UP Board Class 12 Physics 5. चुंबकत्व एवं द्रव्य is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
(a) एक सदिश को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन राशियों की आवश्यकता होती है। उन तीन स्वतन्त्र राशियों के नाम लिखिए जो परम्परागत रूप से पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होती हैं।
(b) दक्षिण भारत में किसी स्थान पर नति कोण का मान लगभग 18° है। ब्रिटेन में आप इससे अधिक नति कोण की अपेक्षा करेंगे या कम की?
(c) यदि आप आस्ट्रेलिया के मेल्बॉर्न शहर में भू-चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं का नक्शा बनाएँ तो ये रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर जाएँगी या इससे बाहर आएँगी?
(d) एक चुम्बकीय सुई जो ऊर्ध्वाधर तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, यदि भू-चुम्बकीय उत्तर या दक्षिण ध्रुव पर रखी हो तो यह किस दिशा में संकेत करेगी?
(e) यह माना जाता है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक चुम्बकीय द्विध्रुव के क्षेत्र जैसा है जो पृथ्वी के केन्द्र पर रखा है और जिसका द्विध्रुव आघूर्ण 8 × 1022 J T-1 है। कोई ढंग सुझाइये जिससे इस संख्या के परिमाण की कोटि जाँची जा सके।
(f) भू-गर्भशास्त्रियों का मानना है कि मुख्य N-S चुम्बकीय ध्रुवों के अतिरिक्त, पृथ्वी की सतह पर कई अन्य स्थानीय ध्रुव भी हैं, जो विभिन्न दिशाओं में विन्यस्त हैं। ऐसा होना कैसे सम्भव है?
(a) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को निर्धारित करने वाली तीन स्वतन्त्र राशियाँ हैं: चुम्बकीय विक्षेपण, नति कोण (अवनति कोण) और पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक। इन्हें पृथ्वी के चुम्बकीय अवयव कहते हैं।
(b) ब्रिटेन में नति कोण का मान दक्षिण भारत की तुलना में अधिक होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रिटेन उत्तरी ध्रुव के अधिक निकट स्थित है। ब्रिटेन में नति कोण का मान लगभग 70° होता है।
(c) मेल्बॉर्न दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है। दक्षिणी गोलार्ध में, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का उत्तरी ध्रुव स्थित होता है। चुम्बकीय बल रेखाएँ उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव की ओर जाती हैं। इसलिए, मेल्बॉर्न में ये रेखाएँ पृथ्वी के अन्दर की ओर जाएँगी।
(d) चुम्बकीय ध्रुवों पर, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र ठीक ऊर्ध्वाधर (लम्बवत) दिशा में होता है। चूँकि सुई ऊर्ध्वाधर तल में घूमने के लिए स्वतन्त्र है, वह किसी भी दिशा में संकेत कर सकती है। अतः ध्रुवों पर यह कोई भी दिशा दर्शा सकती है।
(e) पृथ्वी के चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण का परिमाण M = 8 × 1022 J T-1 दिया गया है। विषुवत रेखा पर स्थित किसी बिंदु पर इस द्विध्रुव के कारण चुम्बकीय क्षेत्र की गणना करके इसकी कोटि की जाँच की जा सकती है।
पृथ्वी की त्रिज्या, R = 6400 km = 6.4 × 106 m
अक्षीय स्थिति में चुम्बकीय क्षेत्र: B = (μ₀ / 4π) * (2M / R³)
मान रखने पर: B ≈ (10-7) * (2 × 8 × 1022) / (6.4 × 106)³ ≈ 0.31 × 10-4 T = 0.31 G
यह मान पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र (लगभग 0.3 से 0.6 G) के समान कोटि का है, जो दिए गए M के परिमाण की पुष्टि करता है।
(f) पृथ्वी की सतह पर विभिन्न स्थानों पर चुम्बकीय खनिजों (जैसे लौह अयस्क) के असमान वितरण के कारण स्थानीय चुम्बकीय ध्रुव उत्पन्न हो सकते हैं। ये स्थानीय ध्रुव मुख्य N-S ध्रुवों के अतिरिक्त होते हैं और भिन्न-भिन्न दिशाओं में अवस्थित हो सकते हैं, जिससे उनका प्रभाव एक-दूसरे को कम या निरस्त भी कर सकता है।
(a) एक जगह से दूसरी जगह जाने पर पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र बदलता है। क्या यह समय के साथ भी बदलता है? यदि हाँ, तो कितने समय अन्तराल पर इसमें पर्याप्त परिवर्तन होते हैं?
(b) पृथ्वी के क्रोड में लोहा है, यह ज्ञात है। फिर भी भू-गर्भशास्त्री इसको पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का स्रोत नहीं मानते। क्यों?
(c) पृथ्वी के क्रोड के बाहरी चालक भाग में प्रवाहित होने वाली आवेश धाराएँ भू-चुम्बकीय क्षेत्र के लिए उत्तरदायी समझी जाती हैं। इन धाराओं को बनाए रखने वाली बैटरी (ऊर्जा स्रोत) क्या हो सकती है?
