UP Board Class 12 Economics 5. सरकारी बजट एवं अर्थव्यवस्था is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर- सार्वजनिक वस्तुएँ ऐसी वस्तुओं को कहा जाता है जिनकी कीमत का निर्धारण बाज़ार कीमत तंत्र द्वारा नहीं हो सकता। इनकी संतुलन कीमत व संतुलन मात्रा वैयक्तिक उपभोक्ताओं और उत्पादकों के बीच संव्यवहार से नहीं हो सकती। उदाहरण- राष्ट्रीय प्रतिरक्षा, सड़क, लोक प्रशासन आदि। सार्वजनिक वस्तुएँ सरकार के द्वारा ही प्रदान की जानी चाहिए क्योंकि-
उत्तर-
| आधार | राजस्व व्यय | पूँजीगत व्यय |
|---|---|---|
| अर्थ | राजस्व व्यय से अभिप्राय सरकार द्वारा एक वित्तीय वर्ष में किये जाने वाले उस अनुमानित व्यय से है, जिसके फलस्वरूप न तो सरकार की परिसंपत्तियों का निर्माण होता है और न ही देनदारियों में कमी आती है। | पूँजीगत व्यय से सरकार द्वारा एक वित्तीय वर्ष में किये जाने वाले उस अनुमानित व्यय से है, जिसके फलस्वरूप या तो सरकार की परिसंपत्तियों का निर्माण होता हैं या देनदारियों में कमी आती है। |
| आवृत्ति | ये भुगतान बार-बार करने की प्रकृति वाले होते हैं। | ये भुगतान एक बार करने वाले प्रकृति के होते हैं। |
| उदाहरण | सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, आर्थिक सहायता, सामाजिक और आर्थिक सहायता पर किये जाने वाले व्यय, सरकारी ऋणों पर ब्याज अदायगियाँ। | सरकार द्वारा भूमि की खरीद, इमारतों, सड़कों, रेल, मेट्रो ट्रेन, पुल का निर्माण, विदेशी सरकार को दिए गए ऋण, कर्जों का भुगतान, सार्वजनिक उद्यम शुरू करना आदि। |
उत्तर- यह कहना बिल्कुल उचित है कि राजकोषीय घाटे से सरकार को ऋण की आवश्यकता होती है। राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और ऋण ग्रहण को छोड़कर कुल प्राप्तियों का अंतर हैं।
सकल राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण से सृजित पूँजीगत प्राप्तियाँ)
हम जानते हैं दोहरे लेखांकन प्रणाली के अनुसार सरकार का कुल व्यय और कुल प्राप्तियाँ बराबर होनी ही चाहिए, क्योंकि सरकार ने जो व्यय किया है उसका भुगतान तो इसे करना ही होगा चाहे वह ऋण लेकर करे चाहे नये नोट छापकर जिसे घाटे की वित्त व्यवस्था कहा जाता है। अतः राजकोषीय घाटा सरकार की कुल ऋण ग्रहण की आवश्यकता के बराबर होता हैं।
राजकोषीय घाटा = ऋण से सृजित पूँजीगत प्राप्तियाँ
उत्तर- जब राजस्व व्यय, राजस्व प्राप्तियों से अधिक होता है तो इसे राजस्व घाटा कहा जाता है।
सूत्र के रूप में,
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ
दूसरी ओर बजट के अंतर्गत जब कुल व्यय कुल प्राप्तियों से अधिक होता है तो इस अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है।
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण से सृजित पूँजीगत प्राप्तियाँ)
= (राजस्व व्यय + पूँजीगत व्यय) – (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण से सृजित पूँजीगत प्राप्तियाँ)
= (राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ) + (पूँजीगत व्यय – गैर ऋण से सृजित पूँजीगत प्राप्तियाँ)
= राजस्व घाटा + (पूँजीगत व्यय – गैर ऋण से सृजित पूँजीगत प्राप्तियाँ)
इस प्रकार, राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटे से अधिक होता है।
(क) संतुलन आय स्तर क्या है?
