UP Board Class 4 EVS 1. चलो चलें स्कूल! is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 4 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर : हाँ, यह काफी आसान लगा। इंटों पर चलते समय हमें अपना संतुलन बनाए रखना पड़ता है, जो एक मजेदार और सीखने वाला अनुभव है।
उत्तर :
(क) मुझे बाँस के पुल पर चलना बहुत रोमांचक और मजेदार लगा। यह एक नई चुनौती जैसा था।
(ख) मैं नहीं गिरा, लेकिन पुल हिलता रहा था, इसलिए चलते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ी।
उत्तर : नंगे पैर चलना ज्यादा आसान और सुरक्षित होगा। क्योंकि नंगे पैरों से हम बाँस की सतह को अच्छी तरह पकड़ सकते हैं और फिसलने का डर कम रहता है। जूते का तला चिकना हो सकता है, जिससे फिसलन बढ़ जाती है।
उत्तर : हाँ, दोनों चित्रों में स्पष्ट अंतर है। पहले चित्र में बच्चा बिना किसी सहारे के, सीधे रस्सी पकड़कर बाल्टी खींच रहा है। दूसरे चित्र में बच्चा एक पुली (घिरनी) की मदद से बाल्टी खींच रहा है। पुली रस्सी को एक घेरे में घुमाती है, जिससे खींचने में आसानी होती है।
उत्तर : पुली (घिरनी) के साथ खींचना निश्चित रूप से ज्यादा आसान होगा। पुली रस्सी के घर्षण को कम करती है और बल लगाने की दिशा बदल देती है, जिससे भारी चीजें भी आसानी से उठाई जा सकती हैं।
उत्तर : मैंने पुली का प्रयोग इन जगहों पर देखा है:
उत्तर : यह एक व्यावहारिक गतिविधि है। एक खाली धागे की रील लो, उसमें एक मजबूत डोरी डालो और एक छोटी टोकरी या डिब्बा बाँधकर देखो कि कैसे पुली की मदद से उसे उठाना आसान हो जाता है।
उत्तर : सीमेंट का पुल बाँस के पुल से कई तरह से अलग है:
उत्तर : सीमेंट के बने पुल की चौड़ाई के आधार पर, एक समय पर 30 से 50 या इससे भी अधिक लोग आसानी से पार कर सकते हैं। यह पुल इतना मजबूत होता है कि उनके चलने से हिलता भी नहीं है।
उत्तर : हाँ, मैंने देखा कि कुछ बच्चे पहाड़ी नदियों को पार करने के लिए लकड़ी या रस्सी के झूलते पुलों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ बच्चे नदी के उथले हिस्से से पैदल पार करते हैं, तो कुछ सीमेंट के मजबूत पुलों से गुजरते हैं। पुल उनके सफर को सुरक्षित और आसान बना देते हैं।
उत्तर : मैं सीमेंट के मजबूत पुल से जाना पसंद करूँगा। क्योंकि यह पूरी तरह सुरक्षित होता है, इसमें गिरने का डर नहीं रहता और इस पर चलना बहुत आसान है। हालाँकि, बाँस के पुल पर चलने का अनुभव भी रोमांचक लगता है, लेकिन वह केवल मजे के लिए एक बार ही ठीक है।
उत्तर : मेरे स्कूल जाने के रास्ते में कोई बड़ा पुल नहीं है, लेकिन मैंने शहर में एक बड़ा सीमेंट का पुल देखा है। वह पुल बहुत चौड़ा और लंबा है, उसके नीचे से सड़क गुजरती है और उस पर कारें, बाइक और लोग चलते रहते हैं। उसके किनारों पर ऊँची रेलिंग लगी हुई है।
