UP Board Class 12 Chemistry 6. तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत एवं प्रक्रम is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
हल: चुम्बकीय पृथक्करण से उन अयस्कों का सान्द्रण किया जाता है जिनमें एक घटक (अयस्क या गैंग) चुम्बकीय गुणों वाला होता है।
उदाहरण: मैग्नेटाइट (Fe3O4), हेमेटाइट (Fe2O3), सिडेराइट (FeCO3)
हल: इस विधि में बॉक्साइट अयस्क में उपस्थित अशुद्धियों जैसे SiO2, Fe2O3, TiO2 आदि को विभिन्न रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा अवक्षेप रूप में या घुलनशील रूप में दूर किया जाता है।
हल: इस अभिक्रिया में अभिक्रियक ठोस हैं, अतः ये कक्ष ताप पर अभिक्रिया नहीं कर सकते हैं। ऊष्मागतिकी रूप से सुसंगत कुछ अभिक्रियाओं के लिए भी निश्चित मात्रा में सक्रियण ऊर्जा की आवश्यकता होती है जिसके लिए तापन आवश्यक है।
हल: एलिंघम आरेख देखने पर ज्ञात होता है कि Al2O3 और MgO के वक्र एक-दूसरे को 1623 K (1350°C) पर काटते हैं। इस ताप से नीचे के ताप पर Mg, Al2O3 को अपचयित कर सकता है तथा 1665 K से अधिक ताप पर Al, MgO का अपचयन कर सकता है।
हल: Zn2+/Zn के लिए E° का मान (-0.76 V), Cu2+/Cu के लिए E° के मान (+0.34 V) से कम है अतः जिंक प्रबल अपचायक है। जिसके कारण यह घुलनशील संकर में से Cu2+ आयनों को आसानी से प्रतिस्थापित कर देता है।
[Cu(CN)2]- + Zn → [Zn(CN)4]2- + Cu (घुलनशील संकर) (अवक्षेप)
अत: जिंक का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा तभी किया जा सकता है जब जिंक से प्रबल अपचायक जैसे Na, K, Al आदि उपस्थित हों। परन्तु ये सभी जल से अभिक्रिया करके H2 गैस उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार ये धातुएँ उद्देश्य को पूरा नहीं करती और जिंक का निष्कर्षण हाइड्रोधातुकर्म द्वारा नहीं किया जा सकता।
हल: फेन प्लवन विधि में अवनमकों का उपयोग दो सल्फाइड अयस्कों को पृथक करने में किया जाता है। अवनमक एक प्रकार के सल्फाइड अयस्क को फेन में आने से रोकता है जबकि दूसरे प्रकार के सल्फाइड अयस्क को फेन में आने देता है। उदाहरणस्वरूप, NaCN एक अवनमक है। यह चयनित रूप से ZnS को फेन में आने से रोकता है परन्तु PbS को फेन में आने देता है।
हल: Cu2O और Cu2S की तुलना में CuFeS2 (पायराइट) के लिए ΔG° का मान अधिक होता है। अतः CuFeS2 कार्बन या हाइड्रोजन द्वारा अपचयित नहीं हो सकता है।
2CuFeS2 + O2 → 2Cu + 2FeS + SO2 (स्वत: प्रवर्तित नहीं)
जबकि C/CO की तुलना में कॉपर ऑक्साइड के लिए ΔG° का मान कम है। अतः सल्फाइड अयस्क को पहले भर्जन द्वारा ऑक्साइड अयस्क में परिवर्तित करते हैं तत्पश्चात् इसका अपचयन करते हैं।
2Cu2S + 3O2 → 2Cu2O + 2SO2
2Cu2O + C → 4Cu + CO2 (स्वतः प्रवर्तित)
हल:
(i) मंडल परिष्करण: यह अशुद्ध धातुओं के शोधन की विधि है। इस विधि का सिद्धान्त यह है कि अशुद्धियों की विलेयता धातु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अधिक होती है। इस विधि में, अशुद्ध धातु की छड़ के एक किनारे पर वृत्ताकार गतिशील तापक लगा रहता है। गलित मंडल तापक के साथ अग्र दिशा में गतिशील रहता है। शुद्ध धातु तापक से पीछे रहकर क्रिस्टलित हो जाती है जबकि अशुद्धियाँ संलग्न गलित मंडल में चली जाती हैं। इस प्रक्रिया को समान दिशा में कई बार दोहराया जाता है। अंत में अशुद्धियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं। इसे काटकर अलग कर लिया जाता है। यह विधि मुख्य रूप से अति उच्च शुद्धता वाले अर्द्धचालकों तथा अन्य अति शुद्ध धातुओं; जैसे जर्मेनियम, सिलिकॉन, बोरॉन, गैलियम तथा इंडियम को प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी है।
