UP Board Class 12 Hindi 14. फणीश्वर नाथ रेणु is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में अद्भुत सामंजस्य था। ढोल की प्रत्येक थाप लुट्टन को एक नया दाँव-पेंच सिखाती थी और उसमें नवीन ऊर्जा व उत्साह का संचार करती थी।
पाठ में ढोल की आवाज़ के कुछ ध्वन्यात्मक शब्द इस प्रकार हैं:
ये ध्वन्यात्मक शब्द मन में उत्साह, ऊर्जा और आनंद की भावना पैदा करते हैं। ये ताल और थाप लुट्टन को नई उम्मीद देती थी तथा विपक्षी को हराने का साहस प्रदान करती थी।
उत्तर:- लुट्टन पहलवान के जीवन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण मोड़ आए:
उत्तर:- लुट्टन पहलवान ने कुश्ती के दाँव-पेंच किसी मानव गुरु से नहीं, बल्कि ढोल की थाप से सीखे थे। ढोल से निकलने वाली विभिन्न ध्वनियाँ उन्हें अलग-अलग दाँव सिखाती और आदेश देती प्रतीत होती थीं। ढोल की आवाज़ सुनते ही उनकी नसों में उत्तेजना दौड़ जाती और विपक्षी को पछाड़ने की इच्छा जागृत होती। इसलिए उनके लिए ढोल ही सच्चा गुरु था।
उत्तर:- गाँव में महामारी और सूखे के कारण निराशा व मृत्यु का सन्नाटा छाया हुआ था। लुट्टन के अपने मन में भी पुत्रों की मृत्यु का गहरा दुःख था। ऐसे में, उनकी ढोलक की आवाज़ निराश गाँव वालों के मन में जीवन की उमंग जगाती थी। यह आवाज़ उन्हें महामारी से लड़ने और कभी न हारने की प्रेरणा देती थी। इसलिए लुट्टन ने अपने दुःख को दबाकर भी गाँव वालों को साहस देने के लिए ढोल बजाना जारी रखा।
उत्तर:- ढोलक की आवाज़ रात के सन्नाटे और दुख के माहौल को तोड़ती थी। महामारी से पीड़ित लोगों की नसों में बिजली-सी दौड़ जाती, उनकी आँखों के सामने दंगल का जोशीला दृश्य आ जाता। वे मृत्यु रूपी शत्रु से लड़ने के लिए तत्पर हो जाते और अपनी पीड़ा भूलकर खुशी-खुशी उसका सामना करते। इस प्रकार ढोल की आवाज़ मृतप्राय गाँव में संजीवनी शक्ति का संचार करती थी।
उत्तर:- महामारी के दौरान सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में बहुत अंतर था। सुबह के समय कोलाहल, हाहाकार और रुदन के बावजूद लोगों के चेहरे पर जीवन की एक चमक होती थी। वे एक-दूसरे को सांत्वना देते और दुःख बाँटते थे। परंतु सूर्यास्त होते ही पूरा परिदृश्य बदल जाता। लोग डरकर घरों में दुबक जाते, चुप्पी साध लेते। माताएँ तक अपने मरते हुए बच्चों को आखिरी विदाई देने का साहस नहीं जुटा पाती थीं। ऐसे में केवल पहलवान की ढोलक की आवाज़ ही सुनाई देती, जो महामारी को चुनौती दे रही होती थी।
उत्तर:-
1. पहले मनोरंजन के सीमित साधनों के कारण कुश्ती लोकप्रिय थी और राजा-महाराजा इसके आयोजन करते थे। समय के साथ मनोरंजन के नए-नए साधन (टीवी, इंटरनेट, अन्य खेल) आ गए और राजशाही भी समाप्त हो गई, जिससे कुश्ती की लोकप्रियता कम हुई।
2. अब कुश्ती के स्थान पर क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस, बैडमिंटन जैसे आधुनिक खेलों ने ले लिया है।
3. कुश्ती को पुनः लोकप्रिय बनाने के लिए निम्नलिखित कार्य किए जा सकते हैं:
उत्तर:- इस कथन का आशय गाँव की दयनीय स्थिति और लोगों के असहनीय दुःख से है। लेखक कहना चाहता है कि अकाल और महामारी से ग्रसित गाँव की पीड़ा को दूर करने वाला कोई नहीं था। प्रकृति भी इस दुःख से व्यथित प्रतीत होती है। टूटता हुआ तारा उस सहायक शक्ति का प्रतीक है जो गाँव तक पहुँचने से पहले ही कमजोर पड़ जाती है। शेष तारों का हँसना यह दर्शाता है कि ऐसी विपदा में कोई सहायक नहीं आता, बल्कि परिस्थितियाँ और भी कठोर हो जाती हैं।
