UP Board class 11 Biology 6. पुष्पी पादपों का शारीर is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर:
उत्तर: हाँ, हम इस कथन से सहमत हैं। कॉर्क कैम्बियम (फेलोजन) एक पार्श्व विभज्योतक है जो वल्कुट (कॉर्टेक्स) की कोशिकाओं से बनता है। यह कोशिकाएँ विभाजित होकर बाहर की ओर सुबेरिनयुक्त कॉर्क (फेलम) कोशिकाएँ बनाती हैं, जो पौधे के आंतरिक ऊतकों की सुरक्षा करती हैं।
उत्तर:
द्वितीयक वृद्धि: द्विबीजपत्री तथा जिम्नोस्पर्म्स आदि काष्ठीय पौधों में पार्श्व विभज्योतकों (संवहन एधा व कॉर्क एधा) की क्रियाशीलता के कारण तने तथा जड़ की मोटाई में होने वाली वृद्धि को द्वितीयक वृद्धि कहते हैं।
प्रक्रिया:
सार्थकता: द्वितीयक वृद्धि के कारण पौधे मजबूत और मोटे होते हैं, जिससे उन्हें यांत्रिक सहारा मिलता है। इससे अधिक मात्रा में जाइलम (लकड़ी) बनती है, जो हमारे लिए इमारती लकड़ी के रूप में उपयोगी है। वार्षिक वलयों के अध्ययन से पौधे की आयु तथा पुराने जलवायु परिस्थितियों का पता चलता है।
(यहाँ द्विबीजपत्री तने की द्वितीयक वृद्धि दर्शाता हुआ एक नामांकित चित्र होगा, जिसमें प्राथमिक जाइलम, द्वितीयक जाइलम, संवहन एधा वलय, द्वितीयक फ्लोएम, कॉर्क एधा, फेलम आदि दिखाए जाएँगे।)
(अ) ट्रैकीड तथा वाहिका
(ब) पैरेन्काइमा तथा कॉलेन्काइमा
(स) रसदारु तथा अन्तःकाष्ठ
(द) खुला तथा बन्द संवहन बण्डल।
उत्तर:
(अ) ट्रैकीड तथा वाहिका में अन्तर
| ट्रैकीड (Tracheids) | वाहिका (Vessels) |
|---|---|
| 1. ये लम्बी, नुकीले सिरों वाली, संकरी कोशिकाएँ होती हैं। | 1. ये लम्बी, चौड़ी, नलिकाकार कोशिकाएँ होती हैं जो सिरों पर जुड़कर एक सतत नली बनाती हैं। |
| 2. इनकी भित्ति पर गर्त (Pits) पाए जाते हैं, जल इन्हीं गर्तों से होकर गुजरता है। | 2. इनकी अनुप्रस्थ भित्तियाँ अवरोधरहित होती हैं, जिससे जल का संवहन बिना रुकावट होता है। |
| 3. ये संवहन ट्रैकियोफाइटा (जैसे फर्न, कोनिफर) के सभी सदस्यों में पाई जाती हैं। | 3. ये मुख्यतः आवृतबीजी पौधों (एन्जियोस्पर्म) में पाई जाती हैं। |
(ब) पैरेन्काइमा (मृदूतक) तथा कॉलेन्काइमा (स्थूलकोण ऊतक) में अन्तर
| पैरेन्काइमा (Parenchyma) | कॉलेन्काइमा (Collenchyma) |
|---|---|
| 1. कोशिका भित्ति पतली व सेलुलोस की बनी होती है। | 1. कोशिका भित्ति असमान रूप से मोटी (कोनों पर अधिक) व सेलुलोस की बनी होती है। |
| 2. कोशिकाएँ गोल, अण्डाकार या लम्बी हो सकती हैं। अंतराकोशिकीय स्थान पाए जाते हैं। | 2. कोशिकाएँ लम्बी व कोणीय होती हैं। अंतराकोशिकीय स्थान नहीं होते। |
| 3. यह भरण, प्रकाश संश्लेषण, भोजन संचय आदि कार्य करता है। | 3. यह यांत्रिक सहारा प्रदान करता है तथा लचीलेपन के लिए उत्तरदायी है। |
| 4. पौधे के सभी भागों में पाया जाता है। | 4. प्रायः द्विबीजपत्री तने की अधस्त्वचा (हाइपोडर्मिस) में पाया जाता है। |
(स) रसदारु (सैपवुड) तथा अन्तःकाष्ठ (हार्टवुड) में अन्तर
| रसदारु (Sapwood) | अन्तःकाष्ठ (Heartwood) |
|---|---|
| 1. द्वितीयक जाइलम का बाहरी, हल्के रंग का भाग होता है। | 1. द्वितीयक जाइलम का आंतरिक, गहरे रंग का भाग होता है। |
| 2. इसमें जल व खनिजों का संवहन सक्रिय रूप से होता है। | 2. इसमें संवहन क्रिया बंद हो जाती है। वाहिकाएँ टाइलोसिस द्वारा अवरुद्ध हो जाती हैं। |
| 3. इसमें टेनिन, रेजिन, तेल आदि पदार्थ नहीं भरे होते। | 3. इसमें टेनिन, रेजिन, तेल, गोंद आदि पदार्थ भर जाने से यह गहरे रंग का व मजबूत हो जाता है। |
| 4. यह नरम होता है। | 4. यह कठोर व टिकाऊ होता है, इमारती लकड़ी के काम आता है। |
(द) खुले तथा बन्द संवहन बण्डल में अन्तर
