UP Board Class 12 Economics 5. बाज़ार संतुलन is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर- बाज़ार संतुलन से तात्पर्य उस स्थिति से है जब एक विशेष कीमत पर बाज़ार में माँगी गई मात्रा पूर्ति की गई मात्रा के बराबर होती है। बाज़ार माँग वक्र माँग के नियम के अनुसार बाईं से दाईं ओर नीचे की ओर ढलान वाला होता है, क्योंकि वस्तु की कीमत तथा उसकी माँगी गई मात्रा में ऋणात्मक संबंध है। बाज़ार पूर्ति वक्र पूर्ति के नियम के अनुसार बाईं से दाईं ओर ऊपर की ढलान वाला होता है, क्योंकि वस्तु की कीमत और उसकी पूर्ति की गई मात्रा में धनात्मक संबंध होता है।
जहाँ पर माँग वक्र (DD) और पूर्ति वक्र (SS) एक दूसरे को काटते हैं, वहाँ पर बाज़ार संतुलन में होता है। इस बिन्दु पर माँग और पूर्ति बराबर होती है। इस बिन्दु के अनुरूप संतुलन कीमत (OP) तथा संतुलन मात्रा (OQ) निर्धारित हो जाती है। यदि बाज़ार कीमत संतुलन कीमत से कम होगी तो बाज़ार में अधिमाँग होगी। यदि बाज़ार कीमत संतुलन कीमत से अधिक होगी तो बाज़ार में अधिपूर्ति होगी।
बाज़ार संतुलन का आरेख
(यहाँ एक आरेख दिखाया जाएगा जहाँ DD और SS वक्र एक दूसरे को काटते हैं, संतुलन बिन्दु E, संतुलन कीमत OP और संतुलन मात्रा OQ दर्शाई जाएगी।)
उत्तर- जब किसी वस्तु की बाज़ार माँग उसकी बाज़ार पूर्ति से अधिक होती है, तो इसे अधिमाँग कहा जाता है। यह संतुलन कीमत से कम कीमत पर होता है, इसे अभावी पूर्ति भी कहते हैं।
उत्तर- जब किसी वस्तु की बाज़ार पूर्ति उसकी बाज़ार माँग से अधिक होती है तो इसे अधिपूर्ति कहा जाता है। यह संतुलन कीमत से अधिक कीमत पर होता है। इसे अभावी माँग भी कहते हैं।
उत्तर-
(क) यदि बाज़ार कीमत संतुलन कीमत से अधिक है- इस स्थिति में बाज़ार माँग बाज़ार पूर्ति से कम होगी अतः अधिपूर्ति जन्म लेगी। यह अधिपूर्ति विक्रेताओं में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगी। प्रतिस्पर्धा के कारण विक्रेता कम कीमत लेने को तैयार हो जाते हैं। कीमत कम होने से माँग विस्तृत हो जाती है और पूर्ति संकुचित हो जाती है। यह तब तक होता है जब तक कीमत पुनः संतुलन कीमत तक नहीं पहुँच जाती।
(ख) यदि बाज़ार कीमत संतुलन कीमत से कम है- इस स्थिति में बाज़ार माँग बाज़ार पूर्ति से अधिक होती है और अधिमाँग जन्म लेती है। यह अधिमाँग क्रेताओं में प्रतिस्पर्धा को बढ़ा देता है। इस प्रतिस्पर्धा के कारण क्रेता अधिक कीमत देने को तैयार हो जाते हैं। इस बढ़ी कीमत के कारण माँग संकुचित हो जाती है तथा पूर्ति विस्तृत हो जाती है। यह तब तक होता है जब तक संतुलन कीमत पुनः स्थापित न हो जाये।
उत्तर- जब फर्मों की संख्या स्थिर हो तो माँग वक्र बाँईं से दाईं ओर नीचे की ओर ढलान वाला होता है, और पूर्ति वक्र दाईं से बाईं ओर नीचे की ओर ढलान वाला होता है। जहां पर ये वक्र एक दूसरे को काटते हैं अर्थात् जिस कीमत पर बाज़ार माँग और बाज़ार पूर्ति बराबर हो जाते हैं, वहाँ पर संतुलन कीमत का निर्धारण होता है। बिन्दु E पर माँग वक्र DD और पूर्ति वक्र SS एक दूसरे को काट रहे हैं, अतः यह संतुलन बिन्दु है। इसके अनुरूप OP संतुलन कीमत है और OQ संतुलन मात्रा है।
उत्तर-
उत्तर- निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन से अभिप्राय है कि उत्पादन में बने रहकर संतुलन में कोई भी फर्म न असामान्य लाभ अर्जित करती है और न हानि उठाती है। ऐसी स्थिति में संतुलन कीमत सभी फर्मों की न्यूनतम लागत के बराबर होगी।
