UP Board Solutions for Class 9 Social Science (भारत और समकालीन विश्व - I)
पाठ 4: वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद
प्रश्न 1- वन विनाश से आप क्या समझते है ? भारत में वन विनाश के कारणों का वर्णन करों|
उत्तर- वन विनाश का अर्थ है वनों का लगातार और अंधाधुंध कटाव, जिसके कारण वनों का क्षेत्रफल कम हो जाता है और पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है।
भारत में वन विनाश के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
- बढ़ती जनसंख्या और कृषि का विस्तार: आबादी बढ़ने से खाद्य पदार्थों की माँग में वृद्धि हुई। इस माँग को पूरा करने के लिए वनों को काटकर कृषि योग्य भूमि में बदला गया।
- रेलवे का विस्तार: ब्रिटिश काल में रेलवे लाइनों के तेजी से विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई। रेल की पटरियों के नीचे लगने वाले स्लीपरों के लिए लाखों पेड़ काटे गए।
- व्यावसायिक बागानों की स्थापना: यूरोप में चाय, कॉफी और रबड़ की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए बड़े बागान बनाए गए। इन बागानों के लिए प्राकृतिक वनों के विशाल हिस्से साफ कर दिए गए।
- जहाज निर्माण: ब्रिटिश नौसेना और व्यापारिक जहाजों के निर्माण के लिए मजबूत इमारती लकड़ी (जैसे सागौन) की भारी माँग थी, जिसने वनों पर दबाव बढ़ाया।
- वैज्ञानिक वानिकी की नीतियाँ: औपनिवेशिक सरकार द्वारा लागू 'वैज्ञानिक वानिकी' के तहत केवल उन्हीं पेड़ों को बढ़ावा दिया गया जो व्यावसायिक रूप से उपयोगी थे, जबकि दूसरी प्रजातियों को नष्ट कर दिया गया।
प्रश्न 2- वैज्ञानिक बानिकी से आप क्या समझते है?
उत्तर- वैज्ञानिक वानिकी एक ऐसी वन प्रबंधन पद्धति थी जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने लागू किया था। इसके तहत वनों को एक व्यावसायिक संसाधन के रूप में देखा गया। इसमें पेड़ों की केवल उन्हीं प्रजातियों को उगाया और काटा जाता था जो रेलवे, जहाज निर्माण और फर्नीचर के लिए उपयोगी थीं, जैसे सागौन और साल। पुराने पेड़ों को काटकर उनकी जगह नए पेड़ लगाए जाते थे, लेकिन यह प्रक्रिया प्राकृतिक वनों की विविधता को नष्ट कर देती थी और स्थानीय लोगों की जरूरतों की अनदेखी करती थी।
प्रश्न 3- 1878 के वन आधिनियम में जंगल कि किन तीन श्रणियो में बाँटा गया ?
उत्तर- 1878 के वन अधिनियम के तहत जंगलों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया:
- आरक्षित वन: ये सबसे मूल्यवान वन थे। इनमें व्यावसायिक दृष्टि से उपयोगी पेड़ होते थे। इन वनों में स्थानीय लोगों के प्रवेश और वन उत्पादों के उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध था।
- सुरक्षित वन: इन वनों में स्थानीय लोगों को कुछ शर्तों के साथ वन उत्पादों का उपयोग करने की अनुमति थी, जैसे लकड़ी लेना या पशु चराना।
- ग्रामीण वन: ये वन गाँवों के आस-पास के क्षेत्रों में थे। इन पर गाँव वालों का अधिकार होता था, लेकिन इनकी गुणवत्ता आरक्षित वनों से कम होती थी।
प्रश्न 4- किस प्रकार की वन की आरक्षित वन कहा गया ?
