UP Board class 11 Biology 5. पुष्पी पादपों की आकारिकी is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
(अ) बरगद, (ब) शलजम, (स) मैंग्रोव वृक्ष।
उत्तर: मूल या जड़ का सामान्य कार्य पौधे को स्थिर रखना और जल एवं खनिज पदार्थों का अवशोषण करना है। इसके अतिरिक्त, विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए जड़ें रूपान्तरित हो जाती हैं।
(अ) बरगद: इसकी शाखाओं से जड़ें निकलकर मिट्टी में धंस जाती हैं। इन्हें स्तम्भ मूल कहते हैं। ये शाखाओं को सहारा देने के साथ-साथ जल एवं खनिजों का अवशोषण भी करती हैं। ये अपस्थानिक जड़ें होती हैं।
(ब) शलजम: मूसला जड़ भोजन संचय के कारण फूलकर कुम्भ के आकार की हो जाती है। इसे कुम्भीरूप जड़ कहते हैं।
(स) मैंग्रोव वृक्ष: इनकी कुछ जड़ों के अन्तिम छोर खूँटी की तरह मिट्टी से बाहर निकल आते हैं। इन पर श्वास रन्ध्र पाए जाते हैं। ये जड़ें श्वसन में सहायक होती हैं, अतः इन्हें श्वसन मूल कहते हैं; जैसे—राइजोफोरा (Rhizophora) में।
चित्र: (अ) बरगद की स्तम्भ मूल, (ब) शलजम की कुम्भीरूप जड़, (स) राइजोफोरा की श्वसन मूल।
(i) “पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते हैं।”
(ii) “फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है।”
उत्तर:
(i) पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते: उदाहरण के लिए—आलू, अरबी आदि। ये तने के रूपान्तरण हैं, जिन्हें कन्द कहते हैं। ये भोजन संचयन का कार्य करते हैं। इनके तना होने की पुष्टि निम्नलिखित बिन्दुओं से होती है:
(ii) फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है: पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह है, जो एक अत्यन्त संघनित अक्षीय तना है। इसमें पर्वसन्धियाँ अत्यधिक पास-पास होती हैं तथा पर्व स्पष्ट नहीं होते। विभिन्न पुष्पीय भाग—बाह्यदल, दल, पुंकेसर, अण्डप—पत्तियों के रूपान्तरण हैं। उदाहरणार्थ, झुमकलता में पुमंगधर, हुरहुर में जायांगधर तथा गुलाब में पुष्पासन की वृद्धि जारी रहती है।
उत्तर: पिच्छाकार तथा हस्ताकार संयुक्त पत्ती में अन्तर
| क्र. सं. | पिच्छाकार संयुक्त पत्ती | हस्ताकार संयुक्त पत्ती |
|---|---|---|
| 1. | पत्ती की आकृति पंख के समान (पिच्छाकार) होती है। | पत्ती की आकृति हाथ की हथेली जैसी प्रतीत होती है। |
| 2. | पर्णक एक मध्य अक्ष (रेकिस) के दोनों ओर लगे रहते हैं। | पर्णक पर्णवृन्त के छोर पर एक ही बिन्दु पर लगे रहते हैं। |
| 3. | रेकिस की संरचना के आधार पर ये एकपिच्छकी, द्विपिच्छकी, त्रिपिच्छकी या बहुपिच्छकी होती हैं। | पर्णकों की संख्या के आधार पर ये एकपर्णी, द्विपर्णी, त्रिपर्णी, चतुष्पर्णी या बहुपर्णी होती हैं। |
उत्तर: तने या शाखा की पर्वसन्धियों पर पत्तियाँ एक विशिष्ट क्रम में लगी होती हैं, इसे पर्णविन्यास कहते हैं। यह निम्नलिखित प्रकार का होता है:
(आ) पुष्पदल विन्यास, (ब) बीजाण्डन्यास, (स) त्रिज्यासममिति, (द) एकव्याससममिति, (य) ऊर्ध्ववर्ती, (र) परिजायांगी पुष्प, (ल) दललग्न पुंकेसर।
उत्तर:
(आ) पुष्पदल विन्यास: कलिका अवस्था में बाह्यदलों या दलों की परस्पर सापेक्ष व्यवस्था को पुष्पदल विन्यास कहते हैं। यह कोरस्पर्शी, व्यावर्तित, कोरछादी या बैक्जीलरी प्रकार का होता है।
(ब) बीजाण्डन्यास: अण्डाशय में जरायु पर बीजाण्डों की व्यवस्था को बीजाण्डन्यास कहते हैं। यह सीमान्त, स्तम्भीय, भित्तीय, मुक्त स्तम्भीय, आधार-लग्न या धरातलीय प्रकार का होता है।