कारण: यदि प्रचलित बाज़ार कीमत पर प्रत्येक फर्म अधिसामान्य लाभ अर्जित कर रही है, तो नई फर्म आकर्षित होंगी। इससे पूर्ति में वृद्धि होगी, कीमत कम होगी और अधिसामान्य लाभ विलुप्त हो जायेगा। इसी प्रकार यदि प्रचलित कीमत पर फर्म सामान्य से कम लाभ अर्जित कर रही हैं तो कुछ फर्म बहिर्गमन कर जायेंगी, जिससे लाभ में वृद्धि होगी और प्रत्येक फर्म के लाभ बढ़कर सामान्य लाभ के स्तर पर आ जायेंगे। इस बिन्दु पर और अधिक फर्में प्रवेश या बहिर्गमन नहीं करेंगी। अतः प्रवेश तथा बहिर्गमन के द्वारा प्रत्येक फर्म प्रचलित बाज़ार कीमत पर सदैव सामान्य लाभ अर्जित करेगी।
अतः बाज़ार कीमत सदैव न्यूनतम औसत लागत के बराबर होगी। (AR)P = न्यूनतम औसत लागत। इस स्थिति में पूर्ति वक्र पूर्णतया लोचदार होगा क्योंकि P = न्यूनतम औसत लागत के स्तर पर फर्म कितनी भी पूर्ति कर सकती है। माँग वक्र DD इसे बिन्दु E पर काटता है जब संतुलन कीमत OP तथा संतुलन मात्रा OQ निर्धारित हो जाती है।
उत्तर- इसे एक संख्यात्मक उदाहरण से समझा जा सकता है।
मान लो,
बाजार माँग (qd) = 380 - 2P (जब P < 200)
बाजार पूर्ति (qs) = 0 (जब P > 200)
एक फर्म की पूर्ति (qsf) = 20 + 2P (जब P > 30)
एक फर्म की पूर्ति (qsf) = 0 (जब P < 30)
हम जानते हैं कि निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन के साथ बाज़ार संतुलन उस कीमत पर होगा, जो फर्मों की न्यूनतम औसत लागत के बराबर हो अतः P = 30
अतः qd = 380 - 2(30) = 380 - 60 = 320
P = 30 पर प्रत्येक फर्म पूर्ति करती है qsf = 20 + 2(30) = 80
अतः फर्मों की संतुलन संख्या = बाजार पूर्ति / एक फर्म द्वारा पूर्ति = 320 / 80 = 4
अतः निर्बाध प्रवेश और बहिर्गमन के साथ संतुलन कीमत, संतुलन मात्रा तथा फर्मों की संख्या क्रमशः ₹30, 320 इकाई तथा 4 है।
उत्तर- संतुलन उपभोक्ता की आय में वृद्धि या कमी से संतुलन कीमत तथा मात्रा किस प्रकार प्रभावित होगी वह इस बात पर निर्भर करता है कि वस्तु सामान्य वस्तु है या निम्नकोटि की वस्तु।
(क) उपभोक्ता की आय में वृद्धि:
सामान्य वस्तु: उपभोक्ता की आय बढ़ने पर सामान्य वस्तु की माँग बढ़ती है और तदनुसार संतुलन कीमत और संतुलन मात्रा भी बढ़ती है।
निम्नकोटि वस्तु: उपभोक्ता की आय बढ़ने पर निम्नकोटि वस्तु की माँग घटती है और तदनुसार संतुलन कीमत और संतुलन मात्रा भी घटती है।
(ख) उपभोक्ता की आय में कमी:
सामान्य वस्तु: सामान्य वस्तु की माँग उपभोक्ता की आय में कमी से कम हो जाती है अतः माँग वक्र बाईं ओर खिसक जाता है। तदनुसार संतुलन कीमत और संतुलन मात्रा दोनों कम हो जाते हैं।
निम्नकोटि वस्तु: निम्नकोटि वस्तु की माँग उपभोक्ता की आय में कमी से बढ़ जाती है। अतः माँग वक्र दाईं ओर खिसक जाता है। तदनुसार संतुलन कीमत और संतुलन मात्रा दोनों बढ़ जाते हैं।
उत्तर- जूतों की जोड़ी तथा मोजों की जोड़ी पूरक वस्तुएँ है। पूरक वस्तु की कीमत और मात्रा में ऋणात्मक संबंध है अर्थात् X की कीमत बढ़ने पर Y की माँग कम हो जाती है तथा विपरीत। इसलिए जूतों की कीमतों में वृद्धि होने पर मोजों की जोड़ी की माँग में कमी होगी। तदनुसार माँग वक्र बाईं ओर खिसक जायेगा और मोजों की कीमत तथा उसकी खरीदी व बेची जाने वाली संख्या में कमी होगी।
