शक्ति का भाव पैदा हो।
2. प्रतीकों का प्रयोग: स्वस्तिक वाला लाल झंडा, नात्सी सल्यूट (हाथ उठाकर अभिवादन) जैसे प्रतीकों से पार्टी की एक अलग पहचान बनाई गई।
3. भावनात्मक भाषण: हिटलर एक कुशल वक्ता था। वह अपने भाषणों में जर्मन लोगों के गौरव, वर्साय संधि की अपमानजनक शर्तों और यहूदियों के षड्यंत्र की बात करके लोगों की भावनाओं को उभारता था।
4. मसीहा की छवि: आर्थिक संकट और राजनीतिक अराजकता के दौर में उसने खुद को एक ऐसे ‘मसीहा’ और ‘रक्षक’ के रूप में पेश किया, जो जर्मनी को इस संकट से उबार सकता है।
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध का अंत धूरी राष्ट्रों की पूर्ण पराजय के साथ हुआ।
मुख्य घटनाक्रम:
- अप्रैल 1945 में सोवियत सेना ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया। हिटलर ने आत्महत्या कर ली।
- मई 1945 में जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया।
- प्रशांत क्षेत्र में जापान अभी भी लड़ रहा था। अमेरिका ने 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम गिराए।
- 2 सितंबर 1945 को जापान ने भी आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया।
उत्तर: वाइमर गणराज्य (1919-1933) का पूरा काल गंभीर समस्याओं से जूझते हुए बीता। प्रमुख समस्याएँ थीं:
1. जनविरोधी शुरुआत: इसे प्रथम विश्व युद्ध की हार और अपमानजनक वर्साय संधि पर हस्ताक्षर करने का दोषी माना जाता था। इसके समर्थकों को ‘नवंबर के अपराधी’ कहा जाता था।
2. आर्थिक संकट: 1923 में जर्मनी में अतिफ्लेशन (हाइपरइन्फ्लेशन) आ गया। मुद्रा (मार्क) की कीमत इतनी गिर गई कि नोटों की गठरी लेकर सामान खरीदा जाता था। बचत खत्म हो गई।
3. राजनीतिक अस्थिरता: दक्षिणपंथी (जैसे नात्सी) और वामपंथी (कम्युनिस्ट) दोनों ही इस गणराज्य के विरोधी थे और इसे उखाड़ फेंकना चाहते थे।
4. विदेशी दबाव: युद्ध की क्षतिपूर्ति (हर्जाना) न चुका पाने पर फ्रांस ने जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्र रूर पर कब्जा कर लिया था।
उत्तर: 1930 तक जर्मनी में नात्सीवाद की लोकप्रियता के निम्नलिखित कारण थे:
1. 1929 की महामंदी का प्रभाव: इससे जर्मन अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। बैंक दिवालिया हो गए, कारखाने बंद हुए, बेरोजगारों की संख्या 60 लाख से अधिक हो गई। लोग हताश और किसी मजबूत नेता की तलाश में थे।
2. वाइमर गणराज्य की कमजोरी: लोकतांत्रिक सरकार इस संकट से निपटने में पूरी तरह विफल रही। लोगों को लोकतंत्र से मोहभंग हो गया।
3. हिटलर का प्रभावी प्रचार: नात्सी प्रचार मशीन ने लोगों को सरल समाधान दिखाए – यहूदियों और विदेशियों को दोष देना, वर्साय संधि को फाड़ फेंकने का वादा, एक शक्तिशाली जर्मनी का सपना।
4. वादे और आश्वासन: हिटलर ने हर वर्ग को कुछ न कुछ वादा किया – बेरोजगारों को रोजगार, व्यापारियों को मुनाफा, युवाओं को गौरवपूर्ण भविष्य। इन वादों ने लोगों को आकर्षित किया।
उत्तर: नात्सी सोच या विचारधारा के प्रमुख पहलू इस प्रकार थे:
1. नस्लवाद: जर्मन आर्य नस्ल को सर्वश्रेष्ठ मानना और यहूदियों, जिप्सियों आदि को ‘निम्न’ एवं ‘परजीवी’ मानकर उनका सफाया करना।
2. एक नेता का शासन (फ्यूहरर प्रिंसिपल): पूर्ण निष्ठा और आज्ञापालन के साथ एक सर्वशक्तिमान नेता (हिटलर) की अगुवाई में चलना। लोकतंत्र को कमजोरी का प्रतीक मानना।
3. युद्ध और विस्तारवाद: ‘जीवन-परिधि’ (लेबेंसरौम) के सिद्धांत के तहत युद्ध को गौरवपूर्ण मानते हुए पड़ोसी देशों पर कब्जा करना।
4. शक्तिशाली राज्य का निर्माण: एक ऐसे शक्तिशाली राज्य का निर्माण करना जो व्यक्ति के हर पहलू (शिक्षा, धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था) पर नियंत्रण रखे।
5. विरोधियों का दमन: कम्युनिस्टों, समाजवादियों, लोकतंत्र समर्थकों और किसी भी प्रकार के विरोध को बर्बरता से कुचल देना।
उत्तर: नात्सी प्रचार यहूदी-विरोधी नफरत फैलाने में निम्नलिखित कारणों से अत्यंत असरदार रहा:
1. सरलीकरण और झूठ: जटिल आर्थिक-सामाजिक समस्याओं (जैसे महामंदी, बेरोजगारी) का सीधा-साधा कारण ‘यहूदियों’ को बता दिया गया। उन्हें सभी बुराइयों की जड़ के रूप में पेश किया गया।
