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UP Board class 11 Political Science (9. संविधान-एक जीवंत दस्तावेज) solution PDF

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UP Board class 11 Political Science (9. संविधान-एक जीवंत दस्तावेज) solution

UP Board class 11 Political Science 9. संविधान-एक जीवंत दस्तावेज Hindi Medium Solutions - PDF

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UP Board Solutions for Class 11 Political Science

अध्याय 9: संविधान-एक जीवंत दस्तावेज

मुख्य बिंदु

  • किसी भी अच्छे संविधान में जीवंतता होना अनिवार्य है ताकि उसमें बदलते समय के अनुरूप बदलाव लाया जा सके।
  • भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज है। लागू होने के समय से यह अपने आप में बदलाव लाता रहा है।
  • भारतीय संविधान में मई 2013 तक 98 संशोधन हो चुके हैं।
  • संशोधनों के मामले में भारतीय संविधान लचीलेपन और कठोरता का सम्मिश्रण है।
  • भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गयी है। संविधान संशोधन की प्रक्रिया केवल संसद में ही प्रारंभ हो सकती है।
  • संविधान संशोधन विधेयक के मामले में राष्ट्रपति को पुनर्विचार के लिए विधेयक को संसद के पास भेजने का अधिकार नहीं है।
  • भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से लागू किया गया।
  • अनुच्छेद 74(1) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि मंत्रिपरिषद् की सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।

प्रश्न 01. निम्नलिखित में से कौन-सा वाक्य सही है- संविधान में समय-समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि

  1. परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
  2. किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है।
  3. हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
  4. संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।

उत्तर: (क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।

प्रश्न 02. निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/गलत का निशान लगाएँ।

(क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता।
उत्तर: सही

(ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है।
उत्तर: सही

(ग) न्यायपालिका संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती परंतु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या के द्वारा वह संविधान को काफी हद तक बदल सकती है।
उत्तर: सही

(घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।
उत्तर: गलत (संसद संविधान की मूल संरचना में संशोधन नहीं कर सकती।)

प्रश्न 03. निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं? इस प्रक्रिया में ये कैसे शामिल होते हैं?

(क) मतदाता
उत्तर: मतदाता अप्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करके भूमिका निभाते हैं। ये प्रतिनिधि संसद या विधानसभा में जनता के विचार रखते हैं।

(ख) भारत का राष्ट्रपति
उत्तर: संशोधन विधेयक राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाता है, परंतु राष्ट्रपति इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते। उन्हें केवल अपनी स्वीकृति देनी होती है।

(ग) राज्य की विधान सभाएँ
उत्तर: कुछ विशेष संशोधनों (जैसे संघीय ढाँचे से जुड़े) के लिए आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुसमर्थन आवश्यक होता है।

(घ) संसद
उत्तर: संशोधन प्रक्रिया संसद से ही शुरू होती है। इसे संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3) से पारित होना आवश्यक है।

(ड) राज्यपाल
उत्तर: संविधान संशोधन की प्रक्रिया में राज्यपाल की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है।

(च) न्यायपालिका
उत्तर: न्यायपालिका संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती, लेकिन वह किसी संशोधन की संवैधानिकता की जाँच कर सकती है और यह सुनिश्चित कर सकती है कि वह संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन न करे।

प्रश्न 04. इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे?

  1. यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
  2. यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
  3. इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
  4. संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।

उत्तर: 42वाँ संशोधन (1976) विवादास्पद रहा क्योंकि यह आपातकाल की पृष्ठभूमि में लाया गया था। इसके द्वारा संसद की शक्तियाँ बढ़ाने, न्यायपालिका की शक्ति घटाने और मौलिक अधिकारों को सीमित करने जैसे व्यापक परिवर्तन किए गए थे। बाद में 43वें और 44वें संशोधनों द्वारा इनमें से अधिकांश परिवर्तनों को निरस्त कर दिया गया।

प्रश्न 05. निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता-

  1. संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है।
  2. खंडन-मंडन/बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं।
  3. कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज्यादा महत्त्व दिया गया है। कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्यवस्था की गई है।
  4. नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
  5. न्यायपालिका केवल किसी कानून की संवैधानिकता के बारे में फैसला दे सकती है। वह ऐसे कानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।

उत्तर: (घ) "नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।" यह कथन सही व्याख्या नहीं करता क्योंकि संविधान के अनुसार, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों की साझा जिम्मेदारी है।

प्रश्न 06. बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिन्हित करें। गलत वाक्य को सही करें।

  1. संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है।
  2. बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है।
  3. न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है।
  4. यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है।
  5. इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं। सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।

उत्तर: उपरोक्त सभी कथन सही हैं।

प्रश्न 07. सन् 2000-2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर आप निम्नलिखित में से कौन-सा निष्कर्ष निकालेंगे-

  1. इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
  2. इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
  3. कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
  4. इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था।
  5. ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।

उत्तर: (ङ) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी। (इस अवधि में दल-बदल विरोधी कानून, स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को मजबूत करने जैसे संशोधन हुए जिन पर व्यापक सहमति थी।)

प्रश्न 08. संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।

उत्तर: संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। इसमें आसानी से संशोधन न हो इसलिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यह दो शर्तों पर आधारित है:

  1. संशोधन का समर्थन करने वाले सदस्यों की संख्या सदन के कुल सदस्यों के बहुमत (आधे से अधिक) से कम नहीं होनी चाहिए।
  2. साथ ही, मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत का भी समर्थन आवश्यक है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संशोधन व्यापक सहमति से हो, न कि किसी एक दल की इच्छा से। उदाहरण के लिए, लोकसभा में 545 सदस्य हैं, तो किसी भी संशोधन के लिए कम से कम 273 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है।