उत्तर : मेरे दादाजी ने बताया कि उनके बचपन में गाँवों में ज्यादातर लकड़ी के मजबूत खंभों वाले पुल होते थे या फिर नदियों में पत्थर रखकर बनाए गए छोटे पुल होते थे। बड़े शहरों में ही पक्के सीमेंट के पुल हुआ करते थे। रस्सी के पुल भी कुछ पहाड़ी इलाकों में मिल जाते थे।
उत्तर : मैंने अपने शहर में एक पुल देखा है। वह एक नहर के ऊपर बना हुआ है, यानी पानी पर बना है। इस पुल से होकर लोग एक तरफ की कॉलोनी से दूसरी तरफ की मुख्य सड़क पर जाते हैं।
उत्तर : उस पुल को सभी तरह के लोग पार करते हैं - स्कूली बच्चे, ऑफिस जाने वाले, बुजुर्ग। साथ ही, साइकिल, मोटरसाइकिल, रिक्शा और कारें भी उस पर से गुजरती हैं। कभी-कभी लोग अपने पालतू कुत्तों को भी साथ लेकर चलते हैं।
उत्तर : वह पुल बहुत पुराना नहीं लगता। उसकी सतह अच्छी है और रेलिंग पर जंग भी नहीं लगी है। लगता है कि उसे कुछ साल पहले ही बनाया गया है या फिर उसकी मरम्मत की गई है।
उत्तर : यह पुल मुख्य रूप से इन चीजों से बना हुआ है:
उत्तर : यह एक रचनात्मक कार्य है। अपनी कॉपी में पुल का चित्र बनाते समय उसके नीचे पानी, ऊपर सड़क, कारें, बाइक, साइकिल चलाते लोग और पुल के किनारे लगी लाइट के खंभे भी बनाना न भूलें।
उत्तर : अगर पुल नहीं होता, तो बहुत सारी परेशानियाँ होतीं:
उत्तर : हाँ, मैंने कई तरह की नावें देखी हैं। जैसे लकड़ी की लंबी पतली नाव (डोंगी), लोहे की बड़ी मोटरबोट, समुद्र में चलने वाले विशाल जहाज और पारंपरिक रंग-बिरंगी पाल वाली नावें भी।
उत्तर : पानी पार करने के कई तरीके हैं:
उत्तर : हाँ, मैं एक बार मेले में ताँगे पर बैठा हूँ। ताँगा घोड़े से खींची जाने वाली एक सुंदर रंग-बिरंगी गाड़ी होती है।
उत्तर : मैं शहर के एक बड़े मेले में ताँगे पर बैठा था। ताँगा चलाने वाले चाचा (कोचमैन) ने मेरी मदद की और मुझे सावधानी से ताँगे पर बिठाया।
उत्तर : मुझे ताँगे पर बैठकर बहुत अच्छा लगा। यह आजकल की कारों या बाइक से बिल्कुल अलग अनुभव था। घोड़े की टापों की आवाज और हल्का-हल्का झूमना बहुत सुखद था।
उत्तर : मेरे प्यारे साथियों, मैंने पिछले सप्ताह ताँगे की सवारी का अनुभव किया। ताँगा लकड़ी का बना होता है और उसे एक सुंदर घोड़ा खींचता है। बैठते ही लगा जैसे हम पुराने जमाने में चले गए हैं। चलते समय हल्का-हल्का झूलना और आस-पास का नज़ारा देखना बहुत मजेदार था। यह पर्यावरण के लिए भी अच्छा है क्योंकि इसमें धुआँ नहीं निकलता। मैं चाहूँगा कि आप भी एक बार यह अनुभव जरूर लें।
उत्तर : हाँ, मेरे नाना-नानी के गाँव में आज भी बैलगाड़ियाँ होती हैं। लोग उन पर खेत का सामान, घास या अनाज लादकर ले जाते हैं।
उत्तर : ज्यादातर बैलगाड़ियों में छत नहीं होती, वे खुली होती हैं ताकि सामान लादना आसान रहे। हालाँकि, कुछ बैलगाड़ियों में यात्रियों के बैठने के लिए बनी सीटों के ऊपर छत भी बनी होती है, ताकि धूप और बारिश से बचा जा सके।
