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UP Board class 11 Political Science (5. अधिकार) solution PDF

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UP Board class 11 Political Science (5. अधिकार) solution

UP Board class 11 Political Science 5. अधिकार Hindi Medium Solutions - PDF

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science (राजनीतिक सिद्धांत)

अध्याय 5: अधिकार

मुख्य बिंदु

  • अधिकार उन बातों का प्रतीक है, जिन्हें समाज के सभी लोगों को सम्मान और गरिमा का जीवन बसर करने के लिए महत्त्वपूर्ण और आवश्यक समझते हैं।
  • 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकारा और लागू किया।
  • 17वीं और 18वीं शताब्दी में राजनीतिक सिद्धांतकार तर्क देते थे कि हमारे लिए अधिकार प्रकृति या ईश्वर प्रदत्त हैं। हमें जन्म से वे अधिकार प्राप्त हैं। अत: कोई व्यक्ति या शासक उन्हें हमसे छीन नहीं सकता।
  • मनुष्य के लिए तीन प्राकृतिक अधिकार चिन्हित किये गए थे- (i) जीवन का अधिकार, (ii) स्वतंत्रता का अधिकार और (iii) संपत्ति का अधिकार
  • नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकार मिलकर किसी सरकार की लोकतांत्रिक प्रणाली की बुनियाद का निर्माण करते हैं।
  • राजनीतिक अधिकार नागरिकों को कानून के समक्ष बराबरी तथा राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का हक देते हैं।
  • अधिकारों का उद्देश्य लोगों के कल्याण की हिफाजत करना होता है।
  • जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के अनुसार लोगों के साथ गरिमामय बर्ताव करने का अर्थ था उनके साथ नैतिकता से पेश आना
  • भारतीय संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, परन्तु सन 1979 में 44वें संशोधन के द्वारा सम्पति के अधिकार को हटा दिया गया है। अब मुख्यतः छह मौलिक अधिकार रह गए हैं।

अभ्यास प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. अधिकार क्या हैं और वे महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? अधिकारों का दावा करने के लिए उपयुक्त आधार क्या हो सकते हैं?

उत्तर: अधिकार का अर्थ यह है कि मनुष्य के सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके द्वारा मनुष्य अपना विकास कर सकता है। अधिकारों के बिना मनुष्य अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता है। जिस देश में नागरिकों को अधिकार प्राप्त नहीं होते, वहाँ के नागरिक अपना विकास नहीं कर सकते हैं। राज्य के द्वारा दिए गए अधिकारों को देखकर ही उस राज्य को अच्छा या बुरा कहा जा सकता है।

विभिन्न विद्वानों के अनुसार अधिकार की परिभाषा:

  • लास्की के अनुसार: "अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना साधारणत: कोई मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता।"
  • हालैंड के अनुसार: "अधिकार एक व्यक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्ति के कर्तव्यों को समाज के मन और शांति द्वारा प्रभावित करने की क्षमता है।"

सरल शब्दों में, अधिकार उन बातों का प्रतीक है, जिन्हें समाज के सभी लोगों के सम्मान और गरिमा का जीवन बसर करने के लिए महत्त्वपूर्ण और आवश्यक समझते हैं। उदाहरण के लिए, आजीविका का अधिकार सम्मानजनक जीवन जीने के लिए ज़रूरी है। लाभकारी रोजगार व्यक्ति को आर्थिक स्वतंत्रता देता है, जो उसकी गरिमा के लिए प्रमुख है।

अधिकार का महत्व:

  • अधिकार से व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है।
  • अधिकार से व्यक्ति की आंतरिक शक्तियों का विकास होता है, जिससे व्यक्ति और समाज की उन्नति होती है।
  • अधिकार सरकार को निरंकुश बनने से रोकते हैं।
  • अधिकार सामाजिक कल्याण का एक साधन हैं।
  • अधिकार व्यक्ति के जीवन को सुखमय बनाते हैं।

अधिकारों के दावे के आधार:

  1. व्यक्तिगत आवश्यकताएँ: मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है, जिससे उसके जीवन का विकास होता है। अधिकारों का निर्माण इन्हीं मांगों के आधार पर होता है।
  2. जीवन के लिए आवश्यकता: कोई मांग अधिकार तभी बन सकती है जब उसकी प्राप्ति जीवन के लिए आवश्यक समझी जाए।
  3. सामाजिक स्वीकृति: समाज उस मांग को उचित समझकर स्वीकार करे।

प्रश्न 2. किन आधारों पर यह अधिकार अपनी प्रकृति में सार्वभौमिक माने जाते हैं?