(d) अपने 4-5 अरब वर्षों के इतिहास में पृथ्वी अपने चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा कई बार उलट चुकी होगी। भू-गर्भशास्त्री, इतने सुदूर अतीत के पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में कैसे जान पाते हैं?
(e) बहुत अधिक दूरियों पर (30,000 km से अधिक) पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र अपनी द्विध्रुवीय आकृति से काफी भिन्न हो जाता है। कौन-से कारक इस विकृति के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं?
(f) अंतरातारकीय अंतरिक्ष में 10-12 T की कोटि का बहुत ही क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र होता है। क्या इस क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र के भी कुछ प्रभावी परिणाम हो सकते हैं? समझाइए।
(a) हाँ, पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र समय के साथ भी बदलता रहता है। यह दैनिक, वार्षिक और सदियों के अंतराल में बदल सकता है। चुम्बकीय आँधियों के दौरान यह अनियमित रूप से भी बदलता है। पर्याप्त परिवर्तन आमतौर पर कुछ सौ वर्षों के अंतराल में देखे जा सकते हैं।
(b) पृथ्वी के आंतरिक क्रोड में लोहा अत्यधिक उच्च तापमान के कारण द्रव अवस्था में है। लौह-चुम्बकीय गुण केवल एक निश्चित तापमान (क्यूरी ताप) तक ही रहते हैं। इस उच्च ताप पर लोहा अपना स्थायी चुम्बकत्व खो देता है, इसलिए यह पृथ्वी के चुम्बकत्व का प्राथमिक स्रोत नहीं हो सकता।
(c) पृथ्वी के बाहरी क्रोड में प्रवाहित होने वाली संवहन धाराओं को बनाए रखने वाली ऊर्जा का स्रोत पृथ्वी के आंतरिक भाग में मौजूद रेडियोएक्टिव पदार्थों के क्षय से उत्पन्न ऊष्मा तथा गुरुत्वाकर्षणीय विभेदों के कारण उत्पन्न ऊर्जा है।
(d) भू-गर्भशास्त्री प्राचीन चट्टानों, विशेष रूप से ज्वालामुखीय लावा से बनी चट्टानों का अध्ययन करते हैं। जब ये चट्टानें ठोस होती हैं, तो उस समय के पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में चुम्बकित हो जाती हैं। इन चट्टानों में संरक्षित इस अवशिष्ट चुम्बकत्व का विश्लेषण करके वे अतीत में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के उत्क्रमण के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
(e) पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर, सौर पवन (सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों का प्रवाह) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ अंतर्क्रिया करता है। यह सौर पवन चुम्बकीय क्षेत्र को दबाकर उसे सूर्य की विपरीत दिशा में खींचता है, जिससे वह द्विध्रुवीय आकृति से भिन्न एक लम्बी, पूँछ जैसी आकृति (चुम्बकमंडल) बनाता है। यही मुख्य कारक है।
(f) हाँ, अत्यंत क्षीण चुम्बकीय क्षेत्र के भी महत्वपूर्ण परिणाम हो सकते हैं। अंतरिक्ष में उपस्थित आवेशित कण (जैसे कॉस्मिक किरणें) इस क्षेत्र में वृत्तीय पथ पर गति करते हैं। चुम्बकीय क्षेत्र B अत्यंत कम है, इसलिए गति के पथ की त्रिज्या (r = mv/qB) बहुत बड़ी होती है। हालाँकि, चूँकि अंतरिक्ष की दूरियाँ विशाल हैं, यह क्षीण क्षेत्र भी इन कणों के मार्ग को मोड़ने और उन्हें आकाशगंगा में फँसाए रखने में सक्षम है, जो ब्रह्मांडीय विकिरण के वितरण को प्रभावित करता है।
दिया है:
चुम्बकीय क्षेत्र, B = 0.25 T
बल आघूर्ण, τ = 4.5 × 10-2 J (या N m)
कोण, θ = 30°
बल आघूर्ण का सूत्र: τ = M B sin θ
⇒ M = τ / (B sin θ)
⇒ M = (4.5 × 10-2) / (0.25 × sin 30°)
⇒ M = (4.5 × 10-2) / (0.25 × 0.5)
⇒ M = (4.5 × 10-2) / (0.125) = 0.36 J T-1
अतः चुम्बकीय आघूर्ण का परिमाण 0.36 J T-1 है।
दिया है: M = 0.32 J T-1, B = 0.15 T
