UP Board Solutions: जीव विज्ञान कक्षा 12
अध्याय 17: जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग
(Biotechnology and its Applications)
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. बीटी (Bt) आविष के रवे कुछ जीवाणुओं द्वारा बनाए जाते हैं, लेकिन जीवाणु स्वयं को नहीं मारते हैं। क्यों?
(क) जीवाणु आविष के प्रति प्रतिरोधी हैं।
(ख) आविष अपरिपक्व है।
(ग) आविष निष्क्रिय होता है।
(घ) आविष जीवाणु की विशेष थैली में मिलता है।
उत्तर: (ग) आविष (प्रोटोक्सिन) निष्क्रिय होता है। जीवाणु के अंदर यह प्रोटीन एक निष्क्रिय रवे के रूप में संग्रहित रहता है, जो केवल कीटों की आँत की विशिष्ट क्षारीय परिस्थितियों में सक्रिय विष (टॉक्सिन) में बदलता है।
प्रश्न 2. पारजीनी जीवाणु क्या है? किसी एक उदाहरण द्वारा वर्णन कीजिए।
उत्तर: जब किसी अन्य जीव (जैसे मनुष्य, पौधे) की इच्छित लक्षण वाली जीन (gene) को जीवाणु के जीनोम में प्रविष्ट कराया जाता है, तो इस प्रकार बने विदेशी जीन युक्त जीवाणु को पारजीनी जीवाणु (Transgenic Bacteria) कहते हैं।
उदाहरण: मानव इन्सुलिन का उत्पादन। मानव इन्सुलिन दो पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं (A और B) से बना होता है। इन श्रृंखलाओं के अनुरूप डीएनए अनुक्रमों को तैयार कर ई. कोलाई जीवाणु के प्लाज्मिड डीएनए में प्रवेश कराया गया। इस पारजीनी जीवाणु ने इन्सुलिन श्रृंखलाओं का उत्पादन किया, जिन्हें बाद में एकत्रित कर वास्तविक इन्सुलिन बनाया गया।
प्रश्न 3. आनुवंशिक रूपान्तरित फसलों के उत्पादन के लाभ व हानि का तुलनात्मक विवरण दीजिए।
उत्तर:
आनुवंशिक रूपान्तरित (GM) फसलों के लाभ एवं हानि
| लाभ (Advantages) |
हानि (Disadvantages) |
- पीड़क प्रतिरोधकता: जैसे Bt कपास, Bt बैंगन।
- खनिज उपयोग क्षमता में वृद्धि।
- अजैविक प्रतिबल सहिष्णुता: सूखा, लवण, ठंड सहने की क्षमता।
- पोषण मूल्य में वृद्धि: जैसे विटामिन-ए युक्त गोल्डन राइस।
- रासायनिक कीटनाशकों पर कम निर्भरता, अतः पर्यावरण प्रदूषण में कमी।
- शेल्फ लाइफ बढ़ाना: देर से पकने वाले टमाटर जैसी फसलें।
- औद्योगिक उपयोग: वसा, ईंधन, दवाओं के वैकल्पिक स्रोत।
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- एलर्जी की संभावना: नई प्रोटीन एलर्जी पैदा कर सकती हैं।
- बीजों की लागत: कुछ GM बीज बाँझ होते हैं, किसानों को हर बार नए महँगे बीज खरीदने पड़ते हैं।
- दीर्घकालिक प्रभाव अज्ञात: मनुष्य के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन अपर्याप्त है। आँत के लाभकारी जीवाणु प्रभावित हो सकते हैं।
- नैतिक चिंताएँ: प्रकृति में मनुष्य का हस्तक्षेप उचित है या नहीं।
- जैव विविधता पर प्रभाव: फसल पर निर्भर अन्य जीवों पर प्रतिकूल असर।
- सुपर-पीड़क उत्पन्न होना: कीट प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर सकते हैं, जिससे नए कीटनाशकों की आवश्यकता होगी।
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प्रश्न 4. क्राई प्रोटीन्स क्या हैं? उस जीव का नाम बताइए जो इसे पैदा करता है। मनुष्य इस प्रोटीन को अपने फायदे के लिए कैसे उपयोग में लाता है?
