UP Board Class 12 Economics 6. खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर- संतुलित व्यापार शेष का अर्थ है कि देश में वस्तुओं का निर्यात और वस्तुओं का आयात बराबर है। सूत्र के रूप में,
संतुलित व्यापार शेष = वस्तुओं का निर्यात - वस्तुओं का आयात = 0
चालू खाता संतुलन का अर्थ है कि देश में वस्तुओं का निर्यात, सेवाओं का निर्यात तथा हस्तांतरण प्राप्तियों का योग, वस्तुओं के आयात, सेवाओं के आयात तथा हस्तांतरण भुगतान के योग के बराबर हो। सूत्र के रूप में,
चालू खाता संतुलन = (वस्तुओं का निर्यात + सेवाओं का निर्यात + हस्तांतरण प्राप्तियाँ) - (वस्तुओं का आयात + सेवाओं का आयात + हस्तांतरण भुगतान) = 0
उत्तर- आधिकारिक आरक्षित लेन-देन से अभिप्राय सरकारी कोषों में उपलब्ध सोने के कोष तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के कोष में कमी और वृद्धि से है। इसका प्रयोग अदायगी संतुलन के आधिक्य और घाटे को ठीक करने के लिए किया जाता है।
घाटे की दशा में विदेशी विनिमय बाज़ार में करेंसी को बेचकर तथा अपने देश के विदेशी विनिमय कोष को कम करके कोई देश आधिकारिक आरक्षित निधि संव्यवहार का कार्य कर सकता है। अधिकृत आरक्षित निधि में कमी को कुल अदायगी-घाटा संतुलन कहते हैं।
इसके विपरीत, आधिक्य की दशा में विदेशी विनिमय बाज़ार में करेंसी को खरीदकर तथा अपने देश के विदेशी विनिमय कोष को बढ़ाकर कोई देश आधिकारिक आरक्षित निधि संव्यवहार का कार्य कर सकता है। अधिकृत आरक्षित निधि में वृद्धि को कुल अदायगी आधिक्य संतुलन कहते हैं।
उत्तर- मौद्रिक विनिमय दर वह विनिमय दर है, जिसमें एक करेंसी की अन्य करेंसियों के संबंध में औसत शक्ति को मापते समय कीमत स्तर में होने वाले परिवर्तनों पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह मुद्रास्फीति के प्रभाव से मुक्त नहीं होती।
वास्तविक विनिमय दर वह है जिसमें विश्व के विभिन्न देशों के कीमत स्तरों में होने वाले परिवर्तन को ध्यान में रखा जाता है। यह स्थिर कीमतों पर आधारित होने के कारण मुद्रास्फीति के प्रभाव से मुक्त होती है।
किसी भी एक समय पर, घरेलू वस्तुएँ खरीदने के लिए मौद्रिक विनिमय दर अधिक उपयुक्त होती है।
उत्तर-
दिया है: ₹1 = 1.25 येन
इसलिए, 1 येन = ₹ (1 / 1.25) = ₹0.80 (यह मौद्रिक विनिमय दर है)।
वास्तविक विनिमय दर = मौद्रिक विनिमय दर × (विदेशी कीमत स्तर / घरेलू कीमत स्तर)
वास्तविक विनिमय दर = 0.80 × (3 / 1.2)
वास्तविक विनिमय दर = 0.80 × 2.5 = 2.0
अतः, 1 येन = ₹2.0 (वास्तविक विनिमय दर के अनुसार)।
उत्तर- डेविड ह्यूम नामक अर्थशास्त्री ने 1752 में इसकी व्याख्या की कि किस प्रकार स्वर्णमान के अंतर्गत स्वचालित युक्ति से अदायगी-संतुलन प्राप्त किया जाता था।