(ii) स्तम्भ वर्णलेखिकी: यह विधि इस सिद्धान्त पर आधारित है कि अधिशोषक पर मिश्रण के विभिन्न घटकों का अधिशोषण अलग-अलग होता है। मिश्रण को द्रव या गैसीय माध्यम में रखा जाता है जो अधिशोषक में से गुजरता है। स्तम्भ में विभिन्न घटक भिन्न-भिन्न स्तरों पर अधिशोषित हो जाते हैं। बाद में अधिशोषित घटकों को उपयुक्त विलायकों द्वारा निक्षालित कर लिया जाता है। इस प्रकार की एक विधि में काँच की नली में Al2O3 का एक स्तम्भ बनाया जाता है एवं गतिशील माध्यम जिसमें घटकों का विलयन उपस्थित होता है, द्रव प्रावस्था में होता है। यह विधि सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले तत्वों के शुद्धिकरण और शुद्ध किए जाने वाले तत्व तथा अशुद्धियों के रासायनिक गुणों में अधिक भिन्नता न होने की स्थिति में, शुद्धिकरण के लिए अत्यधिक उपयोगी है।
हल: एलिंघम आरेख के अनुसार CO (C → CO) तथा CO (CO → CO2) के लिए ΔG° तथा T के मध्य दिये गए वक्र एक दूसरे को 983 K ताप पर काटते हैं। (C → CO) के लिए, 673 K के ताप पर (CO → CO2) के लिए ΔG° का मान अधिक ऋणात्मक है। इसका अर्थ है, 983 K ताप पर या इससे अधिक ताप पर कोक (C) एक अच्छा अपचायक है जबकि इससे निम्न ताप पर CO अच्छा अपचायक है। अतः 673 K ताप पर CO, C की तुलना में अच्छा अपचायक है।
हल: कम क्रियाशील तथा कीमती धातुएँ जैसे एन्टीमनी, सिलीनियम, टेल्यूरियम, चाँदी, सोना तथा प्लेटिनम ऐनोड पंक में पाई जाती हैं। इसका कारण यह है कि कम क्रियाशील होने के कारण ये ऐनोड पर इलेक्ट्रॉन नहीं खो सकती हैं तथा ऐनोड के नीचे ऐनोड पंक के रूप में जमा हो जाती हैं। ऐनोड पर कॉपर धातु सामान्य रूप से इलेक्ट्रॉन खोकर Cu2+ आयन बनाती है।
ऐनोड पर: Cu(s) → Cu2+(aq) + 2e-
नोबल धातुएँ → कोई अभिक्रिया नहीं
हल: वात्या भट्टी में होने वाली अभिक्रियाएँ निम्नानुसार हैं:
वात्या भट्टी में निम्न ताप परिसर पर (500 - 800 K):
(i) 3Fe2O3 + CO → 2Fe3O4 + CO2
(ii) Fe3O4 + 4CO → 3Fe + 4CO2
(iii) Fe2O3 + CO → 2FeO + CO2
वात्या भट्टी में उच्च ताप परिसर पर (900 - 1500 K):
(iv) C + CO2 → 2CO
(v) FeO + CO → Fe + CO2
हल: जिंक ब्लेंड (ZnS) से जिंक के निष्कर्षण में होने वाली अभिक्रियाएँ निम्न प्रकार हैं:
(i) भर्जन: 2ZnS + 3O2 → 2ZnO + 2SO2
(ii) अपचयन: ZnO + C → Zn + CO
हल: कॉपर के धातुकर्म में सिलिका (SiO2) अम्लीय गालक का कार्य करती है। यह गैंग (आयरन की अशुद्धियों) के साथ मिलकर धातुमल बनाती है। कॉपर सल्फाइड अयस्क में FeS अशुद्धि के रूप में होता है।
2FeS + 3O2 → 2FeO + 2SO2 (गैंग)
FeO + SiO2 → FeSiO3 (गालक → आयरन सिलिकेट धातुमल)
हल: वर्ण-लेखन (क्रोमैटोग्राफी) शब्द (Chroma → रंग या वर्ण, Graphein → लेखन) का अर्थ है रंग लेखन। प्रारम्भ में इस विधि का उपयोग केवल रंगीन कार्बनिक यौगिकों के शोधन तथा पृथक्करण के लिए किया जाता था लेकिन आजकल इसका उपयोग दूसरे रंगहीन कार्बनिक यौगिकों के लिए भी किया जाता है।
हल: सामान्यत: वर्णलेखिकी में अधिशोषक ठोस रूप में स्थिर प्रावस्था का कार्य करता है। इसमें निम्न गुण होने चाहिये:
(i) इसकी अधिशोषण क्षमता वरणात्मक होनी चाहिए।
(ii) स्थिर प्रावस्था को गतिशील प्रावस्था या मिश्रण में उपस्थित किसी घटक के साथ अभिक्रिया नहीं करनी चाहिए।
(iii) यह आसानी से उपलब्ध होती हो।
