UP Board Class 12 Biology 17. प्रयोगात्मक एवं प्रोजेक्ट कार्य is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
विधि: किसी पुष्प के परागकणों को ब्रुश की सहायता से परागकोश से पृथक् करके पेट्रीडिश में 10% शर्करा विलयन में रखते हैं। लगभग 24 घंटे पश्चात् कुछ परागकणों को स्लाइड पर रखकर, कवर स्लिप से ढककर सूक्ष्मदर्शी द्वारा अध्ययन करते हैं। अथवा परागकणों को स्लाइड पर रखी 10% शर्करा घोल की बूँद में रखकर स्लाइड को पेट्रीडिश में रखकर ऊपर से ढककर लगभग 24 घंटे के लिए रख देते हैं।
प्रेक्षण:
चित्र: परागकणों का अंकुरण तथा पराग नलिका
सामग्री: विभिन्न प्रकार की मृदा के नमूने, विभिन्न व्यास के छिद्रों वाली लोहे की छलनियाँ, मुन्सेल का मृदा रंगीन चार्ट आदि।
विधि:
| क्र. सं. | मृदा कणों का व्यास | मृदा का गठन |
|---|---|---|
| 1. | 0.002 mm से कम | चिकनी मृदा (Clay) |
| 2. | 0.002 mm – 0.02 mm | गाद (Silt) |
| 3. | 0.02 mm – 0.2 mm | बारीक बालू (Fine Sand) |
| 4. | 0.2 mm – 2 mm | मोटी बालू (Coarse Sand) |
| 5. | 2 mm से अधिक | बजरी (Gravel) |
सामग्री: विभिन्न मृदा के नमूने, परखनली, पोर्सिलेन टाइल, बेरियम सल्फेट, सार्वत्रिक सूचक आदि।
विधि: विभिन्न मृदा नमूनों को अलग-अलग परखनली में लेकर उसमें उतनी ही मात्रा बेरियम सल्फेट की तथा 15 ml जल मिलाकर, इसे अच्छी प्रकार हिलाकर व निथारकर तरल को पृथक् कर लेते हैं। तरल की कुछ बूँदें पोर्सिलेन टाइल पर रखकर इसमें उतनी ही मात्रा में सार्वत्रिक सूचक मिलाते हैं। रंग परिवर्तन का मिलान विभिन्न pH के रंगों की पट्टी से करते हैं, जिस pH के रंग से मिलान हो जाता है, वह मृदा का pH होता है।
निष्कर्ष: मृदा में विभिन्न विलेयशील लवण पाए जाते हैं। उदासीन मृदा में लिटमस का रंग परिवर्तन नहीं होता। क्षारीय मृदा घोल में लिटमस नीला और अम्लीय मृदा में लिटमस लाल हो जाता है। सामान्यतया बगीचे की मृदा का pH मान 7, सड़क के किनारे की मृदा का pH 6.5 और खुली मृदा का pH मान 7.5 के लगभग होता है।
सामग्री: विभिन्न प्रकार की मृदा के नमूने, भौतिक तुला, क्रूसिबल, बीकर, अवन (ओवन) या स्पिरिट लैम्प।
विधि: स्वच्छ एवं शुष्क क्रूसिबल को भौतिक तुला में तोलकर उसका भार ज्ञात कर लेते हैं। क्रूसिबल में एक छोटी चम्मच मृदा लेकर पुनः भार ज्ञात कर लेते हैं। इस नमूने को 24 घंटे के लिए गर्म वायु अवन में 105 – 110°C ताप पर रखते हैं। इसके पश्चात् पुनः मृदा का भार ज्ञात करते हैं। भार की कमी मृदा में नमी की मात्रा को दर्शाती है। यह प्रक्रिया सभी नमूनों में अपनाते हैं।
निष्कर्ष: रेतीली मृदा में नमी की मात्रा बहुत कम, चिकनी मृदा में नमी की मात्रा अधिक होती है। बगीचे की मृदा में ह्यूमस के कारण नमी अधिक होती है।
सामग्री: मृदा के शुष्क नमूने, भौतिक तुला, छिद्रित तली वाले टिन के डिब्बे, फिल्टर पेपर आदि।