(ख) सरकारी व्यय गुणांक और कर गुणांक के मानों की गणना करो।
(ग) यदि सरकार के व्यय में 200 की बढ़ोतरी होती है, तो संतुलन आय में क्या परिवर्तन होगा?
उत्तर-
(क) संतुलन आय स्तर वहाँ होती है जहाँ
AD = AS,
AD = C + I + G
AS = Y
Y = 100 + 0.75(Y – 100) + 200 + 150
Y = 100 + 0.75Y – 75 + 350
Y – 0.75Y = 375
0.25Y = 375
Y = 375 / 0.25
Y = 1500 (संतुलन आय)
(ख) सरकारी व्यय गुणांक = 1 / (1 – MPC)
MPC = 0.75
सरकारी व्यय गुणांक = 1 / (1 – 0.75) = 1 / 0.25 = 4
कर गुणांक = – MPC / (1 – MPC)
कर गुणांक = – 0.75 / 0.25 = –3
(ग) सरकारी व्यय गुणांक = ΔY / ΔG
4 = ΔY / 200
ΔY = 4 × 200
ΔY = 800
अतः संतुलन आय में 800 की वृद्धि होगी।
C = 20 + 0.8Y, I = 30, G = 50, TR = 100
(क) आय का संतुलन स्तर और मॉडल में स्वायत्त व्यय गुणक ज्ञात कीजिए।
(ख) यदि सरकार के व्यय में 30 की वृद्धि होती है तो संतुलन आय पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
(ग) यदि एकमुश्त कर 30 जोड़ दिया जाए जिससे सरकार के क्रय में बढ़ोतरी का भुगतान जा सके, तो संतुलन आय में किस प्रकार का परिवर्तन होगा?
उत्तर-
(क) आय का संतुलन स्तर वहाँ होगा जहाँ
AS = AD,
Y = C + I + G
Y = 20 + 0.80Y + 30 + 50
Y – 0.8Y = 100
0.2Y = 100
Y = 100 / 0.2
Y = 500 करोड़ (संतुलन आय)
स्वायत्त व्यय गुणक = 1 / (1 – MPC)
MPC = 0.8
स्वायत्त व्यय गुणक = 1 / (1 – 0.8) = 1 / 0.2 = 5
(ख) यदि सरकारी व्यय में ΔG = 30 की वृद्धि होती है, तो
स्वायत्त व्यय गुणक = ΔY / ΔG
5 = ΔY / 30
ΔY = 5 × 30
ΔY = 150
अतः संतुलन आय 150 करोड़ बढ़कर 650 करोड़ हो जाएगी।
(ग) यदि एकमुश्त कर 30 जोड़ दिया जाए, तो
AD = 20 + 0.8(Y – 30) + 30 + 50
AD = 20 + 0.8Y – 24 + 80
AD = 76 + 0.8Y
संतुलन पर, Y = AD
Y = 76 + 0.8Y
Y – 0.8Y = 76
0.2Y = 76
Y = 76 / 0.2
Y = 380 करोड़
अतः संतुलन आय घटकर 380 करोड़ रह जाएगी।
उत्तर- मान लीजिए प्रारंभिक संतुलन आय 500 करोड़ है।
स्थिति 1: अंतरण (TR) में 10% की वृद्धि = 10
नया AD = 20 + 0.8(Y + 10) + 30 + 50
संतुलन पर, Y = 20 + 0.8Y + 8 + 80
Y – 0.8Y = 108
0.2Y = 108
Y = 108 / 0.2
Y = 540 करोड़
स्थिति 2: एकमुश्त करों में 10% की वृद्धि = 10
नया AD = 20 + 0.8(Y – 10) + 30 + 50
AD = 20 + 0.8Y – 8 + 80
AD = 92 + 0.8Y
संतुलन पर, Y = 92 + 0.8Y
Y – 0.8Y = 92
0.2Y = 92
Y = 92 / 0.2
Y = 460 करोड़
तुलना: अंतरण में वृद्धि आय के संतुलन स्तर को बढ़ा देती है (500 → 540) जबकि एकमुश्त कर में वृद्धि आय के संतुलन स्तर को कम कर देती है (500 → 460)।
(क) संतुलन आय ज्ञात करो
(ख) संतुलन आय पर कर राजस्व क्या है? क्या सरकार का बजट संतुलित बजट है?