उत्तर- सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले और व्यावसायिक रूप से सबसे मूल्यवान वनों को आरक्षित वन कहा गया। इन वनों में उच्च कोटि की इमारती लकड़ी (जैसे सागौन) के पेड़ पाए जाते थे। इन पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण था और स्थानीय लोगों का इनमें प्रवेश वर्जित था।
प्रश्न 5- वन के आधीन क्षेत्र बढाने के क्या आवश्यकता है ? कारण दो |
उत्तर- भारत में वनाच्छादित क्षेत्र वैज्ञानिक मानकों से काफी कम है। इसे बढ़ाने की निम्नलिखित आवश्यकता है:
- पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए: वन वायु प्रदूषण को कम करते हैं, ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और जलवायु को नियंत्रित रखते हैं। वनों के बिना पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जाता है, जिससे बाढ़, सूखा और मिट्टी का कटाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- जैव विविधता और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए: वन विभिन्न प्रकार के पौधों और जानवरों का प्राकृतिक आवास होते हैं। वन क्षेत्र घटने से कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाती हैं। वनों का विस्तार जैव विविधता को बचाने के लिए जरूरी है।
प्रश्न 6- 'भस्म-कर-भोगों नीति' क्या थी ?
उत्तर- 'भस्म-कर-भोगों नीति' द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जावा (इंडोनेशिया) में डच औपनिवेशिक शासकों द्वारा अपनाई गई एक रणनीति थी। जब जापानी सेना जावा पर कब्जा करने वाली थी, तो डचों ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि जापानियों को वहाँ की मूल्यवान वन संपदा (जैसे सागौन के लट्ठे और आरा मशीनें) हाथ न लग सके, उन्हें स्वयं जला दिया या नष्ट कर दिया। इस नीति का अर्थ था - "जलाकर राख कर दो, ताकि दुश्मन उसका उपभोग न कर सके।"
प्रश्न 7- 'वन ग्राम' से आप क्या समझते है ?
उत्तर- 'वन ग्राम' उन गाँवों को कहा जाता था जिन्हें औपनिवेशिक सरकार ने आरक्षित वनों के अंदर रहने की अनुमति दी थी। यह अनुमति एक शर्त पर दी जाती थी कि गाँव के लोग वन विभाग के लिए मुफ्त में मजदूरी करेंगे। इसमें पेड़ काटना, लकड़ी ढोना और जंगल को आग से बचाने का काम शामिल था। इस प्रकार, वन ग्राम के निवासी वन विभाग के लिए सस्ते श्रमिक का काम करते थे।
प्रश्न 8- कृषि ने वन विनाश को किस प्रकार से प्रभावित किया ?
उत्तर- कृषि ने वन विनाश को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित किया:
- जनसंख्या वृद्धि और खाद्य माँग: आबादी बढ़ने से खाद्य पदार्थों की माँग बढ़ी। इस माँग को पूरा करने के लिए वनों को काटकर नई कृषि भूमि बनाई गई।
- औपनिवेशिक काल में कृषि का विस्तार: ब्रिटिश सरकार ने यूरोप की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत में कृषि का तेजी से विस्तार किया, जिसके लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई।
- व्यावसायिक बागानों की स्थापना: चाय, कॉफी और रबड़ जैसी नकदी फसलों के बागान लगाने के लिए प्राकृतिक वनों के विशाल क्षेत्रों को साफ कर दिया गया।
प्रश्न 9- रेलवे ने वन विनाश को कैसे प्रभावित किया ?
उत्तर- रेलवे के विस्तार ने वन विनाश को बहुत तेजी से बढ़ाया:
- मार्ग निर्माण के लिए सफाई: जहाँ-जहाँ रेलवे लाइनें बिछाई गईं, वहाँ के वनों को पूरी तरह साफ कर दिया गया ताकि रेल मार्ग बनाया जा सके।
- स्लीपरों की माँग: रेल की पटरियों को जोड़े रखने के लिए लकड़ी के स्लीपरों की जरूरत थी। प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में पेड़ सिर्फ स्लीपर बनाने के लिए काटे जाते थे।
- ईंधन के रूप में लकड़ी: उस समय के रेल इंजन को चलाने के लिए भी लकड़ी को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जिससे वनों पर और दबाव पड़ा।
प्रश्न 10- उपनिवेशकाल में बनिय प्रबंधन में परिवर्तन ने लोगो के जीवन में लकड़ी की नई माँग पैदा कर दी | बनिय प्रबंधन में परिवर्तन ने किस प्रकार लोगों को प्रभावित किया ?