उत्तर : पुराने जमाने की बैलगाड़ियों के पहिये पूरी तरह लकड़ी के बने होते थे। आजकल, ज्यादातर बैलगाड़ियों में लोहे के रिम वाले पहिए लगे होते हैं, जिन पर ट्रैक्टर या कार जैसे रबर के टायर चढ़े होते हैं। इससे गाड़ी चलाना आसान और कम खड़खड़ाहट वाला हो गया है।
उत्तर : यह एक रचनात्मक कार्य है। अपनी कॉपी में दो बैल, उनके सिर पर जूआ (जुआ), लकड़ी का डंडा और पीछे लकड़ी की पट्टियों से बना हुआ गाड़ी का ढाँचा बनाओ। दो बड़े पहिए और उनमें लकड़ी के तीलियाँ (स्पोक्स) भी बनाना न भूलें।
उत्तर : हमारे स्कूल में लगभग आधे से ज्यादा बच्चे साइकिल से आते-जाते हैं। साइकिल एक स्वस्थ, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल साधन है। मैं भी प्रतिदिन साइकिल से ही स्कूल आता हूँ।
उत्तर : हाँ, मुझे साइकिल चलानी आती है। मैंने यह कला अपने बड़े भैया से सीखी। पहले उन्होंने पीछे से साइकिल को पकड़कर संतुलन बनाना सिखाया, फिर धीरे-धीरे मैंने खुद चलाना शुरू कर दिया। शुरू में कुछ गिरने के बाद भी मैंने हार नहीं मानी और अभ्यास करते रहा।
उत्तर : हाँ, हमारे गाँव के आस-पास के इलाकों में किसान पुराने पम्पसेट के इंजन और लकड़ी के पहियों का इस्तेमाल करके ऐसी ही गाड़ियाँ बना लेते हैं। इन पर वे खेत का सामान ले जाते हैं या फिर लोगों को छोटी दूरी के लिए ले जाते हैं।
उत्तर : हमारे यहाँ ऐसी गाड़ियों को "चुग्गा" या "मोटर वाली बैलगाड़ी" कहते हैं, क्योंकि यह बैलगाड़ी जैसी दिखती है लेकिन इसमें बैल की जगह इंजन लगा होता है।
उत्तर : हाँ, मैं एक बार ऐसी गाड़ी में बैठना जरूर चाहूँगा। क्योंकि यह एक अलग तरह का अनुभव होगा। यह गाड़ी पुराने सामान से बनी है, इसलिए इसमें बैठकर लगेगा कि हम किसी नए आविष्कार पर सवार हैं। साथ ही, यह देखने में भी बहुत दिलचस्प लगती है।
उत्तर : इसे 'जुगाड़' इसलिए कहते हैं क्योंकि यह गाड़ी नए और डिज़ाइन किए हुए पुर्जों से नहीं, बल्कि घर या खेत में पड़े पुराने और बेकार समझे जाने वाले सामानों को जोड़-तोड़कर (जुगाड़ करके) बनाई जाती है। जैसे पुराना इंजन, लकड़ी के तख्ते, ट्रैक्टर के पुराने पहिए आदि। यह हमारी सूझ-बूझ और कल्पनाशीलता का उदाहरण है।
उत्तर : मैंने पुराने अखबारों को मोड़कर और चिपकाकर एक मजबूत फाइल फोल्डर बनाया है। इसी तरह, एक पुरानी प्लास्टिक की बोतल को काटकर और उसमें मिट्टी भरकर मैंने एक सुंदर गमला बनाया है, जिसमें अब मेरा पौधा उग रहा है।
उत्तर : हाँ, ऐसी बहुत सी जगहें हैं। जैसे:
उत्तर : हाँ, पिछली गर्मियों की छुट्टियों में मैं अपने परिवार के साथ एक वन्यजीव अभयारण्य (वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी) घूमने गया था। वहाँ हम जीप में बैठकर घने जंगल के रास्ते से गुजरे थे।
उत्तर : जंगल का अन
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