1. "अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी।"
आशय: यहाँ रात का मानवीकरण किया गया है। महामारी से ग्रस्त गाँव में चारों ओर मौत का सन्नाटा था। ऐसे में ओस की बूंदें रात के आँसू बहाती हुई प्रतीत हो रही थीं, मानो प्रकृति भी गाँव वालों के दुःख में शामिल हो।
2. "अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।"
आशय: यहाँ तारों का मानवीकरण करते हुए उन्हें हँसते हुए दिखाया गया है। यह प्रकृति की निर्ममता को दर्शाता है। जिस प्रकार टूटता तारा बेबस होकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार गाँव वाले भी महामारी के सामने असहाय थे और कोई उनकी मदद के लिए नहीं आ रहा था।
उत्तर:- आज के समय में कोविड-19 जैसी महामारी या बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा एक विकट स्थिति पैदा कर सकती है। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए मैं निम्नलिखित प्रयास करूँगा/करूँगी:
उत्तर:- कला मानव जीवन का अभिन्न अंग है। यह व्यक्ति के मन की सीमाओं को तोड़कर उसे विस्तृत और उदार बनाती है। संगीत कला का ही एक रूप है जो सीधे मनुष्य की भावनाओं को छूता है। पाठ में ढोलक की थाप ने मृतप्राय गाँव में जीवन का संचार किया, जो कला की शक्ति को प्रमाणित करता है। संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि सभी कलाएँ मनुष्य को उदासी, निराशा और पीड़ा से उबारकर उसमें नई ऊर्जा, उमंग और जीवटता भर देती हैं। कला मनुष्य को आत्मिक शांति और आनंद प्रदान करती है तथा कठिन से कठिन समय में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
उत्तर:- यह कथन सत्य है कि कलाओं का अस्तित्व केवल व्यवस्था या सरकारी संरक्षण पर निर्भर नहीं होता। कला कलाकार के अंदर के समर्पण, एकनिष्ठता, अथक परिश्रम और जनसाधारण के प्यार व सराहना से पनपती है। इतिहास में अनेक कलाकारों ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी कला को जीवित रखा है। व्यवस्था का सहारा कला के विकास में तेजी ला सकता है, परंतु कला की जड़ें कलाकार के हृदय और लोगों के बीच उसकी स्वीकार्यता में होती हैं। सच्ची कला सदैव अपना मार्ग स्वयं बना लेती है।
उत्तर:-
कुश्ती के शब्द: अखाड़ा, दंगल, पहलवान, दाँव-पेंच, चित-पट, गिरा, पटकना, बाजी, मल्लयुद्ध।
अन्य क्षेत्रों की शब्दावली:
चिकित्सा: डॉक्टर, नर्स, रोगी, औषधि, परहेज, ऑपरेशन, पर्ची।
क्रिकेट: बल्लेबाज, गेंदबाज, विकेट, अंपायर, ओवर, चौका, छक्का।
न्यायालय: न्यायाधीश, वकील, अभियुक्त, गवाह, फैसला, जमानत, केस।
विज्ञान: प्रयोग, आविष्कार, शोध, वैज्ञानिक, प्रयोगशाला, सिद्धांत।
उत्तर:- गाँव के वार्षिक दंगल में आज का मुकाबला बहुत दर्शनीय था। पहलवान भीमसेन ने विपक्षी पर बाज की तरह टूट पड़ा और उसे चित्त कर दिया। उसकी इस जीत ने सभी दर्शकों का मन मोह लिया। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जिलाधिकारी की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। भीमसेन ने अपनी कमाई से एक छोटा अखाड़ा बनवाया और गाँव के युवकों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। दुर्भाग्य से, कुछ वर्षों बाद पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई। इस दुःख के बावजूद, भीमसेन ने हिम्मत नहीं हारी और अपने बच्चों को ही अपना वारिस बनाया।
उत्तर:-
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