2. लगातार दोहराव: अखबारों, पोस्टरों, रेडियो, फिल्मों और स्कूली पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से यहूदियों के खिलाफ झूठ और नफरत भरे संदेशों को लगातार दोहराया गया, ताकि वह सच लगने लगे।
3. भावनाओं से खेलना: प्रचार में यहूदियों को ‘जर्मन रक्त को दूषित करने वाला’, ‘कायर’, ‘लालची सूदखोर’ और ‘अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रकारी’ बताकर जर्मन लोगों के राष्ट्रीय गौरव और डर की भावनाओं से खेला गया।
4. बच्चों और युवाओं को लक्ष्य बनाना: स्कूलों और युवा संगठनों में बच्चों को यहूदी-विरोधी विचार सिखाए गए, ताकि नफरत की भावना उनके मन में जड़ जमा ले।
उत्तर: नात्सी समाज में औरतों की भूमिका केवल एक अच्छी माँ और पत्नी तक सीमित थी। उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे शुद्ध आर्य बच्चों को जन्म दें और उनका पालन-पोषण नात्सी विचारधारा के अनुसार करें। उन्हें नौकरी करने या राजनीति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था।
फ्रांसीसी क्रांति और नात्सी शासन में अंतर: फ्रांसीसी क्रांति (1789) समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित थी, जिसने महिलाओं को भी राजनीतिक अधिकारों और शिक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। ओलंप डे गूज जैसी महिलाओं ने सक्रिय भूमिका निभाई। वहीं, नात्सी शासन (1933-45) पुरुष प्रधानता, नस्लीय शुद्धता और पारंपरिक भूमिकाओं में विश्वास रखता था, जिसने महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया और उन्हें घर की चारदीवारी में वापस धकेल दिया।
उत्तर: नात्सियों ने जनता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए:
1. आतंक और दमन: गेस्टापो (गुप्त पुलिस), एसएस, कंसंट्रेशन कैंप के जरिए राजनीतिक विरोधियों, यहूदियों और अवांछित लोगों को डराया, प्रताड़ित किया और मार डाला।
2. प्रचार तंत्र पर एकाधिकार: समाचार पत्र, रेडियो, सिनेमा, साहित्य और कला पर पूरा नियंत्रण कर लिया गया। केवल नात्सी विचारधारा का प्रचार होता था, विरोधी आवाज़ दबा दी जाती थी।
3. शिक्षा और युवा संगठनों का इस्तेमाल: स्कूली पाठ्यक्रम बदल दिए गए। बच्चों को ‘हिटलर यूथ’ और ‘लीग ऑफ जर्मन गर्ल्स’ जैसे संगठनों में शामिल करके उनके दिमाग में नात्सी विचार भरे गए।
4. भव्य रैलियाँ और समारोह: नूर्नबर्ग रैली जैसे भव्य आयोजनों से लोगों में एकता, शक्ति और नेता के प्रति भक्ति की भावना पैदा की गई।
5. अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण: मजदूर संघों को खत्म करके, उद्योगों को युद्ध के लिए तैयार करके और बेरोजगारों को सेना/कारखानों में लगाकर आर्थिक नियंत्रण हासिल किया गया।
उत्तर: लोकतंत्र को नष्ट करके तानाशाही स्थापित करने के लिए हिटलर और नात्सियों ने ये कदम उठाए:
1. महत्वपूर्ण अधिकारों का निलंबन: 28 फरवरी 1933 के ‘अग्नि अध्यादेश’ के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और सभा करने के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया।
2. सभी राजनीतिक दलों पर प्रतिबन्ध: पहले कम्युनिस्ट पार्टी और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा, फिर जुलाई 1933 के कानून द्वारा नात्सी पार्टी के अलावा सभी दलों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया।
3. राजनीतिक विरोधियों का सफाया: ‘लॉन्ग नाइफ्स की रात’ (30 जून 1934) जैसी घटनाओं में सैकड़ों विरोधियों की हत्या कर दी गई। बाकियों को यातना शिविरों में डाल दिया गया।
4. प्रशासन और न्यायपालिका पर कब्जा: सरकारी नौकरियों से गैर-नात्सियों और यहूदियों को निकाल दिया गया। न्यायपालिका को नात्सी विचारधारा के अनुसार चलने के लिए मजबूर किया गया।
5. संसद (राइखस्टाग) को कमजोर करना: ‘सक्षमता कानून’ (इनेबलिंग एक्ट) मार्च 1933 पास करवाकर हिटलर को संसद की मंजूरी के बिना भी कानून बनाने का अधिकार दे दिया गया, जिससे संसद नाममात्र की रह गई।
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