UP Board class 11 Chemistry 9. हाइड्रोजन is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: हाइड्रोजन आवर्त सारणी का प्रथम तत्त्व है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s1 है। इसका बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्षार धातुओं (ns1) के समान है, जो आवर्त सारणी के प्रथम वर्ग से सम्बन्धित है। दूसरी ओर हैलोजनों की भाँति (ns2np5) एक इलेक्ट्रॉन की कमी है, जो आवर्त सारणी के सत्रहवें वर्ग से सम्बन्धित है। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में एक इलेक्ट्रॉन की कमी होने के कारण हाइड्रोजन क्षार धातुओं के समानता दर्शाता है, जो एक इलेक्ट्रॉन त्यागकर एकधनात्मक आयन (H+) बनाते हैं। साथ ही यह हैलोजन की भाँति एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर एक ऋणात्मक आयन (H-) बनाता है तथा हैलोजन की भाँति यह सहसंयोजी आबन्ध भी बनाता है। अतः हम कह सकते हैं कि आवर्त सारणी में हाइड्रोजन के उचित स्थान के लिए विवेचना का विषय रहा है। हाइड्रोजन के अद्वितीय गुणों के कारण इसे आवर्त सारणी में अलग रखा गया है।
उत्तर: हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं:
इन समस्थानिकों का द्रव्यमान अनुपात 1.008 : 2.014 : 3.016 अर्थात लगभग 1:2:3 है।
उत्तर: हाइड्रोजन के दो परमाणुओं के बीच H-H आबन्ध ऊर्जा उच्चतम होती है। इसलिए 2000 K ताप पर डाइहाइड्रोजन की वियोजन ऊर्जा (आबन्ध ऊर्जा) 435.88 kJ mol-1 है, जो इसे स्थायी बनाती है। इस उच्च आबन्ध ऊर्जा के कारण सामान्य परिस्थितियों में हाइड्रोजन द्विपरमाण्विक अणु (H2) के रूप में रहता है, न कि एकल परमाणु के रूप में।
उत्तर: कोयले में सिन्गैस का उत्पादन करने की प्रक्रिया को कोल गैसीकरण कहते हैं:
C(s) + H2O(g) → CO(g) + H2(g)
CO एवं H2 के मिश्रण को वाटर गैस या सिन्गैस कहते हैं। सिन्गैस में उपस्थित कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) को आयरन क्रोमेट उत्प्रेरक की उपस्थिति में भाप से क्रिया कराकर डाइहाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है:
CO(g) + H2O(g) [उत्प्रेरक]→ CO2(g) + H2(g)
इस अभिक्रिया को जल-गैस विस्थापन अभिक्रिया कहते हैं।
उत्तर: जल का विद्युत अपघटन करके बृहद् स्तर पर डाइहाइड्रोजन बनाई जा सकती है। इसके लिए जल में 15-25% अम्ल (जैसे H2SO4) या क्षार (जैसे NaOH) मिलाया जाता है। यह विद्युत अपघट्य विलयन की चालकता बढ़ा देता है, जिससे विद्युत अपघटन सुगमता से होता है। इस प्रक्रम में प्लैटिनम इलेक्ट्रोड का उपयोग किया जाता है।
अभिक्रिया: 2H2O(l) [विद्युत]→ 2H2(g) + O2(g)
(i) H2(g) + MmO2(s) →
(ii) CO(g) + H2(g) →
(iii) C3H8(g) + 3H2O(g) [उत्प्रेरक]→
(iv) Zn(s) + 2NaOH(aq) →
उत्तर:
(i) H2(g) + MmO2(s) → Mm(s) + H2O(l)
