UP Board Class 12 Hindi 12. जैनेन्द्र कुमार is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: बाज़ार का जादू चढ़ने पर मनुष्य बाज़ार की आकर्षक वस्तुओं के मोहजाल में फँस जाता है। इसी आकर्षण के कारण ग्राहक सजी-धजी चीजों को आवश्यकता न होने पर भी खरीदने के लिए लालायित हो जाता है। वह ऐसी गैरजरूरी वस्तुएँ खरीद लेता है जो कुछ समय बाद घर के किसी कोने में पड़ी रहती हैं। परन्तु जब यह जादू उतरता है तो उसे एहसास होता है कि जो वस्तुएँ उसने आराम के लिए खरीदी थीं, वे उल्टा उसके आराम में खलल डाल रही हैं और उसके पैसे की बर्बादी का कारण बनी हैं।
उत्तर: बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का यह सशक्त पहलू उभरकर आता है कि उन्हें अपनी आवश्यकताओं का स्पष्ट ज्ञान है। वे उतना ही कमाना और खर्च करना चाहते हैं, जितनी उनकी आवश्यकता है। बाज़ार उन्हें कभी भी आकर्षित नहीं कर पाता। वे खुली आँखें, संतुष्ट मन और मग्न भाव से केवल अपनी ज़रूरत का सामान खरीदने बाज़ार जाते हैं।
हाँ, भगतजी जैसे व्यक्ति समाज में शांति और व्यवस्था लाने में मददगार हो सकते हैं। ऐसे लोगों की दिनचर्या संतुलित होती है। वे बाज़ार के आकर्षण में फँसकर अधिक से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करते, जिससे समाज में होड़, अशांति और महँगाई नहीं बढ़ती। इस प्रकार उनका सादा और संयमी जीवन समाज में शांति बनाए रखने में सहायक है।
उत्तर: 'बाजारूपन' से तात्पर्य ऊपरी चमक-दमक और दिखावे से है। जब विक्रेता बेकार या सामान्य चीजों को आकर्षक बनाकर मनचाहे ऊँचे दामों पर बेचने लगते हैं और ग्राहक धन का दिखावा करने के लिए व्यर्थ की वस्तुएँ खरीदते हैं, तब बाज़ार में 'बाजारूपन' आ जाता है।
जो विक्रेता ग्राहकों का शोषण नहीं करते और छल-कपट से उन्हें लुभाने का प्रयास नहीं करते, तथा जो ग्राहक केवल अपनी आवश्यकताओं की चीजें ही खरीदते हैं, वे दोनों ही बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं। बाज़ार की वास्तविक सार्थकता मनुष्य की आवश्यकताओं की उचित मूल्य पर पूर्ति करने में ही है।
उत्तर: हम इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र—शिक्षा, आवास, राजनीति, धार्मिक स्थल आदि में लिंग, जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव देखने को मिलता है, किन्तु बाज़ार इस विचारधारा से अलग है। बाज़ार को किसी के लिंग, धर्म या जाति से कोई लेना-देना नहीं होता। वह हर एक के लिए खुला होता है। उसके लिए हर कोई केवल एक 'ग्राहक' है, जो अपनी क्रय शक्ति से वस्तुएँ खरीदता है। इस प्रकार बाज़ार एक प्रकार की सामाजिक समता की रचना करता है, जहाँ सभी ग्राहक समान हैं।
उत्तर:
क. जब कोई धनाढ्य व्यक्ति या अपराधी अपने पैसे और प्रभाव के बल पर कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित कर देता है और दोषी होते हुए भी बच निकलता है, तब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत होता है।
ख. असाध्य बीमारी से ग्रसित व्यक्ति के सामने, या प्रियजन को मृत्यु से बचाने के लिए, पैसे की शक्ति काम नहीं आती। इसी प्रकार प्राकृतिक आपदा या भाग्य के प्रतिकूल होने पर भी पैसा बेअसर साबित होता है।
उत्तर:
1. मन खाली हो: जब मैं केवल घूमने-फिरने के मन से बाज़ार जाता/जाती हूँ, तो बिना योजना के कई अनावश्यक और महँगी चीजें खरीद लाता/लाती हूँ। बाद में पछतावा होता है कि ये चीजें ज़रूरी नहीं थीं और इन पर पैसे बर्बाद हुए।
2. मन खाली न हो: एक बार मुझे स्कूल के लिए एक विशेष किताब खरीदनी थी। मेरा मन पक्का था। मैं सीधे किताबों की दुकान पर गया/गई, वहाँ अन्य आकर्षक सामान थे, पर मैंने केवल वही किताब खरीदी और लौट आया/आई।
3. मन बंद हो: कभी-कभी उदासी या निराशा के क्षणों में बाज़ार जाने का मन नहीं करता। उस समय बाज़ार की चमक-दमक भी आकर्षित नहीं कर पाती और मैं बिना कुछ खरीदे वापस आ जाता/जाती हूँ।
4. मन में नकार हो: एक बार किसी ने मुझे चाइनीज़ खिलौनों की खराब गुणवत्ता के बारे में बताया। उसके बाद बाज़ार में चाइनीज़ सामान देखते ही मेरे मन में उनके प्रति एक नकारात्मक धारणा बन गई और वे सब मुझे घटिया लगने लगे।
उत्तर: इस पाठ में अनेक प्रकार के ग्राहकों का वर्णन है, जैसे—खाली मन और खाली जेब वाले ग्राहक, भरे मन और भरी जेब वाले ग्राहक, अपनी क्रय शक्ति का प्रदर्शन करने वाले ग्राहक, बाजारूपन बढ़ाने वाले ग्राहक, अपव्ययी ग्राहक, मितव्ययी और संयमी ग्राहक।
