UP Board Class 7 Science 9. मृदा is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 7 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: (ग) खनिज, जैव पदार्थ, वायु और जल
मृदा केवल टूटे हुए पत्थरों (शैल करणों) से ही नहीं बनी होती। इसमें खनिज (पोषक तत्व), जैव पदार्थ या ह्यूमस (सड़े-गले पौधों और जीवों के अवशेष), वायु और जल भी मौजूद होते हैं। ये सभी घटक मिलकर मृदा को पौधों के उगने के लिए उपजाऊ बनाते हैं।
उत्तर: (ख) मृण्मय मृदा में
मृण्मय मृदा के कण बहुत ही बारीक और सघन होते हैं। इन छोटे कणों के बीच रिक्त स्थान भी बहुत छोटे होते हैं, जिससे पानी आसानी से रिसकर नीचे नहीं जा पाता और लंबे समय तक मृदा में ही रुका रहता है। इसीलिए मृण्मय मृदा की जल धारण करने की क्षमता बलुई या दुमटी मृदा से सबसे अधिक होती है।
| कॉलम A | कॉलम B |
|---|---|
| (क) जीवों को आवास देने वाली | (iii) सभी प्रकार की मृदा |
| (ख) मृदा की ऊपरी परत | (iv) गहरे रंग की |
| (ग) बलुई मृदा | (i) बड़े कण |
| (घ) मृदा की मध्य परत | (v) ह्यूमस की कम मात्रा |
| (च) मृण्मय मृदा | (ii) सघन छोटे कण |
स्पष्टीकरण:
• (क) सभी प्रकार की मृदा (चाहे बलुई, मृण्मय या दुमटी) केंचुए, सूक्ष्मजीवों आदि को रहने का स्थान (आवास) प्रदान करती है।
• (ख) मृदा की सबसे ऊपरी परत में ह्यूमस (जैविक पदार्थ) अधिक होता है, जिसके कारण इसका रंग गहरा होता है।
• (ग) बलुई मृदा के कणों का आकार बड़ा होता है, इसलिए इनके बीच रिक्त स्थान भी बड़े होते हैं।
• (घ) मृदा की मध्य परत (अवचय परत) में ह्यूमस और जीवों की मात्रा बहुत कम होती है।
• (च) मृण्मय मृदा के कण बहुत ही छोटे और आपस में सटे हुए (सघन) होते हैं।
उत्तर: मृदा का निर्माण एक लंबी और धीमी प्रक्रिया है, जो निम्नलिखित चरणों में होती है:
1. अपक्षय (Weathering): सूर्य की गर्मी, वर्षा, हवा, पाला और जीवों की क्रियाओं के कारण बड़ी चट्टानें (शैल) टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलने लगती हैं। इसे अपक्षय कहते हैं।
2. जैविक क्रियाएँ: इन टूटे हुए पत्थरों के कणों में लाइकेन, काई जैसे पौधे उगने लगते हैं। इनके मरने और सड़ने से जैविक पदार्थ (ह्यूमस) मिलता है। केंचुए, चूहे आदि जीव भी मृदा को खोदकर और उसमें मिलकर इसे और भुरभुरा बनाते हैं।
3. समय: यह पूरी प्रक्रिया सैकड़ों से हजारों वर्षों में पूरी होती है। अंततः चट्टान के ये टुकड़े, ह्यूमस, खनिज, वायु और जल मिलकर उपजाऊ मृदा का निर्माण करते हैं।
उत्तर: मृण्मय मृदा अपने कुछ विशेष गुणों के कारण विशिष्ट फसलों के लिए बहुत उपयोगी है:
• उच्च जल धारण क्षमता: इसके बारीक कण पानी को लंबे समय तक रोककर रखते हैं। यह गुण धान (चावल) की खेती के लिए आदर्श है, क्योंकि धान को लंबे समय तक खेत में पानी भरकर रखने की आवश्यकता होती है।
• पोषक तत्वों से भरपूर: मृण्मय मृदा में अक्सर ह्यूमस और अन्य पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं, जो पौधों की वृद्धि के लिए जरूरी हैं।
• कुछ फसलों के लिए उपयुक्त: धान के अलावा, गेहूँ और दलहन जैसी फसलें भी मृण्मय मृदा में अच्छी पैदावार देती हैं, क्योंकि यह मृदा नमी बनाए रखती है और जड़ों को मजबूती से पकड़ती है।
| मृण्मय मृदा | बलुई मृदा |
|---|---|
| इसमें बहुत छोटे और बारीक कण होते हैं। | इसमें बड़े और मोटे कण होते हैं। |
| कण आपस में सघन और कसकर जुड़े होते हैं। | कण ढीले और अलग-अलग होते हैं। |
| इसमें जल धारण क्षमता बहुत अधिक होती है। पानी देर से रिसता है। | इसमें जल धारण क्षमता बहुत कम होती है। पानी तेजी से रिस जाता है। |
| यह भारी और चिपचिपी होती है, गीली होने पर सख्त हो जाती है। | यह हल्की और भुरभुरी होती है, इसे आसानी से हाथ में उठाया जा सकता है। |
| इसमें ह्यूमस (जैविक पदार्थ) की मात्रा अधिक होती है। | इसमें ह्यूमस की मात्रा कम होती है। |
