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UP Board Class 12 Biology (13. जीव और समष्टियाँ) solution PDF

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UP Board Class 12 Biology (13. जीव और समष्टियाँ) solution

UP Board Class 12 Biology 13. जीव और समष्टियाँ Hindi Medium Solutions - PDF

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UP Board Solutions for Class 12 Biology

अध्याय 13: जीव और समष्टियाँ (Organism and Populations)

पाठ्यपुस्तक के अभ्यास के अन्तर्गत दिए गए प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1. शीत निष्क्रियता (Hibernation) और उपरति (Diapause) में क्या भिन्न है?

उत्तर: शीत निष्क्रियता कम ताप से बचने के लिए कुछ जीवों द्वारा अपनायी जाने वाली निम्न उपापचयी दर की असक्रिय शीत निद्रा है। शीत निष्क्रियता द्वारा भालू, मेढक आदि जैसे पृष्ठवंशी प्राणी जीवित बने रहते हैं।

प्रतिकूल परिस्थिति (कम ताप या अधिक ताप/जल की कमी) जैसी समस्याओं से बचाव के लिए झील और तालाब के अनेक प्राणी प्लवक प्रजातियाँ तथा कुछ कीट (अपृष्ठवंशी) निलम्बित परिवर्द्धन की अवस्था में आ जाती हैं, इस स्थिति को उपरति कहते हैं। इसके द्वारा ये सूक्ष्म जन्तु प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करते हैं।

प्रश्न 2. अगर समुद्री मछली को अलवण जल (Freshwater) की जलजीवशाला में रखा जाए तो वह मछली जीवित रह पाएगी? क्यों और क्यों नहीं?

उत्तर: समुद्री उपास्थि मछली की कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता समुद्री जल की सान्द्रता के समान (आइसोटोनिक) होती है। जब समुद्री मछली को अलवणीय जल की जलजीवशाला में रखते हैं तो इन्हें परासरणी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कोशिकाएँ जलजीवशाला से अत्यधिक मात्रा में जल का अन्तःपरासरण करने लगती हैं। इसके कारण उनके शरीर द्रव्य तनु हो जाते हैं और उनकी आतंरिक पर्यावरण बनाए रखने की क्षमता समाप्त हो जाती है, अतः मछली मर जाती है। ये स्टेनोहेलाइन (सीमित लवणता सहने वाले) जीव हैं जो जलीय सान्द्रता के एक सीमित परास को ही सहन करने की क्षमता रखते हैं।

अस्थिल समुद्री मछलियाँ लगातार समुद्री जल पीकर उससे शरीर में अधिक मात्रा में पहुँचे लवणों को शरीर से निकालती रहती हैं। इस प्रकार की मछली पर भी स्वच्छ जल में रखने का घातक प्रभाव होगा। अतः समुद्री मछली अलवणीय जल में अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाएगी।

प्रश्न 3. लक्षणप्ररूपी (फीनोटाइपिक) अनुकूलन की परिभाषा दीजिए। एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: प्रेक्षणीय लक्षण लक्षणप्ररूपी (फीनोटाइपिक) लक्षण कहलाते हैं। अतः किसी जीव के वह आकारिकीय, शारीरिक, कार्यिकीय या व्यावहारिक लक्षण जो उसे किसी पर्यावरण विशेष में रहने व सफल प्रजनन में सक्षम बनाते हैं, लक्षणप्ररूपी अनुकूलन कहलाते हैं। उदाहरण: मछलियों का नौकाकार शरीर, पक्षियों के पंख।

प्रश्न 4. अधिकतर जीवधारी 45°C से अधिक तापमान पर जीवित नहीं रह सकते। कुछ सूक्ष्मजीव (माइक्रोब) ऐसे आवास में जहाँ तापमान 100°C अधिक है, कैसे जीवित रहते हैं?

