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समानता का अर्थ यह है कि समाज में किसी व्यक्ति या वर्ग से जाति, रंग, क्षेत्र, धर्म और आर्थिक स्तर पर भेदभाव की मनाही हो तथा सभी को समान अवसर प्राप्त हों। समानता की माँग बीसवीं शताब्दी में एशिया और अफ्रीका के उपनिवेश विरोधी स्वतंत्रता संघर्षों के दौरान प्रबल हुई थी।
समानता एक व्यापक रूप से स्वीकृत आदर्श है, जिसे अनेक देशों के संविधान और कानूनों में सम्मिलित किया गया है।
समानता की अवधारणा में यह निहित है कि सभी मनुष्य अपनी दक्षता और प्रतिभा को विकसित करने के लिए तथा अपने लक्ष्यों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए समान अधिकार और अवसरों के हकदार हैं।
प्राकृतिक और समाजजनित असमानताओं में अंतर करना इसलिए उपयोगी होता है क्योंकि इससे स्वीकार की जा सकने लायक और अन्यायपूर्ण असमानताओं को अलग करने में मदद मिलती है।
समानता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विभिन्न समूह और समुदायों के लोगों के पास इन साधनों और अवसरों को पाने का बराबर और उचित मौका हो।
भारत में समान अवसरों की एक विशेष समस्या सुविधाओं की कमी की वजह से नहीं, बल्कि कुछ सामाजिक रीति-रिवाजों के कारण सामने आती है। देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं को उत्तराधिकार का समान अधिकार नहीं मिलता है। आर्थिक असमानता ऐसे समाज में विद्यमान होती है जिसमें व्यक्तियों और वर्गों के बीच धन, दौलत या आमदनी में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं।
मार्क्सवाद और उदारवाद हमारे समाज की दो प्रमुख राजनीतिक विचारधाराएँ हैं। मार्क्स उन्नीसवीं सदी का एक प्रमुख विचारक था।
मार्क्स का मानना था कि खाईनुमा असमानताओं का बुनियादी कारण महत्त्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों जैसे- जल, जंगल, जमीन या तेल समेत अन्य प्रकार की संपत्ति का निजी स्वामित्व है।
निजी स्वामित्व मालिकों के वर्ग को सिर्फ अमीर नहीं बनाता बल्कि उन्हें राजनीतिक ताकत भी देता है।
उदारवादी समाज में संसाधनों और लाभांश के वितरण के सर्वाधिक कारगर और उचित तरीके के रूप में प्रतियोगिता के सिद्धांत का समर्थन करते हैं।
नारीवाद स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का पक्ष लेने वाला राजनीतिक सिद्धांत है। वे स्त्री या पुरुष नारीवादी कहलाते हैं, जो मानते हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच की अनेक असमानताएँ न तो नैसर्गिक हैं और न ही आवश्यक।
उत्तर: समानता और असमानता दोनों ही प्राकृतिक हैं। इन दोनों अवधारणाओं में भिन्नता हो सकती है, परन्तु स्थान विशेष पर दोनों सत्य हो सकते हैं और असत्य भी। प्राकृतिक असमानता कहीं सही हो सकती है और कहीं गलत भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, जहाँ रात होती है वहीं दिन भी होता है। इसी प्रकार कहीं गर्मी होती है तो कहीं ठंडक। इसी प्रकार कोई व्यक्ति काला हो सकता है तो कोई गोरा। व्यक्तियों में जैविक असमानता भी पाई जाती है; कुछ लोग पुरुष होते हैं तो कुछ स्त्री।
प्रकृति ने व्यक्ति को योग्यताओं और क्षमताओं में भिन्न बनाया है, परन्तु प्रत्येक व्यक्ति समान होना चाहता है। समानता एक प्राकृतिक नियम है, परन्तु यह पूर्ण दृष्टिकोण से संभव नहीं है। इसलिए समानता का अर्थ समाज की सामाजिक-आर्थिक दशाओं को ध्यान में रखकर निकाला जा सकता है। समानता की आवश्यकता व्यक्ति के रहन-सहन और वातावरण के प्रभाव से सुनिश्चित की जा सकती है। व्यक्ति द्वारा निर्मित अन्यायपूर्ण असमानता को हटाया जा सकता है, जैसे कि एक डॉक्टर के काम और एक मजदूर के काम में अंतर स्वाभाविक है, परन्तु उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए।
