UP Board class 11 Chemistry 3. तत्वों का वर्गीकरण तथा गुणधर्मो में आवर्तिता is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. class 11 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर: आवर्त सारणी में तत्वों को उनके इलेक्ट्रॉन विन्यास के अनुसार व्यवस्थित किया गया है।
उत्तर: मेंडलीव ने तत्वों का परमाणु भार के आधार पर वर्गीकरण किया। उन्होंने तत्वों को क्षैतिज पंक्तियों और ऊर्ध्वाधर स्तंभों में रखा, जिससे समान गुणधर्म वाले तत्व एक ही समूह में आ गए। हालाँकि, कुछ अपवादों के कारण वे इस आधार पर पूरी तरह दृढ़ नहीं रह पाए।
उत्तर: मेंडलीव के अनुसार, तत्वों के गुणधर्म उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं। आधुनिक आवर्त नियम के अनुसार, तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु क्रमांकों (परमाणु संख्या) के आवर्ती फलन होते हैं।
उत्तर: छठे आवर्त (n=6) के लिए, संभावित उपकोश हैं: s, p, d, और f। इनमें इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या इस प्रकार है:
उत्तर: परमाणु क्रमांक 14 वाला तत्व सिलिकॉन (Si) है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s² 2s² 2p⁶ 3s² 3p² है। यह तीसरे आवर्त और वर्ग 14 (कार्बन समूह) में स्थित है।
उत्तर: तीसरे आवर्त और 17वें वर्ग (हैलोजन समूह) में स्थित तत्व क्लोरीन (Cl) है। इसका परमाणु क्रमांक 17 है तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s² 2s² 2p⁶ 3s² 3p⁵ है।
उत्तर:
(i) बर्केलियम (Bk), परमाणु क्रमांक 97.
(ii) सीबोर्गियम (Sg), परमाणु क्रमांक 106.
उत्तर: एक ही वर्ग के सभी तत्वों का बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है। चूंकि रासायनिक गुणधर्म मुख्यतः बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों की संख्या और व्यवस्था पर निर्भर करते हैं, इसलिए एक वर्ग के तत्वों के गुणधर्मों में समानता पाई जाती है।
उत्तर:
परमाणु त्रिज्या: किसी परमाणु के नाभिक से बाह्यतम कोश की औसत दूरी को परमाणु त्रिज्या कहते हैं। अधातुओं के लिए यह सहसंयोजक त्रिज्या (आबंध लंबाई का आधा) और धातुओं के लिए धात्विक त्रिज्या (दो आसन्न परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी का आधा) होती है।
आयनिक त्रिज्या: किसी आयन के नाभिक से उसके बाह्यतम इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी को आयनिक त्रिज्या कहते हैं।
उत्तर:
आवर्त में (बाएं से दाएं): परमाणु त्रिज्या घटती है। कारण: एक ही आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर परमाणु क्रमांक बढ़ता है, जिससे नाभिकीय आवेश (प्रोटॉनों की संख्या) बढ़ता है। इससे बाह्य इलेक्ट्रॉनों पर आकर्षण बल बढ़ जाता है और परमाणु सिकुड़ जाता है।
वर्ग में (ऊपर से नीचे): परमाणु त्रिज्या बढ़ती है। कारण: ऊपर से नीचे जाने पर इलेक्ट्रॉन कोशों की संख्या बढ़ती है। नाभिक और बाह्य इलेक्ट्रॉनों के बीच की दूरी बढ़ जाती है तथा आवरण प्रभाव भी बढ़ता है, जिससे आकर्षण बल कम हो जाता है और परमाणु का आकार बढ़ जाता है।
उत्तर: समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज वे परमाणु या आयन होते हैं जिनमें इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या समान होती है, भले ही उनका परमाणु क्रमांक भिन्न हो।