उत्तर: अधिकार जीवन की ऐसी परिस्थितियाँ हैं जो महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हैं। इन्हें सार्वभौमिक इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि इनकी माँग सभी कालों में सभी लोगों द्वारा की गई है। ये अधिकार मानव अस्तित्व के लिए मौलिक हैं। वस्तुत: अधिकार मौलिक शर्तें हैं जो मानव जाति के लिए आत्म-सम्मान और गरिमा के लिए महत्वपूर्ण हैं।

सार्वभौमिक अधिकारों के उदाहरण:

  1. जीविका का अधिकार: यह एक व्यक्ति के जीवन का आधार है। अच्छा रोजगार व्यक्ति को आर्थिक रूप से स्वालंबी बनाता है, उसका महत्व बढ़ाता है और शोषण से बचाता है।
  2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यह हमें विभिन्न प्रकार से (लिखित, मौखिक, कलात्मक) अपने विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है।
  3. शिक्षा का अधिकार: यह व्यक्ति के मानसिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक विकास में सहायक है। यह उपयोगी कौशल प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति जीवन के विविध पहलुओं में सही चुनाव करने में सक्षम होता है।

प्रश्न 3. संक्षेप में उन नए अधिकारों की चर्चा कीजिए, जो हमारे देश में सामने रखे जा रहे हैं।

उत्तर: आज का लोकतांत्रिक विश्व जागरूकता और चेतना से भरा हुआ है। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए पारंपरिक अधिकारों के अलावा नए क्षेत्रों में भी अधिकारों की माँग उठ रही है। भारत में भी ऐसे कई नए अधिकारों पर चर्चा हो रही है और कुछ को कानूनी मान्यता भी मिली है।

  • आदिवासी अधिकार: अपने रहवास, जीवन शैली और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने का अधिकार।
  • बाल अधिकार: बच्चों के शोषण, विशेषकर बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अधिकार। शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का अधिकार।
  • महिला अधिकार: समान वेतन, सुरक्षा और समान अवसर के अधिकार।
  • पर्यावरण अधिकार: स्वच्छ हवा, पानी और पर्यावरण में रहने का अधिकार।
  • सूचना का अधिकार: सरकारी कार्यों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार।
  • विकलांग व्यक्तियों के अधिकार: समान अवसर और सुविधाएँ प्राप्त करने का अधिकार।

प्रश्न 4. राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों में अंतर बताइये। हर प्रकार के अधिकार के उदाहरण भी दीजिए।

उत्तर: समाज के लोगों को विभिन्न प्रकार की सुविधाओं और दशाओं की आवश्यकता होती है, जिन्हें वे अधिकार के रूप में प्राप्त कर अपना विकास करना चाहते हैं।

1. राजनीतिक अधिकार: ये अधिकार नागरिकों को कानून के समक्ष बराबरी तथा राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी का हक देते हैं। ये लोकतंत्र की नींव हैं।
उदाहरण:

  1. कानून के समक्ष समानता
  2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  3. मतदान का अधिकार
  4. निर्वाचित होने का अधिकार
  5. संघ बनाने का अधिकार
  6. राजनीतिक दल बनाने या शामिल होने का अधिकार

2. आर्थिक अधिकार: ये वे अधिकार हैं जो मनुष्य की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करते हैं और उसे आर्थिक शोषण से बचाते हैं।
उदाहरण:

