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उत्तर: क्षार धातुएँ आवर्त सारणी के s-ब्लॉक में वर्ग 1 के तत्व हैं। इनके गुण उनके संयोजी कक्षक में उपस्थित s-इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
परमाण्वीय एवं आयनिक त्रिज्या: अपने आवर्त में क्षार धातु की परमाण्वीय त्रिज्या सबसे बड़ी होती है। इनके धनायन (M⁺) संगत परमाणु से छोटे होते हैं।
आयनन एन्थैल्पी: क्षार धातुओं की आयनन एन्थैल्पी बहुत कम होती है।
भौतिक गुण:
रासायनिक गुण:
उत्तर: आवर्त सारणी के वर्ग 2 के तत्व बेरीलियम (Be), मैग्नीशियम (Mg), कैल्सियम (Ca), स्ट्रॉन्शियम (Sr), बेरियम (Ba) एवं रेडियम (Ra) क्षारीय मृदा धातुएँ कहलाती हैं।
परमाण्वीय गुण:
भौतिक गुण:
रासायनिक गुण:
उत्तर: क्षार धातुएँ अत्यधिक क्रियाशील होती हैं। ये अपने संयोजी कोश के एकमात्र s-इलेक्ट्रॉन को बहुत आसानी से त्यागकर M⁺ आयन बना लेती हैं। इसलिए ये प्रकृति में कभी भी शुद्ध या मुक्त अवस्था में नहीं पाई जाती हैं, बल्कि सदैव यौगिकों (जैसे क्लोराइड, कार्बोनेट) के रूप में पाई जाती हैं।
हल: माना सोडियम की ऑक्सीकरण संख्या x है।
Na₂O₂ में, 2(x) + 2(-1) = 0
2x - 2 = 0
2x = 2
x = +1
अतः सोडियम की ऑक्सीकरण संख्या +1 है।
उत्तर: सोडियम की आयनन एन्थैल्पी पोटैशियम से अधिक होती है। इसका अर्थ है कि सोडियम से इलेक्ट्रॉन निकालना पोटैशियम से इलेक्ट्रॉन निकालने की तुलना में अधिक कठिन है। चूँकि रासायनिक अभिक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन का त्याग या साझा करना शामिल होता है, इसलिए सोडियम पोटैशियम की तुलना में कम अभिक्रियाशील है।
उत्तर:
(क) आयनन एन्थैल्पी: क्षारीय मृदा धातुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी संगत क्षार धातुओं से अधिक होती है क्योंकि इन पर नाभिकीय आवेश अधिक होता है। उदाहरण: I.E.(Mg) > I.E.(Na)
(ख) ऑक्साइडों की क्षारकता: क्षार धातुओं के ऑक्साइड (जैसे Na₂O) अत्यधिक क्षारीय होते हैं। क्षारीय मृदा धातुओं के ऑक्साइड (जैसे MgO, CaO) भी क्षारीय होते हैं, परन्तु क्षार धातु ऑक्साइडों की तुलना में इनकी क्षारकता कम होती है।
(ग) हाइड्रॉक्साइडों की विलेयता: क्षार धातुओं के हाइड्रॉक्साइड (जैसे NaOH, KOH) जल में अत्यधिक विलेय होते हैं। क्षारीय मृदा धातुओं के हाइड्रॉक्साइड (जैसे Ca(OH)₂, Mg(OH)₂) जल में कम विलेय होते हैं। विलेयता का क्रम: NaOH > Ca(OH)₂
उत्तर: लीथियम (वर्ग 1) और मैग्नीशियम (वर्ग 2) के परमाणु तथा आयनिक आकार लगभग समान होने के कारण इनके गुणों में समानता पाई जाती है। इसे विकर्ण संबंध कहते हैं।
समानताएँ:
उत्तर:
उत्तर: प्रकाश वैद्युत प्रभाव के लिए धातु से इलेक्ट्रॉन का निकलना आवश्यक है। पोटैशियम एवं सीजियम की आयनन एन्थैल्पी लीथियम की तुलना में बहुत कम होती है, जिसके कारण ये प्रकाश (फोटॉन) की आपतित ऊर्जा से आसानी से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित कर देते हैं। लीथियम की आयनन एन्थैल्पी अपेक्षाकृत अधिक होने के कारण यह प्रकाश से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करने में कम कुशल है।
उत्तर: क्षार धातु द्रव अमोनिया में घुलकर एक गहरे नीले रंग का विलयन बनाती है। यह रंग विलयन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण होता है। जब ये अमोनिया-युक्त इलेक्ट्रॉन [e⁻(NH₃)ₓ] दृश्य प्रकाश को अवशोषित करते हैं, तो वे उच्च ऊर्जा स्तर में संक्रमण करते हैं, जिससे नीला रंग दिखाई देता है। जब इस सांद्र नीले विलयन को और तनु किया जाता है या लंबे समय तक रखा जाता है, तो यह कॉपर (ताँबे) जैसे रंग में बदल सकता है और अंततः धात्विक चमक प्रदर्शित कर सकता है।