उत्तर-
(क) आय संतुलन वहाँ होगा जहाँ
AS = AD
Y = C + I + G
Y = 70 + 0.70(Y – 0.10Y) + 90 + 100
Y = 70 + 0.70(0.9Y) + 190
Y = 260 + 0.63Y
Y – 0.63Y = 260
0.37Y = 260
Y = 260 / 0.37
Y ≈ 702.70 करोड़
(ख) संतुलन आय पर कर राजस्व = 0.10Y = 0.10 × 702.70 = 70.27 करोड़
सरकारी व्यय (G) = 100 करोड़
चूँकि सरकारी व्यय (100) > कर राजस्व (70.27), अतः यह संतुलित बजट नहीं है। यह घाटे का बजट है। सरकारी बजट घाटा = 100 – 70.27 = 29.73 करोड़ के बराबर है।
(क) सरकार के क्रय में 20 की वृद्धि
(ख) अंतरण में 20 की कमी।
उत्तर-
MPC = 0.75, t = 0.20
सरकारी व्यय गुणक = 1 / [1 – MPC(1 – t)]
= 1 / [1 – 0.75(1 – 0.20)]
= 1 / [1 – 0.75 × 0.80]
= 1 / [1 – 0.60]
= 1 / 0.40
सरकारी व्यय गुणक = 2.5
(क) सरकारी व्यय में वृद्धि (ΔG) = 20
संतुलन आय में वृद्धि (ΔY) = गुणक × ΔG
ΔY = 2.5 × 20 = 50
अतः संतुलन आय में 50 की वृद्धि होगी।
(ख) अंतरण गुणक = MPC / [1 – MPC(1 – t)]
= 0.75 / 0.40
अंतरण गुणक = 1.875
अंतरण में कमी (ΔTR) = –20
संतुलन आय में परिवर्तन (ΔY) = अंतरण गुणक × ΔTR
ΔY = 1.875 × (–20)
ΔY = –37.5
अतः संतुलन आय में 37.5 की कमी होगी।
उत्तर-
कर गुणक = – MPC / (1 – MPC)
सरकारी व्यय गुणक = 1 / (1 – MPC)
चूँकि MPC सदैव 1 से कम होता है (0 < MPC < 1), इसलिए (1 – MPC) हमेशा धनात्मक होगा।
दोनों गुणकों के हर समान हैं, लेकिन कर गुणक के अंश में ऋणात्मक चिह्न है और MPC का मान है, जबकि सरकारी व्यय गुणक के अंश में केवल 1 है।
उदाहरण: यदि MPC = 0.8, तो
कर गुणक = –0.8 / 0.2 = –4 (निरपेक्ष मान = 4)
सरकारी व्यय गुणक = 1 / 0.2 = 5
स्पष्ट है कि निरपेक्ष मान में कर गुणक (4) सरकारी व्यय गुणक (5) से छोटा है।
कारण: सरकारी व्यय का प्रत्यक्ष प्रभाव समग्र माँग पर पड़ता है, जबकि करों में कमी से उपभोक्ता की प्रयोज्य आय बढ़ती है, जिसका केवल एक भाग (MPC के अनुसार) ही उपभोग में जाता है। इसलिए कर गुणक का प्रभाव सरकारी व्यय गुणक से कम होता है।
उत्तर- सरकारी घाटा एक वर्ष में व्यय के लिए सरकार द्वारा लिए गए आवश्यक ऋणों की मात्रा को उजागर करता है। सरकार द्वारा अधिक ऋण लेने का अर्थ है भावी पीढ़ी के लिए ब्याज का पुनर्भुगतान करने का भार अधिक होता है। वर्ष प्रति वर्ष जब ये ऋण भार अधिक होते जाते हैं तो भावी पीढ़ियों के लिए उपलब्ध साधन कम होते जाते हैं। यह निश्चित रूप से वृद्धि की प्रक्रिया में एक प्रतिबंधक के रूप में काम करेगी, विशेषतः जब सरकार गैर-उत्पादकीय उद्देश्य के लिए ऋण लेती है।
