UP Board Class 10 Science 11. मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर : मानव नेत्र में स्थित अभिनेत्र लेंस की वह विशेष क्षमता, जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी को परिवर्तित करके दूर या पास रखी विभिन्न वस्तुओं का स्पष्ट प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर बना पाता है, समंजन क्षमता कहलाती है। पक्ष्माभी पेशियों के सिकुड़ने या फैलने से लेंस की वक्रता बदलती है, जिससे फोकस दूरी समायोजित होती है।
उत्तर : इस दोष को दूर करने के लिए अवतल लेंस (Diverging Lens) का प्रयोग किया जाता है। यह लेंस आँख पर पड़ने से पहले ही प्रकाश किरणों को फैलाकर इस प्रकार मोड़ता है कि दूर की वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर सही से बनने लगता है।
उत्तर : सामान्य दृष्टि वाले मानव नेत्र के लिए:
दूर बिंदु (Far Point): नेत्र से अनंत (Infinity) दूरी पर स्थित होता है।
निकट बिंदु (Near Point): नेत्र से लगभग 25 सेंटीमीटर की दूरी पर स्थित होता है।
उत्तर : इस विद्यार्थी को निकट-दृष्टि दोष (मायोपिया) है। इस दोष में दूर की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखाई देतीं।
इसे संशोधित करने के लिए उपयुक्त क्षमता का अवतल लेंस युक्त चश्मा पहनाया जाता है, जो प्रकाश किरणों को अपसारित करके प्रतिबिंब को दृष्टिपटल पर लाता है।
उत्तर : (9) समंजन
उत्तर : (9) दृष्टिपटल
उत्तर : (c) 25 cm
उत्तर : (०) पक्ष्माभी द्वारा
उत्तर :
(क) दूर की दृष्टि के लिए: लेंस की क्षमता P = -5.5 D है। फोकस दूरी f (मीटर में) = 1/P
अतः f = 1/(-5.5) ≈ -0.1818 मीटर या -18.18 सेमी। ऋणात्मक चिन्ह दर्शाता है कि यह एक अवतल लेंस है।
(ख) निकट की दृष्टि के लिए: लेंस की क्षमता P = +1.5 D है।
अतः f = 1/(+1.5) ≈ +0.666 मीटर या +66.66 सेमी। धनात्मक चिन्ह दर्शाता है कि यह एक उत्तल लेंस है।
उत्तर : व्यक्ति का दूर बिंदु 80 सेमी पर है, अर्थात अनंत पर स्थित वस्तु का प्रतिबिंब 80 सेमी पर बनना चाहिए। इसलिए, संशोधक लेंस की फोकस दूरी f = -80 सेमी = -0.8 मीटर होगी (ऋणात्मक क्योंकि अवतल लेंस)।
लेंस की क्षमता P = 1/f (मीटर में) = 1/(-0.8) = -1.25 डाइऑप्टर (D)
अतः आवश्यक लेंस अवतल लेंस होगा और उसकी क्षमता -1.25 D होगी।
उत्तर :
(ध्यान दें: यहाँ चित्र बनाना संभव नहीं है, परन्तु स्पष्टीकरण इस प्रकार है)
उत्तर : सामान्य मानव नेत्र की समंजन क्षमता एक सीमा तक ही कार्य करती है। नेत्र लेंस की फोकस दूरी को घटाकर एक न्यूनतम सीमा से अधिक नहीं किया जा सकता। जब वस्तु को 25 सेमी (जो सामान्य निकट बिंदु है) से भी पास रखा जाता है, तो लेंस अत्यधिक उत्तल होने के बावजूद प्रकाश किरणों को इतना अधिक मोड़ नहीं पाता कि प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर स्पष्ट बन सके। प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे बनने लगता है, जिससे वस्तु धुंधली दिखाई देती है।
