UP Board Class 10 Science 6. जैव प्रक्रम is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 10 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
उत्तर : विसरण एक धीमी एवं निष्क्रिय प्रक्रिया है जो केवल छोटी दूरी तक ही कार्य कर सकती है। हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों का शरीर बड़ा एवं जटिल होता है, जिसमें ऊतक शरीर की गहराई में स्थित होते हैं। केवल विसरण द्वारा वायुमंडल से ऑक्सीजन लेकर शरीर के प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाना संभव नहीं है। इसीलिए श्वसन तंत्र एवं रक्त परिसंचरण जैसी कुशल प्रणालियों की आवश्यकता होती है जो सक्रिय रूप से ऑक्सीजन का परिवहन कर सकें।
उत्तर : किसी वस्तु के सजीव होने का निर्धारण करने के लिए हम जैव प्रक्रमों के होने का मापदंड उपयोग करते हैं। ये प्रक्रम हैं – पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, संवेदनशीलता, वृद्धि, प्रजनन आदि। कोई भी वस्तु जो इनमें से एक या अधिक प्रक्रम स्वयं दर्शाती है, उसे सजीव माना जाता है। उदाहरण के लिए, एक पौधा प्रकाश संश्लेषण (पोषण) करता है और वृद्धि करता है, इसलिए वह सजीव है।
उत्तर : विभिन्न जीव अपने जैव प्रक्रमों को चलाने एवं शरीर की वृद्धि के लिए विभिन्न कच्ची सामग्रियों का उपयोग करते हैं। मुख्य कच्ची सामग्रियाँ हैं:
1. जल: सभी जैव रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए आवश्यक।
2. कार्बन डाइऑक्साइड: स्वपोषी पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण में भोजन बनाने के लिए उपयोग की जाती है।
3. ऑक्सीजन: अधिकांश जीवों द्वारा भोजन का ऑक्सीकरण कर ऊर्जा प्राप्त करने (श्वसन) के लिए।
4. खनिज लवण: पौधों एवं जंतुओं में विभिन्न कार्यों एवं संरचना के लिए।
5. भोजन (कार्बनिक पदार्थ): विषमपोषी जीव ऊर्जा एवं शारीरिक निर्माण के लिए बाहर से भोजन ग्रहण करते हैं।
उत्तर : किसी जीव के जीवित रहने एवं उसके जीवन को बनाए रखने (अनुरक्षण) के लिए निम्नलिखित मूलभूत जैव प्रक्रम अत्यंत आवश्यक हैं:
1. पोषण: ऊर्जा एवं शारीरिक वृद्धि के लिए भोजन प्राप्त करना।
2. श्वसन: भोजन से ऊर्जा मुक्त करना।
3. परिवहन: शरीर के विभिन्न भागों तक पदार्थों का वहन।
4. उत्सर्जन: शरीर से हानिकारक नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना।
5. संवेदनशीलता एवं अनुक्रिया: पर्यावरणीय परिवर्तनों को पहचानना एवं उनके प्रति प्रतिक्रिया देना।
6. वृद्धि: शरीर का आकार एवं कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि।
इन प्रक्रमों के बिना जीव का अस्तित्व संभव नहीं है।
उत्तर : स्वयंपोषी एवं विषमपोषी पोषण में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:
| स्वयंपोषी पोषण | विषमपोषी पोषण |
|---|---|
| इसमें जीव सरल अकार्बनिक पदार्थों (जल, CO₂) से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं संश्लेषित करते हैं। | इसमें जीव दूसरे जीवों या उनसे प्राप्त कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। |
| यह प्रक्रिया केवल हरे पौधों एवं कुछ जीवाणुओं में होती है। | यह प्रक्रिया सभी जंतुओं, कवकों एवं अधिकांश जीवाणुओं में होती है। |
| इसके लिए क्लोरोफिल की आवश्यकता होती है। | इसके लिए क्लोरोफिल की आवश्यकता नहीं होती। |
| उदाहरण: सभी हरे पौधे। | उदाहरण: मनुष्य, जंतु, कवक। |
उत्तर : पौधा प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री निम्नलिखित स्रोतों से प्राप्त करता है:
1. जल: पौधे की जड़ें मृदा से जल एवं खनिज अवशोषित करती हैं।
2. कार्बन डाइऑक्साइड: पत्तियों की सतह पर उपस्थित सूक्ष्म रंध्रों (स्टोमेटा) द्वारा वायुमंडल से ग्रहण करते हैं।
3. सूर्य का प्रकाश: पत्तियों में उपस्थित हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करते हैं।
4. क्लोरोफिल: यह हरित वर्णक क्लोरोप्लास्ट के भीतर ही पाया जाता है, जो प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलने का कार्य करता है।