(स) त्रिज्यासममिति: जब पुष्प को किसी भी मध्य लम्ब अक्ष से काटने पर दो समान अर्द्ध-भागों में विभक्त किया जा सके, तो इसे त्रिज्यासममिति कहते हैं।
(द) एकव्याससममिति: जब पुष्प केवल एक ही मध्य लम्ब अक्ष से दो समान अर्द्ध-भागों में विभक्त किया जा सके, तो इसे एकव्याससममिति कहते हैं।
(य) ऊर्ध्ववर्ती: जब पुष्प के अन्य भाग अण्डाशय के नीचे से निकलते हैं, तो पुष्प को अधोजाय तथा अण्डाशय को ऊर्ध्ववर्ती कहते हैं।
(र) परिजायांगी पुष्प: यदि पुष्पीय भाग पुष्पासन से अण्डाशय के समान ऊँचाई से निकलते हैं, तो इस प्रकार के पुष्प परिजायांगी कहलाते हैं। इसमें अण्डाशय आधा ऊर्ध्ववर्ती होता है।
(ल) दललग्न पुंकेसर: जब पुंकेसर दल से लगे होते हैं, तो इन्हें दललग्न पुंकेसर कहते हैं।
(अ) असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम,
(ब) झकड़ा जड़ (मूल) तथा अपस्थानिक मूल,
(स) वियुक्ताण्डपी तथा युक्ताण्डपी अण्डाशय।
उत्तर:
(अ) असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम में अन्तर
| क्र. सं. | असीमाक्षी पुष्पक्रम | ससीमाक्षी पुष्पक्रम |
|---|---|---|
| 1. | मातृ अक्ष की वृद्धि असीमित होती है। | मातृ अक्ष के शिखर पर पुष्प निर्माण से वृद्धि रुक जाती है। |
| 2. | पुष्पों की संख्या असीमित होती है। | पुष्पों की संख्या सीमित होती है। |
| 3. | पुष्प मातृ अक्ष पर अग्राभिसारी क्रम में लगे होते हैं। | पुष्प मातृ अक्ष पर तलाभिसारी क्रम में लगे होते हैं। |
| 4. | पुष्प केन्द्र से परिधि की ओर खिलते हैं। | पुष्प परिधि से केन्द्र की ओर खिलते हैं। |
| 5. | पुष्प प्रायः सहपत्री होते हैं। | पुष्प सहपत्ररहित होते हैं। |
(ब) झकड़ा जड़ तथा अपस्थानिक जड़ में अन्तर
| क्र. सं. | झकड़ा जड़ | अपस्थानिक जड़ |
|---|---|---|
| 1. | एकबीजपत्री पौधों में मूसला जड़ अल्पजीवी होती है, इसके स्थान पर तने के आधार से अनेक समान मोटाई की जड़ें निकल आती हैं; जैसे—गेहूँ, धान, जौ। | मूलांकुर को छोड़कर पौधे के अन्य भागों (तना, पत्ती आदि) से निकलने वाली जड़ों को अपस्थानिक जड़ें कहते हैं; जैसे—बरगद की स्तम्भ मूल, राइजोफोरा की श्वसन मूल, अजूबा की पर्णमूल। |
(स) वियुक्ताण्डपी तथा युक्ताण्डपी अण्डाशय में अन्तर
| क्र. सं. | वियुक्ताण्डपी अण्डाशय | युक्ताण्डपी अण्डाशय |
|---|---|---|
| 1. | बहुअण्डपी जायांग के सभी अण्डाशय पृथक्-पृथक् होते हैं; जैसे—शरीफा, मदार, स्ट्रॉबेरी, कमल। इनसे पुंजफल बनते हैं। | बहुअण्डपी जायांग के सभी अण्डाशय परस्पर जुड़े रहते हैं; जैसे—खीरा, टमाटर, बैंगन, नींबू, पोस्त। इनसे एकल फल बनते हैं। |
(अ) चने के बीज तथा (ब) मक्का के बीज की अनुदैर्घ्य काट।
उत्तर:
(अ) चने के बीज की अनुदैर्घ्य काट:
संरचना: बीजावरण, बीजांडद्वार, बीजनाभि, दो दालें (बीजपत्र), मूलांकुर, प्रांकुर।
(ब) मक्का के बीज की अनुदैर्घ्य काट:
संरचना: बीजावरण, भ्रूणपोष, एल्यूरोन स्तर, शूट, प्रांकुर, मूलांकुर, बीजपत्र (स्क्यूटेलम)।
उत्तर: तने का मुख्य कार्य पत्तियों, पुष्पों एवं फलों को धारण करना तथा जल, खनिज एवं कार्बनिक पदार्थों का संवहन करना है। विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए तने रूपान्तरित हो जाते हैं। तने के रूपान्तरण निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:
1. भूमिगत रूपान्तरित तने: ये चार प्रकार के होते हैं—