उत्तर: तापमान एन्जाइम्स की क्रियाशीलता को प्रभावित करता है। सामान्यतः जीवधारी 45°C से अधिक तापमान सहन नहीं कर पाते क्योंकि एन्जाइम्स का विकृतीकरण हो जाता है। लेकिन कुछ जीव तापमानों के व्यापक परास (चरम) को सहन करने में समर्थ होते हैं। जैसे कुछ जीवाणु और शैवाल गर्म जल स्रोतों में जीवित रहते हैं, ऐसे जीवधारियों को पृथुतापी (Thermophiles) कहते हैं। इन जीवों में ऊष्मास्थिर एन्जाइम्स पाए जाते हैं जिन पर उच्च ताप का प्रभाव नहीं पड़ता। इनकी कोशिका कला के शाखित श्रृंखला लिपिड व कोशिका भित्ति भी अधिक ताप सहने के लिए अनुकूलित होते हैं।

प्रश्न 5. उन गुणों को बताइए जो व्यष्टियों में तो नहीं पर समष्टियों में होते हैं।

उत्तर: समष्टि में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो व्यष्टि में नहीं पाए जाते। ये हैं:

  1. जन्मदर एवं मृत्यु दर: व्यष्टि जन्म लेता है और मरता है, लेकिन समष्टि में इन्हें प्रति व्यष्टि दर के रूप में मापा जाता है।
  2. लिंग अनुपात: समष्टि में नर एवं मादा का अनुपात होता है, जो व्यष्टि में नहीं होता।
  3. आयु संरचना एवं आयु पिरामिड: समष्टि विभिन्न आयु वर्ग के व्यष्टियों से मिलकर बनती है, जिसे आयु पिरामिड द्वारा दर्शाया जाता है।
  4. समष्टि घनत्व एवं आकार: समष्टि का आकार (घनत्व) समय के साथ बदलता रहता है, जो व्यष्टि का गुण नहीं है।

प्रश्न 6. अगर चरघातांकी रूप से (एक्स्पोनेन्शियली) बढ़ रही समष्टि 3 वर्ष में दोगुने साइज की हो जाती है तो समष्टि की वृद्धि की इन्ट्रिन्जिक दर (r) क्या है?

उत्तर: माना समष्टि का प्रारंभिक आकार N0 है। 3 वर्ष बाद यह दोगुनी हो जाती है, अर्थात Nt = 2N0
चरघातांकी वृद्धि के समीकरण Nt = N0ert के अनुसार:
2N0 = N0er×3
2 = e3r
ln(2) = 3r
r = ln(2)/3 ≈ 0.693/3 ≈ 0.231 प्रति व्यष्टि प्रति वर्ष

प्रश्न 7. पादपों में शाकाहारिता (हर्बीवोरी) के विरुद्ध रक्षा करने की महत्त्वपूर्ण विधियाँ बताइए।

उत्तर: पौधे शाकाहारियों से अपनी रक्षा के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनाते हैं:

  1. आकारिकीय अनुकूलन: काँटे (बबूल, कैक्टस), सघन रोम, कठोर व मोटी बाह्य त्वचा।
  2. रासायनिक अनुकूलन: विषैले रसायनों का निर्माण, जैसे कैलोट्रोपिस में ग्लाइकोसाइड, तम्बाकू में निकोटीन, कॉफी में कैफीन। ये रसायन शाकाहारी को बीमार कर देते हैं या उसकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं।

प्रश्न 8. आर्किड पौधा, आम के पेड़ की शाखा पर उग रहा है। आर्किड और आम के पेड़ के बीच पारस्परिक क्रिया का वर्णन आप कैसे करेंगे?

उत्तर: आर्किड तथा आम के वृक्ष के मध्य सम्बन्ध सहभोजिता (Commensalism) का है। इसमें आर्किड (अधिपादप) को आम के वृक्ष की शाखा पर सहारा मिलता है, जिससे उसे लाभ होता है। आम के वृक्ष को इस संबंध से न तो लाभ होता है और न ही हानि। आर्किड अपनी आर्द्रताग्राही जड़ों से वायुमंडल से सीधे नमी प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न 9. कीटपीड़कों (पेस्ट/इंसेक्ट) के प्रबन्ध के लिए जैव नियन्त्रण विधि के पीछे क्या पारिस्थितिक सिद्धान्त है?