उत्तर : हमारे आमाशय की भित्ति की कोशिकाओं द्वारा स्रावित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) की निम्नलिखित महत्वपूर्ण भूमिकाएँ हैं:
1. अम्लीय माध्यम उत्पन्न करना: यह अम्ल आमाशय में अम्लीय माध्यम बनाता है, जो पेप्सिन एंजाइम की क्रिया के लिए अनुकूल है। पेप्सिन अम्लीय माध्यम में ही प्रोटीन के पाचन का कार्य करता है।
2. रोगाणुनाशक: यह भोजन के साथ आए हानिकारक जीवाणुओं एवं रोगाणुओं को नष्ट कर देता है।
3. प्रोटीन को सरल बनाना: अम्ल भोजन में उपस्थित जटिल प्रोटीन अणुओं को सरल रूप में परिवर्तित करने में सहायता करता है, ताकि एंजाइम उन पर आसानी से कार्य कर सकें।
उत्तर : पाचक एंजाइम जैव उत्प्रेरक हैं जो भोजन के जटिल अघुलनशील अणुओं को सरल, घुलनशील एवं अवशोषण योग्य अणुओं में विखंडित करते हैं। इनका मुख्य कार्य पाचन की दर को बढ़ाना है। प्रत्येक एंजाइम एक विशिष्ट पदार्थ पर कार्य करता है:
• एमाइलेज: स्टार्च को माल्टोज शर्करा में।
• पेप्सिन एवं ट्रिप्सिन: प्रोटीन को पेप्टाइड्स एवं अमीनो अम्ल में।
• लाइपेज: वसा को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में।
इस प्रकार, एंजाइम पाचन प्रक्रिया को कुशल, तीव्र एवं संपन्न बनाते हैं।
उत्तर : क्षुद्रांत्र (छोटी आंत) पचे हुए भोजन के अवशोषण के लिए अद्भुत रूप से अनुकूलित है:
1. लंबाई: यह लगभग 7.5 मीटर लंबी होती है, जो अवशोषण के लिए लंबी दूरी प्रदान करती है।
2. विलाई: इसकी आंतरिक सतह पर अंगुली के समान असंख्य सूक्ष्म उभार होते हैं, जिन्हें विलाई कहते हैं। ये अवशोषण सतह के क्षेत्रफल को विशाल रूप से बढ़ा देते हैं।
3. रक्त वाहिकाओं का जाल: प्रत्येक विलस में रक्त केशिकाओं एवं लसीका वाहिकाओं (लैक्टील) का सघन जाल होता है, जो अवशोषित पोषक तत्वों को शरीर के सभी भागों तक पहुँचाता है।
4. कोशिकीय संरचना: विलाई की सतह की कोशिकाओं में सूक्ष्म अंकुर (माइक्रोविलाई) होते हैं, जो अवशोषण क्षेत्रफल को और भी बढ़ा देते हैं।
इस प्रकार की संरचना क्षुद्रांत्र को भोजन के पोषक तत्वों के अवशोषण का प्रमुख स्थान बनाती है।
उत्तर : स्थलीय जीव, जलीय जीवों की तुलना में श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने में निम्नलिखित कारणों से लाभप्रद स्थिति में हैं:
1. ऑक्सीजन की सांद्रता: वायुमंडल में ऑक्सीजन गैस की सांद्रता (लगभग 21%) जल में घुली ऑक्सीजन की सांद्रता की तुलना में बहुत अधिक होती है।
2. प्राप्ति में सरलता: स्थलीय जीव सीधे वायुमंडल से ऑक्सीजन ले सकते हैं, जबकि जलीय जीवों को जल में घुली ऑक्सीजन को निकालने के लिए विशेष श्वसन अंगों (जैसे गलफड़े) की आवश्यकता होती है, जो अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं।
3. प्राप्ति की दर: गैस के रूप में ऑक्सीजन का विसरण द्रव (जल) में घुली ऑक्सीजन की तुलना में तेजी से होता है।
इस प्रकार, स्थलीय वातावरण ऑक्सीजन की आसान एवं प्रचुर उपलब्धता प्रदान करता है।
उत्तर : ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त करने के मुख्यतः तीन पथ हैं, जो ऑक्सीजन की उपलधता पर निर्भर करते हैं:
| श्वसन का प्रकार | स्थिति | स्थान | उत्पाद | ऊर्जा मुक्ति |
|---|---|---|---|---|
| वायवीय श्वसन | ऑक्सीजन की उपस्थिति | कोशिका द्रव्य एवं माइटोकॉन्ड्रिया | CO₂, जल, ऊर्जा | अधिकतम (36 ATP प्रति ग्लूकोज अणु) |
| अवायवीय श्वसन (किण्वन) | ऑक्सीजन की अनुपस्थिति | कोशिका द्रव्य | यीस्ट में: इथेनॉल + CO₂ + ऊर्जा मांसपेशियों में: लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा |
कम (2 ATP प्रति ग्लूकोज अणु) |
उत्तर : मनुष्यों में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन रक्त द्वारा होता है, जिसमें हीमोग्लोबिन नामक वर्णक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ऑक्सीजन का परिवहन:
1. फेफड़ों की वायु कूपिकाओं में ऑक्सीजन का दाब अधिक होता है।