(i) प्रकन्द: भूमि के अन्दर क्षैतिज रूप से बढ़ने वाले तने; जैसे—अदरक, हल्दी, केला।
(ii) घनकन्द: ऊर्ध्वाधर रूप में बढ़ने वाले भूमिगत तने; जैसे—अरवी, जिमीकन्द।
(iii) तना कन्द: भूमिगत तने के अन्तिम सिरों पर फूलकर बनते हैं; जैसे—आलू।
(iv) शल्क कन्द: छोटे, चपटे तने जिन पर शल्क पत्र होते हैं; जैसे—प्याज, लहसुन, लिली।
2. अर्द्धवायवीय रूपान्तरित तने: ये कमजोर तने पृथ्वी की सतह पर या आंशिक रूप से मिट्टी में रेंगकर वृद्धि करते हैं तथा कायिक प्रजनन में सहायक होते हैं। ये चार प्रकार के होते हैं—
(i) उपरिभूस्तारी: भूमि की सतह पर फैले रहते हैं; जैसे—दूब घास, खट्टी-बूटी।
(ii) भूस्तारी: भूमिगत तने से निकलकर बाद में ऊपर आते हैं; जैसे—स्ट्रॉबेरी, अरवी।
(iii) अन्तःभूस्तारी: भूमिगत तने से निकलकर तिरछे होकर भूमि से बाहर आ जाते हैं; जैसे—पोदीना, गुलदाउदी।
(iv) भूस्तारिका: जलीय पौधों में पाए जाते हैं; जैसे—जलकुम्भी, समुद्र सोख।
3. वायवीय रूपान्तरित तने: तने का वायवीय भाग विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित हो जाता है।
(i) पर्णाभ स्तम्भ: तना चपटा, हरा व मांसल हो जाता है तथा पत्ती का कार्य करता है; जैसे—नागफनी, यूफोर्बिया।
(ii) स्तम्भ प्रतान: तने के रूपान्तर से बने प्रतान जो आरोहण में सहायक होते हैं; जैसे—झुमकलता, अंगूर, काशीफल।
(iii) स्तम्भ कंटक: कक्षस्थ या अग्रस्थ कलिकाओं से बने कंटक; जैसे—करोंदा, बोगनविलिया।
(iv) पत्र प्रकलिकाएँ: कलिकाओं में भोजन संग्रह से बनी संरचनाएँ जो कायिक प्रवर्धन करती हैं; जैसे—लहसुन, केतकी, रतालू।
उत्तर:
(अ) कुल फेबेसी (मटर का पुष्प):
आवास: एकवर्षीय शाक, आरोही।
मूल: मूसला जड़, ग्रन्थिल (नाइट्रोजन स्थिरीकरण)।
स्तम्भ: शाकीय, हरा, बेलनाकार।
पत्ती: एकान्तर, अनुपर्णी, अग्र पर्णक प्रतान में रूपान्तरित।
पुष्पक्रम: एकल कक्षास्थ या गुच्छ।
पुष्प: सहपत्री, द्विलिंगी, एकव्याससममित, परिजायांगी।
बाह्यदलपुंज: 5, संयुक्त।
दलपुंज: 5, पृथक्, पताकाकार, दो पंख, दो नौतल।
पुमंग: 10 पुंकेसर, द्विसंघी (9+1), द्विकोष्ठी परागकोश।
जायांग: एकअण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती, एककोष्ठीय, सीमान्त बीजाण्डन्यास।
फल: शिम्ब।
पुष्प सूत्र: Br. % ⊕ K(5) C1+2+(2) A(9)+1 G1
चित्र: मटर का पुष्पीय चित्र उपलब्ध कराया जाएगा।
(ब) कुल सोलेनेसी (मकोय का पुष्प):
आवास: जंगली, वार्षिक शाक।
मूल: शाखामय मूसला जड़।
स्तम्भ: वायवीय, शाकीय, हरा।
पत्ती: एकान्तर, सरल, अननुपर्णी।
पुष्पक्रम: एकलशाखी ससीमाक्ष (हेलिकॉइड)।
पुष्प: असहपत्री, पूर्ण, द्विलिंगी, त्रिज्यासममित, अधोजाय।
बाह्यदलपुंज: 5, संयुक्त, कोरस्पर्शी।
दलपुंज: 5, संयुक्त, चक्रिक, मरोड़ी दलविन्यास।
पुमंग: 5, दललग्न, परागकोश द्विपालित।
जायांग: द्विअण्डपी, युक्ताण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती, स्तम्भीय बीजाण्डन्यास।
फल: बेरी।
पुष्प सूत्र: Ebr ⊕ K(5) C(5) A5 G(2)
चित्र: मकोय का पुष्पीय चित्र उपलब्ध कराया जाएगा।
उत्तर: अण्डाशय में जरायु पर बीजाण्डों के लगने के क्रम को बीजाण्डन्यास कहते हैं। यह निम्नलिखित प्रकार का होता है:
उत्तर: पुष्प एन्जियोस्पर्म्स में जनन हेतु बनने वाली संरचना है, जो वास्तव में एक रूपान्तरित प्ररोह है। एक प्ररूपी पुष्प (जैसे—सरसों) के निम्नलिखित भाग होते हैं:
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