उत्तर: जैव नियंत्रण विधि परभक्षण या परजीविता के पारिस्थितिक सिद्धांत पर आधारित है। इसमें पीड़क की प्राकृतिक शत्रु (परभक्षी या परजीवी) की समष्टि को बढ़ाकर पीड़क समष्टि को नियंत्रित किया जाता है। उदाहरण:

  • ऑस्ट्रेलिया में नागफनी को नियंत्रित करने के लिए कैक्टोब्लास्टिस नामक शलभ (पतंगे) का उपयोग।
  • एफिड के नियंत्रण के लिए लेडी बर्ड (भिंडी) का प्रयोग।
  • कीटों के नियंत्रण के लिए बैक्युलोवाइरस जैसे रोगजनकों का उपयोग।

प्रश्न 10. निम्नलिखित के बीच अन्तर कीजिए--
(क) शीत निष्क्रियता और ग्रीष्म निष्क्रियता (हाइबरनेशन एवं एस्टीवेशन)
(ख) बाह्योष्मी और आन्तरोष्मी (एक्टोथर्मिक एण्ड एण्डोथर्मिक)।

उत्तर: (क) शीत निष्क्रियता और ग्रीष्म निष्क्रियता में अन्तर

शीत निष्क्रियता (Hibernation) ग्रीष्म निष्क्रियता (Aestivation)
शीत ऋतु के कुप्रभाव से बचने के लिए कुछ समय के लिए सुप्तावस्था में चले जाना। गर्मी या शुष्कता के कुप्रभाव से बचने के लिए कुछ अवधि के लिए सुप्तावस्था में चले जाना।
उदाहरण: भालू, मेढक, छिपकली। उदाहरण: कुछ मछलियाँ, मेढक (कीचड़ में दबकर)।

(ख) बाह्योष्मी और आन्तरोष्मी में अन्तर
बाह्योष्मी (Ectothermic) आन्तरोष्मी (Endothermic)
शरीर का ताप वातावरण के अनुसार बदलता रहता है। पर्यावरण से प्राप्त ऊष्मा पर निर्भर रहते हैं। शरीर का ताप स्थिर रहता है। शरीर की उपापचय क्रियाओं द्वारा ऊष्मा उत्पन्न कर ताप नियंत्रित करते हैं।
ये प्रायः अनुकूलक (Conformers) होते हैं। ये नियंत्रक (Regulators) होते हैं।
उदाहरण: मछली, उभयचर, सरीसृप। उदाहरण: पक्षी, स्तनधारी।

प्रश्न 11. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए--
(क) मरुस्थल पादपों और प्राणियों के अनुकूलन
(ख) जल की कमी के प्रति पादपों का अनुकूलन
(ग) प्राणियों में व्यावहारिक अनुकूलन
(घ) पादपों के लिए प्रकाश का महत्त्व
(ङ) तापमान और पानी की कमी का प्रभाव तथा प्राणियों का अनुकूलन।

उत्तर:
(क) मरुस्थल पादपों और प्राणियों के अनुकूलन:

  • पादप: जल संरक्षण हेतु काँटों में रूपांतरित पत्तियाँ (कैक्टस), मांसल तना, गहरी जड़ें, रन्ध्र गड्ढों में, दिन में रन्ध्र बंद करके प्रकाश संश्लेषण (CAM पथ)।
  • प्राणी: पसीना कम, सान्द्र मूत्र उत्सर्जन, रात्रिचर जीवन (दिन में बिलों में छिपना), वसा के ऑक्सीकरण से जल प्राप्ति (ऊँट, कंगारू चूहा)।
(ख) जल की कमी के प्रति पादपों का अनुकूलन: उपरोक्त (क) में दिए गए पादपों के अनुकूलन जल की कमी के प्रति ही हैं, जैसे जड़ तंत्र का विकसित होना, पत्तियों का रूपांतरण, मोटी क्यूटिकल, उच्च परासरणी सान्द्रता। (ग) प्राणियों में व्यावहारिक अनुकूलन:
  • प्रवास (Migration): प्रतिकूल मौसम से बचने के लिए दूसरे स्थान पर जाना, जैसे प्रवासी पक्षी।
  • शीत/ग्रीष्म निष्क्रियता: सुप्तावस्था में चले जाना।
  • समय विशेष पर सक्रियता: ठंड में धूप सेंककर शरीर गर्म करना।
(घ) पादपों के लिए प्रकाश का महत्त्व: प्रकाश पादपों के लिए निम्नलिखित कार्यों हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है:
  1. प्रकाश संश्लेषण (भोजन निर्माण)
  2. वाष्पोत्सर्जन दर को प्रभावित करना
  3. पुष्पन एवं फलन को प्रेरित करना
  4. बीज अंकुरण
  5. पर्णहरित (क्लोरोफिल) का संश्लेषण
  6. पादप गतियाँ (फोटोट्रॉपिज्म)
(ङ) तापमान और पानी की कमी का प्रभाव तथा प्राणियों का अनुकूलन:
  • निम्न ताप के प्रति: शरीर पर मोटी वसा की परत (इन्सुलेशन), छोटे कान (एलन का नियम), शीत निष्क्रियता, बड़ा आकार (बर्गमैन का नियम)।
  • जल की कमी के प्रति: उपरोक्त (क) में दिए गए मरुस्थलीय प्राणियों के अनुकूलन, जैसे सान्द्र मूत्र, पसीने की कमी, रात्रिचर जीवन।