| वायु संचार कम होता है। | वायु संचार अच्छा होता है। |
उत्तर: मृदा की विभिन्न परतों (मृदा-परिच्छेदिका) को दर्शाता हुआ एक नामांकित चित्र:
परतों के नाम:
A - कार्बनिक परत (O परत): सबसे ऊपर, सूखी पत्तियों और जैविक अवशेषों की परत।
B - संस्तर या ऊपरी मृदा (A परत): यह सबसे उपजाऊ परत है, जिसमें गहरा रंग, अधिक ह्यूमस और सूक्ष्मजीव होते हैं।
C - अवस्तर या मध्य मृदा (B परत): इस परत में ह्यूमस कम, लेकिन खनिज और चट्टान के छोटे टुकड़े अधिक होते हैं।
D - अवचयित शैल खंड (C परत): बड़े, आंशिक रूप से टूटे हुए चट्टान के टुकड़े।
E - आधार शैल (R परत): सबसे नीचे, ठोस और अटूट मूल चट्टान।
उत्तर:
दिया गया है:
• पानी की कुल मात्रा = 200 mL
• अंतःस्रवण में लगा कुल समय = 40 मिनट
अंतःस्रवण दर = (पानी की मात्रा) / (लगा हुआ समय)
= 200 mL / 40 मिनट
= 5 mL प्रति मिनट
इसका अर्थ है कि उस मृदा के नमूने में पानी 5 mL प्रति मिनट की दर से रिस रहा था।
उत्तर: मृदा प्रदूषण और अपरदन को रोकने के उपाय:
(क) मृदा प्रदूषण रोकने के उपाय:
1. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का कम उपयोग: इनके अत्यधिक प्रयोग से मृदा की गुणवत्ता खराब होती है। इनके स्थान पर जैविक खाद, कम्पोस्ट और प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए।
2. प्लास्टिक और अविघटित कचरे का निपटान: प्लास्टिक की थैलियाँ और अन्य नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा मृदा में दबने से उसे प्रदूषित करते हैं। इनका पुनर्चक्रण या सही तरीके से निपटान करना चाहिए।
3. औद्योगिक अपशिष्ट का उचित प्रबंधन: कारखानों से निकलने वाले हानिकारक रसायनों को सीधे भूमि में नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उनका उपचार करना चाहिए।
4. सीवेज और गंदे पानी का उपचार: बिना साफ किए गंदे पानी को सिंचाई के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
(ख) मृदा अपरदन (क्षरण) रोकने के उपाय:
1. वृक्षारोपण: पेड़ों की जड़ें मृदा को बांधकर रखती हैं और तेज हवा या बारिश के पानी से उसे बहने से रोकती हैं। ढलान वाली जगहों पर पेड़ लगाना विशेष रूप से फायदेमंद है।
2. समोच्च जुताई और सीढ़ीनुमा खेती: पहाड़ी क्षेत्रों में खेतों को सीढ़ियों का आकार देकर और ढलान के समानांतर जुताई करके पानी के बहाव की गति कम की जा सकती है।
3. आवरण फसलें उगाना: खेत खाली न छोड़ें। फसल कटने के बाद भी कुछ पौधे (जैसे घास) लगाए रखने से मृदा की सुरक्षा होती है।
4. अनियंत्रित चराई पर रोक: जानवरों द्वारा अत्यधिक चराई से भूमि की वनस्पति खत्म हो जाती है, जिससे अपरदन बढ़ता है।
5. बांध बनाना: नालियों और छोटी नदियों पर बांध बनाकर पानी के वेग को कम किया जा सकता है।
| प | ल | 2 |
| 3 | अ | 4 |
| 5 | 6 | स |
| 7 | त | 8 |
| द | 9 | उ |
| 10 | म |
(रंगीन खाने पहेली के उत्तर दर्शाते हैं)
पहेली के उत्तर:
सीधे (Across):
1. प्लास्टिक (इसके बने थैलों के अपशिष्ट से मृदा प्रदूषण होता है।)
2. लवणीय (इस प्रकार की मृदा में सूक्ष्म कणों का अनुपात अधिक होता है।)
4. अपक्षय (मृदा बनने की प्रक्रिया।)
5. संस्तर (मृदा परिच्छेदिका की एक परत।)
8. तृण (वनस्पति न होने पर यह मृदा को उड़ा ले जाती है।)
9. दुमट (इस प्रकार की मृदा सुवातित एवं शुष्क होती है।)
10. मृण्मय (इस प्रकार की मृदा सुवातित एवं शुष्क होती है। यहाँ संभवतः प्रश्न में भ्रम है, सही उत्तर 'जलधारणक्षमता' होना चाहिए, लेकिन दिए गए खाने के अनुसार 'मृण्मय' फिट बैठता है।)
ऊपर से नीचे (Down):
2. मृदा (भूमि की ऊपरी परत, जो पौधों को आधार देती है।)
3. अपरदन (पवन तथा प्रवाही जल के कारण मृदा पर प्रभाव।)
6. स्रवण (मृदा में जल के अवशोषण की प्रक्रिया।)
7. परिच्छेदिका (किसी स्थान की मृदा की काट।)
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