मैं अपने आप को 'भरे मन वाला ग्राहक' मानता/मानती हूँ क्योंकि मैं आवश्यकता समझकर ही बाज़ार जाता/जाती हूँ और केवल ज़रूरी चीजें ही खरीदने का प्रयास करता/करती हूँ।
उत्तर:
मॉल की संस्कृति: यहाँ एक ही छत के नीचे तरह-तरह के ब्रांडेड सामान मिलते हैं। वातानुकूलित वातावरण, दिखावा और आकर्षण प्रमुख होता है। मुख्य ग्राहक उच्च और उच्च मध्यम वर्ग से होते हैं।
सामान्य बाज़ार: यह आम लोगों की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करता है। यहाँ सीधा-सादा माहौल होता है और दाम अपेक्षाकृत कम होते हैं। ग्राहक मुख्यतः मध्यम वर्ग से होते हैं।
हाट की संस्कृति: यह ग्रामीण या स्थानीय बाजार होता है, जो साप्ताहिक या विशेष अवसरों पर लगता है। यहाँ सीधा सौदा, कम दाम और स्थानीय उत्पाद प्रमुख होते हैं। ग्राहक निम्न मध्यम वर्ग और ग्रामीण परिवेश से होते हैं।
पर्चेजिंग पावर (क्रय शक्ति) का प्रदर्शन सबसे अधिक मॉल की संस्कृति में नज़र आता है, क्योंकि वहाँ उच्च वर्ग के ग्राहक होते हैं और वस्तुओं को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि ग्राहक आकर्षित हुए बिना न रह सके।
उत्तर: हाँ, हम इस विचार से पूर्णतः सहमत हैं। कई बार दुकानदार ग्राहक की आवश्यकताओं का शोषण करते हैं। उदाहरण के लिए, जब किसी आवश्यक वस्तु (जैसे सब्ज़ियाँ, दाल, तेल) की कमी होती है या त्योहार के मौसम आते हैं, तो दुकानदार मनमाने ऊँचे दाम वसूलने लगते हैं। ग्राहक को उस वस्तु की सख्त ज़रूरत होती है, इसलिए वह मजबूरी में उस ऊँची कीमत को चुकाने के लिए विवश हो जाता है। इस प्रकार उसकी आवश्यकता ही उसके शोषण का कारण बन जाती है।
उत्तर: यहाँ 'माया' शब्द धन-संपत्ति की ओर संकेत कर रहा है। स्त्रियों का माया (धन) जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि समाज और परिवार की विभिन्न जिम्मेदारियों के कारण है। वे परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं:
1. परिवार के भविष्य की चिंता, बच्चों की शिक्षा और उनके विवाह की जिम्मेदारी।
2. अचानक आने वाले आर्थिक संकट (जैसे बीमारी, दुर्घटना) के लिए पैसे का इंतज़ाम करना।
3. घर-गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने और रिश्ते-नातों को निभाने की आवश्यकता।
4. अक्सर पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को आर्थिक रूप से कमजोर या असुरक्षित माना जाता है, इसलिए वे स्वयं को सुरक्षित महसूस करने के लिए भी बचत करती हैं।
| औपचारिक रूप | अनौपचारिक रूप |
|---|---|
| 1. पैसा पावर है। | 1. बाज़ार है कि शैतान का जाल। |
| 2. बाज़ार में एक जादू है। | 2. उस महिमा का मैं कायल हूँ। |
| 3. एक बार की बात कहता हूँ। | 3. पैसा उससे आगे होकर भीख माँगता है। |
उत्तर:
1. पानी भीतर हो; लू का लूपन व्यर्थ हो जाता है।
2. लू में जाना तो पानी पीकर जाना।
3. बाज़ार आमंत्रित करता है कि आओ, मुझे लूटो और लूटो।
4. परंतु पैसे की व्यंग शक्ति की सुनिए।
5. कहीं आप भूल न कर बैठिएगा।
ऐसे संबोधन पाठक से सीधा संवाद स्थापित करते हैं और पाठ को रोचक व संवादात्मक बनाते हैं, जिससे पाठक पूरी रुचि के साथ पाठ पढ़ता है।
उत्तर: पाठ से कोड मिक्सिंग के उदाहरण:
1. हमें हफ्ते में चॉकलेट खरीदने की छूट थी।
2. बाज़ार है या शैतान का जाल।
3. पर्चेजिंग पावर के अनुपात में आया है।
4. बचपन के कुछ फ्रॉक तो मुझे अब तक याद है।
5. वहाँ के लोग उम्दा खाने के शौक़ीन हैं।
आगत शब्दों के हिन्दी पर्यायों का प्रयोग करने से भाषा कई बार दुरूह और भारी हो सकती है (जैसे 'ट्रेन' के स्थान पर 'लौह-पथ-गामिनी')। कोड मिक्सिंग से भाषा सहज, जीवंत और संप्रेषण में आसान बनती है।
उत्तर:
'ही' के प्रयोग वाले वाक्य:
1. उन्हें आज ही आना है।
2. तुमसे ही मिलना था।
3. यह काम तुम ही कर सकते हो।
'भी' के प्रयोग वाले वाक्य:
1. उन्हें भी आमंत्रित किया गया है।
2. निरंजन साहब अब भी नहीं समझ पाए।
3. तुम भी चले आओ।
'तो' के प्रयोग वाले वाक्य:
1. वह कर तो लेगा।
2. चश्मा तो था, पर संगमरमर का नहीं था।
3. गहने थे तो सही, पर मैंने पहने नहीं।
तीनों निपात एक साथ:
1. आप घर पर ही रुकें, क्योंकि माँ भी तो जा चुकी है।
2. मुझे भी तो पता चले कि आखिर तुम्हें ही यह काम क्यों सौंपा गया।
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