UP Board Class 12 Chemistry 1. ठोस अवस्था is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
हल: ठोस अवस्था में अवयवी कण गति करने के लिए स्वतन्त्र नहीं होते हैं। अवयवी कणों के मध्य प्रबल आकर्षण बलों के कारण ये केवल अपनी माध्य स्थितियों के चारों ओर दोलन कर सकते हैं। इस कारण ठोस सघन व्यवस्था तथा कठोर संरचना रखते हैं।
हल: ठोसों में अवयवी कण अपनी माध्य स्थितियों में प्रबल आकर्षण बलों द्वारा बँधे रहते हैं। अणुओं के मध्य दूरी अर्थात् अन्तराण्विक दूरी दाब बढ़ाने या कम करने पर अप्रभावित रहती है। अत: ठोसों का आयतन निश्चित होता है।
हल:
| अक्रिस्टलीय ठोस | क्रिस्टलीय ठोस |
|---|---|
| पॉलियूरिथेन | बेन्जोइक अम्ल |
| टेफ्लॉन | नैफ्थैलीन |
| सेलोफेन | पोटैशियम नाइट्रेट |
| पॉलिवाइनिल क्लोराइड | ताँबा |
| रेशा काँच |
हल: द्रव अभिलाक्षणिक गुण अर्थात् बहने की प्रवृत्ति रखते हैं। काँच भी इस गुण को प्रदर्शित करता है यद्यपि यह अत्यन्त मन्द बहता है। पुरानी इमारतों की खिड़कियों और दरवाजों में जड़े शीशे निरपवाद रूप से शीर्ष की अपेक्षा अधस्तल में किंचित मोटे पाए जाते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि काँच अत्यधिक मन्दता से नीचे प्रवाहित होकर अधस्तल भाग को किंचित मोटा कर देता है। अत: काँच को अतिशीतित द्रव माना जाता है।
हल: एक ठोस जो सभी दिशाओं में अपवर्तनांक के समान मान रखता है, समदैशिक प्रकृति का होता है तथा इसके कारण इस ठोस की प्रकृति अक्रिस्टलीय होती है। तेज धार वाले औजार से काटने पर यह साफ विदलन प्रदर्शित नहीं करता है बल्कि यह अनियमित सतहों वाले टुकड़ों में टूट जाता है।
हल:
हल: चूँकि, ठोस 'A' ठोस एवं गलित दोनों अवस्थाओं में विद्युतरोधी है, यह इसमें आयनों की अनुपस्थिति को प्रदर्शित करता है। यह अत्यन्त उच्च ताप पर पिघलता है, अतः यह एक विशाल अणु है। ये सहसंयोजक ठोसों के गुण हैं। अतः यह एक सहसंयोजक ठोस है।
हल: आयनिक ठोसों की गलित अवस्था में विद्युत संचालन आयनों की गति के कारण होता है। ठोस अवस्था में आयन गति नहीं कर सकते हैं तथा प्रबल स्थिर वैद्युत बलों द्वारा बँधे रहते हैं। अत: ये कुचालक के समान व्यवहार करते हैं।
हल: धात्विक ठोस। एक ठोस के विद्युत सुचालक होने के लिए मुक्त इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति आवश्यक होती है। धात्विक ठोसों में मुक्त इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं, जो विद्युत चालकता, आघातवर्ध्यता और तन्यता प्रदान करते हैं।
हल: जालक बिन्दु एक क्रिस्टल जालक में एक विशिष्ट अवयवी कण (परमाणु, आयन या अणु) की स्थिति को निरूपित करता है। दिक्स्थान या आकाश में जालक बिन्दुओं की व्यवस्था एक विशिष्ट क्रिस्टलीय ठोस की ज्यामिति के लिए उत्तरदायी होती है।
हल: एक एकक कोष्ठिका निम्न पैरामीटरों द्वारा अभिलाक्षणित होती है-
(i) उसके तीनों किनारों की विमाओं a, b तथा c के द्वारा।
(ii) किनारों (कोरों) के मध्य कोण α (b तथा c के मध्य), β (a तथा c के मध्य) और γ (a तथा b के मध्य) के द्वारा।
इस प्रकार एकक कोष्ठिका छः पैरामीटरों a, b, c, α, β और γ द्वारा अभिलाक्षणित होती है।
