UP Board Class 12 Hindi 11. महादेवी वर्मा is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: भक्तिन का वास्तविक नाम लक्ष्मी था। हिंदुओं के अनुसार लक्ष्मी धन की देवी हैं। प्रायः नाम व्यक्तित्व का परिचायक होता है, किंतु भक्तिन गरीब थी। उसका पूरा जीवन ससुराल वालों की सेवा करने और पति की मृत्यु के बाद संघर्ष करते हुए व्यतीत हुआ। इस प्रकार उसके नाम का वास्तविक अर्थ और उसके जीवन का यथार्थ दोनों परस्पर भिन्न थे। इसलिए निर्धन भक्तिन सबको अपना असली नाम लक्ष्मी बताकर उपहास का पात्र नहीं बनना चाहती थी, अतः वह अपना असली नाम छुपाती थी।
उसे लक्ष्मी नाम उसके माता-पिता ने दिया होगा, क्योंकि उन्हें लगा होगा कि बेटी लक्ष्मी का अवतार होती है। इसलिए उसके आने से वे खुशहाल होंगे ही, साथ ही वह जिसके घर जाएगी वे भी धन-धान्य से भरपूर हो जाएँगे। इसके बाद उसे एक और नाम मिला – ‘भक्तिन’। यह नाम लेखिका महादेवी वर्मा ने उसका यज्ञोपवीत, सिर पर चोटी, गले में कंठी माला और भक्तों की तरह सादगीपूर्ण वेशभूषा देखकर दिया होगा।
उत्तर: हाँ, हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं क्योंकि भक्तिन के पुत्र न होने पर उसे उपेक्षा अपने ही घर की स्त्रियों अर्थात सास और जिठानियों से मिली। सास और जिठानियाँ चौकी पर बैठकर आराम फरमाती थीं क्योंकि उन्होंने लड़कों को जन्म दिया था, भले ही वे किसी लायक नहीं थे। भक्तिन तथा उसकी नन्हीं बेटियों को घर और खेतों का सारा काम करना पड़ता था। यहाँ तक कि उनके खाने-पीने में भी अंतर था – जेठानियों के लड़के दूध-मलाई खाते और लड़कियाँ मोटा अनाज। लड़कियाँ होने के बावजूद उसके पति का भक्तिन के प्रति स्नेह कभी भी कम नहीं हुआ।
मेरे हिसाब से किसी भी घर में बिना स्त्री की सहमति के भ्रूणहत्या, दहेज की माँग, परिवार में बेटा-बेटी में अंतर, बेटी-बहुओं पर अत्याचार आदि नहीं किया जा सकता।
उत्तर: भक्तिन की बेटी के संदर्भ में पंचायत द्वारा किया गया न्याय, तर्कहीन और अंधे कानून पर आधारित है। भक्तिन के जेठ के बेटे ने संपत्ति के लालच में षड्यंत्र कर उसकी विधवा लड़की को धोखे से जाल में फँसाया। पंचायत ने निर्दोष लड़की की कोई बात नहीं सुनी और एकतरफा फैसला देकर उसका विवाह जबरदस्ती उसके निकम्मे तीतरबाज साले से कर दिया। इसी वजह से भक्तिन को भी घर छोड़ना पड़ा।
विवाह के इस संदर्भ में स्त्री के अधिकारों को कुचलने की परंपरा हमारे देश में सदियों से चली आ रही है। आज भी हमारे समाज में स्त्रियों के विवाह का निर्णय उसके परिवार वालों द्वारा लिया जाता है। उसे बेजान वस्तु की तरह अनजान हाथों में सौंप दिया जाता है। यदि कोई लड़की विरोध करने का साहस करती भी है तो उसके स्वर को दबा दिया जाता है या उसे दुश्चरित्र घोषित कर दिया जाता है।
उत्तर: यद्यपि भक्तिन महादेवीजी की सेवा पूरे मन से करती थी, तथापि कई गुणों के साथ-साथ भक्तिन के व्यक्तित्व में कुछ दुर्गुण भी निहित थे –