विधि: मृदा के शुष्क नमूनों को बारीक पीस लेते हैं। छिद्रित तली वाले टिन के डिब्बों (A, B, C) में नीचे फिल्टर पेपर लगा कर, डिब्बों का भार अलग-अलग ज्ञात कर लेते हैं। A, B, C डिब्बों में अलग-अलग स्थानों की पिसी हुई मृदा भरकर पुनः उनका भार ज्ञात कर लेते हैं। A, B, C डिब्बों को जल से भरी पेट्रीडिश में तब तक रखते हैं जब तक मृदा की ऊपरी सतह गीली न हो जाए। डिब्बों को पेट्रीडिश से बाहर निकल लेते हैं, जब इनसे पानी का टपकना बन्द हो जाता है, तब पुनः इनका भार ज्ञात कर लेते हैं, और भार में वृद्धि का अन्तर ज्ञात कर लेते हैं।
निष्कर्ष: बगीचे की मृदा की जल धारण क्षमता सबसे अधिक, खेत की मृदा की जल धारण क्षमता नदी की मृदा से अधिक होती है।
रेतीली मृदा या रेतीली दोमट मृदा की जल धारण क्षमता कम होती है, इसमें पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में न होने के कारण, यह कम उपजाऊ होती है। रेतीली मृदा में शुष्कोद्भिद् पादप उगते हैं, इनकी संख्या भी कम होती है।
चिकनी मृदा (Clay Soil) की जल धारण क्षमता अधिक होती है। मृदा कणों के मध्य रिक्त स्थान बहुत छोटे होते हैं। अतः यह मृदा कठोर हो जाती है, इसमें वायु संचार बहुत कम होता है। इस मृदा में समोद्भिद् (Mesophytes) पाए जाते हैं।
दोमट मृदा (Loam) में वायु संचार तथा जल धारण क्षमता सामान्य होती है। यह मृदा कृषि के लिए उपयुक्त होती है। किसी स्थान पर पाए जाने वाले पौधों की आकारिकी उस स्थान की मृदा संरचना पर निर्भर करती है।
सामग्री: जलाशयों से जल एवं जीवों का संग्रह करने के लिए पॉलीथीन की थैलियाँ, कीट पकड़ने वाला जाल आदि।
विधि: जलाशयों से जल के साथ जलीय जीवों (पादप एवं जन्तु) को छोटी-छोटी पॉलीथीन की थैलियों में एकत्र करके प्रयोगशाला में ले आते हैं।
प्रेक्षण:
विधि: दो व्यापक रूप से भिन्न स्थलों की वायु में निलम्बित कणिक पदार्थों का अध्ययन करने के लिए औद्योगिक क्षेत्र तथा जहाँ भवनों का निर्माण कार्य चल रहा हो, उन स्थानों का चयन करके, वायु में उपस्थित निलम्बित कणिक पदार्थों की उपस्थिति ज्ञात करते हैं।
प्रेक्षण: वायु में उपस्थित ठोस कणों को उनकी आमाप, स्रोत तथा भौतिक स्थिति के आधार पर 5 समूहों में वर्गीकृत कर लेते हैं–
इन कणों की प्रकृति इनके स्रोत पर निर्भर करती है। रेशेदार तन्तुमय पदार्थ अपने स्रोत के समीप स्थित रहते हैं, जबकि महीन कण वायु में अधिक समय तक निलम्बित रहते हैं। ये कण वायु की विषाक्त गैसों को अवशोषित कर लेते हैं। वर्षा के समय निलम्बित कण नमी को अवशोषित करके भारी हो जाते हैं और नीचे बैठकर मृदा को प्रदूषित करते हैं।
सामग्री: मजबूत सुतली, कील, हथौड़ा, मीटर टेप, कागज, पेन्सिल, हरबेरियम शीट आदि।
विधि:
प्रेक्षण: अध्ययन किए गए पौधों की संख्या को तालिका में अंकित करते हैं–
| पौधे की प्रजाति का नाम | प्रति वर्ग इकाई में पौधों की संख्या | कुल पादप जनसंख्या या सघनता | समष्टि घनत्व |
|---|---|---|---|
| A | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | – | – |
| B | – | – | – |
| C | – | – | – |
| D | – | – | – |
निष्कर्ष: किसी जाति की जनसंख्या घनत्व किसी क्षेत्र में अध्ययन किए गए पौधों की कुल संख्या का औसत होता है।
समष्टि घनत्व = वर्गों में किसी जाति के पौधों की कुल संख्या / वर्गों की संख्या
सामग्री: पतली डोरी, कील, मीटर पैमाना, हथौड़ा, कागज, पेन्सिल, हरबेरियम शीट, सेलोटेप।
