UP Board Class 6 Social Studies 9. शहरी क्षेत्र में आजीविका is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 6 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
इस चित्र में एक व्यस्त शहरी सड़क का दृश्य है। सड़क पर विभिन्न प्रकार के वाहन जैसे कार, स्कूटर, बस और साइकिल चल रहे हैं। पैदल चलने वाले लोग भी दिखाई दे रहे हैं। सड़क के किनारे अलग-अलग तरह की दुकानें हैं और फुटपाथ पर रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, अखबार बेचने वाले तथा अन्य छोटे-मोटे काम करने वाले लोग मौजूद हैं। यह चित्र शहर के जीवन की व्यस्तता और विविधता को दर्शाता है।
पिछले अध्याय के ग्रामीण चित्र में मुख्य रूप से खेती, मछली पकड़ने और छोटी दुकानों जैसे कार्य दिखाए गए थे। वहाँ प्राकृतिक वातावरण, खुला स्थान और शांति थी। इसके विपरीत, इस शहरी चित्र में भीड़भाड़, वाहनों का शोर और तेज गति से चलता जीवन दिखाई देता है। ग्रामीण क्षेत्र में लोगों के काम प्रकृति से जुड़े थे, जबकि शहर में लोग दुकानदारी, सेवाएँ प्रदान करना और विभिन्न व्यवसायों से जुड़े हैं।
इस चित्र में शहर के विभिन्न हिस्सों के बीच का अंतर स्पष्ट दिखता है। एक तरफ बड़ी-बड़ी इमारतें और आधुनिक दुकानें हैं, तो दूसरी तरफ फुटपाथ पर अस्थायी ठेले और छोटे व्यवसाय चल रहे हैं। कुछ लोग अच्छे कपड़े पहने हैं और कारों में सफर कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग साधारण कपड़ों में पैदल चल रहे हैं या साइकिल चला रहे हैं। यह अंतर आय, व्यवसाय और जीवन स्तर के अंतर को दर्शाता है।
बच्चू माँझी अपने गाँव से रोजगार की तलाश में शहर आया था। गाँव में उसे मिस्त्री का काम तो मिलता था, लेकिन वह नियमित नहीं था और कमाई पर्याप्त नहीं थी। अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक से न कर पाने के कारण उसे अधिक आमदनी की उम्मीद में शहर आना पड़ा।
बच्चू माँझी अकेले शहर आया है क्योंकि शहर में रहने का खर्च बहुत अधिक है। उसकी कमाई इतनी नहीं है कि वह अपने पूरे परिवार को शहर में ला सके और उनके रहने, खाने-पीने और पढ़ाई का खर्च उठा सके। इसलिए, उसका परिवार गाँव में ही रहता है और बच्चू अकेले शहर में काम करके पैसे भेजता है।
सब्जी बेचने वाले या ठेले वाले अपना दिन बहुत जल्दी शुरू करते हैं। वे सुबह 4-5 बजे थोक मंडी जाते हैं और ताजी सब्जियाँ खरीदकर लाते हैं। फिर वे अपना ठेला या दुकान सजाते हैं। दिन भर वे गली-मोहल्लों में घूमकर या एक जगह बैठकर सब्जियाँ बेचते हैं। शाम तक ज्यादातर सब्जी बेचने की कोशिश करते हैं ताकि अगले दिन फिर से ताजा सामान ला सकें। उनका काम बहुत मेहनत वाला होता है और आमदनी दिन-प्रतिदिन के हिसाब से अलग-अलग होती है।
बच्चू एक रिक्शा चालक है और उसकी कमाई पूरी तरह से उसके रोज काम करने पर निर्भर करती है। अगर वह एक दिन भी छुट्टी लेता है, तो उस दिन की कमाई पूरी तरह से चली जाती है। यह कमाई उसके अपने गुजारे और गाँव में परिवार के लिए भेजे जाने वाले पैसे के लिए बहुत जरूरी है। इसलिए, छुट्टी लेना उसके लिए एक तरह से पैसे का नुकसान है, इसीलिए उसे बहुत सोचना पड़ता है।