उनके अनुसार, यदि सोने के भंडार में कमी हुई, तो सभी प्रकार की कीमतें और लागत भी अनुपातिक रूप से कम होंगी और इसके फलस्वरूप घरेलू वस्तुएँ विदेशी वस्तुओं की तुलना में सस्ती हो जायेंगी। तदनुसार, आयात घटेगा और निर्यात बढ़ेगा।
जिस देश से घरेलू अर्थव्यवस्था आयात कर रही थी और सोने में उसको भुगतान कर रही थी, उसको कीमतों और लागतों में वृद्धि का सामना करना पड़ेगा। अतः उनका महँगा निर्यात घटेगा और घरेलू अर्थव्यवस्था से आयात बढ़ेगा।
इस प्रकार धातुओं के कीमत तंत्र द्वारा सोने की क्षति उठाकर अदायगी संतुलन में सुधार लाना होता है। इस संतुलन की प्राप्ति के बाद शुद्ध सोने का प्रवाह नहीं होता और आयात-निर्यात संतुलन बना रहता है। इस प्रकार स्वचालित साम्यतंत्र के द्वारा स्थिर विनिमय दर को कायम रखा जाता था।
उत्तर- नम्य विनिमय दर का निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पूर्ति तथा माँग की शक्तियों द्वारा होता है। विदेशी विनिमय की माँग इसकी अपनी कीमत से विपरीत रूप से संबंधित होती है, जबकि विदेशी विनिमय की पूर्ति इसकी अपनी कीमत से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित होती है।
उत्तर- अवमूल्यन सरकार द्वारा आयोजन के अनुसार विदेशी करेंसी के संबंध में घरेलू करेंसी के मूल्य में जान-बूझकर की गई कमी है। यह उस स्थिति में होता है जब विनिमय दर का निर्धारण पूर्ति और माँग की शक्तियों द्वारा नहीं होता, परंतु विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा निश्चित किया जाता है।
मूल्यह्रास विदेशी करेंसी के संबंध में, घरेलू करेंसी के मूल्य में आने वाली कमी है, यह उस स्थिति में होता है, जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में विनिमय दर का निर्धारण पूर्ति और माँग की शक्तियों द्वारा होता है।
उत्तर- हाँ, केंद्रीय बैंक प्रबंधित तैरती व्यवस्था में हस्तक्षेप करता है। यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में विदेशी करेंसी के विक्रय तथा क्रय के द्वारा होता है।
जब केंद्रीय बैंक को लगता है कि घरेलू करेंसी के बाज़ार मूल्य का अत्याधिक मूल्यह्रास हो रहा है, तो इसे नियंत्रित करने के लिए तथा घरेलू करेंसी के पूर्व मूल्य को स्थापित करने के लिए यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में विदेशी मुद्रा (जैसे यूएस डॉलर) की बिक्री करेगा। इससे विदेशी मुद्रा की पूर्ति बढ़ती है और उसकी कीमत (विनिमय दर) कम हो जाती है।
इसी प्रकार, जब केंद्रीय बैंक यह महसूस करता है कि घरेलू करेंसी का बाज़ार मूल्य अत्यधिक बढ़ रहा है तो वह विदेशी करेंसी खरीदना आरंभ कर देता है। जब विदेशी करेंसी के लिए माँग में वृद्धि होती है, तो घरेलू करेंसी के संबंध में इसकी कीमत बढ़ने लगती है, जिससे निर्यात प्रोत्साहित होता है।