उत्तर- औपनिवेशिक काल में वन प्रबंधन में आए परिवर्तनों ने विभिन्न समूहों को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावित किया:
- झूम खेती करने वालों को:
- सरकार ने झूम खेती (स्थानांतरित कृषि) पर प्रतिबंध लगा दिया, क्योंकि इसे वनों के लिए हानिकारक और कर वसूली में बाधक माना गया।
- इसके कारण अनेक आदिवासी समुदायों को उनके पारंपरिक घरों और जीवनशैली से जबरन विस्थापित होना पड़ा।
- कुछ को मजदूरी करनी पड़ी, तो कुछ ने सरकार के खिलाफ विद्रोह किया।
- घुमंतू और चरवाहा समुदायों को:
- वन अधिनियमों ने उनके पारंपरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया। जंगल में पशु चराना, लकड़ी या फल इकट्ठा करना गैरकानूनी हो गया।
- चराई पर कर लगा दिया गया और पास लेने पड़ते थे।
- इससे कोरावा, कराचा जैसे कई घुमंतू समुदाय अपनी आजीविका से हाथ धो बैठे।
- लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को:
- बड़ी यूरोपीय कंपनियों को वन उत्पादों के व्यापार की इजारेदारी (एकाधिकार) दे दी गई।
- छोटे भारतीय व्यापारियों और स्थानीय व्यवसाय पर नियंत्रण हो गया, कई बार उन्हें 'अपराधी कबीला' घोषित कर दिया गया।
- बागान मालिकों को:
- उन्हें फायदा हुआ। सरकार ने जंगलों के विशाल हिस्से बहुत सस्ते दामों पर यूरोपीय बागान मालिकों को दे दिए।
- चाय, कॉफी के बागान लगाने के लिए प्राकृतिक वन साफ किए गए।
- शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज अफसरों को:
- स्थानीय लोगों के पारंपरिक शिकार पर प्रतिबंध लग गया, लेकिन अंग्रेज अफसरों के लिए बड़े जानवरों (जैसे बाघ, शेर) का शिकार एक 'खेल' बन गया।
- इस अंधाधुंध शिकार के कारण कई जानवरों की प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर पहुँच गईं।
प्रश्न 11- बस्तर और जावा के औपनिवेशिक वन प्रबंधन में क्या समानताएँ हैं?
उत्तर- भारत के बस्तर क्षेत्र और इंडोनेशिया के जावा द्वीप के औपनिवेशिक वन प्रबंधन में निम्नलिखित समानताएँ थीं:
- वनों का आरक्षण: दोनों जगहों पर औपनिवेशिक शक्तियों (भारत में अंग्रेज और जावा में डच) ने सबसे मूल्यवान वनों को 'आरक्षित वन' घोषित कर दिया और स्थानीय लोगों की पहुँच पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
- बेगार श्रम (मुफ्त मजदूरी) की व्यवस्था:
- बस्तर में: गाँव वालों को वनों में रहने की इजाजत इस शर्त पर दी गई कि वे वन विभाग के लिए मुफ्त में पेड़ काटने और लकड़ी ढोने का काम करेंगे।
- जावा में: कुछ गाँवों को कर से मुक्ति इस शर्त पर दी गई कि वे सामूहिक रूप से मुफ्त में लकड़ी काटने और ढोने के लिए भैंसें उपलब्ध कराएँगे। इसे 'ब्लांडोंग डिएन्स्ट' प्रणाली कहा जाता था।
- व्यावसायिक उद्देश्य: दोनों ही जगहों पर वन प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक शक्ति के लिए लाभ कमाना था, चाहे वह रेलवे के लिए लकड़ी हो या जहाज निर्माण के लिए।