  1. कार्य (रोजगार) का अधिकार
  2. उचित मजदूरी का अधिकार
  3. विश्राम एवं अवकाश का अधिकार
  4. भोजन, वस्त्र, आवास जैसी न्यूनतम आवश्यकताओं का अधिकार
  5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियों का अधिकार
  6. चिकित्सा सुविधा का अधिकार

3. सांस्कृतिक अधिकार: ये अधिकार व्यक्ति के मानसिक, नैतिक और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं तथा उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की स्वतंत्रता देते हैं।
उदाहरण:

  1. शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार
  2. अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने व विकसित करने का अधिकार
  3. अपने त्योहार, रीति-रिवाज और वेशभूषा को मनाने/धारण करने का अधिकार
  4. शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार

प्रश्न 5. अधिकार राज्य की सत्ता पर कुछ सीमाएँ लगाते हैं। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।

उत्तर: अधिकार राज्य की सत्ता पर निम्नलिखित प्रकार से सीमाएँ लगाते हैं:

  • दावों के रूप में सीमा: अधिकार राज्य से प्राप्त माँग एवं दावे हैं। इसलिए यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह लोगों के कल्याण के लिए सुविधाएँ उपलब्ध कराए। ऐसा करने में राज्य की शक्ति स्वेच्छाचारी नहीं रह जाती, बल्कि उस पर दायित्व आ जाता है।
  • कानूनी सीमा: राज्य के कानून लोगों के अधिकारों की रक्षा करते हुए ही बनाए जाते हैं। कानून राज्य और नागरिकों के बीच संबंध को नियंत्रित करता है और राज्य को यह निर्देश देता है कि वह नागरिकों के विकास के लिए आवश्यक दशाएँ उपलब्ध कराए।
  • नैतिक सीमा: राज्य का अस्तित्व केवल अपनी सुरक्षा से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण से टिका होता है। नागरिकों के अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की शक्ति का उपयोग उनके जीवन और स्वतंत्रता को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा के लिए किया जाए।

उदाहरण: भारत में 'मौलिक अधिकार' राज्य (केंद्र व राज्य सरकार) पर सीधी सीमा हैं। राज्य समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला कोई कानून नहीं बना सकता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से दबा नहीं सकता। ऐसा करने पर न्यायपालिका उस कानून को रद्द कर सकती है।


अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. अधिकार क्या है? उदाहरण के द्वारा समझाइए।

उत्तर: (मुख्य उत्तर के समान, संक्षिप्त रूप में) अधिकार सामाजिक जीवन की वे आवश्यक परिस्थितियाँ हैं जिनके बिना व्यक्ति अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, शिक्षा का अधिकार व्यक्ति को ज्ञान और कौशल प्रदान करता है, जिससे वह एक बेहतर जीवन और रोजगार प्राप्त कर सकता है, अपनी गरिमा बनाए रख सकता है।

प्रश्न 2. अधिकारों की दावेदारी से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: अधिकारों की दावेदारी का अर्थ है, उन चीजों की माँग करना जो हमारी बेहतरी और विकास के लिए आवश्यक हैं। ये दावे हमारी दक्षता और प्रतिभा विकसित करने में सहायक होते हैं। जैसे, शिक्षा के अधिकार की दावेदारी का मतलब है हर व्यक्ति के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की माँग करना, ताकि वह एक सुयोग्य नागरिक बन सके।

प्रश्न 3. नागरिक स्वतंत्रता का क्या अर्थ है?

उत्तर: नागरिक स्वतंत्रता का अर्थ वे अधिकार हैं जो व्यक्ति को राज्य के अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त रखते हैं। इनमें शामिल हैं: विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया का अधिकार और शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन का अधिकार। ये स्वतंत्रताएँ लोकतांत्रिक प्रणाली की आधारशिला हैं।

प्रश्न 4. भारतीय संविधान में नागरिकों को कौन से मौलिक अधिकार दिए गए हैं?