उत्तर: लेखिका को भक्तिन का सिर मुंडवाना पसंद नहीं था। लेखिका उसे ऐसा करने के लिए हमेशा मना करती थी, परन्तु भक्तिन केश मुँडाने से मना किए जाने पर शास्त्रों का हवाला देते हुए कहती है – ‘तीरथ गए मुँडाए सिद्ध’। यह बात किस शास्त्र में लिखी है, इसका भक्तिन को कोई ज्ञान नहीं था, जबकि लेखिका को पता था कि यह उक्ति शास्त्र की न होकर किसी व्यक्ति द्वारा कही गई है। परन्तु तर्क देने में पटु भक्तिन की सिर मुंडवाने की आदत को लेखिका बदल नहीं पाई।
उत्तर: महादेवी, भक्तिन को नहीं बदल पायीं, पर भक्तिन ने महादेवी को बदल दिया। भक्तिन देहाती महिला थी और शहर में आने के बाद भी उसने अपने-आप में कोई परिवर्तन नहीं आने दिया। भक्तिन देहाती खाना – गाढ़ी दाल, मोटी रोटी, मकई की लपसी, ज्वार के भुने हुए भुट्टे के हरे दाने, बाजरे के तिल वाले पुए आदि बनाती थी और महादेवी को वैसे ही खाना पड़ता था। भक्तिन के हाथ का मोटा-देहाती खाना खाते-खाते महादेवी का स्वाद बदल गया और वे भक्तिन की तरह ही देहाती बन गईं।
उत्तर: ‘आलो आँधारि’ की नायिका और भक्तिन के व्यक्तित्व में यह समानता है कि दोनों ही घरेलू नौकरानियाँ हैं। दोनों को ही परिवार से उपेक्षा मिली और दोनों ने ही अपने आत्मसम्मान को बचाते हुए अपने जीवन का निर्वाह किया।
उत्तर: आज भी हमारे समाज में विवाह के संदर्भ में पंचायत का रुख बड़ा ही क्रूर, संकीर्ण और रुढ़िवादी है। आज भी विवाह संबंधी निर्णय पंचायत में लिए जाते हैं। पंचायत अपनी रुढ़िवादी विचारधाराओं से प्रभावित होकर कभी-कभी अमानवीय फैसले दे देती है। आज भी पंचायतों का तानाशाही रवैया जारी है। अखबारों तथा टी.वी. में आए दिन इस प्रकार की घटनाएँ सुनने को मिलती हैं कि पंचायत ने पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहने पर मजबूर कर दिया, शादी हो जाने के बाद भी पति-पत्नी को अलग रहने पर मजबूर किया और उनकी बात न मानने पर उनकी हत्या कर दी गई या उन्हें समाज से निष्कासित कर दिया गया।
1. पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले
अर्थ: भक्तिन ने पहली कन्या के बाद दो और कन्याओं को जन्म दिया जो रूप-रंग में बिल्कुल उसकी पहली पुत्री की ही तरह थीं।
2. खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी
अर्थ: टकसाल सिक्के ढालने वाली मशीन को कहते हैं। भारतीय समाज में ‘लड़के’ को खरा सिक्का और ‘लड़की’ को खोटा सिक्का कहा जाता है। समाज में लड़कियों का कोई महत्त्व नहीं होता है। भक्तिन को खोटे सिक्के की टकसाल की संज्ञा दी गई है क्योंकि उसने एक के बाद एक तीन लड़कियों को जन्म दिया, जबकि समाज पुत्र जन्म देने वाली स्त्रियों को महत्त्व देता है।
3. अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूति
अर्थ: भक्तिन अपने पिता के देहांत के कई दिनों बाद पहुँची थी। जब वह मायके की सीमा पर पहुँचीं तो लोग कानाफूसी कर रहे थे कि बेचारी अब आई है। आमतौर पर शोक की खबर प्रत्यक्ष तौर पर नहीं दी जाती। कानाफूसी या फुसफुसाहट के अस्पष्ट शब्दों में कही जाती है। अतः लेखिका ने इसे अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ कहा है। वहीं पिता के देहांत के कारण लोग उसे सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से देख रहे थे तथा ढाँढ़स बँधा रहे थे। बातें स्पष्ट तौर पर की जा रही थीं। अतः उन्हें लेखिका ने स्पष्ट सहानुभूति कहा है।
उत्तर: इसी प्रकार का एक शब्द है – ननद + ओई = ननदोई (ननद का पति)।