उत्तर: क्राई प्रोटीन्स (Cry Proteins) विषाक्त प्रोटीन का एक समूह है जो विशिष्ट कीटों को मारने में सक्षम है।
- उत्पादक जीव: बैसीलस थ्यूरिनजिएन्सिस (Bacillus thuringiensis) नामक जीवाणु।
- यह जीवाणु अपने बीजाणुओं में इन प्रोटीनों को निष्क्रिय रवों (क्रिस्टल) के रूप में जमा करता है।
- कीट द्वारा खाए जाने पर, कीट की आँत की क्षारीय परिस्थितियाँ इन रवों को सक्रिय विष में बदल देती हैं, जिससे कीट की मृत्यु हो जाती है।
मानव द्वारा उपयोग:
- Bt फसलों का निर्माण: क्राई प्रोटीन को कूटबद्ध करने वाली जीन (जैसे cryIAc, cryIIAb) को कपास, मक्का जैसी फसलों में डालकर पीड़क-प्रतिरोधी Bt फसलें विकसित की गई हैं।
- जैविक कीटनाशक: बैसीलस थ्यूरिनजिएन्सिस के बीजाणुओं को सीधे खेतों में जैव-कीटनाशक के रूप में छिड़काव किया जाता है।
प्रश्न 5. जीन चिकित्सा क्या है? एडीनोसीन डिएमीनेज (ए.डी.ए.) की कमी का उदाहरण देते हुए इसका सचित्र वर्णन कीजिए।
उत्तर: जीन चिकित्सा (Gene Therapy) एक ऐसी तकनीक है जिसमें रोगी की कोशिकाओं में एक सामान्य, कार्यशील जीन को प्रविष्ट कराकर आनुवंशिक दोष के कारण होने वाले रोग का उपचार किया जाता है।
एडीनोसीन डिएमीनेज (ADA) की कमी का उदाहरण:
- ADA एंजाइम की कमी से SCID (Severe Combined Immuno Deficiency) नामक गंभीर प्रतिरक्षा तंत्र विकार होता है।
- 1990 में, इस रोग से पीड़ित एक 4 वर्षीय बच्ची में पहली सफल जीन चिकित्सा की गई।
जीन चिकित्सा की प्रक्रिया (ADA की कमी के लिए)
(आरेख: रोगी के लसीकाणु में रेट्रोवाइरस के माध्यम से सामान्य ADA जीन का स्थानांतरण)
चरणबद्ध प्रक्रिया:
- रोगी के रक्त से लसीकाणु (लिम्फोसाइट्स) निकाले जाते हैं और प्रयोगशाला में संवर्धित किए जाते हैं।
- सामान्य ADA जीन को एक रेट्रोवाइरस वेक्टर में डाला जाता है।
- इस रेट्रोवाइरस का उपयोग कर संवर्धित लसीकाणुओं को संक्रमित किया जाता है। वायरस अपना (ADA जीन सहित) डीएनए कोशिका के जीनोम में सम्मिलित कर देता है।
- इन "दुरुस्त" कोशिकाओं को रोगी के शरीर में वापस इंजेक्ट कर दिया जाता है।
- ये कोशिकाएँ ADA एंजाइम बनाने लगती हैं, जिससे प्रतिरक्षा तंत्र कार्य करने लगता है।
- चुनौती: लसीकाणुओं का जीवनकाल सीमित होता है, इसलिए उपचार को समय-समय पर दोहराना पड़ता है। स्थायी उपचार के लिए भ्रूणीय अवस्था में या अस्थि मज्जा की स्टेम कोशिकाओं में जीन स्थानांतरण आवश्यक है।
प्रश्न 6. ई. कोलाई जैसे जीवाणु में मानव जीन की क्लोनिंग एवं अभिव्यक्ति के प्रायोगिक चरणों का आरेखीय निरूपण प्रस्तुत कीजिए।
ई. कोलाई में मानव जीन की क्लोनिंग
(आरेख: प्रतिबंधन एंजाइम व डीएनए लाइगेज की सहायता से प्लाज्मिड वेक्टर में मानव जीन का सम्मिलन)
मुख्य चरण:
- जीन पृथक्करण: मानव कोशिका से वांछित जीन (जैसे इन्सुलिन जीन) को प्रतिबंधन एंजाइम की सहायता से काटकर अलग किया जाता है।
- वेक्टर तैयार करना: ई. कोलाई के प्लाज्मिड को उसी प्रतिबंधन एंजाइम से काटा जाता है।
- रीकॉम्बिनेंट डीएनए निर्माण: मानव जीन को प्लाज्मिड के खुले सिरों से जोड़ने के लिए डीएनए लाइगेज एंजाइम का उपयोग किया जाता है।
- परिवर्तन (Transformation): इस रीकॉम्बिनेंट प्लाज्मिड को ई. कोलाई जीवाणु में प्रवेश कराया जाता है।
- चयन व संवर्धन: एंटीबायोटिक प्रतिरोधी मार्कर की सहायता से उन जीवाणुओं का चयन किया जाता है जिनमें रीकॉम्बिनेंट प्लाज्मिड है।
- अभिव्यक्ति व उत्पादन: चयनित जीवाणु संवर्धन में बढ़ते हैं और मानव जीन की अभिव्यक्ति के फलस्वरूप वांछित प्रोटीन (जैसे इन्सुलिन) का उत्पादन करते हैं।
प्रश्न 7. तेल के रसायनशास्त्र तथा आर.डी.एन.ए. तकनीक के आधार पर बीजों से तेल (हाइड्रोकार्बन) हटाने की कोई एक विधि सुझाइए।
उत्तर: तेल (ट्राइग्लिसराइड) ग्लिसरॉल और वसीय अम्लों से बना होता है। चूँकि जीन सीधे तेल को कोड नहीं करते, बल्कि उसके संश्लेषण में शामिल एंजाइमों को कोड करते हैं, इसलिए आर.डी.एन.ए. तकनीक द्वारा तेल हटाने के लिए निम्न विधि अपनाई जा सकती है:
जीन निष्क्रियीकरण (Gene Silencing) या जीन टारगेटिंग:
- वसीय अम्लों के संश्लेषण के लिए आवश्यक किसी विशिष्ट एंजाइम (जैसे डेसैचुरेज) को कोड करने वाली जीन की पहचान की जाती है।
- आर.डी.एन.ए. तकनीक द्वारा एक ऐसा डीएनए अनुक्रम तैयार किया जाता है जो इस जीन के mRNA से जुड़कर उसकी अभिव्यक्ति को रोक दे (RNA interference)।
- इस डीएनए अनुक्रम को पौधे के जीनोम में प्रविष्ट कराया जाता है।
- परिणामस्वरूप, वह विशिष्ट एंजाइम नहीं बनेगा, वसीय अम्ल का संश्लेषण रुक जाएगा और अंततः बीज में तेल का निर्माण नहीं होगा या कम होगा।
प्रश्न 8. गोल्डन राइस (गोल्डन धान) क्या है?