हल:
(i) षट्कोणीय और एकनताक्ष एकक कोष्ठिका में विभेद:
| प्राचल | षट्कोणीय | एकनताक्ष |
|---|---|---|
| अक्षीय दूरियाँ | a = b ≠ c | a ≠ b ≠ c |
| अक्षीय कोण | α = β = 90°, γ = 120° | α = γ = 90°, β ≠ 90° |
| उदाहरण | ग्रेफाइट, ZnO | Na₂SO₄·10H₂O, गन्धक |
(ii) फलक केन्द्रित और अंतःकेन्द्रित एकक कोष्ठिका में विभेद:
| प्राचल | फलक केन्द्रित (FCC) | अंतः केन्द्रित (BCC) |
|---|---|---|
| जालक बिन्दुओं की स्थिति | प्रत्येक कोने तथा प्रत्येक फलक के केन्द्र पर | प्रत्येक कोने तथा घन के केन्द्र पर |
| एकक कोष्ठिका में परमाणुओं की संख्या | 8 × 1/8 + 6 × 1/2 = 4 | 8 × 1/8 + 1 × 1 = 2 |
हल:
(i) एक एकक कोष्ठिका के कोने पर उपस्थित बिन्दु आठ एकक कोष्ठिकाओं द्वारा बराबर सहभाजित होता है तथा इसलिए इस प्रकार के प्रत्येक बिन्दु का केवल 1/8 वाँ भाग एक विशिष्ट एकक कोष्ठिका से सम्बन्धित होता है।
(ii) एक काय या अंत: केन्द्रित बिन्दु पूर्णतया एक एकक कोष्ठिका से सम्बन्धित होता है क्योंकि यह अन्य किसी एकक कोष्ठिका द्वारा सहभाजित नहीं होता है।
हल: चार, क्योंकि प्रत्येक परमाणु चार अन्य परमाणुओं द्वारा घिरा होता है।
हल: एक निविड संकुलित संरचना (0.5 मोल) में कुल परमाणुओं की संख्या (N) = 0.5 × 6.022 × 10²³ = 3.011 × 10²³
अष्टफलकीय रिक्तियों की संख्या = N = 3.011 × 10²³
चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2N = 2 × 3.011 × 10²³ = 6.022 × 10²³
कुल रिक्तियों की संख्या = N + 2N = 3.011 × 10²³ + 6.022 × 10²³ = 9.033 × 10²³
हल: माना ccp में उपस्थित N तत्व के परमाणु = x
अतः चतुष्फलकीय रिक्तियों की संख्या = 2x
चूँकि, M तत्व के परमाणुओं द्वारा चतुष्फलकीय रिक्तियों का 1/3 भाग अध्यासित होता है।
अतः M तत्व के परमाणुओं की संख्या = (1/3) × 2x = 2x/3
M : N का अनुपात = (2x/3) : x = 2 : 3
अत: यौगिक का सूत्र = M₂N₃
हल:
(i) सरल घनीय जालक में संकुलन क्षमता = 52.4%
(ii) अंतः केन्द्रित घनीय जालक में संकुलन क्षमता = 68%
(iii) षट्कोणीय निविड संकुलित जालक में संकुलन क्षमता = 74%
षट्कोणीय निविड संकुलित जालक उच्चतम संकुलन क्षमता (74%) रखता है।
हल:
घनत्व (d) = (Z × M) / (a³ × Nₐ)
अतः Z = (d × a³ × Nₐ) / M
प्रश्नानुसार,
M = 2.7 × 10⁻² kg mol⁻¹
a = 405 pm = 405 × 10⁻¹² m = 4.05 × 10⁻¹⁰ m
d = 2.7 × 10³ kg m⁻³
Nₐ = 6.022 × 10²³ mol⁻¹
Z = (2.7 × 10³ kg m⁻³ × (4.05 × 10⁻¹⁰ m)³ × 6.022 × 10²³ mol⁻¹) / (2.7 × 10⁻² kg mol⁻¹)
Z ≈ 4
चूँकि एकक कोष्ठिका में चार परमाणु हैं अतः घनीय एकक कोष्ठिका फलक केन्द्रित होनी चाहिए।
हल: जब एक ठोस को गर्म किया जाता है, तो क्रिस्टल में एक रिक्तिका दोष (शॉट्की दोष) उत्पन्न हो सकता है। गर्म करने पर, कुछ जालक स्थल रिक्त हो जाते हैं तथा ठोस का घनत्व कम हो जाता है क्योंकि आयनों की संख्या प्रति इकाई आयतन घटती है।
हल:
(i) ZnS फ्रेंकेल दोष को दर्शाता है क्योंकि इसके आयनों के आकार में अधिक अन्तर होता है।
(ii) AgBr फ्रेंकल तथा शॉट्की दोनों ही दोषों को दर्शाता है।
