UP Board Class 12 Hindi 3. अतीत में दबे पाँव is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- सिंधु सभ्यता एक साधन-सम्पन्न नगरीय सभ्यता थी, परन्तु उसमें राजसत्ता या धर्मसत्ता के चिह्न नहीं मिलते। वहाँ की नगर योजना में वास्तुकला, मुहरों, ठप्पों, जल-व्यवस्था, साफ-सफाई और सामाजिक व्यवस्था आदि की एकरूपता द्वारा उनमें अनुशासन देखा जा सकता है, आडंबर नहीं। यहाँ पर सब कुछ आवश्यकताओं से ही जुड़ा हुआ है। वहाँ यातायात के साधन के रूप में बैलगाड़ी की व्यवस्था थी, अनाज भंडार भरे थे। नागरिक सुविधा-सम्पन्न थे किन्तु भव्यता का प्रदर्शन कहीं नहीं मिलता। अन्य सभ्यताओं में राजतंत्र और धर्मतंत्र की ताकत को दिखाते हुए भव्य महल, मंदिर और मूर्तियाँ बनाई गईं, किंतु सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में छोटी-छोटी मूर्तियाँ, खिलौने, मृद्भांड, नावें मिली हैं। 'नरेश' के सिर पर रखा मुकुट भी छोटा है। इसमें प्रभुत्व या दिखावे के तेवर कहीं दिखाई नहीं देते। इस प्रकार सिंधु सभ्यता विकसित साधन-सम्पन्न सभ्यता थी लेकिन भव्यता का दिखावा कहीं नहीं था।
उत्तर:- सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का भरपूर ज्ञान एवं समझ थी, जिसकी छवि उनके दैनिक जीवन से संबंधित वस्तुओं से मिलती है। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता की तकनीकि-सिद्धि से ज्यादा कला-सिद्धि ज़ाहिर करता है। अन्य सभ्यताओं में राजतंत्र और धर्मतंत्र की ताकत को दिखाते हुए भव्य महल, मंदिर और मूर्तियाँ बनाई गईं, किंतु सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में छोटी-छोटी मूर्तियाँ, खिलौने, मृद्भांड, नावें मिली हैं। 'नरेश' के सिर पर रखा मुकुट भी छोटा है। इसमें प्रभुत्व या दिखावे के तेवर कहीं दिखाई नहीं देते। यहाँ आम आदमी के दैनिक जीवन में काम आने वाली चीजों को सलीके से बनाया गया है।
अतः सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौन्दर्यबोध है जो समाज के द्वारा पोषित है, राजपोषित या धर्मपोषित नहीं है।
उत्तर:- हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर, न राजाओं-महंतों की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प छोटे हैं और औज़ार भी। मोहनजो-दड़ो के 'नरेश' के सिर पर रखा मुकुट भी छोटा है। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। यहाँ आम आदमी के काम आने वाली चीजों को सलीके से बनाया गया है। नगरयोजना, वास्तुकला, मुहरों, ठप्पों, जल-व्यवस्था, साफ-सफाई और सामाजिक व्यवस्था आदि में एकरूपता देखने मिलती है। शक्ति के प्रतीक के रूप में सैन्य हथियार के अवशेष कहीं नहीं मिलते। पुरातत्व विभाग को ऐसे कोई भी चिह्न नहीं मिले जिससे पता चले कि वे असभ्य या हथियार-प्रेमी थे। इन आधारों पर विद्वान यह मानते हैं कि 'सिंधु-सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा स्वयं अनुशासित सभ्यता थी।'
उत्तर:- इस कथन से लेखक का आशय है कि इन टूटे-फूटे घरों की सीढ़ियों पर खड़े होकर आप विश्व की सभ्यता के दर्शन कर सकते हैं क्योंकि सिंधु सभ्यता विश्व की महान सभ्यताओं में से एक है, जो सबसे अधिक उन्नत और विकसित थी। सिंधु सभ्यता आडंबररहित एवं अनुशासनप्रिय है। यहाँ के मकानों की सीढ़ियाँ उस कालखंड तथा उसके पूर्व इतिहास का एहसास एवं परिचय कराती हैं जब यह सभ्यता अपने चरम उत्कर्ष पर रही होगी। यह सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। खंडहरों से मिले अवशेषों और इन टूटे-फूटे घरों से मानवता के चिह्न और मानवजाति के क्रमिक विकास को भी स्पष्ट देखा जा सकता है। इसकी नगर योजना अद्वितीय है। सड़क निर्माण, जल निकास, स्नानघरों की व्यवस्था सर्वोत्तम है। उस समय का ज्ञान, उसके द्वारा स्थापित मानदंड आज भी हमारे लिए अनुकरणीय हैं। इस प्रकार हम इन सीढ़ियों पर चढ़कर किसी इतिहास की ही खोज नहीं करना चाहते बल्कि सिंधु सभ्यता के उस सभ्य मानवीय समाज को देखना चाहते हैं, जिसने भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत किया।