उत्तर: हाँ, हम इस तर्क से सहमत हैं कि पूर्ण आर्थिक समानता न तो संभव है और न ही वांछनीय। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। एक डॉक्टर और एक मजदूर को समान पारिश्रमिक न तो संभव है और न ही वांछित है, क्योंकि डॉक्टर ने अधिक निवेश करके अपनी क्षमताओं और योग्यताओं को बढ़ाया है। डॉक्टर का उत्तरदायित्व और कार्य मजदूर के कार्य और उत्तरदायित्व से कहीं अधिक होता है। एक डॉक्टर को प्रतिमाह 10,000 रुपये भुगतान किया जा सकता है, जबकि एक मजदूर की न्यायसंगत मजदूरी 3,000 रुपये प्रतिमाह हो सकती है। इसलिए यहाँ दोनों की पारिश्रमिक में 7,000 रुपये का अंतर है। इसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए और इसे समानता के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
यदि दो मजदूरों को समान कार्य के लिए अलग-अलग मजदूरी (जैसे 1000 रुपये और 3000 रुपये) दी जाती है, तो उस स्थिति को व्यक्ति-निर्मित असमानता कहा जा सकता है। सभी व्यक्ति अधिक धनी या अधिक गरीब नहीं हो सकते। यह कल्पना नहीं की जा सकती कि सभी व्यक्ति महलों में रहें या सभी झोपड़ियों में। समानता सापेक्षिक शर्त के रूप में होनी चाहिए, जिसमें सभी को समान अवसर मिले, योग्यताओं एवं क्षमताओं के विकास का मौका मिले और जीवन की आवश्यकताएँ पूरी हों।
(क) सकारात्मक कार्यवाई
(ख) अवसर की समानता
(ग) समान अधिकार
1. प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है।
2. बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊँची दर देते हैं।
3. प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए।
उत्तर:
(क) सकारात्मक कार्यवाई - (2) बैंक वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज की ऊँची दर देते हैं।
(ख) अवसर की समानता - (3) प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए।
(ग) समान अधिकार - (1) प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत देने का अधिकार है।
उत्तर: यह सलाह समानता के सिद्धांत से पूर्ण रूप से संगत नहीं है। समानता के सिद्धांत के अनुसार, विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग नीतियाँ नहीं अपनाई जानी चाहिए। यहाँ एक नीति छोटे और सीमांत किसानों के लिए है और दूसरी बड़े और धनी किसानों के लिए। यदि लघु किसान अपनी उपज की अच्छी कीमत नहीं प्राप्त कर रहे हैं, तो इसके कारण भिन्न हो सकते हैं। लघु और सीमांत किसानों की सहायता उच्च रियायती दरों पर ऋण देकर, बेहतर बाजार पहुँच प्रदान करके या अन्य सामान्य सुविधाएँ देकर की जा सकती है, जो सभी किसानों के लिए न्यायसंगत हों।
(क) कक्षा का हर बच्चा नाटक का पाठ अपना क्रम आने पर पढ़ेगा।
उत्तर: इस उदाहरण में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि कक्षा के हर बच्चे को क्रमानुसार बराबर का अवसर दिया जा रहा है।
(ख) कनाडा सरकार ने दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति से 1960 तक यूरोप के श्वेत नागरिकों को कनाडा में आने और बसने के लिए प्रोत्साहित किया।
उत्तर: इस उदाहरण में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि कनाडा सरकार ने रंग के आधार पर भेदभावपूर्ण नीति अपनाई। उसने केवल गोरे यूरोपीय लोगों को ही कनाडा में प्रवासन के लिए प्रोत्साहित किया।
(ग) वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग से रेलवे आरक्षण की एक खिड़की खोली गई।
उत्तर: इस उदाहरण में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि यह एक सकारात्मक कार्यवाही (Positive Action) है। भारतीय संविधान और नीतियाँ वरिष्ठ नागरिकों को विशेष सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
(घ) कुछ वन क्षेत्रों को निश्चित आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उत्तर: इस उदाहरण में समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह एक सकारात्मक कार्यवाही है। यह आरक्षण ऐतिहासिक रूप से वंचित और वनों पर निर्भर आदिवासी समुदायों के अधिकारों और जीवनयापन को सुरक्षित करने के लिए किया गया है।
(क) स्त्रियां हमारी माताएँ हैं। हम अपनी माताओं को मताधिकार से वंचित करके अपमानित नहीं करेंगे?