उत्तर- चाय और कॉफी प्रतिस्थापन वस्तुएँ हैं। प्रतिस्थापन वस्तुओं की कीमत और माँग में धनात्मक संबंध होता है अर्थात् X की कीमत बढ़ने पर वस्तु Y की मात्रा बढ़ती है, तथा विपरीत। अतः कॉफी की कीमत बढ़ने से चाय की माँग में वृद्धि होगी, माँग में वृद्धि होने पर संतुलन कीमत भी बढ़ेगी और संतुलन मात्रा भी बढ़ेगी। कॉफी की कीमत कम होने से चाय की माँग में कमी होगी। माँग में कमी होने से संतुलन कीमत भी घटेगी तथा संतुलन मात्रा भी घटेगी।
उत्तर- आगतों की कीमतों में परिवर्तन वस्तु की उत्पादन लागत और फलस्वरूप लाभ को प्रभावित करता है। इससे उत्पादक का पूर्ति वक्र प्रभावित होता है।
आगतों की कीमतों में वृद्धि: आगतों की कीमतों में वृद्धि से लागत बढ़ जाती है, लाभ कम हो जाता है, अतः पूर्ति में 'कमी' आ जाती है। इसके फलस्वरूप संतुलन कीमत बढ़ जाती है और संतुलन मात्रा घट जाती है।
आगतों की कीमतों में कमी: आगतों की कीमतों में कमी से लागत कम हो जाती है, लाभ बढ़ जाता है। अतः पूर्ति में 'वृद्धि' हो जाती है। इसके फलस्वरूप संतुलन कीमत कम हो जाती है और संतुलन मात्रा बढ़ जाती है।
उत्तर- वस्तु Y की संतुलन कीमत तथा मात्रा दोनों बढ़ जायेंगी।
उत्तर- यदि फर्मों की संख्या स्थिर है तो माँग वक्र के दाईं ओर खिसकने (माँग में वृद्धि) से संतुलन मात्रा तथा संतुलन कीमत दोनों बढ़ेंगे और माँग वक्र के बाईं ओर खिसकने (माँग में कमी) से संतुलन मात्रा और संतुलन कीमत दोनों कम होंगे।
यदि फर्मों के लिए निर्बाध प्रवेश तथा बहिर्गमन की अनुमति है तो P = न्यूनतम औसत लागत पर स्थिर रहेगा। इस कीमत पर कोई भी फर्म कितनी भी मात्रा की पूर्ति कर सकती है, परन्तु कीमत को परिवर्तित नहीं कर सकती। अतः ऐसे में माँग बढ़ने से संतुलन मात्रा बढ़ेगी, संतुलन कीमत समान रहेगी तथा माँग कम होने से संतुलन मात्रा कम होगी, संतुलन कीमत समान रहेगी।
उत्तर- इसमें तीन स्थितियाँ संभव हैं।
उत्तर-
(क) माँग और पूर्ति वक्र दोनों समान दिशा में शिफ्ट होते हैं।
दोनों में वृद्धि हो:
उत्तर- वस्तु बाज़ार में तथा श्रम बाज़ार में दोनों में ईष्टतम मात्रा का निर्धारण पूर्ति और माँग शक्तियों द्वारा ही होता है। परन्तु श्रम बाज़ार में श्रम की पूर्ति करने वाले परिवार क्षेत्रक है और श्रम की माँग फर्मों से आती है, जबकि वस्तुओं के बाज़ार में वस्तुओं की माँग करने वाले परिवार क्षेत्रक है और पूर्ति फर्मों से आती है। मजदूरी दरें तथा ईष्टतम मात्रा का निर्धारण श्रम के लिए माँग और पूर्ति वक्रों के प्रतिच्छेदन बिन्दु पर होता है, जहाँ श्रम की माँग और पूर्ति संतुलन में हों। इसी प्रकार वस्तुओं की कीमतों तथा ईष्टतम मात्रा का निर्धारण भी माँग और पूर्ति वक्रों के प्रतिच्छेदन बिन्दु पर होता है, जहाँ वस्तु की माँग और पूर्ति बराबर हो।
उत्तर- मजदूरी दर और ईष्टतम मात्रा का निर्धारण श्रम के लिए माँग और पूर्ति वक्रों के प्रतिच्छेदन बिन्दु पर होता है।
उत्तर- एक अधिकतमकर्ता फर्म उस बिन्दु तक श्रम का उपयोग करेगी, जिस पर श्रम की अंतिम इकाई के उपयोग की अतिरिक्त लागत उस इकाई से प्राप्त अतिरिक्त लाभ के बराबर है। श्रम की एक अतिरिक्त इकाई को उपयोग में लाने के अतिरिक्त लागत मजदूरी दर (W) है। श्रम की एक अतिरिक्त इकाई द्वारा अतिरिक्त निर्गत उत्पादन उसका सीमांत उत्पाद (MPL) तथा प्रत्येक अतिरिक्त इकाई निर्गत के विक्रय से प्राप्त अतिरिक्त आय फर्म की उस इकाई से प्र
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