UP Board Class 12 Chemistry 14. जैव अणु is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
हल: ग्लूकोस (C6H12O6) में 5 –OH समूह तथा सूक्रोस (C12H22O11) में 8 –OH समूह उपस्थित हैं, जो ध्रुवीय प्रकृति के होते हैं। ये जल के अणुओं के साथ अंतराआण्विक हाइड्रोजन आबन्ध बनाते हैं, अतः ये यौगिक जल में आसानी से विलेय होते हैं।
बेन्जीन (C6H6) तथा साइक्लोहेक्सेन (C6H12) हाइड्रोकार्बन हैं। ये कोई ध्रुवीय समूह नहीं रखते हैं तथा जल के साथ हाइड्रोजन आबन्ध नहीं बना पाते हैं। इस कारण ये जल में अविलेय हैं।
हल: लैक्टोस, जल-अपघटन पर मोनोसैकेराइडों के दो अणु बनाता है, जिसमें एक अणु D-(+)-ग्लूकोस तथा एक अणु D-(+)-गैलेक्टोस का होता है।
हल: D-ग्लूकोस एक ऐल्डोहैक्सोस है जो ऐल्डिहाइड समूह की लाक्षणिक अभिक्रियाएँ (जैसे NaHSO3, टॉलेन अभिकर्मक, फेहलिंग अभिकर्मक के साथ) देता है, किन्तु D-ग्लूकोस का पेन्टाऐसीटेट ये अभिक्रियाएँ नहीं देता है। इसका अर्थ है कि इसमें ऐल्डिहाइड समूह या तो अनुपस्थित है अथवा रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए उपलब्ध नहीं है। वास्तव में, ऐल्डिहाइड समूह हेमीऐसीटल संरचना का एक भाग है जो पेन्टाऐसीटिल ग्लूकोस में उपस्थित रहता है, अतः यह अभिक्रिया के लिए मुक्त नहीं है।
हल: ऐमीनो अम्ल द्विध्रुवीय (NH3+–CHR–COO–) प्रकृति के होते हैं तथा प्रबल द्विध्रुवीय आकर्षण रखते हैं। अतः ये उच्च गलनांक रखते हैं। जब ये जल में घोले जाते हैं, तो जल के अणुओं के साथ हाइड्रोजन आबन्ध बनाते हैं, अतः ये जल में विलेय हैं।
हैलो अम्ल द्विध्रुवीय नहीं हैं। केवल इनका कार्बोक्सिल समूह हाइड्रोजन बन्ध में सम्बद्ध रहता है, हैलोजन परमाणु नहीं। अतः हैलो अम्ल, ऐमीनो अम्लों की अपेक्षा कम गलनांक तथा कम विलेयता रखते हैं।
हल: जब अण्डे को उबाला जाता है तो इसकी गोलिकाकार (ग्लोब्यूलर) प्रोटीन विकृत हो जाती है। उपस्थित जल सम्भवतः विकृतीकरण के दौरान अवशोषित अथवा अधिशोषित हो जाता है तथा लुप्त हो जाता है।
हल: विटामिन C (ऐस्कॉर्बिक अम्ल) जल में विलेय है। अतः यह लगातार शरीर से मूत्र के रूप में उत्सर्जित होता रहता है तथा इस कारण शरीर में संचित नहीं हो सकता है।
हल: जब DNA के एक न्यूक्लिओटाइड का जल-अपघटन किया जाता है, तो यह डीऑक्सीराइबोस शर्करा अणु, फॉस्फोरिक अम्ल तथा नाइट्रोजनी क्षारक (पिरिमिडीन क्षारक – थायमीन T तथा साइटोसिन C; प्यूरीन क्षारक – ग्वानीन G तथा ऐडेनीन A) देता है।