2. यहाँ ऑक्सीजन रक्त केशिकाओं में विसरित होकर लाल रक्त कणिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर अस्थाई यौगिक ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है।
3. यह ऑक्सीहीमोग्लोबिन रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न ऊतकों तक पहुँचता है।
4. ऊतकों में ऑक्सीजन का दाब कम होने पर ऑक्सीहीमोग्लोबिन विखंडित होकर ऑक्सीजन मुक्त कर देता है, जो कोशिकाओं द्वारा उपयोग की जाती है।
कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन:
1. कोशिकीय श्वसन के फलस्वरूप ऊतकों में CO₂ का दाब अधिक होता है।
2. CO₂ तीन प्रकार से रक्त में परिवहित होती है:
a. प्लाज्मा में घुलकर (लगभग 7%)।
b. हीमोग्लोबिन के साथ कार्बामिनोहीमोग्लोबिन बनाकर (लगभग 20-25%)।
c. बाइकार्बोनेट आयन (HCO₃⁻) के रूप में (लगभग 70%)।
3. रक्त यह CO₂ फेफड़ों तक ले जाता है, जहाँ यह वायु कूपिकाओं में विसरित होकर श्वासोच्छ्वास द्वारा बाहर निकल जाती है।
उत्तर : मानव फेफड़ों की संरचना गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए अत्यंत कुशलता से अनुकूलित है:
1. शाखन तंत्र: श्वासनली बारीक श्वसनिकाओं में विभाजित होती है, जो आगे चलकर असंख्य सूक्ष्म, पतली भित्ति वाली वायु थैलियों में खुलती हैं, जिन्हें वायु कूपिकाएँ कहते हैं।
2. वायु कूपिकाओं की संरचना: ये अंगूर के गुच्छे के समान गोलाकार संरचनाएँ हैं। इनकी भित्ति एककोशिकीय एवं पतली होती है तथा इन पर रक्त केशिकाओं का सघन जाल फैला होता है।
3. अधिकतम सतह क्षेत्र: दोनों फेफड़ों में लगभग 30-50 करोड़ वायु कूपिकाएँ होती हैं, जो गैस विनिमय के लिए लगभग 100 वर्ग मीटर का विशाल क्षेत्रफल प्रदान करती हैं – एक टेनिस कोर्ट के लगभग बराबर!
4. नम सतह: कूपिकाओं की भीतरी सतह नम होती है, जो गैसों के विसरण में सहायक है।
इस प्रकार की संरचना ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड के तीव्र एवं कुशल आदान-प्रदान को संभव बनाती है।
उत्तर : मानव में वहन तंत्र (परिसंचरण तंत्र) के मुख्य घटक एवं उनके कार्य निम्नलिखित हैं:
| घटक | कार्य |
|---|---|
| हृदय | यह एक पंप की तरह कार्य करता है जो संकुचन एवं शिथिलन द्वारा शुद्ध रक्त को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है तथा अशुद्ध रक्त को फेफड़ों में भेजता है। |
| रक्त | यह तरल संयोजी ऊतक है जो पोषक तत्वों, गैसों, हार्मोन्स एवं अपशिष्ट पदार्थों का वहन करता है। इसके अवयव हैं:
• प्लाज्मा: तरल माध्यम। • लाल रक्त कणिकाएँ: ऑक्सीजन का वहन। • श्वेत रक्त कणिकाएँ: रोग प्रतिरोधक। • प्लेटलेट्स: रक्त का थक्का बनाना। |
| रक्त वाहिकाएँ | • धमनियाँ: हृदय से शुद्ध रक्त शरीर के अंगों तक ले जाती हैं।
• शिराएँ: अंगों से अशुद्ध रक्त हृदय तक लाती हैं। • केशिकाएँ: धमनियों एवं शिराओं को जोड़ने वाली सूक्ष्म वाहिकाएँ, जहाँ वास्तविक पदार्थों का आदान-प्रदान होता है। |
उत्तर : स्तनधारियों एवं पक्षियों में ऑक्सीजनित (शुद्ध) एवं विऑक्सीजनित (अशुद्ध) रक्त को अलग रखना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत आवश्यक है:
1. उच्च ऊर्जा आवश्यकता: इन जीवों को शरीर का तापमान स्थिर रखने (समतापी) एवं सक्रिय जीवनशैली के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा वायवीय श्वसन से प्राप्त होती है, जिसके लिए अधिक ऑक्सीजन चाहिए।
2. दक्षता बढ़ाना: यदि दोनों प्रकार का रक्त मिल जाए, तो शरीर के अंगों को कम ऑक्सीजन वाला रक्त मिलेगा, जिससे ऊर्जा उत्पादन कम होगा।
3. चार-कक्षीय हृदय: इन जीवों में हृदय के दो आलिंद एवं दो निलय होते हैं, जो शुद्ध एवं अशुद्ध रक्त के लिए पूर्णतः पृथक मार्ग बनाते हैं। इससे शरीर को अधिकतम ऑक्सीजन युक्त रक्त मिलता है, जो उनकी उच्च चयापचय दर को पूरा करता है।
उत्तर : उच्च संगठित पादपों (जैसे फूलदार पौधे) में वहन तंत्र के दो मुख्य घटक या संवहनी ऊतक होते हैं:
1. जाइलम (दारू): यह ऊतक मुख्यतः जड़ों से पत्तियों तक जल एव
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