हल: जब एक उच्च संयोजकता के धनायन को अशुद्धि के रूप में एक आयनिक ठोस में मिलाया जाता है तो कुछ रिक्तिकाएँ उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, जब स्ट्रॉन्शियम क्लोराइड (SrCl₂) को सोडियम क्लोराइड (NaCl) में मिलाया जाता है तो Sr²⁺ के कुछ स्थान Na⁺ द्वारा घेर लिए जाते हैं। प्रत्येक Sr²⁺ आयन दो Na⁺ आयनों को प्रतिस्थापित करता है। यह एक आयन का स्थान ग्रहण करता है किन्तु दूसरा स्थान रिक्त रहता है। इस प्रकार उत्पन्न धनायन रिक्तिकाओं की संख्या Sr²⁺ आयनों की संख्या के बराबर होती है।
हल: सोडियम क्लोराइड (NaCl) के क्रिस्टल को सोडियम वाष्प के वातावरण में गर्म करने पर, सोडियम परमाणु क्रिस्टल की सतह पर जम जाते हैं। Cl⁻ आयन क्रिस्टल की सतह में विसरित हो जाते हैं तथा Na परमाणुओं के साथ जुड़कर NaCl देते हैं। ऐसा Na⁺ आयन बनाने के लिए Na परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन के निकल जाने से होता है। निर्मुक्त इलेक्ट्रॉन विसरित होकर क्रिस्टल के ऋणायनिक स्थान को अध्यासित करते हैं। ये इलेक्ट्रॉन प्रकाश से ऊर्जा अवशोषित करते हैं और पीले रंग के तुल्य विकिरणों को उत्सर्जित करते हैं। ये इलेक्ट्रॉन F-केन्द्र कहलाते हैं।
हल: n-प्रकार के अर्द्धचालक से तात्पर्य है कि चालकता में वृद्धि इलेक्ट्रॉनों के आधिक्य की उपस्थिति के कारण होती है। अत: एक वर्ग-14 के तत्व को एक वर्ग-15 के तत्व जैसे-आर्सेनिक या फॉस्फोरस के साथ अपमिश्रित करना चाहिए।
हल: लौहचुम्बकीय पदार्थ, फेरीचुम्बकीय पदार्थ की तुलना में अधिक अच्छे स्थायी चुम्बक बनाते हैं। ठोस अवस्था में लौहचुम्बकीय पदार्थों के धातु आयन छोटे खण्डों (डोमेन) में समूहित होते हैं। पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यासित हो जाते हैं। चुम्बकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी यह अभिविन्यास बना रहता है, अतः यह एक स्थायी चुम्बक बन जाता है। यह गुण फेरीचुम्बकीय पदार्थों में नहीं पाया जाता है।
हल: अक्रिस्टलीय ठोस असमाकृति के कणों से बने होते हैं। इन ठोसों में अवयवी कणों (परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनों) की व्यवस्था केवल लघु-परासी व्यवस्था होती है। ऐसी व्यवस्था में नियमित और आवर्ती पुनरावृत व्यवस्था केवल अल्प दूरियों तक देखी जाती है।
उदाहरण: काँच, रबर, प्लास्टिक आदि।
हल: काँच एक अक्रिस्टलीय ठोस है जिसमें अवयवी कण (SiO₄ चतुष्फलक) केवल लघु परासी व्यवस्था रखते हैं। क्वार्ट्ज सिलिका का एक क्रिस्टलीय रूप है जिसमें SiO₄ इकाईयाँ दीर्घ परासी व्यवस्था में व्यवस्थित रहती हैं। क्वार्टज को पिघलाकर तथा फिर शीघ्रता से ठण्डा करके काँच में रूपान्तरित किया जा सकता है।
हल:
(i) P₄O₁₀ - आण्विक ठोस
(ii) (NH₄)₃PO₄ - आयनिक ठोस
(iii) SiC - सहसंयोजक ठोस
(iv) I₂ - आण्विक ठोस
(v) P₄ - आण्विक ठोस
(vi) प्लास्टिक - अक्रिस्टलीय ठोस
(vii) ग्रेफाइट - सहसंयोजक ठोस
(viii) पीतल - धात्विक ठोस
(ix) Rb - धात्विक ठोस
(x) LiBr - आयनिक ठोस
(xi) Si - सहसंयोजक ठोस
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