हल: DNA अणु एक द्विकुण्डलनी संरचना तथा चार एक-दूसरे से जुड़े अनुपूरक क्षारक रखते हैं। साइटोसिन (C), ग्वानीन (G) के साथ जुड़ा होता है, जबकि थायमीन (T), ऐडेनीन (A) के साथ जुड़ा होता है। इस प्रकार की संरचना के कारण, DNA निश्चित मोलर अनुपात में उत्पादों को उत्पन्न करता है। RNA में इस प्रकार की स्थिति नहीं होती है, अर्थात् क्षार युग्मन नियम का पालन नहीं होता है। RNA को जल-अपघटित करने पर विभिन्न क्षारकों की मात्राएँ भिन्न होती हैं। यह संकेत देता है कि RNA एकल रज्जुक संरचना रखता है।
हल: कार्बोहाइड्रेट जो आगे सरलतम अणुओं में जल-अपघटित नहीं किए जा सकते हैं, मोनोसैकेराइड कहलाते हैं। इनका सामान्य सूत्र (CH2O)n है, जहाँ n = 3–7। ये दो प्रकार के होते हैं: ऐल्डोस (–CHO समूह उपस्थित) तथा कीटोस (>C=O समूह उपस्थित)।
हल: वे शर्कराएँ जो अपचायक के समान कार्य करती हैं, अपचायक शर्करा कहलाती हैं। ये एक ऐल्डिहाइड (–CHO) अथवा एक कीटोनिक (>C=O) समूह रखती हैं। सभी मोनोसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड (सूक्रोस को छोड़कर) अपचायक शर्करा होती हैं। उदाहरण: ग्लूकोस, फ्रक्टोस, लैक्टोस आदि। ये टॉलेन अभिकर्मक तथा फेहलिंग विलयन को अपचयित कर देती हैं।
हल: (i) पौधों की कोशिका भित्ति सेलुलोस, एक पॉलिसैकेराइड से बनी होती है।
(ii) कार्बोहाइड्रेट्स पौधों में स्टार्च (एक पॉलिसैकेराइड) के रूप में संचित रहते हैं, जो खाद्याशय की भाँति कार्य करता है।
हल:
मोनोसैकेराइड: राइबोस, 2-डीऑक्सीराइबोस, गैलेक्टोस, फ्रक्टोस।
डाइसैकेराइड: माल्टोस, लैक्टोस।
हल: ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध वह ऑक्सीजन आबन्ध है, जिसके द्वारा दो मोनोसैकेराइड इकाइयाँ आपस में संयुक्त होकर एक डाइसैकेराइड अणु बनाते हैं। ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध बनने के दौरान, मोनोसैकेराइड की एक इकाई हेमीऐसीटल तथा दूसरी इकाई ऐल्कोहॉल की तरह कार्य करती है। डाइसैकेराइड तथा पॉलिसैकेराइड इस आबन्ध के द्वारा बनते हैं।
उदाहरण: सूक्रोस अणु में ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस के मध्य ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध बनता है।
हल: ग्लाइकोजन एक पॉलिसैकेराइड (कार्बोहाइड्रेट) है जो प्राणी शरीर में संग्रहित रहता है। यह यकृत, मांसपेशियों तथा मस्तिष्क में उपस्थित रहता है। जब शरीर को ग्लूकोस की आवश्यकता होती है, एन्जाइम ग्लाइकोजन को ग्लूकोस में तोड़ देते हैं।
स्टार्च भी एक पॉलिसैकेराइड है, जो पौधों में संग्रहित रहता है। यह दो घटकों ऐमिलोस तथा ऐमिलोपेक्टिन से मिलकर बना होता है। ग्लाइकोजन संरचना में मुख्यतः ऐमिलोपेक्टिन के सदृश है। ग्लाइकोजन तथा ऐमिलोपेक्टिन दोनों ग्लूकोस के शाखित बहुलक हैं, किन्तु ग्लाइकोजन ऐमिलोपेक्टिन से अधिक शाखित होता है। ग्लाइकोजन श्रृंखला में 10–14 ग्लूकोस इकाइयाँ होती हैं, जबकि ऐमिलोपेक्टिन श्रृंखलाएँ 20–25 ग्लूकोस इकाइयाँ रखती हैं।