(i) F⁻ (10 इलेक्ट्रॉन) के साथ समइलेक्ट्रॉनिक: Ne, Na⁺, O²⁻
(ii) Ar (18 इलेक्ट्रॉन) के साथ समइलेक्ट्रॉनिक: Cl⁻, K⁺, Ca²⁺
(iii) Mg²⁺ (10 इलेक्ट्रॉन) के साथ समइलेक्ट्रॉनिक: Ne, Na⁺, F⁻
(iv) Rb⁺ (36 इलेक्ट्रॉन) के साथ समइलेक्ट्रॉनिक: Kr, Br⁻
उत्तर:
(क) ये सभी समइलेक्ट्रॉनिक स्पीशीज हैं क्योंकि प्रत्येक में 10 इलेक्ट्रॉन हैं (Ne गैस के समान विन्यास)।
(ख) आयनिक त्रिज्या का बढ़ता क्रम: सभी में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान है, परन्तु नाभिकीय आवेश (प्रोटॉनों की संख्या) बढ़ने से आकर्षण बल बढ़ता है और आयन सिकुड़ जाता है। अतः बढ़ती त्रिज्या का क्रम है:
Al³⁺ < Mg²⁺ < Na⁺ < F⁻ < O²⁻ < N³⁻
उत्तर:
धनायन छोटे होते हैं: धनायन बनने पर परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन खो देता है। इससे प्रभावी नाभिकीय आवेश (शुद्ध आकर्षण) बढ़ जाता है क्योंकि प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या से अधिक हो जाती है। नाभिक शेष इलेक्ट्रॉनों को अधिक शक्ति से खींचता है, जिससे आयन का आकार सिकुड़ जाता है।
ऋणायन बड़े होते हैं: ऋणायन बनने पर परमाणु में अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन आ जाता है। इससे इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बढ़ जाता है और प्रभावी नाभिकीय आवेश कम हो जाता है। इलेक्ट्रॉन बादल फैल जाता है, जिससे आयन का आकार बढ़ जाता है।
उत्तर: इन पदों का उपयोग मानक स्थितियों को परिभाषित करने के लिए किया जाता है ताकि विभिन्न तत्वों के लिए प्राप्त मानों की तुलना की जा सके।
उत्तर:
एक परमाणु के लिए आयनन ऊर्जा = +2.18 × 10⁻¹⁸ J (ऋणात्मक चिह्न हटा देते हैं क्योंकि ऊर्जा दी जाती है)।
1 मोल हाइड्रोजन परमाणुओं के लिए आयनन एन्थैल्पी:
= (2.18 × 10⁻¹⁸ J/परमाणु) × (6.022 × 10²³ परमाणु/mol)
= 1.312 × 10⁶ J/mol
= 1312 kJ/mol (क्योंकि 1 kJ = 1000 J)
उत्तर:
(i) Be (बेरिलियम) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s² 2s² है। यह पूर्ण भरे हुए 2s-उपकोश वाला स्थायी विन्यास है। B (बोरॉन) का विन्यास 1s² 2s² 2p¹ है। Be से एक इलेक्ट्रॉन (स्थायी 2s² से) निकालना B से एक इलेक्ट्रॉन (अपेक्षाकृत अस्थिर 2p¹ से) निकालने की तुलना में अधिक ऊर्जा लेता है। इसलिए Be की प्रथम आयनन एन्थैल्पी B से अधिक है।
(ii) N (नाइट्रोजन) का विन्यास 1s² 2s² 2p³ है। यह अर्ध-भरे हुए p-उपकोश (2p³) का स्थायी विन्यास है। O (ऑक्सीजन) का विन्यास 1s² 2s² 2p⁴ है। O में एक p-कक्षक में इलेक्ट्रॉन युग्म बन जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बढ़ जाता है। इस प्रतिकर्षण के कारण O से एक इलेक्ट्रॉन निकालना N की तुलना में अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। इसलिए O की प्रथम आयनन एन्थैल्पी N से कम है।
उत्तर:
प्रथम आयनन एन्थैल्पी: Na (1s² 2s² 2p⁶ 3s¹) से एक इलेक्ट्रॉन (3s¹) निकालना Mg (1s² 2s² 2p⁶ 3s²) से एक इलेक्ट्रॉन (3s² में से एक) निकालने की तुलना में आसान है, क्योंकि Mg का नाभिकीय आवेश (Z=12) Na (Z=11) से अधिक है और उसका 3s-उपकोश पूर्ण भरा है। अतः Na की प्रथम आयनन एन्थैल्पी Mg से कम है।