(a) स्थायी सन्तुलन: यह तब होता है जब चुम्बकीय आघूर्ण M, चुम्बकीय क्षेत्र B की दिशा में होता है, अर्थात् उनके बीच कोण θ = 0° होता है।
स्थितिज ऊर्जा, U = - M · B = - M B cos θ
⇒ U = - (0.32) × (0.15) × cos 0° = - (0.048) × (1) = -0.048 J
(b) अस्थायी सन्तुलन: यह तब होता है जब M, B के विपरीत दिशा में होता है, अर्थात् θ = 180° होता है।
स्थितिज ऊर्जा, U = - M B cos 180° = - (0.32 × 0.15) × (-1) = +0.048 J
अतः अस्थायी सन्तुलन में स्थितिज ऊर्जा +0.048 J है।
जब परिनालिका में धारा प्रवाहित होती है, तो यह एक समान चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है जो इसकी अक्ष के अनुदिश होता है, ठीक एक छड़ चुम्बक के समान। इसके सिरे उत्तरी (N) एवं दक्षिणी (S) ध्रुवों की भाँति व्यवहार करते हैं। अतः यह एक चुम्बकीय द्विध्रुव के रूप में कार्य करती है।
परिनालिका का चुम्बकीय आघूर्ण: M = n I A
यहाँ, फेरों की संख्या n = 800, धारा I = 3.0 A, अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल A = 2.5 × 10-4 m2
⇒ M = 800 × 3.0 × (2.5 × 10-4)
⇒ M = 2400 × 2.5 × 10-4 = 6000 × 10-4 = 0.6 J T-1
इस आघूर्ण की दिशा परिनालिका की अक्ष के अनुदिश दाएँ हाथ के नियम से निर्धारित होती है।
प्रश्न 5 से, परिनालिका का चुम्बकीय आघूर्ण M = 0.6 J T-1
दिया है: बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र B = 0.25 T, कोण θ = 30°
बल आघूर्ण, τ = M B sin θ
⇒ τ = (0.6) × (0.25) × sin 30°
⇒ τ = 0.15 × 0.5 = 0.075 N m
अतः परिनालिका पर लगने वाला बल आघूर्ण 0.075 N m है।
दिया है: M = 1.5 J T-1, B = 0.22 T
(a) कृत कार्य: कार्य W = - M B (cos θ₂ - cos θ₁)
(i) θ₁ = 0° (प्रारम्भिक, क्षेत्र के अनुदिश), θ₂ = 90° (अन्तिम, क्षेत्र के लम्बवत्)
W = -1.5 × 0.22 × (cos 90° - cos 0°) = -0.33 × (0 - 1) = 0.33 J
(ii) θ₁ = 0°, θ₂ = 180° (क्षेत्र के विपरीत)
W = -1.5 × 0.22 × (cos 180° - cos 0°) = -0.33 × (-1 - 1) = -0.33 × (-2) = 0.66 J
(b) बल आघूर्ण: τ = M B sin θ
(i) θ = 90° पर, τ = 1.5 × 0.22 × sin 90° = 0.33 × 1 = 0.33 N m
(ii) θ = 180° पर, τ = 1.5 × 0.22 × sin 180° = 0.33 × 0 = 0 N m
दिया है: n = 2000, A = 1.6 × 10-4 m2, I = 4.0 A
(a) चुम्बकीय आघूर्ण M = n I A = 2000 × 4.0 × (1.6 × 10-4)
⇒ M = 8000 × 1.6 × 10-4 = 12800 × 10-4 = 1.28 J T-1
(b) एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखे चुम्बकीय द्विध्रुव पर कुल बल शून्य होता है क्योंकि दोनों ध्रुवों पर बल परिमाण में समान पर दिशा में विपरीत होते हैं, जो एक युगल बनाते हैं।
बल आघूर्ण, τ = M B sin θ (दिया है: B = 7.5 × 10-2 T, θ = 30°)
⇒ τ = 1.28 × (7.5 × 10-2) × sin 30° = 1.28 × 7.5 × 10-2 × 0.5
⇒ τ = (1.28 × 3.75) × 10-2 = 4.8 × 10-2 N m
अतः बल आघूर्ण 4.8 × 10-2 N m है।
दिया है: फेरों की संख्या N = 16, त्रिज्या r = 10 cm = 0.1 m, धारा I = 0.75 A, चुम्बकीय क्षेत्र B = 5.0 × 10-2 T, दोलन आवृत्ति f = 2.0 s-1
कुण्डली का चुम्बकीय आघूर्ण: M = N I A = N I (π r²)
⇒ M = 16 × 0.75 × (3.14 × (0.1)²) = 12 × 3.14 × 0.01 ≈ 0.377 J T-1
चुम्बकीय द्विध्रुव के दोलन की आवृत्ति: f = (1 / 2π) √(M B / I)
जहाँ I जड़त्व-आघूर्ण है। दोनों ओर वर्ग करने पर:
f² = (1 / 4π²) (M B / I) ⇒ I = (M B) / (4π² f²)
मान रखने पर: I = (0.377 × 5.0 × 10-2) / (4 × (3.14)² × (2.0)²)
⇒ I = (0.01885) / (4 × 9.8596 × 4) ≈ 0.01885 / 157.75 ≈ 1.195 × 10-4 kg m²
अतः कुण्डली का जड़त्व-आघूर्ण ल
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