उत्तर- नहीं, घरेलू वस्तुओं के लिए माँग तथा वस्तुओं के लिए घरेलू माँग दोनों अलग-अलग अवधारणाएँ हैं।
उत्तर- दिया गया आयात फलन है: M = 60 + 0.06Y
यहाँ, 0.06Y वह भाग है जो आय (Y) पर निर्भर करता है। अतः आयात की सीमांत प्रवृत्ति (MPM) = 0.06 होगी।
आयात की सीमांत प्रवृत्ति और समस्त माँग फलन में व्युत्क्रम संबंध है। आयात की सीमांत प्रवृत्ति बढ़ने पर समस्त माँग फलन कम हो जाता है और आयात की सीमांत प्रवृत्ति कम होने पर समस्त माँग फलन बढ़ जाता है।
उत्तर- खुली अर्थव्यवस्था गुणक बंद अर्थव्यवस्था गुणक से छोटा होता है, क्योंकि घरेलू माँग का एक हिस्सा विदेशी वस्तुओं (आयात) के लिए होता है। अतः स्वायत्त माँग में वृद्धि से बंद अर्थव्यवस्था की तुलना में निर्गत (आय) में कम वृद्धि होती है। इससे व्यापार शेष में भी गिरावट होती है।
उत्तर- यदि कर आनुपातिक हैं, अर्थात T = tY (जहाँ t कर की दर है), तो उपभोग फलन C = a + b(Y - tY + TR) होगा।
समग्र माँग AD = C + I + G + (X - M) होगी।
संतुलन आय (Y) के लिए, Y = AD रखने पर हल करने पर गुणक प्राप्त होता है।
इकमुश्त कर की स्थिति में कर गुणक -b/(1-b) के बराबर होता है, जबकि अनुपातिक कर (T = tY) की स्थिति में कर गुणक -b/(1-b+bt) के बराबर होता है।
इससे सिद्ध होता है कि एकमुश्त कर की स्थिति में कर गुणक अधिक होता है और अनुपातिक कर की स्थिति में यह कम होता है।
उत्तर-
(क) संतुलन आय की गणना:
YD = Y - T = Y - 50
AD = C + I + G + (X - M)
AD = [40 + 0.8(Y - 50)] + 60 + 40 + [90 - (50 + 0.05Y)]
AD = 40 + 0.8Y - 40 + 60 + 40 + 90 - 50 - 0.05Y
AD = 140 + 0.75Y
संतुलन पर, Y = AD
Y = 140 + 0.75Y
Y - 0.75Y = 140
0.25Y = 140
Y = 140 / 0.25 = 560
संतुलन आय = 560 करोड़
(ख) संतुलन आय पर निवल निर्यात:
निवल निर्यात (NX) = X - M = 90 - (50 + 0.05Y)
Y=560 रखने पर,
NX = 90 - (50 + 0.05*560) = 90 - (50 + 28) = 90 - 78 = 12 करोड़
(ग) जब G = 50 हो जाता है:
AD = [40 + 0.8(Y - 50)] + 60 + 50 + [90 - (50 + 0.05Y)]
AD = 40 + 0.8Y - 40 + 60 + 50 + 90 - 50 - 0.05Y
AD = 150 + 0.75Y
संतुलन पर, Y = AD
Y = 150 + 0.75Y
0.25Y = 150
Y = 150 / 0.25 = 600 करोड़ (नई संतुलन आय)
नया निवल निर्यात (NX) = 90 - (50 + 0.05*600) = 90 - (50 + 30) = 10 करोड़
सरकारी व्यय बढ़ने से संतुलन आय बढ़कर 600 करोड़ हो गई और निवल निर्यात घटकर 10 करोड़ रह गया।
उत्तर- मान लीजिए निर्यात X = 100 हो जाता है, अन्य चर वही रहते हैं (C = 40 + 0.8YD, T=50, I=60, G=40, M=50+0.05Y)।
AD = [40 + 0.8(Y - 50)] + 60 + 40 + [100 - (50 + 0.05Y)]
AD = 40 + 0.8Y - 40 + 60 + 40 + 100 - 50 - 0.05Y
AD = 150 + 0.75Y
संतुलन पर, Y = AD
Y = 150 + 0.75Y
0.25Y = 150
Y = 150 / 0.25 = 600 करोड़ (नई संतुलन आय)