| खुला संवहन बण्डल (Open Vascular Bundle) | बन्द संवहन बण्डल (Closed Vascular Bundle) |
|---|---|
| 1. जाइलम व फ्लोएम के बीच एधा (कैम्बियम) उपस्थित होती है। | 1. जाइलम व फ्लोएम के बीच एधा (कैम्बियम) अनुपस्थित होती है। |
| 2. इनमें द्वितीयक वृद्धि संभव है। | 2. इनमें द्वितीयक वृद्धि संभव नहीं है। |
| 3. ये द्विबीजपत्री पौधों के तने व जड़ में पाए जाते हैं। | 3. ये एकबीजपत्री पौधों में पाए जाते हैं। |
(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल
(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना।
उत्तर (अ): एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री मूल में अन्तर
| लक्षण | एकबीजपत्री मूल | द्विबीजपत्री मूल |
|---|---|---|
| वल्कुट (कॉर्टेक्स) | अपेक्षाकृत पतला। | अपेक्षाकृत मोटा। |
| अन्तस्त्वचा | कोशिकाओं की भित्तियाँ स्थूलित होती हैं, कैस्पेरियन पट्टियाँ स्पष्ट। | भित्तियाँ पतली, कैस्पेरियन पट्टियाँ कम स्पष्ट। |
| परिरम्भ (पेरीसाइकिल) | केवल पार्श्व मूल बनाती है। | पार्श्व मूल, एधा व कॉर्क एधा बनाने में सहायक। |
| संवहन बण्डल | बहुसंख्यक (6 से अधिक)। जाइलम वाहिकाएँ गोलाकार, बड़ी। द्वितीयक वृद्धि नहीं होती। | कम संख्या में (2 से 6)। जाइलम वाहिकाएँ बहुभुजी, छोटी। द्वितीयक वृद्धि हो सकती है। |
| मज्जा | विकसित व स्पष्ट। | अल्पविकसित या अनुपस्थित। |
उत्तर (ब): एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना में अन्तर
| लक्षण | एकबीजपत्री तना | द्विबीजपत्री तना |
|---|---|---|
| बाह्यत्वचा पर रोम | अनुपस्थित या बहुत कम। | प्रायः बहुकोशिकीय रोम उपस्थित। |
| अधस्त्वचा (हाइपोडर्मिस) | दृढ़ोतकी (स्क्लेरेन्काइमा) की बनी। | स्थूलकोण ऊतक (कॉलेन्काइमा) की बनी। |
| संवहन बण्डल | भरण ऊतक में बिखरे, अवर्धी, बंद प्रकार के। बंडल आच्छद उपस्थित। | एक वलय में व्यवस्थित, वर्धी, खुले प्रकार के। बंडल आच्छद अनुपस्थित। |
| द्वितीयक वृद्धि | सामान्यतः नहीं होती। | सामान्यतः होती है। |
| मज्जा | अस्पष्ट या अनुपस्थित। | स्पष्ट रूप से उपस्थित। |
उत्तर: सूक्ष्मदर्शी में शैशव तने की अनुप्रस्थ काट का अवलोकन करके निम्नलिखित संरचनात्मक लक्षणों के आधार पर पहचान करते हैं:
यदि तना एकबीजपत्री है, तो:
यदि तना द्विबीजपत्री है, तो:
उत्तर: उपरोक्त लक्षण—संवहन बण्डलों का फैला हुआ व बिखरा विन्यास, उनके चारों ओर दृढ़ोतकी (स्क्लेरेन्काइमी) बण्डल आच्छद की उपस्थिति तथा फ्लोएम में मृदूतक (पैरेन्काइमा) का अभाव—ये सभी एकबीजपत्री तने की विशेषताएँ हैं। अतः दिया गया पादप भाग एकबीजपत्री तने का है।
उत्तर: जाइलम तथा फ्लोएम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि ये एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं जो सामूहिक रूप से एक विशिष्ट कार्य करती हैं।
उत्तर: रन्ध्री तन्त्र (Stomatal System): पत्ती की बाह्यत्वचा पर पाए जाने वाले रन्ध्र (Stomata), उनकी द्वार कोशिकाएँ (Guard Cells) तथा सहायक कोशिकाएँ (Accessory Cells) मिलकर रन्ध्री तन्त्र बनाते हैं। यह तन्त्र वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों के आदान-प्रदान को नियंत्रित करता है।
रचना:
रन्ध्री तन्त्र का नामांकित चित्र
(यहाँ एक चित्र होगा जिसमें वृक्काकार द्वार कोशिकाओं के बीच रन्ध्रीय छिद्र, मोटी आंतरिक भित्ति, क्लोरोप्लास्ट तथा सहायक कोशिकाएँ दिखाई जाएँगी।)
उत्तर: पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र निम्नलिखित हैं:
उत्तर: पादप शारीर (Anatomy) का अध्ययन अत्यंत उपयोगी है:
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