UP Board Class 11 Physics 12. ऊष्मागतिकी is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
कोई गीजर 3.0 लीटर प्रति मिनट की दर से बहते हुए जल को 27°C से 77°C तक गर्म करता है। यदि गीजर का परिचालन गैस बर्नर द्वारा किया जाए तो ईंधन के व्यय की क्या दर होगी? बर्नर के ईंधन की दहन-ऊष्मा 4.0 × 10⁴ J/g है।
जल के प्रवाह की दर (V) = 3 L/min = 3 × 10⁻³ m³/min
जल का घनत्व (ρ) = 10³ kg/m³
∴ जल के प्रवाह की द्रव्यमान दर (m) = आयतन × घनत्व = 3 × 10⁻³ × 10³ = 3 kg/min
ताप वृद्धि (ΔT) = 77°C – 27°C = 50°C
जल की विशिष्ट ऊष्मा (s) = 4.2 × 10³ J/kg-°C
जल द्वारा प्रति मिनट ली गई ऊष्मा (Q) = m s ΔT = 3 × (4.2 × 10³) × 50 = 6.3 × 10⁵ J/min
ईंधन की दहन ऊष्मा = 4.0 × 10⁴ J/g = 4.0 × 10⁷ J/kg
माना ईंधन खपत दर = m' kg/min
तब, ईंधन द्वारा उत्पन्न ऊष्मा = जल द्वारा ली गई ऊष्मा
m' × (4.0 × 10⁷) = 6.3 × 10⁵
m' = (6.3 × 10⁵) / (4.0 × 10⁷) = 15.75 × 10⁻³ kg/min = 15.75 g/min
अतः ईंधन व्यय की दर 15.75 ग्राम प्रति मिनट है।
स्थिर दाब पर 2.0 × 10⁻² kg नाइट्रोजन (कमरे के ताप पर) के ताप में 45°C वृद्धि करने के लिए कितनी ऊष्मा की आपूर्ति की जानी चाहिए? (N₂ का अणुभार = 28; R = 8.3 J mol⁻¹ K⁻¹)
स्थिर दाब पर आवश्यक ऊष्मा: Q = n Cₚ ΔT
नाइट्रोजन का द्रव्यमान (m) = 2.0 × 10⁻² kg
ताप वृद्धि (ΔT) = 45°C = 45 K
N₂ का आणविक द्रव्यमान (M) = 28 g/mol = 28 × 10⁻³ kg/mol
मोलों की संख्या (n) = m / M = (2.0 × 10⁻²) / (28 × 10⁻³) = 20/28 = 5/7 मोल
द्विपरमाणुक गैस के लिए, Cₚ = (7/2)R
∴ Q = n × (7/2)R × ΔT = (5/7) × (7/2) × 8.3 × 45
Q = (5/2) × 8.3 × 45 = (5 × 8.3 × 45) / 2 = (1867.5) / 2 = 933.75 J
अतः आवश्यक ऊष्मा 933.75 J है।
व्याख्या कीजिए कि ऐसा क्यों होता है?
(a) भिन्न-भिन्न तापों T₁ व T₂ के दो पिण्डों को यदि ऊष्मीय सम्पर्क में लाया जाए तो यह आवश्यक नहीं है कि उनका अन्तिम ताप (T₁ + T₂)/2 ही हो।
(b) रासायनिक या नाभिकीय संयन्त्रों में शीतलक (अर्थात् द्रव जो संयन्त्र के भिन्न-भिन्न भागों को अधिक गर्म होने से रोकता है) की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होनी चाहिए।
(c) कार को चलाते-चलाते उसके टायरों में वायुदाब बढ़ जाता है।
(d) किसी बन्दरगाह के समीप के शहर की जलवायु, समान अक्षांश के किसी रेगिस्तानी शहर की जलवायु से अधिक शीतोष्ण होती है।
(a) दो वस्तुओं का अंतिम ताप केवल तभी (T₁ + T₂)/2 होगा जब उनकी ऊष्मा धारिताएँ समान हों। यदि ऊष्मा धारिताएँ भिन्न हैं, तो अधिक ऊष्मा धारिता वाली वस्तु का ताप परिवर्तन कम होगा, जिससे अंतिम ताप उनके औसत से भिन्न होगा।
(b) शीतलक का कार्य संयन्त्र से अधिकतम ऊष्मा अवशोषित करना है। चूँकि अवशोषित ऊष्मा Q = m s ΔT होती है, इसलिए उच्च विशिष्ट ऊष्मा (s) वाले शीतलक के लिए, समान द्रव्यमान और ताप वृद्धि पर अधिक ऊष्मा अवशोषित होगी, जिससे शीतलन दक्षता बढ़ेगी।
(c) गाड़ी चलाते समय टायरों और सड़क के बीच घर्षण के कारण टायरों का ताप बढ़ जाता है। टायर के भीतर की वायु का आयतन लगभग स्थिर रहता है। चार्ल्स के नियम के अनुसार, स्थिर आयतन पर दाब ताप के समानुपाती होता है। अतः ताप बढ़ने से वायुदाब बढ़ जाता है।
(d) बंदरगाह के निकट समुद्र की उपस्थिति के कारण वहाँ की वायु में आर्द्रता अधिक होती है। जल की उच्च विशिष्ट ऊष्मा के कारण, समुद्र दिन के समय ऊष्मा अवशोषित कर शहर को ठंडा रखता है और रात में ऊष्मा मुक्त कर उसे गर्म रखता है। इससे जलवायु समशीतोष्ण बनती है। रेगिस्तान में नमी की कमी के कारण दिन में अधिक गर्मी और रात में अधिक ठंड होती है।
गतिशील पिस्टन लगे किसी सिलिंडर में मानक ताप व दाब पर 3 मोल हाइड्रोजन भरी है। सिलिंडर की दीवारें ऊष्मारोधी पदार्थ की बनी हैं तथा पिस्टन को उस पर बालू की परत लगाकर ऊष्मारोधी बनाया गया है। यदि गैस को उसके आरम्भिक आयतन के आधे आयतन तक संपीडित किया जाए तो गैस का दाब कितना बढ़ेगा?