उत्तर: ज्वाला रंग तब उत्पन्न होता है जब धातु आयन की ऊर्जा से उत्तेजित होकर संयोजी इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर में जाता है और वापस निम्न स्तर में आने पर विशिष्ट तरंगदैर्ध्य का प्रकाश उत्सर्जित करता है। बेरीलियम (Be²⁺) और मैग्नीशियम (Mg²⁺) आयनों का आकार बहुत छोटा तथा आयनन एन्थैल्पी बहुत अधिक होती है। इस कारण ये ज्वाला की ऊर्जा से अपने संयोजी इलेक्ट्रॉनों को उत्तेजित नहीं कर पाते, अतः कोई ज्वाला रंग नहीं देते। Ca, Sr, Ba के आयनों का आकार बड़ा व आयनन एन्थैल्पी कम होने के कारण ये सरलता से उत्तेजित होकर ज्वाला को क्रमशः ईंटिया लाल, किरमिजी लाल व हरा रंग प्रदान करते हैं।
उत्तर: साल्वे प्रक्रम सोडियम कार्बोनेट (Na₂CO₃) के औद्योगिक निर्माण की एक विधि है। इसमें होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नलिखित हैं:
उत्तर: साल्वे प्रक्रम NaHCO₃ के कम विलेयता के सिद्धांत पर कार्य करता है, जिसे अवक्षेपित कर अलग किया जा सकता है। पोटैशियम हाइड्रोजन कार्बोनेट (KHCO₃) जल में अत्यधिक विलेय होता है, इसलिए इसे अवक्षेप के रूप में अलग नहीं किया जा सकता। अतः पोटैशियम कार्बोनेट के निर्माण के लिए साल्वे विधि प्रयुक्त नहीं की जा सकती।
उत्तर: Li⁺ आयन का आकार बहुत छोटा होता है। छोटे Li⁺ आयन का बड़े CO₃²⁻ आयन के साथ बना जालक अस्थायी होता है क्योंकि छोटा Li⁺ आयन बड़े ऋणायन को पर्याप्त रूप से ध्रुवित करके उसके बंध को कमजोर कर देता है। इसलिए Li₂CO₃ कम ताप पर ही वियोजित होकर Li₂O और CO₂ दे देता है।
Na⁺ आयन का आकार Li⁺ से बड़ा होता है, जिससे Na₂CO₃ का जालक अधिक स्थायी होता है और यह बहुत उच्च ताप पर ही वियोजित होता है।
उत्तर:
(क) नाइट्रेट:
तापीय स्थायित्व: क्षार धातु नाइट्रेट (LiNO₃ को छोड़कर) गर्म करने पर नाइट्राइट और ऑक्सीजन देते हैं। क्षारीय मृदा धातु नाइट्रेट गर्म करने पर ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन देते हैं।
विलेयता: दोनों वर्गों के नाइट्रेट जल में विलेय होते हैं।
(ख) कार्बोनेट:
तापीय स्थायित्व: क्षार धातु कार्बोनेट (Li₂CO₃ को छोड़कर) अधिक ताप पर भी स्थायी होते हैं। क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट गर्म करने पर ऑक्साइड और CO₂ में वियोजित हो जाते हैं। स्थायित्व वर्ग में नीचे बढ़ता है: BeCO₃ < MgCO₃ < CaCO₃ < SrCO₃ < BaCO₃
विलेयता: क्षार धातु कार्बोनेट जल में विलेय होते हैं। क्षारीय मृदा धातु कार्बोनेट जल में अल्प विलेय होते हैं और विलेयता वर्ग में नीचे जाने पर घटती है।
(ग) सल्फेट:
तापीय स्थायित्व: क्षार धातु सल्फेट अत्यधिक ताप पर भी स्थायी होते हैं। क्षारीय मृदा धातु सल्फेट गर्म करने पर ऑक्साइड और SO₃ देते हैं।
विलेयता: क्षार धातु सल्फेट जल में विलेय होते हैं। क्षारीय मृदा धातु सल्फेटों की विलेयता वर्ग में नीचे जाने पर तेजी से घटती है। BeSO₄ और MgSO₄ विलेय हैं, CaSO₄ अल्प विलेय है, जबकि SrSO₄, BaSO₄ अविलेय हैं।
उत्तर:
(i) सोडियम धातु: गलित सोडियम क्लोराइड (NaCl) के विद्युत-अपघटन द्वारा (डाउन विधि)। कैथोड पर सोडियम धातु एकत्र होती है।
कैथोड: Na⁺ + e⁻ → Na
ऐनोड: 2Cl⁻ → Cl₂ + 2e⁻
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