उत्तर: गोल्डन राइस आनुवंशिक इंजीनियरिंग द्वारा विकसित चावल (Oryza sativa) की एक किस्म है।
- इसमें बीटा-कैरोटीन (β-carotene) की उपस्थिति के कारण दाने हल्के पीले/सुनहरे रंग के होते हैं। बीटा-कैरोटीन शरीर में जाकर विटामिन-ए में परिवर्तित हो जाता है।
- इसे विकसित करने का मुख्य उद्देश्य विटामिन-ए की कमी (जिससे अंधापन व रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है) को दूर करना था।
- बाद में, और अधिक बीटा-कैरोटीन उत्पादन करने वाली गोल्डन राइस 2 किस्म विकसित की गई।
- पर्यावरणविदों व कुछ समूहों द्वारा इसके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है।
प्रश्न 9. क्या हमारे रुधिर में प्रोटिएजेज तथा न्यूक्लिएजेज हैं?
उत्तर: हाँ, हमारे रक्त में प्रोटिएजेज और न्यूक्लिएजेज दोनों प्रकार के एंजाइम पाए जाते हैं।
- प्रोटिएजेज (Proteases): ये प्रोटीन को तोड़ने वाले एंजाइम हैं। रक्त में ये अक्सर निष्क्रिय रूप (जाइमोजन) में मौजूद रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सक्रिय होते हैं।
उदाहरण: प्रोथ्रॉम्बिन (निष्क्रिय), जो सक्रिय थ्रॉम्बिन में बदलकर रक्त के थक्के बनाने में मदद करता है।
- न्यूक्लिएजेज (Nucleases): ये न्यूक्लिक अम्ल (DNA/RNA) को तोड़ने वाले एंजाइम हैं। रक्त में इनकी मात्रा कम होती है, लेकिन ये कोशिका मृत्यु से मुक्त हुए न्यूक्लिक अम्लों के अपघटन में भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न 10. मुखीय सक्रिय औषधीय प्रोटीन को किस प्रकार बनाएँगे? इस कार्य में आने वाली मुख्य समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर: मुख द्वारा ली जाने वाली प्रोटीन औषधि (जैसे इन्सुलिन) बनाने में निम्नलिखित मुख्य समस्याएँ आती हैं:
- पाचन तंत्र में विघटन: प्रोटीन, आहारनाल में मौजूद प्रोटिएज एंजाइमों (जैसे पेप्सिन, ट्रिप्सिन) द्वारा पचाकर छोटे पेप्टाइड्स या अमीनो अम्लों में तोड़ दिए जाते हैं, जिससे उनकी औषधीय क्रिया समाप्त हो जाती है।
- आमाशय की अम्लीयता: पेट का तेजाब (HCl) प्रोटीन की संरचना को नष्ट कर सकता है (विकृतिकरण)।
- अवशोषण की समस्या: प्रोटीन के बड़े अणु आँत की दीवार से सीधे अवशोषित नहीं हो पाते।
संभावित समाधान (औषधि बनाने के तरीके):
- सुरक्षात्मक आवरण (कोटिंग): प्रोटीन को एक ऐसी कोटिंग से ढंकना जो उसे अम्ल व एंजाइमों से बचाए और केवल आँत में पहुँचकर ही घुले।
- नैनोकैप्सूल/लिपोसोम: प्रोटीन को सूक्ष्म लिपिड या पॉलिमर के कैप्सूल में बंद कर देना, जो अवशोषण में सहायक हों।
- एंजाइम अवरोधक: गोली के साथ हल्के प्रोटिएज अवरोधक देना ताकि प्रोटीन का पाचन कम हो।
- वैकल्पिक मार्ग: प्रोटीन की संरचना में ऐसे बदलाव करना कि वह पाचन तंत्र से बच सके या अवशोषण योग्य छोटे, सक्रिय टुकड़ों में टूटे।
--- अध्याय समाप्त ---