यह एक रुद्धोष्म प्रक्रम है क्योंकि निकाय ऊष्मारोधी है। रुद्धोष्म प्रक्रम के लिए: PVγ = नियतांक, अर्थात P₁V₁γ = P₂V₂γ
हाइड्रोजन (H₂) एक द्विपरमाणुक गैस है, इसलिए γ = Cₚ/Cᵥ = 7/5 = 1.4
माना प्रारंभिक आयतन V₁ = V, तो अंतिम आयतन V₂ = V/2
प्रारंभिक दाब P₁ = P (मानक दाब)
रुद्धोष्म समीकरण से: P₂ = P₁ (V₁/V₂)γ = P (V / (V/2))1.4 = P (2)1.4
(2)1.4 ≈ 2.639
∴ P₂ ≈ 2.64 P
अतः दाब लगभग 2.64 गुना बढ़ जाएगा।
रुद्धोष्म विधि द्वारा किसी गैस की अवस्था परिवर्तन करते समय उसकी एक साम्यावस्था A से दूसरी साम्यावस्था B तक ले जाने में निकाय पर 22.3 J कार्य किया जाता है। यदि गैस को दूसरी प्रक्रिया द्वारा अवस्था A से अवस्था B में लाने में निकाय द्वारा अवशोषित नेट ऊष्मा 9.35 cal है तो बाद के प्रकरण में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य कितना है? (1 cal = 4.19 J)
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के अनुसार: ΔQ = ΔU + ΔW
प्रथम (रुद्धोष्म) प्रक्रम के लिए:
किया गया कार्य (ΔW) = -22.3 J (ऋणात्मक क्योंकि निकाय पर कार्य किया गया)
रुद्धोष्म प्रक्रम में ΔQ = 0
∴ 0 = ΔU + (-22.3) ⇒ ΔU = +22.3 J
आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन (ΔU) अवस्था A और B के बीच पथ-स्वतंत्र है।
दूसरे प्रक्रम के लिए:
अवशोषित ऊष्मा (ΔQ) = 9.35 cal = 9.35 × 4.19 = 39.18 J
ΔU = 22.3 J (ऊपर ज्ञात)
∴ ΔW = ΔQ – ΔU = 39.18 – 22.3 = 16.88 J ≈ 16.9 J
अतः निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य 16.9 J है।
समान धारिता वाले दो सिलिंडर A तथा B एक-दूसरे से स्टॉपकॉक के द्वारा जुड़े हैं। A में मानक ताप व दाब पर गैस भरी है जबकि B पूर्णतः निर्वातित है। स्टॉपकॉक यकायक खोल दी जाती है। निम्नलिखित का उत्तर दीजिए-
(a) सिलिंडर A तथा B में अन्तिम दाब क्या होगा?
(b) गैस की आन्तरिक ऊर्जा में कितना परिवर्तन होगा?
(c) गैस के ताप में क्या परिवर्तन होगा?
(d) क्या निकाय की माध्यमिक अवस्थाएँ (अन्तिम साम्यावस्था प्राप्त करने के पूर्व) इसके P-V-T पृष्ठ पर होंगी?
यह एक मुक्त प्रसार की प्रक्रिया है।
माना प्रत्येक सिलिंडर का आयतन V है। प्रारंभ में गैस केवल सिलिंडर A में है।
प्रारंभिक आयतन (V₁) = V, प्रारंभिक दाब (P₁) = P (वायुमंडलीय दाब)
स्टॉपकॉक खोलने के बाद गैस का आयतन (V₂) = V + V = 2V
(a) चूँकि पूरा निकाय ऊष्मारोधी है और गैस पर कोई बाह्य कार्य नहीं हो रहा, इसलिए आंतरिक ऊर्जा और ताप स्थिर रहते हैं। यह एक समतापीय प्रसार है।
बॉयल के नियम से: P₁V₁ = P₂V₂ ⇒ P × V = P₂ × (2V)
∴ अंतिम दाब P₂ = P/2
(b) आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन ΔU = 0 (क्योंकि ΔT = 0)
(c) गैस के ताप में कोई परिवर्तन नहीं होगा (ΔT = 0).