प्रश्न 09. भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद की अलग-अलग व्याख्याओं का परिणाम रहे हैं। उदाहरण सहित व्याख्या करें।

उत्तर: भारतीय संविधान में अनेक संशोधन न्यायपालिका और संसद के बीच व्याख्या के मतभेद के कारण हुए हैं। जब न्यायपालिका संविधान के किसी प्रावधान की एक खास व्याख्या करती है और संसद उससे सहमत नहीं होती, तो वह संशोधन के माध्यम से अपनी व्याख्या को स्थापित करती है।

उदाहरण:

  1. संपत्ति के अधिकार से संबंधित संशोधन: न्यायपालिका ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। सरकार द्वारा जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार के कानूनों को चुनौती दी गई। इन न्यायिक निर्णयों के जवाब में संसद ने प्रथम, चौथे, सत्रहवें और चौवालीसवें संशोधन किए ताकि भूमि सुधार कानूनों को मजबूती मिल सके और अंततः संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया।
  2. मूल संरचना सिद्धांत: केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत दिया कि संसद संविधान की मूल संरचना को बदल नहीं सकती। इसने संसद की संशोधन शक्ति पर सीमा लगा दी। इसके बाद के संशोधनों में इस सिद्धांत को ध्यान में रखा जाने लगा।
यह टकराव लोकतंत्र का एक स्वस्थ लक्षण है, जहाँ विभिन्न संस्थाएँ संविधान की अपनी-अपनी व्याख्या करके शक्ति संतुलन बनाए रखती हैं।

प्रश्न 010. अगर संशोधन की शक्ति जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होती है तो न्यायपालिका को संशोधन की वैधता पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए। क्या आप इस बात से सहमत हैं? व्याख्या करें।

उत्तर: नहीं, मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ। भारत में संवैधानिक सर्वोच्चता और न्यायिक पुनरावलोकन के सिद्धांत लागू हैं। जनता के प्रतिनिधियों (संसद) के पास संशोधन की शक्ति है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। संविधान स्वयं ही सर्वोच्च कानून है।

न्यायपालिका का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि संसद द्वारा किया गया कोई भी संशोधन संविधान की मूल भावना और बुनियादी ढाँचे का उल्लंघन न करे। यह जाँच संविधान के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका का महत्वपूर्ण कार्य है। यदि न्यायपालिका को यह अधिकार नहीं होता, तो संसद के पास संविधान के मूल स्वरूप को ही बदल देने की असीमित शक्ति हो जाती, जो लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए, संशोधन पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार न्यायपालिका के पास होना आवश्यक है।

अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

प्रश्न 01. भारतीय संविधान में किस प्रकार से संशोधन किया जा सकता है?

उत्तर: भारतीय संविधान में तीन तरीकों से संशोधन किया जा सकता है:

  1. साधारण बहुमत द्वारा: कुछ प्रावधान (जैसे नए राज्यों का गठन, राज्यसभा में सीटों की संख्या) संसद के साधारण बहुमत से बदले जा सकते हैं।
  2. विशेष बहुमत द्वारा: अधिकांश संशोधनों के लिए संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3) की आवश्यकता होती है।
  3. विशेष बहुमत एवं राज्यों की स्वीकृति द्वारा: संघीय ढाँचे से जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधानों (जैसे राष्ट्रपति का चुनाव, न्यायपालिका, राज्यों की सीमाएँ) में संशोधन के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ आधे राज्यों की विधानसभाओं का अनुसमर्थन आवश्यक है।

प्रश्न 05. संविधान को एक जीवंत दस्तावेज़ माना गया है। इसका क्या अर्थ है?

उत्तर: संविधान को जीवंत दस्तावेज़ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एक जीते-जागते प्राणी की तरह समय के साथ बदलता और विकसित होता रहता है। यह स्थिर नहीं है। न्यायपालिका की व्याख्याओं और संसद के संशोधनों के माध्यम से यह नए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश के अनुरूप ढल जाता है। उदाहरण के लिए, मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष करना (61वाँ संशोधन), या पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देना (73वाँ संशोधन) इसकी जीवंतता के प्रमाण हैं।

प्रश्न 011. भारतीय संविधान की मूल संरचना तथा उसके विकास का वर्णन कीजिए।

उत्तर: 'मूल संरचना का सिद्धांत' भारतीय संविधान के विकास की सबसे महत्वपूर्ण धारणा है। इसकी स्थापना सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के ऐतिहासिक मामले में की थी।

इस सिद्धांत के अनुसार:

  1. संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है।
  2. संसद संविधान की मूल संरचना या आधारभूत ढाँचे को नष्ट या बदल नहीं सकती।
  3. यह तय करना कि कोई संशोधन मूल संरचना का उल्लंघन करता है या नहीं, न्यायपालिका का अधिकार क्षेत्र है।
मूल संरचना में क्या शामिल है? न्यायपालिका ने समय-समय पर निम्नलिखित को मूल संरचना का हिस्सा माना है: संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र, संप्रभुता, गणराज्य, धर्मनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों का मूल स्वरूप, संघीय ढाँचा, शक्तियों का पृथक्करण आदि।

इस सिद्धांत ने संविधान के विकास को इस प्रकार निर्देशित किया है कि संशोधनों की एक सीमा रही है और संविधान के मूल आदर्श सुरक्षित रहे हैं।

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