उत्तर: भारतीय संविधान में नागरिकों को निम्नलिखित छह मौलिक अधिकार दिए गए हैं:

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
  5. शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

प्रश्न 5. मौलिक अधिकार से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: मौलिक अधिकार वे आधारभूत अधिकार हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इनके बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक अपनी उन्नति नहीं कर सकते। जैसे- जीवन, समानता और स्वतंत्रता का अधिकार। इन्हें 'मौलिक' कहा जाता है क्योंकि:

  1. ये संविधान में सुरक्षित हैं और सरकार इन्हें आसानी से नहीं छीन सकती।
  2. ये व्यक्तित्व विकास के लिए अपरिहार्य हैं।
  3. ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (लागू कराए जा सकने वाले) हैं।

प्रश्न 6. अधिकार किस प्रकार राज्य को प्रभावित करते हैं?

उत्तर: अधिकार राज्य को निम्न प्रकार से प्रभावित करते हैं:

  1. अधिकार माँगों के रूप में राज्य की प्रभुसत्ता को सीमित करते हैं।
  2. अधिकार राज्य को कुछ विशेष कार्य करने (जैसे शिक्षा उपलब्ध कराना) या कुछ कार्य न करने (जैसे भेदभाव न करना) का निर्देश देते हैं।
  3. अधिकार राज्य को लोगों की माँगों को पूरा करने के लिए विवश करते हैं।
  4. अधिकार राज्य को लोगों के कल्याण के लिए सुधारात्मक कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 7. भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के नाम बताइए।

उत्तर: (प्रश्न 4 के उत्तर के समान) भारतीय संविधान में वर्तमान में छह मौलिक अधिकार हैं: 1. समानता का अधिकार, 2. स्वतंत्रता का अधिकार, 3. शोषण के विरुद्ध अधिकार, 4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, 5. शिक्षा और संस्कृति का अधिकार, 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

प्रश्न 8. राजनीतिक अधिकार से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: राजनीतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो नागरिकों को राज्य की शासन प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का अवसर देते हैं। ये अधिकार लोकतंत्र की जीवनरेखा हैं। इनमें शामिल हैं: मतदान का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, सरकार की आलोचना करने का अधिकार, राजनीतिक दल बनाने का अधिकार आदि। ये अधिकार नागरिकों को शासन में 'शासक' की भूमिका निभाने का हक देते हैं।

प्रश्न 9. जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के अनुसार मानवीय गरिमा की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इमैनुएल कांट के अनुसार, प्रत्येक मनुष्य में मात्र मनुष्य होने के नाते अंतर्निहित गरिमा होती है। चाहे वह गरीब, अशिक्षित या अनैतिक ही क्यों न हो, उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए। कांट ने अधिकार की एक नैतिक अवधारणा प्रस्तुत की:

  1. स्वर्णिम नियम: हमें दूसरों के साथ वैसा ही आचरण करना चाहिए, जैसा हम अपने लिए दूसरों से अपेक्षा करते हैं।
  2. साधन के रूप में प्रयोग न करना: हमें दूसरों को अपने स्वार्थ की पूर्ति का केवल साधन नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उन्हें स्वयं में एक लक्ष्य के रूप में सम्मान देना चाहिए।
इस विचार के अनुसार, अधिकार मनुष्य की इसी गरिमा की रक्षा के साधन हैं।

प्रश्न 10. प्राकृतिक अधिकार से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: 17वीं-18वीं शताब्दी के दार्शनिकों (जैसे जॉन लॉक, रूसो) का मानना था कि कुछ अधिकार मनुष्य को प्रकृति या ईश्वर द्वारा जन्म से ही प्राप्त होते हैं। कोई भी मानवीय शासक या राज्य इन्हें छीन नहीं सकता। इन्हें प्राकृतिक अधिकार कहा गया। मुख्य रूप से तीन प्राकृतिक अधिकार माने गए:

  1. जीवन का अधिकार
  2. स्वतंत्रता का अधिकार
  3. संपत्ति का अधिकार
इस सिद्धांत का उपयोग तानाशाही शासन का विरोध करने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किया गया। आधुनिक मानवाधिकारों की अवधारणा की नींव इन्हीं विचारों में है।

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