UP Board Class 12 Chemistry 16. दैनिक जीवन में रसायन is a Hindi Medium Solution which is prescribed by Uttar Pradesh Board for their students. These Solutions is completely prepared considering the latest syllabus and it covers every single topis, so that every student get organised and conceptual learning of the concepts. Class 12 Students of UP Board who have selected hindi medium as their study medium they can use these Hindi medium textSolutions to prepare themselves for exam and learn the concept with ease.
हल: नींद लाने वाली गोलियाँ प्रशांतकों अथवा प्रतिअवसादक ड्रग्स को रखती हैं। ये तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती हैं तथा चिंता, तनाव, क्षोभ अथवा उत्तेजना से मुक्ति दिलाती हैं। परन्तु इनका उपयोग चिकित्सक के परामर्श के अनुसार करना चाहिए। इनकी अनियंत्रित तथा अधिक मात्रा शरीर तथा मस्तिष्क को नुकसान पहुँचा सकती है क्योंकि उच्च मात्रा में ये औषध विष के समान कार्य करती हैं।
हल: 'रैनिटिडीन प्रति-अम्ल है', यह वक्तव्य भेषजगुणविज्ञानीय (फार्माकोलोजिकल) प्रभाव के अनुसार औषध के वर्गीकरण को निर्देशित करता है। यह पेट की अम्लता (आधिक्य) को उदासीन करता है तथा कोई भी औषध जो अम्ल के आधिक्य का प्रतिकार करेगी, प्रति अम्ल कहलाएगी।
हल: प्राकृतिक मधुरक (सूक्रोस आदि) शरीर को कैलोरी प्रदान करते हैं। मधुमेह के मरीजों के लिए अधिक कैलोरी ग्रहण करना नुकसानदायक है। अतः कृत्रिम मधुरकों का उपयोग (क) ग्रहण की गई कैलोरी को नियंत्रित करने के लिए तथा (ख) मधुमेह के मरीजों के लिए शर्करा के प्रतिर्थापी के रूप में किया जाता है।
हल:
(i) ग्लिसरिल पामिटेट से साबुन निर्माण:
हल:
अणु: C17H35COO(CH2CH2O)nCH2CH2OH
जलविरागी भाग: लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (C17H35COO-)
जलरागी भाग: पॉलीऑक्सीएथिलीन श्रृंखला (-(CH2CH2O)nCH2CH2OH)
प्रकार्यात्मक समूह: एस्टर (-COO-) तथा ऐल्कोहॉल (-OH)
हल: ड्रग्स (औषधों) के विभिन्न प्रकार के वर्गीकरण विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित लोगों के लिए लाभदायक होते हैं। उदाहरण भेषजगुणविज्ञानीय (फार्माकोलोजिकल) प्रभाव का ज्ञान इसे चिकित्सकों के लिए आसान बनाता है। यह प्राथमिक उपचार में मरीजों के लिए उचित औषध उपलब्ध कराने में भी सहायक है। जैसे-प्रति-अम्ल पेट में अम्लता के आधिक्य में उपयोग किए जा सकते हैं।
इसी प्रकार अन्य प्रकार के वर्गीकरण वैज्ञानिकों, ड्रग उत्पादकों, विद्यार्थियों तथा कैमिस्ट आदि के लिए सहायक हैं।
हल: औषध सामान्यतया बृहत् अणुओं, जैसे- कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों आदि से पारस्परिक क्रिया करती हैं। इन बृहत् अणुओं को लक्ष्य-अणु अथवा औषध-लक्ष्य कहा जाता है। समान संरचनात्मक विशेषताओं वाली औषधों की लक्ष्यों पर क्रियाविधि समान हो सकती है।
हल: न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, एन्जाइम औषध लक्ष्य के रूप में चुने जाते हैं।