उत्तर:- सिंधु सभ्यता का इतिहास वर्तमान समय से दुगने समय से पूर्व का है। यह सच है कि टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों के दस्तावेज़ होते हैं। यह खंडहर उस समय की संस्कृति का परिचय कराते हैं, जब हमारे पूर्वज उसके साक्षी रहे होंगे, उसका निर्माण और विस्तार किया होगा। आज भी हम किसी भी मकान की देहरी पर पीठ टिकाकर सुस्ता सकते हैं। रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध को या बैलगाड़ी की रुनझुन को महसूस कर सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे पूर्वजों का बौद्धिक, सामाजिक स्तर इतना विकसित था कि वे आज भी अनुकरणीय हैं। इस प्रकार नगर-नियोजन, धातु एवं पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्भांड, उन पर चित्रित मानव और अन्य आकृतियाँ, मुहरें, उन पर बारीकी से की गई चित्रकारी इतिहास के दस्तावेज होने के साथ-साथ उस अनछुए समय को भी हमारे सामने उपस्थित कर देते हैं, जिसके अब हम केवल दर्शक मात्र हैं।
उत्तर:- चारमीनार
इस बार की छुट्टियों में हम हैदराबाद गए। वहाँ के ऐतिहासिक, रमणीय स्थलों में से एक, हैदराबाद शहर का चारमीनार हमेशा हमारी यादों में बसा रहेगा। हैदराबाद शहर प्राचीन और आधुनिक समय का अनोखा मिश्रण है, जो देखने वालों को 400 वर्ष पुराने भवनों की भव्यता के साथ आपस में सटी आधुनिक इमारतों का भी दर्शन कराता है।
चारमीनार 1591 में शहर के मोहम्मद कुली कुतुब शाह द्वारा बनवाई गई बृहत वास्तुकला का एक अनुपम नमूना है। शहर की पहचान मानी जाने वाली चारमीनार, चार मीनारों से मिलकर बनी एक चौकोर प्रभावशाली इमारत है। यह स्मारक ग्रेनाइट के मनमोहक चौकोर खंभों से बना है, जो उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशाओं में स्थित चार विशाल आर्च पर निर्मित किया गया है। यह आर्च कमरों के दो तलों और आर्चवे की गैलरी को सहारा देते हैं। चौकोर संरचना के प्रत्येक कोने पर एक छोटी मीनार है। ये चार मीनारें हैं, जिनके कारण भवन को यह नाम दिया गया है। प्रत्येक मीनार कमल की पत्तियों के आधार की संरचना पर खड़ी है।
इस तरह चारमीनार को देखकर हुई अनुभूति एक स्वप्न के साकार होने जैसी थी।
उत्तर:- मोहनजो-दड़ो के निकट बहती हुई सिंधु नदी, नगर में कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखकर लेखक ने सिंधु घाटी की सभ्यता को जल-संस्कृति कहा है। मैं लेखक के कथन से पूर्णतया सहमत हूँ।
तर्क:
1. स्नानघरों की व्यवस्था: प्रत्येक घर में एक स्नानघर था। घर के भीतर से पानी या मैला पानी नालियों के माध्यम से बाहर हौदी में आता था और फिर बड़ी नालियों में चला जाता था। अधिकतर नालियाँ ऊपर से बंद थीं।
2. उन्नत जलनिकासी: इनकी जलनिकासी व्यवस्था बहुत ही ऊँचे दर्ज की थी, जो आज दिखाई नहीं पड़ती। उस समय के लोगों में सफाई के प्रति जागरूकता थी, वे सफाईपसंद थे।
3. कुओं का व्यापक प्रबंध: नगर में पीने के पानी के लिए कुँओं का व्यापक प्रबंध था। ये कुएँ पक्की ईटों के बने थे। अकेले मोहनजो-दड़ो नगर में सैकड़ों कुएँ थे।
4. महाकुंड: यहाँ का महाकुंड लगभग चालीस फुट लम्बा और पच्चीस फुट चौड़ा था। यह पक्की ईटों से बना था, जिसमें जलनिकास के लिए नालियाँ थीं। सिंधु नदी के समीप होने से जल का व्यापक भंडार था।
इन सभी बिंदुओं से स्पष्ट है कि जल प्रबंधन और स्वच्छता उनकी संस्कृति का केंद्रीय आधार था, इसलिए सिंधु सभ्यता को 'जल-संस्कृति' कहना उचित है।
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