प्रश्न 12. अजैवीय (Abiotic) पर्यावरणीय कारकों की सूची बनाइए।

उत्तर: अजैवीय कारकों को तीन मुख्य समूहों में बाँटा जा सकता है:

  1. जलवायवीय कारक: ताप, जल, प्रकाश, वायुगति, वर्षा, आर्द्रता, वायुमंडलीय गैसें।
  2. मृदीय कारक: मृदा की भौतिक संरचना, खनिज, कार्बनिक पदार्थ, मृदा जल, मृदा वायु।
  3. स्थलाकृतिक कारक: स्थान की ऊँचाई, भूमि का ढाल, पर्वतों की दिशा।

प्रश्न 13. निम्नलिखित का उदाहरण दीजिए---
(क) आतपोद्भिद (हेलियोफाइट)
(ख) छायोद्भिद (सियोफाइट)
(ग) सजीवप्रजक (विविपेरस) अंकुरण वाले पादप
(घ) आन्तरोष्मी (एण्डोथर्मिक) प्राणी
(ङ) बाह्योष्मी (एक्टोथर्मिक) प्राणी
(च) नितलस्थ (बेंथिक) जोन का जीव।

उत्तर:

  1. आतपोद्भिद: सूरजमुखी, टाइफा (Typha)।
  2. छायोद्भिद: क्रोटोन, मनी प्लांट।
  3. सजीवप्रजक पादप: राइजोफोरा (मैंग्रोव)।
  4. आन्तरोष्मी प्राणी: मनुष्य, गाय, गौरैया।
  5. बाह्योष्मी प्राणी: मेढक, छिपकली, साँप।
  6. नितलस्थ जीव: स्टारफिश, स्पंज, कोरल।

प्रश्न 14. समष्टि (Population) और समुदाय (Community) की परिभाषा दीजिए।

उत्तर:

  • समष्टि: किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में एक निश्चित समय पर रहने वाले एक ही प्रजाति के जीवों के समूह को समष्टि कहते हैं। ये जीव समान संसाधनों का उपयोग करते हैं और समान जीन पूल साझा करते हैं।
  • समुदाय: किसी निश्चित क्षेत्र में एक साथ रहने वाली विभिन्न प्रजातियों की सभी समष्टियों के समूह को जैविक समुदाय कहते हैं। इन समष्टियों के बीच पारस्परिक क्रियाएँ होती हैं।

प्रश्न 15. निम्नलिखित की परिभाषा दीजिए और प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए--
(क) सहभोजिता (Commensalism)
(ख) परजीविता (Parasitism)
(ग) छद्मावरण (Camouflage)
(घ) सहोपकारिता (Mutualism)
(ङ) अन्तर्जातीय स्पर्धा (Interspecific competition)।

उत्तर:

  1. सहभोजिता: एक जीव को लाभ होता है, दूसरा न तो लाभान्वित होता है और न ही हानि। उदाहरण: आर्किड का आम के वृक्ष पर उगना।
  2. परजीविता: एक जीव (परजीवी) को लाभ होता है, दूसरे जीव (पोषी) को हानि होती है। उदाहरण: मनुष्य के शरीर में एस्केरिस (गोलकृमि)।
  3. छद्मावरण: परभक्षी से बचने के लिए शिकार द्वारा अपने शरीर का रंग-रूप परिवेश के अनुरूप बना लेना। उदाहरण: टिड्डा या गिलहरी का पेड़ की छाल जैसा दिखना।
  4. सहोपकारिता: दोनों जीवों को पारस्परिक लाभ होता है। उदाहरण: शैवाल व कवक का सहजीवन (लाइकेन)।
  5. अन्तर्जातीय स्पर्धा: विभिन्न प्रजातियों के जीवों के बीच सीमित संसाधनों (भोजन, स्थान) के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा। उदाहरण: खेत में गेहूँ की फसल और खरपतवार के बीच स्पर्धा।