(ii) CO(g) + 2H2(g) → CH3OH(l)
(iii) C3H8(g) + 3H2O(g) → 3CO(g) + 7H2(g)
(iv) Zn(s) + 2NaOH(aq) → Na2ZnO2(aq) + H2(g)
उत्तर: डाइहाइड्रोजन में H-H बन्ध की उच्च एन्थैल्पी (435.88 kJ mol-1) होने के कारण यह अणु स्थाई है। किसी भी तत्त्व के एकल आबन्ध दो परमाणुओं के बीच यह अधिकतम है। अतः 2000 K ताप पर डाइहाइड्रोजन का परमाणुओं में वियोजन केवल 0.081% है। यह 5000 K ताप पर बढ़कर 95.5% हो जाता है। कक्ष ताप पर उच्च H-H आबन्ध एन्थैल्पी के कारण डाइहाइड्रोजन कम अभिक्रियाशील (उदासीन) है।
उत्तर: हाइड्रोजन के दूसरे तत्त्वों के साथ मिलकर बने यौगिक हाइड्राइड कहलाते हैं। इन्हें इलेक्ट्रॉन की उपलब्धता के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है:
(i) इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड: इनकी लुइस संरचना लिखते समय इलेक्ट्रॉन कम होते हैं। उदाहरण: डाइबोरेन (B2H6). आवर्त सारणी के 13वें वर्ग (बोरॉन परिवार) के तत्त्व ऐसे हाइड्राइड बनाते हैं। ये लुइस अम्ल की भाँति कार्य करते हैं अर्थात इलेक्ट्रॉन ग्राही होते हैं।
(ii) इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध हाइड्राइड: इनमें परम्परागत लुइस संरचना के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉनों की संख्या होती है। उदाहरण: CH4, SiH4. आवर्त सारणी के 14वें वर्ग के तत्त्व ऐसे हाइड्राइड बनाते हैं, जो चतुष्फलकीय ज्यामिति के होते हैं।
(iii) इलेक्ट्रॉन समृद्ध हाइड्राइड: इनमें इलेक्ट्रॉन आधिक्य एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के रूप में उपस्थित होते हैं। उदाहरण: NH3, H2O, HF. आवर्त सारणी के 15वें से 17वें वर्ग तक के तत्त्व ऐसे हाइड्राइड बनाते हैं। ये इलेक्ट्रॉनदाता (लुइस क्षार) होते हैं।
उत्तर: इलेक्ट्रॉन न्यून हाइड्राइड में केन्द्रीय परमाणु अपना अष्टक पूर्ण नहीं करता है। उदाहरण: B2H6 (डाइबोरेन) में बोरॉन परमाणु sp3 संकरित है, किन्तु इसमें दो इलेक्ट्रॉन त्रिकेन्द्र-द्विआबन्ध (3c-2e बन्ध) बनाते हैं। ऐसे अणु का प्रयास इलेक्ट्रॉन ग्रहण करना होता है। कोई पदार्थ जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, लुइस सिद्धान्त के अनुसार अम्ल कहलाता है। अतः 13वें वर्ग के यौगिक (जैसे B2H6, AlH3) लुइस अम्ल कहलाते हैं। ये इलेक्ट्रॉन समृद्ध यौगिकों (जैसे NH3) के साथ अभिक्रिया करके एडक्ट बनाते हैं।
उत्तर: CH4, C2H6, C2H4 एवं C2H2 कार्बनिक हाइड्राइड हैं। इनकी लुइस संरचना सम्भव है तथा इनमें कार्बन परमाणु अष्टक पूर्ण करता है। ये इलेक्ट्रॉन परिशुद्ध यौगिक हैं। इनमें न तो इलेक्ट्रॉन की कमी है और न ही आधिक्य। अतः ऐसे यौगिक न तो लुइस अम्ल (इलेक्ट्रॉन ग्राही) और न ही लुइस क्षार (इलेक्ट्रॉनदाता) की भाँति कार्य करते हैं।