द्वितीय आयनन एन्थैल्पी: Na⁺ (1s² 2s² 2p⁶) का विन्यास नियॉन जैसी उत्कृष्ट गैस का स्थायी विन्यास है। इससे दूसरा इलेक्ट्रॉन निकालना बहुत कठिन (अधिक ऊर्जा लेने वाला) है। दूसरी ओर, Mg⁺ (1s² 2s² 2p⁶ 3s¹) का विन्यास Na के समान है, जिससे दूसरा इलेक्ट्रॉन (3s¹) निकालना अपेक्षाकृत आसान है। इसलिए Na की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी Mg की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक है।
उत्तर: किसी वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी घटती है। इसके प्रमुख कारण हैं:
उत्तर: सामान्यतः वर्ग में नीचे जाने पर आयनन एन्थैल्पी घटनी चाहिए। यहाँ B से Al तक तो घट रही है, लेकिन Al (577) की तुलना में Ga (579) की आयनन एन्थैल्पी थोड़ी अधिक है और Tl (589) की In (558) से अधिक है। यह विचलन d- तथा f- इलेक्ट्रॉनों के दुर्बल परिरक्षण प्रभाव (Poor Shielding Effect) के कारण है। Ga और In, d-ब्लॉक तत्वों के बाद आते हैं, और Tl, f-ब्लॉक (लैन्थेनाइड) तत्वों के बाद आता है। d और f इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश को प्रभावी ढंग से परिरक्षित नहीं कर पाते। इसलिए, Ga और Tl के बाह्य इलेक्ट्रॉनों पर प्रभावी नाभिकीय आवेश अपेक्षा से अधिक होता है, जिससे उन्हें निकालना कठिन (अधिक ऊर्जा लेने वाला) हो जाता है।
उत्तर: अधिक ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का अर्थ है इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति अधिक है। (i) F (फ्लोरीन) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी O (ऑक्सीजन) से अधिक ऋणात्मक होगी। F का परमाणु आकार छोटा है और उच्च नाभिकीय आवेश के कारण यह इलेक्ट्रॉन को दृढ़ता से आकर्षित करता है। (ii) Cl (क्लोरीन) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी F से कम ऋणात्मक (या कम ऋणात्मक) होती है। हालाँकि F सबसे अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व है, लेकिन इसके छोटे आकार के कारण नए इलेक्ट्रॉन के प्रवेश पर अधिक प्रतिकर्षण होता है, जबकि Cl का आकार बड़ा होने से यह प्रतिकर्षण कम होता है। इसलिए, गैसीय अवस्था में Cl की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी F से अधिक ऋणात्मक होती है।
उत्तर: O की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी धनात्मक होगी। कारण: O (ऑक्सीजन) का विन्यास 1s² 2s² 2p⁴ है। पहला इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर O⁻ आयन बनता है (O + e⁻ → O⁻)। यह प्रक्रिया ऊर्जा मुक्त करती है (ऋणात्मक एन्थैल्पी)। लेकिन, O⁻ आयन पर पहले से ही एक ऋणात्मक आवेश है। दूसरा इलेक्ट्रॉन (O⁻ + e⁻ → O²⁻) जोड़ने पर दो ऋणावेशित कणों के बीच प्रबल विकर्षण बल के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है। इसके लिए ऊर्जा की आपूर्ति करनी पड़ती है, अर्थात यह प्रक्रिया ऊर्जा अवशोषित करती है। इसलिए द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का मान धनात्मक होता है।
उत्तर:
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