विधि: पतली डोरी और कीलों की सहायता से क्षेत्र विशेष में 1 × 1 मीटर क्षेत्र पर वर्ग जालिका बनाते हैं। सुविधानुसार इसे पुनः 10 सेमी के वर्गों में विभाजित कर लेते हैं। पादप प्रजातियों का वितरण उसके स्थानीय वातावरण के प्रति अनुकूलनता को प्रदर्शित करता है। समुदाय में किसी भी प्रजाति के सदस्य समान रूप से वितरित नहीं होते।
प्रेक्षण: आवृत्ति (Frequency) का तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष में एक प्रजाति विशेष के सदस्यों की बारम्बारता को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। रॉन्कियर ने आवृत्ति के आधार पर पादप प्रजातियों को निम्नलिखित 5 आवृत्ति वर्गों में बाँटा है–
| वर्ग | आवृत्ति रेंज | उपस्थिति |
|---|---|---|
| 1 | 1-20% | दुर्लभ |
| 2 | 21-40% | यदा-कदा उपस्थित |
| 3 | 41-60% | अक्सर उपस्थित |
| 4 | 61-80% | अधिकतर उपस्थित |
| 5 | 81-100% | सदैव उपस्थित |
प्रतिशत आवृत्ति = (वर्ग जालिकाओं की संख्या जिसमें प्रजाति विशेष के सदस्य / नमूने के लिए प्रयुक्त वर्ग जालिकाओं की कुल संख्या) × 100
सामग्री: प्याज की स्थिर की हुई मूलाग्र, ऐसीटोकारमीन, स्पिरिट लैम्प, स्लाइड, कवर स्लिप आदि।
विधि: मूलाग्र का लगभग 5 मिमी लम्बा टुकड़ा लेकर ऐसीटोकारमीन से अभिरंजित करके, टुकड़े को स्लाइड पर रखकर कवर स्लिप से ढक देते हैं। स्लाइड को 3-4 मिनट तक स्पिरिट लैम्प पर गर्म करके, कवर स्लिप को अँगुली से दबा देते हैं। कोशिकाओं का सूक्ष्मदर्शी से अध्ययन कीजिए। कोशिकाओं में कोशा विभाजन की विभिन्न अवस्थाएँ—पूर्वावस्था, मध्यावस्था, पश्चावस्था तथा अन्त्यावस्था दिखायी देती हैं।
चित्र: समसूत्री कोशा विभाजन की मध्यावस्था
चित्र: समसूत्री कोशा विभाजन की पश्चावस्था
सामग्री: स्टार्च का घोल, आयोडीन का घोल, फेहलिंग घोल, बेनेडिक्ट घोल, मुख की लार, परखनलियाँ, स्पिरिट लैम्प आदि।
विधि: एक ग्राम अरारोट का पेस्ट बनाकर उसमें 100 ml जल मिलाकर, उबालकर ठण्डा कर लेते हैं। यह 1% स्टार्च का घोल है। 5-5 ml स्टार्च घोल चार अलग-अलग परखनलियों में लेते हैं। A परखनली में 5 ml साधारण जल तथा शेष B, C तथा D में 5-5 ml लार मिलाते हैं। D परखनली के मिश्रण को 5 मिनट तक 100°C ताप पर उबालते हैं। प्रत्येक परखनली के घोल को तीन-तीन भागों में बाँट लेते हैं। जैसे—A1, A2, A3; B1, B2, B3 आदि। A1, B1, C1 तथा D1 परखनली में आयोडीन घोल मिलाकर निरीक्षण करने पर A1 तथा D1 परखनली का नीला रंग स्टार्च की उपस्थिति को प्रदर्शित करती है। B1 तथा C1 परखनली में स्टार्च लार में उपस्थित एमाइलेज (टायलिन) के कारण माल्टोस में बदल जाने के कारण नीला रंग नहीं आता। D1 परखनली में उच्च ताप के कारण एन्जाइम नष्ट हो जाने के कारण स्टार्च माल्टोस में नहीं बदलता।
विभिन्न तापमान और अलग-अलग pH मान के प्रभाव का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि सामान्य शरीर ताप 37°C तथा pH 6.8 पर लार एमाइलेज स्टार्च पर प्रतिक्रिया करता है। अम्लीय तथा क्षारीय pH मान पर एन्जाइम कार्य नहीं करता; अति निम्न ताप पर एन्जाइम निष्क्रिय रहता है और उच्च ताप पर एन्जाइम नष्ट हो जाता है।
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