उत्तर: अरससमीकरणमितीय हाइड्राइड वे हाइड्राइड हैं जिनमें हाइड्रोजन तथा धातु का अनुपात स्थिर नहीं होता, बल्कि ताप एवं दाब के साथ बदलता रहता है। उदाहरण: LaH2.87, YbH2.55, TiH1.5-1.8, ZrH1.3-1.75 आदि। ये d- एवं f-ब्लॉक के संक्रमण तत्त्वों से बने होते हैं।
क्षारीय धातुएँ (जैसे Na, K) अरससमीकरणमितीय हाइड्राइड नहीं बनाती हैं। वे स्टॉइकियोमीट्रिक (रससमीकरणमितीय) हाइड्राइड (जैसे NaH, KH) बनाती हैं, जिनमें हाइड्रोजन का अनुपात निश्चित होता है। d- एवं f-ब्लॉक तत्त्वों के d या f कक्षक आंशिक भरे होते हैं, जहाँ H परमाणु जालक स्थानों पर अवस्थित होता है, जिससे अनुपात निश्चित नहीं रहता।
उत्तर: संक्रमण धातुओं के हाइड्राइड (जैसे LaNi5H6, TiFeH2) हाइड्रोजन का अवशोषण करते हैं। ये धात्विक हाइड्राइड हाइड्रोजनीकरण अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। कुछ धातुएँ (जैसे Pd, Pt) बहुत अधिक मात्रा में हाइड्रोजन का अवशोषण कर सकती हैं। यह गुण हाइड्रोजन को भण्डारित करने में सहायक है। इन हाइड्राइडों को गर्म करने पर हाइड्रोजन गैस मुक्त हो जाती है, जिसे ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
उत्तर: परमाण्विक हाइड्रोजन टॉर्च में, हाइड्रोजन गैस को दो टंगस्टन इलेक्ट्रोड्स के बीच विद्युत आर्क से गुजारा जाता है। इस उच्च ताप (लगभग 4000°C) पर H2 अणु परमाणुओं में विखण्डित हो जाते हैं:
H2(g) → 2H(g)
ये उच्च ऊर्जा वाले हाइड्रोजन परमाणु धातु की सतह पर पुनः संयोजित होते हैं और अत्यधिक ऊष्मा मुक्त करते हैं, जिसका उपयोग धातुओं की वेल्डिंग और कर्तन के लिए किया जाता है।
ऑक्सी-हाइड्रोजन टॉर्च में, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसों के मिश्रण को जलाया जाता है, जिससे लगभग 2800°C का उच्च ताप उत्पन्न होता है। इसका भी उपयोग वेल्डिंग और धातु काटने में होता है।
उत्तर: NH3, H2O तथा HF में से HF का हाइड्रोजन बन्ध उच्चतम है। कारण: फ्लोरीन (F) परमाणु आवर्त सारणी में सबसे अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्त्व है। विद्युत ऋणात्मकता में अन्तर अधिक होने के कारण H-F आबन्ध अत्यधिक ध्रुवीय होता है, जिससे H-परमाणु पर आंशिक धनावेश (δ+) तथा F-परमाणु पर प्रबल आंशिक ऋणावेश (δ-) होता है। यह प्रबल आकर्षण HF अणुओं के बीच प्रबल हाइड्रोजन आबन्ध बनाता है।
उत्तर: नहीं, लवणीय हाइड्राइड (जैसे NaH) से उत्पन्न आग बुझाने के लिए CO2 अग्निशामक का उपयोग नहीं किया जा सकता। लवणीय हाइड्राइड जल से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करते हैं, जो ज्वलनशील है:
NaH(s) + H2O(l) → NaOH(aq) + H2(g) + ऊष्मा