प्रश्न 16. उपयुक्त आरेख की सहायता से लॉजिस्टिक (संभार तन्त्र) समष्टि वृद्धि का वर्णन कीजिए।

उत्तर: प्रकृति में संसाधन सीमित होते हैं, इसलिए समष्टि की वृद्धि हमेशा चरघातांकी नहीं होती। जब वृद्धि सीमित संसाधनों द्वारा नियंत्रित होती है, तो उसे लॉजिस्टिक वृद्धि कहते हैं। इसका वक्र S-आकार (सिग्मॉइड) का होता है।

लॉजिस्टिक वृद्धि वक्र
चित्र: लॉजिस्टिक समष्टि वृद्धि वक्र (सिग्मॉइड वक्र)

इस वक्र की चार प्रावस्थाएँ होती हैं:
  1. पश्चता प्रावस्था: वृद्धि धीमी शुरुआत।
  2. त्वरण प्रावस्था: वृद्धि तेज हो जाती है।
  3. मंदन प्रावस्था: संसाधन सीमित होने लगते हैं, वृद्धि दर कम होने लगती है।
  4. साम्यावस्था प्रावस्था: समष्टि घनत्व पर्यावरण की पोषण क्षमता (K) के स्तर पर स्थिर हो जाता है।
लॉजिस्टिक वृद्धि का समीकरण है: dN/dt = rN((K-N)/K)
जहाँ, N = समष्टि घनत्व, r = आंतरिक वृद्धि दर, K = पोषण क्षमता।

प्रश्न 17. निम्नलिखित कथनों में परजीविता (पैरासिटिज्म) को कौन-सा सबसे अच्छी तरह स्पष्ट करता है--
(क) एक जीव को लाभ होता है।
(ख) दोनों जीवों को लाभ होता है।
(ग) एक जीव को लाभ होता है, दूसरा प्रभावित नहीं होता है।
(घ) एक जीव को लाभ होता है, दूसरा प्रभावित होता है।

उत्तर: (घ) एक जीव को लाभ होता है, दूसरा प्रभावित होता है।

प्रश्न 18. समष्टि (पॉपुलेशन) की कोई तीन महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताइए और व्याख्या कीजिए।

उत्तर: समष्टि की तीन महत्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  1. जन्म दर (Natality): किसी निश्चित समय में समष्टि में नए व्यष्टियों के जन्म लेने की दर। यह समष्टि के आकार में वृद्धि करती है।
  2. मृत्यु दर (Mortality): किसी निश्चित समय में समष्टि में व्यष्टियों की मृत्यु की दर। यह समष्टि के आकार को कम करती है।
  3. आयु वितरण (Age Distribution): समष्टि में विभिन्न आयु वर्ग (प्रजननक्षम, प्रजननपूर्व, प्रजननोत्तर) के व्यष्टियों का अनुपात। यह समष्टि की भविष्य की वृद्धि क्षमता को दर्शाता है।

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Other Chapters of Class 12 Biology
1. जीवों में जनन
2. पुष्पी पादपों में लैंगिक जनन
3. मानव जनन
4. जनन स्वास्थ्य
5. वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत
6. वंशागति के आण्विक आधार
7. विकास
8. मानव स्वास्थ्य तथा रोग
9. खाद्य उत्पादन में वृद्धि की कार्यनीति
10. मानव कल्याण में सूक्ष्म जीव
11. जैव प्रौद्योगिकी - सिद्धांत व प्रक्रम
12. जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग
13. जीव और समष्टियाँ
14. पारितंत्र
15. जैव विविधता एवं संरक्षण
16. पर्यावरणीय मुद्दे
17. प्रयोगात्मक एवं प्रोजेक्ट कार्य
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