(d) नहीं, मुक्त प्रसार एक तीव्र और अनियंत्रित प्रक्रिया है। अंतिम साम्यावस्था तक पहुँचने से पहले की मध्यवर्ती अवस्थाएँ असाम्यावस्था में होती हैं और गैस समीकरण (PV = nRT) का पालन नहीं करतीं। अतः वे P-V-T पृष्ठ पर नहीं होंगी।
एक वाष्प इंजन अपने बॉयलर से प्रति मिनट 3.6 × 10⁹ J ऊर्जा प्रदान करता है जो प्रति मिनट 5.4 × 10⁸ J कार्य देता है। इंजन की दक्षता कितनी है? प्रति मिनट कितनी ऊष्मा अपशिष्ट होगी?
इंजन को प्रति मिनट दी गई ऊष्मा (Q₁) = 3.6 × 10⁹ J
इंजन द्वारा प्रति मिनट किया गया उपयोगी कार्य (W) = 5.4 × 10⁸ J
इंजन की दक्षता (η) = (उपयोगी कार्य / आपूर्त ऊष्मा) × 100%
η = (5.4 × 10⁸) / (3.6 × 10⁹) × 100 = (0.15) × 100 = 15%
प्रति मिनट अपशिष्ट ऊष्मा (Q₂) = आपूर्त ऊष्मा – उपयोगी कार्य
Q₂ = (3.6 × 10⁹) – (5.4 × 10⁸) = 10⁸ (36 – 5.4) = 10⁸ × 30.6 = 3.06 × 10⁹ J/min
एक हीटर किसी निकाय को 100 W की दर से ऊष्मा प्रदान करता है। यदि निकाय 75 J/s की दर से कार्य करता है, तो आन्तरिक ऊर्जा की वृद्धि किस दर से होगी?
हीटर द्वारा ऊष्मा आपूर्ति दर (ΔQ/Δt) = 100 W = 100 J/s
निकाय द्वारा कार्य करने की दर (ΔW/Δt) = 75 J/s
ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम से: ΔQ = ΔU + ΔW
दर के रूप में: ΔQ/Δt = ΔU/Δt + ΔW/Δt
∴ 100 = (ΔU/Δt) + 75
⇒ आंतरिक ऊर्जा वृद्धि दर (ΔU/Δt) = 100 – 75 = 25 J/s या 25 W
किसी ऊष्मागतिकीय निकाय को मूल अवस्था से मध्यवर्ती अवस्था तक चित्र में दर्शाये अनुसार एक रेखीय प्रक्रम द्वारा ले जाया गया है। एक समदाबीय प्रक्रम द्वारा इसके आयतन को E से F तक ले जाकर मूल मान तक कम कर देते हैं। गैस द्वारा E से F तथा वहाँ से F तक कुल किए गए कार्य का आकलन कीजिए।
सूत्र: P-V आरेख में प्रक्रम वक्र के अधीन क्षेत्रफल गैस द्वारा किए गए कार्य के बराबर होता है।
प्रक्रम E → F (आयतन बढ़ता है):
कार्य (WEF) = समलंब EABF का क्षेत्रफल + आयत ABDC का क्षेत्रफल
= [½ × (600-300) × (5-2)] + [300 × (5-2)]
= [½ × 300 × 3] + [300 × 3] = 450 + 900 = +1350 J
प्रक्रम F → E (समदाबी संपीडन, आयतन घटता है):
कार्य (WFE) = आयत ABDC का क्षेत्रफल (ऋणात्मक चिह्न सहित)
= – [300 × (5-2)] = –900 J
कुल कार्य (E → F → E चक्र के लिए):
Wकुल = WEF + WFE = 1350 + (-900) = +450 J
चक्र दक्षार्णवर्त है, अतः कुल कार्य धनात्मक है।
खाद्य पदार्थ को एक प्रशीतक के अन्दर रखने पर वह उसे 9°C पर बनाए रखता है। यदि कमरे का ताप 36°C है तो प्रशीतक के निष्पादन गुणांक का आकलन कीजिए।
प्रशीतक (रेफ्रिजरेटर) का निष्पादन गुणांक (β) निम्न सूत्र से दिया जाता है:
β = T₂ / (T₁ – T₂)
जहाँ,
T₂ = निम्न ताप (सिंक का ताप) = 9°C = 9 + 273 = 282 K
T₁ = उच्च ताप (स्रोत का ताप) = 36°C = 36 + 273 = 309 K
∴ β = 282 / (309 – 282) = 282 / 27 ≈ 10.44
अतः प्रशीतक का निष्पादन गुणांक लगभग 10.44 है।
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