उत्तर : जब वस्तु की दूरी बदलती है, तब भी प्रतिबिंब सदैव दृष्टिपटल पर ही बनना चाहिए तभी वस्तु स्पष्ट दिखेगी। ऐसा नेत्र की समंजन क्षमता के कारण हो पाता है। वस्तु दूर जाने पर पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, जिससे लेंस पतला होकर उसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है। इस प्रकार, वस्तु की दूरी के साथ लेंस की फोकस दूरी स्वतः समायोजित हो जाती है, जिससे प्रतिबिंब की दूरी (नेत्र लेंस से दृष्टिपटल तक) लगभग स्थिर रहती है।
उत्तर : तारे टिमटिमाते प्रतीत होते हैं क्योंकि उनसे आने वाला प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय लगातार अपवर्तित होता रहता है। वायुमंडल की विभिन्न परतों का तापमान एवं घनत्व अलग-अलग होता है, जिसके कारण उनका अपवर्तनांक निरंतर बदलता रहता है। इस परिवर्तनशील अपवर्तन के कारण तारे से आने वाली प्रकाश किरणें हमारी आँख में टेढ़ी-मेढ़ी होकर प्रवेश करती हैं, जिससे तारे की चमक एवं स्थिति में क्षणिक परिवर्तन (टिमटिमाहट) दिखाई देता है।
उत्तर : ग्रह तारों की तुलना में पृथ्वी के बहुत निकट स्थित हैं। इस कारण वे हमें प्रकाश के सूक्ष्म बिंदुओं की बजाय चक्रिकाओं (डिस्क) के रूप में दिखाई देते हैं। वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण ग्रह के चक्रिका के विभिन्न बिंदुओं से आने वाली प्रकाश की तीव्रता में होने वाले परिवर्तन एक-दूसरे की क्षतिपूर्ति कर देते हैं। इसलिए ग्रह का कुल प्रकाश तीव्रता में कोई अचानक परिवर्तन (टिमटिमाहट) नहीं होता और वे स्थिर प्रकाश स्रोतों की तरह दिखते हैं।
उत्तर : सूर्योदय या सूर्यास्त के समय सूर्य क्षितिज के निकट होता है और उसकी किरणों को हम तक पहुँचने के लिए वायुमंडल की मोटी परत से गुजरना पड़ता है। वायुमंडल के कण (धूल, जलवाष्प आदि) प्रकाश के कम तरंगदैर्ध्य वाले रंगों (जैसे नीला, बैंगनी) का प्रकीर्णन अधिक करते हैं। इन रंगों के प्रकीर्णित हो जाने के बाद, केवल अधिक तरंगदैर्ध्य वाले रंग (जैसे लाल, नारंगी) सीधे हमारी आँखों तक पहुँच पाते हैं। इसीलिए सूर्य रक्ताभ (लालिमा लिए हुए) प्रतीत होता है।
उत्तर : पृथ्वी पर हमें आकाश नीला दिखाई देता है क्योंकि वायुमंडल में उपस्थित कण सूर्य के प्रकाश में से नीले रंग का प्रकीर्णन करते हैं। अंतरिक्ष में वायुमंडल नहीं होता। वहाँ प्रकाश का प्रकीर्णन करने के लिए कोई कण (वायु, धूल आदि) नहीं होते। इसलिए, सूर्य का प्रकाश बिना किसी प्रकीर्णन के सीधा ही चलता रहता है और अंतरिक्ष यात्री को सूर्य एक तेज चमकीला बिंदु तथा उसके चारों ओर का आकाश काला (अंधकारमय) दिखाई देता है।
उत्तर :
(यहाँ चित्र बनाना संभव नहीं है, परन्तु नेत्र के प्रमुख भागों के नाम इस प्रकार हैं)
मानव नेत्र के प्रमुख भाग: 1. नेत्र श्वेतमणि (Sclera), 2. कॉर्निया (Cornea), 3. परितारिका (Iris), 4. पुतली (Pupil), 5. अभिनेत्र लेंस (Eye lens), 6. पक्ष्माभी पेशियाँ (Ciliary muscles), 7. दृष्टिपटल/रेटिना (Retina), 8. अंध बिंदु (Blind spot), 9. पीत बिंदु (Yellow spot), 10. दृक तंत्रिका (Optic nerve), 11. जलीय द्रव (Aqueous humour), 12. काचाभ द्रव (Vitreous humour)।
उत्तर : मानव नेत्र एक अत्यंत संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण ज्ञानेंद्रिय है जो हमें इस रंगीन संसार को देखने की क्षमता प्रदान करता है। यह एक प्राकृतिक कैमरे की भाँति कार्य करता है।