यह अभिक्रिया अत्यधिक ऊष्माक्षेपी है। उत्पन्न हाइड्रोजन वायु में उपस्थित ऑक्सीजन से क्रिया करके जलने लगती है। CO2 अग्निशामक ऑक्सीजन की आपूर्ति रोककर आग बुझाता है, किन्तु यहाँ आग का कारण हाइड्रोजन गैस है। साथ ही, उच्च ताप पर CO2 गर्म धातु (जैसे Na) के साथ अभिक्रिया कर सकती है। अतः ऐसी आग को बालू (sand) से ढककर बुझाना चाहिए।
(i) CaH2, BeH2 तथा TiH2 को उनकी बढ़ती हुई विद्युत चालकता के क्रम में।
(ii) LiH, NaH तथा CsH को आयनिक गुण के बढ़ते क्रम में।
(iii) H-H, D-D तथा T-T को उनके बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी के बढ़ते हुए क्रम में।
(iv) NaH, MgH2 तथा H2O को बढ़ते हुए अपचायक गुण के क्रम में।
उत्तर:
(i) विद्युत चालकता का बढ़ता क्रम: BeH2 < CaH2 < TiH2
(ii) आयनिक गुण का बढ़ता क्रम: LiH < NaH < CsH
(iii) बन्ध-वियोजन एन्थैल्पी का बढ़ता क्रम: T-T < D-D < H-H
(iv) अपचायक गुण का बढ़ता क्रम: H2O < MgH2 < NaH
उत्तर:
H2O (जल) की संरचना: गैस अवस्था में जल का अणु कोणीय (V-आकार) होता है। इसमें H-O-H आबन्ध कोण 104.5° तथा O-H आबन्ध दूरी 95.7 pm होती है। यह अत्यधिक ध्रुवीय अणु है।
H2O2 (हाइड्रोजन परॉक्साइड) की संरचना: H2O2 का अणु समतलीय नहीं है। ठोस अवस्था में यह विरूपित संरचना रखता है। दोनों ऑक्सीजन परमाणु एकल आबन्ध (O-O) से जुड़े होते हैं। प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु एक हाइड्रोजन परमाणु से भी जुड़ा होता है। O-O आबन्ध लम्बाई 147.5 pm तथा O-H आबन्ध लम्बाई 95 pm होती है। दोनों O-H आबन्ध एक ही तल में नहीं होते हैं।
उत्तर: जल का स्वतः प्रोटोनीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें जल के दो अणु आपस में अभिक्रिया करके एक अणु प्रोटॉन (H+) दान करता है और दूसरा अणु उस प्रोटॉन को ग्रहण करता है।
H2O(l) + H2O(l) ⇌ H3O+(aq) + OH-(aq)
प्रोटॉन दान करने वाला जल अणु OH- आयन में बदल जाता है तथा प्रोटॉन ग्रहण करने वाला अणु H3O+ (हाइड्रोनियम आयन) में बदल जाता है।
महत्त्व: इस स्वतः प्रोटोनीकरण के कारण जल में सदैव H3O+ तथा OH- आयनों की सान्द्रता (25°C पर प्रत्येक 10-7 mol L-1) होती है। यही कारण है कि जल उदासीन होता है (pH = 7) तथा यह अम्लीय एवं क्षारीय दोनों प्रकार के व्यवहार (उभयधर्मिता) प्रदर्शित कर सकता है।
उत्तर: फ्लोरीन (F2) जल के साथ तीव्र अभिक्रिया करता है:
2F2(g) + 2H2O(l) → 4H+(aq) + 4F-(aq) + O2(g)
ऑक्सीकरण-अपचयन विश्लेषण:
ऑक्सीकरण: जल (H2O) में ऑक्सीकरण अवस्था -2 वाला ऑक्सीजन, ऑक्सीकृत होकर ऑक्सीकरण अवस्था 0 वाली O2 गैस बनाता है। अतः जल (विशेषकर उसका ऑक्सीजन) ऑक्सीकृत होता है। जल यहाँ अपचायक का कार्य करता है।
अपचयन: फ्लोरीन (F2) में ऑक्सीकरण अवस्था 0 वाला F, अपचयित होकर ऑक्सीकरण अवस्था -1 वाला F- आयन बनाता है। अतः फ्लोरीन अपचयित होता है। F2 यहाँ ऑक्सीकारक का कार्य करता है।
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