- स्थानीय विद्रोह: दोनों क्षेत्रों के लोगों ने वन कानूनों और बेगार श्रम के खिलाफ विद्रोह किया। बस्तर में भील और गोंड आदिवासियों ने, तो जावा में सामंतों ने विद्रोह का नेतृत्व किया।
प्रश्न 12- सन् 1880 से 1920 के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के वनाच्छादित क्षेत्र में 97 लाख हेक्टेयर की गिरावट आयी। पहले के 10.86 करोड़ हेक्टेयर से घटकर यह क्षेत्र 9.89 करोड़ हेक्टेयर रह गया था। इस गिरावट में निम्नलिखित कारकों की भूमिका बताएँ: रेलवे, जहाज निर्माण, कृषि-विस्तार, व्यावसायिक खेती, चाय-कॉफी के बागान, आदिवासी और किसान
उत्तर- 1880 से 1920 के बीच वन क्षेत्र में भारी गिरावट में उपरोक्त कारकों की निम्न भूमिका रही:
- रेलवे: रेलवे के विस्तार के लिए मार्ग बनाने हेतु वन साफ किए गए। स्लीपरों और इंजन के ईंधन के लिए लाखों पेड़ काटे गए। अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में हर साल 35,000 पेड़ सिर्फ स्लीपरों के लिए काटे जाते थे।
- जहाज निर्माण: ब्रिटिश नौसेना और व्यापारिक बेड़े को मजबूत बनाने के लिए भारी मात्रा में इमारती लकड़ी (सागौन) की जरूरत थी, जिसके लिए वनों की कटाई हुई।
- कृषि-विस्तार: बढ़ती आबादी और यूरोप की माँग को पूरा करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने हेतु वनों को काटकर नई कृषि भूमि बनाई गई।
- व्यावसायिक खेती: गन्ना, कपास, जूट जैसी नकदी फसलों की खेती के विस्तार के लिए वनों को साफ किया गया।
- चाय-कॉफी के बागान: यूरोप में इनकी बढ़ती माँग के कारण, ब्रिटिश सरकार ने सस्ते दामों पर वन भूमि यूरोपीय बागान मालिकों को दे दी। असम, दार्जिलिंग आदि में चाय के बागानों के लिए विशाल वन क्षेत्र साफ किए गए।
- आदिवासी और किसान: इन समुदायों ने भी अपनी आवश्यकताओं (झोपड़ी निर्माण, ईंधन, कृषि) के लिए वनों का उपयोग किया। हालाँकि, उनकी भूमिका औपनिवेशिक व्यावसायिक शोषण की तुलना में बहुत कम थी।
प्रश्न 13- युद्धों से जंगल क्यों प्रभावित होते हैं ?
उत्तर- युद्धों का वनों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है:
- सैन्य जरूरतों के लिए अंधाधुंध कटाई: युद्ध के समय सेना की जरूरतों (शिविर, किलेबंदी, ईंधन) को पूरा करने और दुश्मन की आवाजाही रोकने के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की जाती है। प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में वन विभाग ने ब्रिटिश सेना की जरूरतें पूरी करने के लिए बेतहाशा पेड़ काटे।
- 'भस्म-कर-भोगों' नीति: पीछे हटती सेना दुश्मन के हाथ संसाधन न लगने देने के लिए वन संपदा को नष्ट कर देती है, जैसा कि जावा में डचों ने किया।
- युद्धोत्तर पुनर्निर्माण: युद्ध के बाद शहरों, कारखानों और रेलवे के पुनर्निर्माण के लिए लकड़ी की भारी माँग होती है, जिससे वनों पर फिर से दबाव पड़ता है।
- वन प्रबंधन का ठप होना: युद्धकाल में वन संरक्षण और प्रबंधन की नियमित योजनाएँ रुक जाती हैं, जिससे अवैध कटाई बढ़ जाती है।
--- शेष प्रश्नों के उत्तर ऊपर दिए गए हैं ---