नया निवल निर्यात (NX) = X - M = 100 - (50 + 0.05*600) = 100 - (50 + 30) = 20 करोड़
निर्यात बढ़ने से संतुलन आय बढ़कर 600 करोड़ हो गई और निवल निर्यात बढ़कर 20 करोड़ हो गया।
उत्तर- एक अर्थव्यवस्था में आय संतुलन में होता है जब समग्र माँग (AD) समग्र पूर्ति (AS) के बराबर हो।
AD = C + I + G + (X - M)
AS = C + S + T
संतुलन पर, AD = AS
अतः, C + I + G + (X - M) = C + S + T
दोनों ओर से C घटाने पर,
I + G + (X - M) = S + T
पुनः व्यवस्थित करने पर,
G - T = (S - I) - (X - M)
यह सिद्ध होता है कि सरकारी बजट घाटा (G - T) निजी बचत-निवेश अंतर (S - I) और निवल निर्यात (X - M) के अंतर के बराबर होता है।
उत्तर- देश A में मुद्रास्फीति ऊँची है, इसलिए देश A की वस्तुएँ महँगी हो जाएँगी।
देश A: इसके लोग विदेशी (देश B की) सस्ती वस्तुएँ अधिक खरीदेंगे (आयात बढ़ेगा)। विदेशी (देश B के लोग) देश A की महँगी वस्तुएँ कम खरीदेंगे (निर्यात घटेगा)। परिणामस्वरूप, देश A में आयात > निर्यात होगा, अर्थात देश A का व्यापार शेष ऋणात्मक (घाटा) होगा।
देश B: इसके लोग घरेलू सस्ती वस्तुएँ अधिक खरीदेंगे और देश A की महँगी वस्तुएँ कम आयात करेंगे। विदेशी (देश A के लोग) देश B की सस्ती वस्तुएँ अधिक खरीदेंगे। परिणामस्वरूप, देश B में निर्यात > आयात होगा, अर्थात देश B का व्यापार शेष धनात्मक (आधिक्य) होगा।
उत्तर- चालू पूँजीगत खाते का घाटा खतरे का संकेत होगा यदि इसका प्रयोग उपभोग अथवा गैर-विकासात्मक कार्यों के लिए किया जा रहा है।
यदि इसका उपयोग विकासात्मक योजनाओं (जैसे बुनियादी ढाँचा, उत्पादक क्षमता) के लिए किया जा रहा है, तो इससे अर्थव्यवस्था में आय और रोजगार का स्तर ऊँचा उठेगा। आय बढ़ने से कर राजस्व बढ़ेगा, निर्यात क्षमता बढ़ेगी और विदेशी निवेश करने की क्षमता बढ़ेगी। इससे अर्थव्यवस्था भविष्य में इस घाटे की पूर्ति करने में समर्थ हो सकती है।
उत्तर-
दिया है: कर T = 0.2Y (कर आय का 20%)
YD = Y - T = Y - 0.2Y = 0.8Y
AD = C + I + G + (X - M)
AD = [100 + 0.75*(0.8Y)] + 500 + 750 + [150 - (100 + 0.2Y)]
AD = 100 + 0.6Y + 500 + 750 + 150 - 100 - 0.2Y
AD = 1400 + 0.4Y
संतुलन पर, Y = AD
Y = 1400 + 0.4Y
Y - 0.4Y = 1400
0.6Y = 1400
Y = 1400 / 0.6 = 2333.33 करोड़ (संतुलन आय)
बजट घाटा/आधिक्य: G - T = 750 - 0.2Y
Y=2333.33 रखने पर, 750 - 0.2*(2333.33) = 750 - 466.67 = 283.33 करोड़ (बजट घाटा)
व्यापार घाटा/आधिक्य: NX = X - M = 150 - (100 + 0.2Y)
Y=2333.33 रखने पर, 150 - (100 + 466.67) = 150 - 566.67 = -416.67 करोड़ (व्यापार घाटा)
उत्तर- कुछ देशों ने अपने बाह्य खाते (भुगतान संतुलन) में स्थायित्व लाने के लिए निम्नलिखित विनिमय दर व्यवस्थाओं का प्रयोग किया है:
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