उत्तर- हाँ, सार्वजनिक ऋण एक बोझ बन सकता है। आवर्ती उधार भावी पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय ऋणों को संचित करता है। भावी पीढ़ी को विरासत में एक पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था मिल सकती है, जिसमें राष्ट्रीय सकल उत्पाद की वृद्धि दर निरंतर कम रहती है। इसके फलस्वरूप सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा कर्जों के पुनर्भुगतान या ब्याज भुगतान के लिए खपत होती है और घरेलू निवेश निचले स्तर पर बनी रहती है। जब सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा राजकोषीय घाटा होने पर ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जहाँ एक दुश्चक्र जन्म लेता है- उच्च राजकोषीय घाटे के कारण सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि दर कम होती है और निम्न सकल घरेलू उत्पाद की संवृद्धि के कारण राजकोषीय घाटा उच्च होता है। अतः प्राप्तियाँ संकुचित होती हैं जबकि व्यय में विस्तार होता है। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ता है और सरकारी व्यय का बड़ा हिस्सा कल्याण संबंधी व्ययों पर खर्च किया जाता है।
उत्तर- राजकोषीय घाटा हमेशा स्फीतिकारी हो, यह आवश्यक नहीं है। यदि राजकोषीय घाटे का प्रयोग उत्पादक क्रियाओं के लिए किया गया हो, जिससे अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की पूर्ति में वृद्धि हो तो संभव है कि राजकोषीय घाटा स्फीतिकारी सिद्ध न हो। परंतु वास्तव में सरकार द्वारा लिये जाने वाले उधार का एक महत्त्वपूर्ण संघटक भारतीय रिजर्व बैंक है। इसके कारण अर्थव्यवस्था में मुद्रा पूर्ति में वृद्धि होती है। मुद्रा पूर्ति में वृद्धि के कारण प्रायः कीमत स्तर में वृद्धि होती है। कीमत स्तर में साधारण वृद्धि उच्च लाभों के द्वारा अधिक निवेश को प्रेरित कर सकती है। परन्तु जब कीमत वृद्धि का स्तर भयप्रद सीमाओं तक बढ़ जाता है, तो इसके कारण आगतों की लागतों में वृद्धि तथा मुद्रा की गिरती क्रय क्षमता के कारण समग्र माँग में कमी होती है। ये दोनों कारक मिलकर निवेश में कमी करते हैं, जिसके कारण सकल घरेलू उत्पाद में कमी होती है। अंततः अर्थव्यवस्था में माँग कम होने से अपस्फीति भी हो सकती है और आर्थिक मंदी भी जन्म ले सकती है।
उत्तर- घाटे में कटौती के लिए दो मुख्य विधियाँ अपनाई जा सकती हैं-
इसके अतिरिक्त सरकार व्यय में कमी करने के लिए जिन क्षेत्रों में कार्यरत है स्वयं को उनमें से कुछ क्षेत्रों से निकाल लेती है। इस प्रकार सार्वजनिक उपक्रमों के शेयरों की बिक्री के द्वारा भी प्राप्तियों में बढ़ोतरी करने का एक प्रयास किया जाता है।
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