UP Board Class 12 Hindi 18. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:- डॉ. आंबेडकर जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं मानते थे। उनके अनुसार, यह विभाजन अस्वाभाविक है। इसके पीछे उनके प्रमुख तर्क इस प्रकार हैं:
उत्तर:- जाति प्रथा व्यक्ति को जीवन भर एक ही पैतृक पेशे से बाँध देती है, भले ही वह उसकी इच्छा या आवश्यकता के अनुरूप न हो। यदि वह पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो, तो व्यक्ति को भूखों मरने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। आधुनिक युग में उद्योगों की तकनीक और प्रक्रिया में लगातार बदलाव आते रहते हैं। ऐसे में यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो उसके सामने बेरोजगारी और भुखमरी के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता। इस प्रकार, पेशा परिवर्तन पर रोक लगाकर जाति-प्रथा बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण बनी हुई है।
आज की स्थिति में परिवर्तन आया है। सरकारी कानून, सामाजिक सुधार और वैश्वीकरण के प्रभाव से जाति के बंधन कुछ लचीले हुए हैं। आज लोग अपनी जाति से अलग पेशों को भी अपना रहे हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसरों में विस्तार के कारण, व्यक्ति को अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार कार्य चुनने के कुछ अवसर प्राप्त होने लगे हैं, हालाँकि पूर्ण समानता अभी भी एक लक्ष्य है।
उत्तर:- डॉ. आंबेडकर के अनुसार, दासता की व्यापक परिभाषा केवल कानूनी गुलामी तक सीमित नहीं है। वास्तविक दासता तब होती है जब किसी व्यक्ति को अपना पेशा चुनने की आज़ादी न दी जाए या अपने अनुकूल आचरण करने की स्वतंत्रता न हो। सामाजिक दासता की स्थिति में व्यक्ति को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। अपनी इच्छा के विरुद्ध, मजबूरी में पैतृक पेशा अपनाना भी दासता का ही एक रूप है।
उत्तर:- यह सच है कि शारीरिक और सामाजिक विरासत के आधार पर मनुष्यों में असमानताएँ हो सकती हैं। फिर भी, डॉ. आंबेडकर 'समता' को एक व्यावहारिक सिद्धांत मानने पर जोर देते हैं। उनका तर्क है कि समाज से अधिकतम उपयोगिता और विकास प्राप्त करने के लिए, प्रत्येक सदस्य को अपनी क्षमता विकसित करने और रुचि के अनुरूप व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। एक राजनीतिज्ञ के लिए यह आवश्यक है कि वह एक व्यवहार्य सिद्धांत को अपनाए, और यह सिद्धांत यही हो सकता है कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए तथा उन्हें समान अवसर दिए जाएँ। इससे समाज में मानसिक स्तर पर भेदभाव की भावना पनपने नहीं पाती।
उत्तर:- हाँ, हम लेखक के इस विचार से पूर्णतः सहमत हैं। डॉ. आंबेडकर ने भावनात्मक समानता और मानवीय एकता की दृष्टि से ही जातिवाद के उन्मूलन की बात की है। किसी भी समाज में सच्चा भाईचारा और समत्व तभी आ सकता है जब सभी वर्गों को जीवन की मूलभूत भौतिक सुविधाएँ और समान अवसर उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए, एक गाँव की साधारण पाठशाला और एक महँगे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का निष्पक्ष मूल्यांकन तभी संभव है जब दोनों के पास शिक्षा के समान संसाधन हों। जातिवाद के उन्मूलन के लिए स्वस्थ मानसिकता, खुले विचार और समान भौतिक आधार – तीनों ही परम आवश्यक हैं।
उत्तर:- आदर्श समाज के तीन तत्व – स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृता – में 'भ्रातृता' शब्द रखकर लेखक ने स्त्रियों का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं किया है, परंतु यह समझना चाहिए कि स्त्री और पुरुष दोनों ही किसी भी समाज के अभिन्न अंग हैं। अतः आदर्श समाज की कल्पना में स्त्रियों को सम्मिलित माना जाना स्वाभाविक है।
'भ्रातृता' शब्द संस्कृत मूल का है, जिसका अर्थ 'भाईचारा' है। यह भावना सामाजिक एकता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, चूँकि यह शब्द आम बोलचाल में कम प्रचलित है, इसलिए 'बंधुत्व' या 'सामाजिक एकता' जैसे शब्द अधिक उपयुक्त और समावेशी लगते हैं, जो स्त्री-पुरुष सभी के बीच के सौहार्दपूर्ण संबंधों को बेहतर ढंग से व्यक्त करते हैं।
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