हल:
(i) सूक्रोस: सूक्रोस दक्षिण ध्रुवण घूर्णक होती है, लेकिन जल-अपघटन के उपरान्त दक्षिण ध्रुवण घूर्णक ग्लूकोस तथा वाम ध्रुवण घूर्णक फ्रक्टोस देती है।
C12H22O11 + H2O → C6H12O6 + C6H12O6
सूक्रोस → D-(+)-ग्लूकोस + D-(-)-फ्रक्टोस
चूँकि फ्रक्टोस के वाम ध्रुवण घूर्णन का मान (-92.4°) ग्लूकोस के दक्षिण ध्रुवण घूर्णन (+52.5°) से अधिक होता है, अतः मिश्रण वाम ध्रुवण घूर्णक होता है तथा यह अपवर्तक शर्करा के नाम से जाना जाता है।
(ii) लैक्टोस: लैक्टोस जल-अपघटन पर D-गैलेक्टोस तथा D-ग्लूकोस देता है।
C12H22O11 + H2O → C6H12O6 + C6H12O6
लैक्टोस → D-गैलेक्टोस + D-ग्लूकोस
हल: स्टार्च तथा सेलुलोस के मध्य मुख्य अन्तर ग्लूकोस अणुओं की प्रकृति में अन्तर होने के कारण होता है।
स्टार्च ऐमिलोस तथा ऐमिलोपेक्टिन दो घटकों से मिलकर बना होता है। ये दोनों α-D-ग्लूकोस इकाइयों से बने होते हैं। ऐमिलोस 200–1000 α-D-(+)-ग्लूकोस इकाइयों की अशाखित शृंखला होती है जो C1–C4 ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध द्वारा जुड़ी रहती है। ऐमिलोपेक्टिन α-D-ग्लूकोस इकाइयों की शाखित श्रृंखला होती है जिसमें C1–C4 ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध होते हैं, जबकि शाखन C1–C6 ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध द्वारा होता है।
सेलुलोस में केवल β-D-(+)-ग्लूकोस अणु एक-दूसरे से C1–C4 ग्लाइकोसाइडिक आबन्ध द्वारा जुड़े होते हैं।
हल:
(i) HI के साथ: D-ग्लूकोस की HI के साथ अभिक्रिया में n-हेक्सेन बनता है (अपचयन)।
(ii) ब्रोमीन जल के साथ: D-ग्लूकोस की Br2 जल के साथ अभिक्रिया में ग्लूकोनिक अम्ल बनता है (ऑक्सीकरण)।
(iii) HNO3 के साथ: D-ग्लूकोस की HNO3 के साथ अभिक्रिया में सैकेरिक अम्ल बनता है (ऑक्सीकरण)।
हल: निम्नलिखित अभिक्रियाएँ D-ग्लूकोस की विवृत श्रृंखला द्वारा नहीं समझाई जा सकती हैं:
(i) यद्यपि ग्लूकोस में ऐल्डिहाइड समूह उपस्थित है, फिर भी यह 2,4-DNP परीक्षण एवं शिफ परीक्षण नहीं देता तथा NaHSO3 के साथ भी क्रिया नहीं करता है।
(ii) ग्लूकोस का पेन्टाऐसीटेट, हाइड्रॉक्सिल ऐमीन के साथ क्रिया नहीं करता है।
(iii) α- तथा β-मेथिल ग्लूकोसाइड के बनने को, इसकी विवृत श्रृंखला द्वारा नहीं समझाया जा सकता है। ये केवल तभी बनते हैं जब हम इसकी चक्रीय संरचना को मानते हैं।
हल:
आवश्यक ऐमीनो अम्ल: वे ऐमीनो अम्ल जो शरीर में संश्लेषित नहीं हो सकते तथा जिनको भोजन में लेना आवश्यक है, आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहलाते हैं।
उदाहरण: वैलीन, ल्यूसीन, फेनिलऐलानिन आदि।
अनावश्यक ऐमीनो अम्ल: वे ऐमीनो अम्ल जो शरीर में संश्लेषित हो सकते हैं, अनावश्यक ऐमीनो अम्ल कहलाते हैं।