क. ई कउन बड़ी बात आय। रोटी बनाय जानित है, दाल राँध लेइत है, साग-भाजी छँउक सकित है, अउर बाकी का रहा।
खड़ी बोली: यह कौन बड़ी बात है। रोटी बनाना जानती हूँ, दाल बना लेती हूँ, साग-भाजी छौंक सकती हूँ और शेष क्या रहा।
ख. हमारे मालकिन तौ रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहती हैं। अब हमहूँ पढ़े लागब तो घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी।
खड़ी बोली: हमारी मालकिन तो रात-दिन पुस्तकों में ही व्यस्त रहती हैं। अब यदि मैं भी पढ़ने लगूँ तो घर-परिवार के कार्य कौन करेगा।
ग. ऊ बिचरिअउ तौ रात-दिन काम माँ झुकी रहती हैं, अउर तुम पचै घूमती-फिरती हौ, चलौ तनिक हाथ बटाय लेउ।
खड़ी बोली: वह बेचारी तो रात-दिन काम में लगी रहती है और तुम लोग घूमते-फिरते हो। जाओ, थोड़ी उनकी सहायता करो।
घ. तब ऊ कुच्छौ करिहैं-धरिहें ना-बस गली-गली गाउत-बजाउत फिरिहैं।
खड़ी बोली: तब वह कुछ करता-धरता नहीं होगा, बस गली-गली में गाता-बजाता फिरता है।
ड. तुम पचै का का बताईयहै पचास बरिस से संग रहित है।
खड़ी बोली: तुम लोगों को क्या बताऊँ, पचास वर्ष से साथ में रहती हूँ।
च. हम कुकरी बिलारी न होयँ, हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहिं त तुम्हार पचै की छाती पै होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।
खड़ी बोली: मैं कुतिया-बिल्ली नहीं हूँ। मेरा मन करेगा तो मैं दूसरे के घर जाऊँगी, अन्यथा तुम लोगों की छाती पर ही हौला भुनुँगी और राज करूँगी – यह समझ लेना।
1. अरे! उससे सावधान रहना! वह नीचे से ऊपर तक वायरस से भरा हुआ है। जिस सिस्टम में जाता है उसे हैंग कर देता है।
विश्लेषण: इस वाक्य में कंप्यूटर की तकनीकी भाषा का प्रयोग हुआ है। यहाँ ‘वायरस’ का अर्थ दोष, ‘सिस्टम’ का अर्थ है व्यवस्था और ‘हैंग’ का अर्थ है ठहराव। वाक्य का अर्थ है – वह पूरी तरह दूषित है। वह जहाँ भी जाता है, पूरी कार्यप्रणाली में खलल डाल देता है।
2. घबरा मत! मेरी इनस्वींगर के सामने उसके सारे वायरस घुटने टेकेंगे। अगर ज्यादा फाउल मारा तो रेड कार्ड दिखा के हमेशा के लिए पवेलियन भेज दूँगा।
विश्लेषण: इस वाक्य में खेल से संबंधित शब्दावली का प्रयोग हुआ है। यहाँ ‘इनस्वींगर’ का अर्थ है – गहराई से भेदने वाली कार्यवाही, ‘फाउल’ का अर्थ गलत काम, ‘रेड कार्ड’ का अर्थ है बाहर जाने का संकेत तथा ‘पवेलियन’ का अर्थ है वापिस भेजना। वाक्य का अर्थ है – घबरा मत। जब मैं अन्दर तक मार करने वाली कार्यवाही करूँगा तो उसकी सारी हेकड़ी निकल जाएगी। अगर उसने अधिक गड़बड़ की तो उसे क़ानूनी दांवपेंच में फँसाकर बाहर निकाल फेंकूँगा।
3. जानी टेंसन नई लेने का वो जिस स्कूल में पढ़ता है अपुन उसका हैडमास्टर है।
विश्लेषण: इस वाक्य में मुंबई की बोलचाल की भाषा (तथा अंग्रेजी मिश्रित हिंदी) का प्रयोग है। ‘जानी’ शब्द का अर्थ है कोई भी व्यक्ति, ‘टेंसन लेना’ का अर्थ है – परवाह करना, ‘स्कूल में पढ़ना’ का अर्थ है – काम करना तथा ‘हैडमास्टर’ होना का अर्थ है – कार्य में निपुण होना। वाक्य का अर्थ है – चिंता मत करो, वह जो काम कर रहा है, उस काम में मैं उसका भी उस्ताद हूँ।
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