वंदना और हरप्रीत ने एक बड़ी रेडीमेड कपड़ों की दुकान (शोरूम) इसलिए शुरू की क्योंकि आजकल लोगों की पसंद बदल गई है। अब ज्यादातर लोग सिले-सिलाए कपड़े खरीदना पसंद करते हैं, बजाय कपड़ा लेकर दर्जी के पास जाने के। इस दुकान को चलाने के लिए उन्हें बहुत कुछ करना पड़ता है:
सामान की व्यवस्था: उन्हें अलग-अलग शहरों से, कभी-कभी विदेशों से भी, अच्छे और फैशनेबल कपड़े मँगवाने पड़ते हैं।
विज्ञापन: अपनी दुकान के बारे में लोगों को बताने के लिए उन्हें अखबार, टीवी और रेडियो पर विज्ञापन देने पड़ते हैं।
दुकान की सजावट: कपड़ों को आकर्षक ढंग से प्रदर्शित करना और दुकान को साफ-सुथरा रखना जरूरी है।
कर्मचारी: दुकान चलाने के लिए सेल्सपर्सन और अन्य कर्मचारियों को रखना और उनका प्रबंधन करना भी उनकी जिम्मेदारी है।
एक बड़ी दुकान के मालिक अपने व्यवसाय की योजना बहुत सोच-समझकर बनाते हैं। वे यह तय करते हैं कि किस मौसम में कौन सा सामान रखना है, कहाँ से और कैसे सामान खरीदना सस्ता और अच्छा रहेगा, और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए किस तरह के प्रचार की जरूरत है। पिछले बीस सालों में बहुत बदलाव आया है:
ग्राहकों की पसंद: ग्राहक अब ज्यादा जागरूक हैं और ब्रांडेड तथा गुणवत्ता वाला सामान चाहते हैं।
प्रतिस्पर्धा: दुकानों और मॉल की संख्या बढ़ने से प्रतिस्पर्धा भी बहुत बढ़ गई है।
तकनीक का उपयोग: अब कंप्यूटर से बिल बनाना, स्टॉक का हिसाब रखना और ऑनलाइन विज्ञापन देना आम बात हो गई है।
बाजार में सामान बेचने वाले:
फैक्ट्रियाँ और छोटे कारखाने मजदूरों को अनियमित रूप से (कॉन्ट्रैक्ट या दैनिक आधार पर) इसलिए रखते हैं ताकि उन पर होने वाला खर्च कम रहे। अगर उन्हें स्थायी कर्मचारी रखना पड़े, तो उन्हें न्यूनतम वेतन, भविष्य निधि (PF), चिकित्सा लाभ, छुट्टी का वेतन आदि देना पड़ता है। अनियमित मजदूरों को सिर्फ काम के दिनों के हिसाब से पैसे मिलते हैं और कोई अन्य सुविधा नहीं। इस तरह मालिक अपना मुनाफा बढ़ा सकते हैं और जब काम कम हो तो मजदूरों को आसानी से हटा सकते हैं।
काम के घंटे: निर्मला जैसे मजदूरों को अक्सर सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक लगातार काम करना पड़ता है। उनके काम के घंटे निश्चित नहीं होते और आवश्यकता पड़ने पर रविवार को भी काम करना पड़ सकता है।
कमाई: उन्हें दैनिक आधार पर मजदूरी मिलती है। मान लीजिए, 8 घंटे के लिए 80 रुपये और उससे अधिक समय काम करने पर अतिरिक्त 40 रुपये मिलते हैं। यह आय बहुत कम और अनिश्चित होती है।
काम करने की जगह व सुविधाएँ: वे आमतौर पर छोटे, बंद और हवादार कमरों में काम करते हैं जहाँ मशीनों का शोर बहुत होता है। पीने का साफ पानी, स्वच्छ शौचालय या आराम करने की उचित जगह जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी अक्सर नहीं मिलतीं। काम करते समय चोट लगने की आशंका रहती है, लेकिन उसके लिए कोई बीमा सुरक्षा नहीं होती।
साल भर में रोजगार के दिनों की संख्या: उन्हें साल भर नियमित काम नहीं मिलता। त्योहारों के मौसम या किसी विशेष आर्डर के समय 8-9 महीने काम मिल सकता है, लेकिन बाकी के 3-4 महीने बेरोजगार रहना पड़ सकता है, जिस दौरान उनकी कोई आमदनी नहीं होती।