उदाहरण: ग्लाइसीन, ऐलानिन, ग्लूटैमिक अम्ल आदि।
हल:
(i) पेप्टाइड आबन्ध: पेप्टाइड बन्ध एक ऐमाइड आबन्ध है, जो –COOH समूह तथा –NH2 समूह के मध्य बनता है। जब एक ऐमीनो अम्ल का कार्बोक्सिल समूह, अन्य ऐमीनो अम्ल के ऐमीनो समूह से क्रिया करता है तो जल का एक अणु निकलता है तथा पेप्टाइड आबन्ध बनता है।
(ii) प्राथमिक संरचना: किसी प्रोटीन में ऐमीनो अम्लों के विशिष्ट क्रम से बनी पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला उसकी प्राथमिक संरचना कहलाती है। ऐमीनो अम्लों के क्रम में परिवर्तन प्रोटीन के गुणों को भी परिवर्तित कर देता है। हीमोग्लोबिन में केवल एक ऐमीनो अम्ल इकाई में परिवर्तन से "सिकल सैल एनीमिया" नामक बीमारी हो जाती है।
(iii) विकृतीकरण: जब प्राकृत प्रोटीन में भौतिक परिवर्तन (जैसे ताप में परिवर्तन) अथवा रासायनिक परिवर्तन (जैसे pH में परिवर्तन) किया जाता है, तो हाइड्रोजन बन्धों में अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती है, जिसके कारण गोलिका (ग्लोब्यूल) खुल जाती है तथा हेलिक्स अकुण्डलित हो जाती है तथा प्रोटीन अपनी जैविक सक्रियता को खो देता है। इसे प्रोटीन का विकृतीकरण कहते हैं। विकृतीकरण के दौरान द्वितीयक तथा तृतीयक संरचनाएँ नष्ट हो जाती हैं, किन्तु प्राथमिक संरचना अप्रभावित रहती है।
उदाहरण: उबलाने पर अण्डे की सफेदी का स्कंदन, दही का जमना आदि।
हल: किसी प्रोटीन की द्वितीयक संरचना का सम्बन्ध उस आकृति से है जिसमें पॉलिपेप्टाइड शृंखला विद्यमान होती है। द्वितीयक संरचना दो प्रकार की होती है:
(i) α-हेलिक्स: α-हेलिक्स संरचना में एक पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला में सभी सम्भव हाइड्रोजन आबन्ध बन सकते हैं। इसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला दक्षिणावर्ती पेंच के समान मुड़ी रहती है, फलस्वरूप प्रत्येक ऐमीनो अम्ल के अवशिष्ट का –NH समूह, कुण्डली के अगले मोड़ पर स्थित >C=O समूह के साथ हाइड्रोजन आबन्ध बना सकता है।
(ii) β-प्लीटेड संरचना: β-प्लीटेड संरचना में सभी पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लगभग अधिकतम विस्तार तक खिंची रहकर एक दूसरे के पार्श्व में स्थित होती हैं तथा आपस में अंतराआण्विक हाइड्रोजन आबन्ध द्वारा जुड़ी रहती हैं। यह संरचना कपड़े में प्लीट के समान होती है, अतः β-प्लीटेड शीट भी कहलाती है।
हल: प्रोटीन की α-हेलिक्स संरचना का स्थायीकरण विभिन्न पेप्टाइड बन्धों के >C=O तथा >N–H समूहों के मध्य अंतराआण्विक हाइड्रोजन आबन्धन द्वारा होता है।
हल:
| क्र. सं. | गोलिकाकार प्रोटीन | रेशेदार प्रोटीन
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