(ख) सरकार के निर्णय पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रभावित करते हैं इसलिए शासकों के चुनाव में उनका भी मत होना चाहिए।
(ग) महिलाओं को मताधिकार न देने से परिवारों में मतभेद पैदा हो जाएँगे।
(घ) महिलाओं से मिलकर आधी दुनिया बनती है। मताधिकार से वंचित करके लंबे समय तक उन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता है।
उत्तर: समानता के विचार से संगत तर्क (ख) और (घ) हैं।
कारण:
तर्क (ख) में कहा गया है कि सरकार के निर्णय पुरुष और महिला दोनों को प्रभावित करते हैं, इसलिए दोनों को शासकों के चुनाव में सहभागी होने का अधिकार होना चाहिए। यह तर्क नागरिकों के रूप में महिलाओं की समान भागीदारी पर जोर देता है।
तर्क (घ) में कहा गया है कि महिलाएँ सम्पूर्ण जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा हैं और उन्हें मताधिकार से वंचित करना एक बड़े वर्ग के साथ अन्याय है। यह तर्क जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को रेखांकित करता है।
तर्क (क) और (ग) भावनात्मक या सामाजिक सद्भाव पर आधारित हैं, जो समानता के मूलभूत सिद्धांत को सीधे तौर पर नहीं दर्शाते।
उत्तर: समानता का अर्थ यह है कि समाज में किसी व्यक्ति या वर्ग से जाति, रंग, क्षेत्र, धर्म और आर्थिक स्तर पर भेदभाव न किया जाए तथा सभी को समान अवसर प्राप्त हों। लास्की के अनुसार, "सर्वप्रथम समानता का अर्थ है कि समाज में कोई विशेषाधिकार युक्त वर्ग न हो।"
उत्तर: समानता मुख्य रूप से पाँच प्रकार की होती है:
उत्तर: समाज में नागरिकों के लिए समानता विकास के लिए आवश्यक शर्त है, क्योंकि समानता के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का वास्तविक उपभोग नहीं कर सकता। जब कानून समान रूप से सभी व्यक्तियों के जीवन और सम्पत्ति की रक्षा करता है, तभी व्यक्ति निर्भीक होकर अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सकता है। समानता की अवधारणा इस विचार पर जोर देती है कि सम्पूर्ण मानव जाति समान मूल्य रखती है, जिसका सरोकार रंग, लिंग, जाति और राष्ट्रीयता से नहीं होता। इसलिए मानव विकास के लिए समान व्यवहार और सम्मान आवश्यक है।
उत्तर: राजनीतिक सिद्धांत में प्राकृतिक और सामाजिक असमानताओं में निम्नलिखित अंतर किया जाता है:
उत्तर: आर्थिक समानता का अर्थ है कि सभी व्यक्तियों को अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समान रोजगार, समान वेतन, व्यवसाय और आर्थिक कार्य करने के समान अवसर प्राप्त हों। लास्की के अनुसार, जहाँ संपत्ति कुछ हाथों में केंद्रित होती है, वहाँ धन का राजनीति, संस्कृति और न्यायपालिका पर हावी हो जाना स्वाभाविक है। आर्थिक समानता के मुख्य पक्ष हैं: बेरोजगारी, बुढ़ापे में आर्थिक सहायता; स्त्री-पुरुष को समान कार्य के लिए समान वेतन; सभी को रोजगार और उचित अवकाश; तथा प्रत्येक व्यक्ति की न्यूनतम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति।
उत्तर: कानून के समक्ष समानता का अर्थ है कि संविधान एवं कानून की दृष्टि में सभी नागरिक समान हैं। कानून के लिए कोई व्यक्ति छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा, शिक्षित-अशिक्षित, अमीर-गरीब नहीं है। सभी उसकी दृष्टि में समान हैं और वह किसी से भी भेदभाव नहीं करता। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने सभी समान हैं।
उत्तर: मार्क्स का विश्वास था कि व्यक्ति-निर्मित असमानता का मूल कारण व्यक्तिगत संपत्ति का कुछ हाथों में केंद्रित होना है। इससे न केवल आर्थिक असमानता पैदा होती है बल्कि यह शिक्षा, सामाजिक स्तर, राजनीतिक प्रभाव आदि सभी क्षेत्रों में असमानता को बढ़ाता है। मार्क्स ने राज्य को पूँजीपति वर्ग का एजेंट माना और पूँजीवादी वर्ग को समाप्त करने का सुझाव दिया। उन्होंने असमानता मिटाने और एक समतावादी समाज की स्थापना के लिए समाज के ढाँचे को बदलने पर जोर दिया।
उत्तर: भारतीय संविधान ने सामाजिक समानता स्थापित करने के लिए कई प्रावधान किए हैं। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण प्रदान करता है। अनुच्छेद 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है। इस प्रकार संविधान में समानता के अधिकार को सुरक्षित किया गया है।
उत्तर: मार्क्सवादी विचार के अनुसार, खाईनुमा असमानताओं का बुनियादी कारण महत्त्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों जैसे जल, जंगल, जमीन आदि का निजी स्वामित्व है। निजी स्वामित्व मालिकों के वर्ग को न केवल अम
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