हल: अशुद्ध निकैल को कार्बन मोनोऑक्साइड के प्रवाह में 330-350 K पर गर्म करने से वाष्पशील निकेल टेट्राकार्बोनिल संकुल बन जाता है।
Ni (अशुद्ध) + 4CO → [Ni(CO)4] (निकैल टेट्राकार्बोनिल)
इस कार्बोनिल को 450-470 K ताप पर गर्म करते हैं जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु दे देता है।
[Ni(CO)4] → Ni (शुद्ध) + 4CO
हल: बॉक्साइट अयस्क के सान्द्रण के लिए प्रायः निक्षालन (बॉयर प्रक्रम) का उपयोग करते हैं।
(a) चूर्णित अयस्क को 473-523 K ताप तथा 35-36 bar दाब पर सांद्र सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन से पाचित कर सांद्रित करते हैं। Al2O3 सोडियम ऐलुमिनेट के रूप में तथा SiO2 सोडियम सिलिकेट के रूप में निक्षालित हो जाता है।
Al2O3(s) + 2NaOH(aq) + 3H2O(l) → 2Na[Al(OH)4](aq)
(b) विलयन में CO2 गैस प्रवाहित करते हैं जिससे जलयोजित ऐलुमिना अवक्षेपित हो जाता है।
2Na[Al(OH)4](aq) + CO2(g) → Al2O3.xH2O(s) + 2NaHCO3(aq)
(c) सिलिका अशुद्धि सोडियम सिलिकेट के रूप में विलयन में ही रह जाती है। जलयोजित ऐलुमिना के अवक्षेप को छानकर, धोकर, सुखाकर तथा 1470 K पर गर्म करके शुद्ध Al2O3 प्राप्त करते हैं।
Al2O3.xH2O(s) → Al2O3(s) + xH2O(g)
हल:
| भर्जन | निस्तापन |
|---|---|
| 1. अयस्क को वायु या ऑक्सीजन की अधिकता में गर्म करते हैं। | 1. अयस्क को वायु या ऑक्सीजन की अनुपस्थिति या सीमित आपूर्ति के साथ गर्म करते हैं। |
| 2. इसका उपयोग सल्फाइड अयस्कों के लिए किया जाता है। | 2. इसका उपयोग कार्बोनेट अयस्कों के लिए किया जाता है। |
| 3. धातु ऑक्साइड के साथ SO2 उत्पन्न होती है। | 3. धातु ऑक्साइड के साथ CO2 उत्पन्न होती है। |
| 4. उदाहरण: 2ZnS + 3O2 → 2ZnO + 2SO2 | 4. उदाहरण: ZnCO3 → ZnO + CO2 |
हल:
कच्चा लोहा (पिग आयरन): वात्या भट्टी से प्राप्त लोहे के इस रूप में लगभग 4% कार्बन तथा अन्य अशुद्धियाँ जैसे S, P, Si, Mn आदि सूक्ष्म मात्रा में उपस्थित होती है।
ढलवाँ लोहा: लोहे के इस रूप को, कच्चे लोहे को लोहे एवं कोक के साथ गर्म हवा के झोकों द्वारा पिघलाकर प्राप्त किया जाता है। इसमें थोड़ा कम कार्बन (लगभग 3%) होता है। यह अति कठोर और भंगुर होता है।
हल:
| खनिज | अयस्क |
|---|---|
| 1. भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ (धातु विशेष के), जिनमें धातु उपस्थित होती है, खनिज कहलाते हैं। | 1. जिन खनिजों से धातु का पृथक्करण रासायनिक तथा निष्कर्षण, सुगमता से तथा आर्थिक रूप से लाभदायक हो, किया जा सकता हो, उसे अयस्क कहते हैं। |
| 2. सभी खनिज अयस्क नहीं हैं। | 2. सभी अयस्क खनिज हैं। |
| 3. उदाहरण: बॉक्साइड (Al2O3.2H2O), मिट्टी (केयोलिनाइट, Al2O3.2SiO2.2H2O) | 3. उदाहरण: बॉक्साइड (Al2O3.2H2O) |
हल: कॉपर मेट में मुख्यतः Cu2S और FeS होता है। आयरन सल्फाइड (FeS) अशुद्धि को दूर करने के लिए कॉपर मेट को सिलिका परत चढ़े बेसेमर परिवर्तक में रखकर गर्म वायु के झोंके प्रवाहित करते हैं। सिलिका गालक का कार्य करती है तथा गैंग FeO से संयोग कर धातुमल (FeSiO3) बनाती है।
2FeS + 3O2 → 2FeO + 2SO2
FeO + SiO2 → FeSiO3 (धातुमल)
हल: ऐलुमिनियम धातु प्राप्त करने के लिए गलित ऐलुमिना का अपचयन वैद्युत-अपघटन द्वारा किया जाता है (हॉल-हेरॉल्ट प्रक्रम)। शुद्ध ऐलुमिना का गलनांक उच्च (2323 K) होता है। ऐलुमिना में क्रायोलाइट (Na3AlF6) तथा फ्लोरस्पार (CaF2) मिलाया जाता है क्योंकि:
(i) यह मिश्रण के गलनांक को कम कर देता है।
(ii) यह मिश्रण को विद्युत का अधिक सुचालक बनाता है।
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