हाँ, दूसरों के घरों में काम करने वाली महिलाएँ (गृहकार्यिकाएँ) पूरी तरह से अनियमित मजदूरों की श्रेणी में आती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि:
लेबर चौक पर आने वाले मजदूरों का जीवन बहुत ही अनिश्चित और कठिन होता है। उनके पास कोई स्थायी रोजगार नहीं होता, वे दैनिक मजदूरी पर निर्भर रहते हैं। रहने के लिए उनके पास कोई स्थायी घर नहीं होता; कई लोग फुटपाथ पर सोते हैं या सस्ते रैन बसेरे में रहते हैं। उनकी कमाई इतनी कम होती है कि वे अपनी कमाई बचा नहीं पाते और चाय की दुकानों पर ही अपना पैसा जमा करते या जरूरत पड़ने पर उधार लेते हैं। काम न मिलने के दिनों में उन्हें भूखे पेट भी रहना पड़ सकता है। काम के दौरान उन्हें लंबे समय तक काम करना पड़ता है, सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं होते और अक्सर न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे मिलते हैं। यह एक बहुत ही असुरक्षित और चुनौतीपूर्ण जीवन है।
| नाम | काम | आय | काम की सुविधाएँ | स्वयं का काम / रोज़गार | काम की जगह | सुरक्षा |
|---|---|---|---|---|---|---|
| बच्चू माँझी | रिक्शा चलाना | लगभग 100 रु. प्रतिदिन (अनिश्चित) | कोई सुविधा नहीं। बारिश, धूप में काम करना पड़ता है। | स्वयं का काम (लेकिन रिक्शा किराए का हो सकता है) | सड़क | कोई सुरक्षा नहीं। दुर्घटना या बीमारी में कोई सहायता नहीं। |
| हरप्रीत और वंदना | रेडीमेड कपड़ों की दुकान चलाना | अच्छी आय (लगभग 30,000 रु. प्रति माह या अधिक) | कार, फोन, एयर कंडीशन दुकान आदि सुविधाएँ उपलब्ध। | स्वयं का काम (उद्यमी) | अपना शोरूम | व्यवसाय की सुरक्षा है, लेकिन बाजार के जोखिम हैं। |
| निर्मला | कपड़ा सिलने का काम (फैक्ट्री में) | लगभग 80 रु. प्रतिदिन + ओवरटाइम | बहुत कम सुविधाएँ। भीड़भाड़ वाला कमरा, शोरगुल। | दूसरे के यहाँ रोजगार (अनियमित) | गैराज या छोटी फैक्ट्री | कोई सुरक्षा नहीं। काम न मिलने पर नौकरी जा सकती है। |
काम में अंतर: बच्चू एक स्व-रोजगार व्यक्ति है लेकिन उसकी आय बहुत कम और जोखिम भरी है। हरप्रीत-वंदना भी स्व-रोजगार में हैं लेकिन वे एक बड़े और स्थापित व्यवसाय के मालिक हैं, जिसमें आय अधिक और स्थिर है। निर्मला एक मजदूर है जो दूसरों के लिए काम करती है, उसकी आय न्यूनतम है, कोई सुविधा नहीं है और नौकरी पूरी तरह से असुरक्षित है।
स्थायी और नियमित नौकरी:
सुधा को, जो एक स्थायी कर्मचारी है, वेतन के अलावा निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
| दुकानों या दफ्तरों के नाम | चीज़ों/सेवाओं के प्रकार | |||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अमर फार्मेसी | दवाइयाँ और प्राथमिक चिकित्सा सामग्री बेचना | |||||||||||
| सरिता स्टेशनरी | कॉपी, किताबें, पेन, पेंसिल जैसी शैक्षणिक सामग्री बेचना | |||||||||||
| बिजली विभाग कार्यालय | बिजली कनेक्शन, बिल भुगतान और शिकायत निवारण सेवाएँ | |||||||||||
| गोपाल किराना स्टोर | रोजमर्रा की खाद्य सामग्री जैसे आटा, दाल,
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