कार्य विधि: किसी वस्तु से चलने वाली प्रकाश किरणें सबसे पहले नेत्र के पारदर्शी कॉर्निया से अपवर्तित होती हैं। फिर वे पुतली से होकर अभिनेत्र लेंस पर पड़ती हैं। लेंस इन किरणों को और अधिक मोड़कर (अपवर्तित करके) प्रकाश-सुग्राही परदे दृष्टिपटल (रेटिना) पर वस्तु का वास्तविक एवं उल्टा प्रतिबिंब बनाता है। रेटिना इस प्रतिबिंब को विद्युत संकेतों में बदलकर दृक तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क तक भेज देता है। मस्तिष्क इस संकेत की व्याख्या करके हमें वस्तु का सीधा एवं स्पष्ट बिंब दर्शाता है।
प्रमुख अंग एवं कार्य:
उत्तर : अभिनेत्र लेंस की वह क्षमता जिसके कारण वह पक्ष्माभी पेशियों के सहारे अपनी वक्रता एवं फोकस दूरी को परिवर्तित कर लेता है, समंजन क्षमता कहलाती है। जब हम पास की वस्तु देखते हैं, तो पेशियाँ सिकुड़ती हैं, लेंस मोटा (अधिक उत्तल) हो जाता है और फोकस दूरी घट जाती है। जब दूर की वस्तु देखते हैं, तो पेशियाँ शिथिल होती हैं, लेंस पतला हो जाता है और फोकस दूरी बढ़ जाती है। इस प्रकार यह क्षमता हमें विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को स्पष्ट देखने में सहायक होती है।
उत्तर : सामान्य नेत्र के लिए वह न्यूनतम दूरी, जहाँ तक वस्तु को पास लाकर भी बिना अधिक प्रयास के स्पष्ट देखा जा सके, 25 सेंटीमीटर होती है। इसे स्पष्ट दर्शन की न्यूनतम दूरी या निकट बिंदु कहते हैं।
उत्तर : मोतियाबिन्द एक ऐसी स्थिति है जिसमें अधिक उम्र के कुछ व्यक्तियों का प्राकृतिक अभिनेत्र लेंस धीरे-धीरे धुंधला या दूधिया हो जाता है। इसके कारण लेंस की पारदर्शिता कम हो जाती है और प्रकाश रेटिना तक ठीक से नहीं पहुँच पाता, जिससे दृष्टि धुंधली हो जाती है।
इसे दूर करने का एकमात्र प्रभावी उपाय शल्य चिकित्सा (सर्जरी) है। इस ऑपरेशन में धुंधले प्राकृतिक लेंस को हटाकर उसकी जगह एक कृत्रिम पारदर्शी इंट्राओकुलर लेंस (IOL) लगा दिया जाता है, जिससे रोगी की दृष्टि वापस आ जाती है।
उत्तर : जब नेत्र की समंजन क्षमता में कमी आ जाती है या नेत्र की संरचना में कोई अनियमितता हो जाती है, तो वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर नहीं बन पाता। इस स्थिति को दृष्टि दोष या अपवर्तन दोष कहते हैं। इससे व्यक्ति को वस्तुएँ धुंधली दिखाई देने लगती हैं।
मुख्य रूप से दृष्टि दोष तीन प्रकार के होते हैं:
उत्तर : निकट-दृष्टि दोष (मायोपिया) एक ऐसा दृष्टि दोष है जिसमें व्यक्ति निकट रखी वस्तुओं को तो स्पष्ट देख सकता है, लेकिन दूर रखी वस्तुएँ धुंधली दिखाई देती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नेत्र लेंस अत्यधिक अभिसारी हो जाता है या नेत्र गोलक लंबा हो जाता है, जिससे दूर की वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल के सामने बनता है।
इसे दूर करने के लिए अवतल लेंस (अपसारी लेंस) का प्रयोग किया जाता है। यह लेंस प्रकाश किरणों को आँख में प्रवेश करने से पहले ही फैला देता है, जिससे प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर सही स्थान पर बनने लगता है और दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
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