हल: प्रत्येक औषध की क्रिया तथा मात्रा विशिष्ट होती है। यदि औषध एक से अधिक ग्राही से जुड़ती है तो यह पार्श्व प्रभाव उत्पन्न कर सकती है। औषध को अधिक मात्रा में लिए जाने पर यह विष के समान कार्य कर सकती है। अतः औषध (दवाईयाँ) सदैव योग्य चिकित्सक से परामर्श करके लेनी चाहिए।
हल: रसायन चिकित्सा का अर्थ, "औषध के रूप में रसायनों की सहायता से रोगों का उपचार करना है।" अतः रसायनों के चिकित्सीय उपयोग को रसायन चिकित्सा कहते हैं। इसका उपयोग रोगों के निदान, निवारण और उपचार के लिए किया जाता है।
हल: एन्जाइम की सक्रिय सतह पर औषध को बाँधने के लिए आयनिक बंध, हाइड्रोजन बंध, वाण्डरवाल्स बल, द्विध्रुव-द्विध्रुव आकर्षण बल कार्य करते हैं।
हल: ये (प्रति-अम्ल तथा प्रतिएलर्जी औषध) एक-दूसरे के कार्य में बाधक नहीं होती हैं क्योंकि ये शरीर में भिन्न-भिन्न ग्राहियों (Receptors) से जुड़ती हैं।
हल: नॉरएड्रिनेलिन एक तंत्रिकीय संचारक है जो मनोदशा परिवर्तन में भूमिका निभाती है। इसका कम स्तर अवसाद उत्पन्न करता है। अतः प्रशांतक (प्रतिअवसादक) औषधों की आवश्यकता होती है। इप्रोनाइजिड और फिनल्जिन ऐसी दो प्रमुख औषध हैं।
हल: वे प्रतिजैविक (एन्टीबॉयोटिक) जो हानिकारक अथवा रोग-जनित जीवाणुओं के विस्तृत परास का विनाश करते हैं, बृहद-स्पेक्ट्रम जीवाणुनाशी अथवा विस्तृत स्पेक्ट्रम प्रतिजैविक कहलाते हैं। ये ग्रैम पॉजिटिव और ग्रैम नेगेटिव दोनों प्रकार के जीवाणुओं के विरुद्ध समान रूप से प्रभावशाली हैं। उदाहरण ऐम्पिसिलिन और ऐमोक्सिसिलिन।
हल: पूतिरोधी वे रासायनिक पदार्थ हैं, जो सूक्ष्मजीवों को मारते हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोकते हैं। इनका प्रयोग जीवित ऊतकों के लिए सुरक्षित है। अतः, इनका प्रयोग घाव, चोट, व्रण (अल्सर) और रोगग्रस्त त्वचा की सतह पर किया जाता है।
उदाहरण: डेटॉल, फ्यूरासिन, सोफ्रामाइसिन, सेवलॉन आदि।
संक्रमणहारी वे रासायनिक पदार्थ हैं, जो सूक्ष्मजीवों को मारने में सक्षम होते हैं। परंतु जीवित ऊतकों के लिए इन्हें प्रयोग करना सुरक्षित नहीं होता है। इनका प्रयोग फर्श, नाले, उपकरणों आदि जैसी निर्जीव वस्तुओं के लिए किया जाता है।
उदाहरण: फीनॉल (1% विलयन) तथा क्लोरीन (0.2 से 0.4 ppm)।
हल: प्रति-अम्लों NaHCO3, Mg(OH)2 अथवा Al(OH)3 पेट में उत्पन्न अम्ल की अधिक मात्रा को उदासीन कर देते हैं। किंतु इनकी अधिकता आमाशय को क्षारीय बना देती है तथा अधिक हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के स्राव को प्रेरित करती है, जो आमाशय में अल्सर (घाव) को उत्पन्न कर सकता है। सिमेटिडीन तथा रैनिटिडीन आमाशय की दीवार में उपस्थित ग्राही के साथ हिस्टामीन की अन्तःक्रिया को रोकते हैं। इसके फलस्वरूप अम्ल की कम मात्रा का स्राव होता है। अतः सिमेटिडीन तथा रैनिटिडीन, सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट अथवा मैग्नीशियम या ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड की तुलना में श्रेष्ठ प्रति-अम्ल माने जाते हैं।
हल: फीनॉल का 0.2% विलयन पूतिरोधी के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, जबकि फीनॉल का 1% विलयन संक्रमणहारी के रूप में कार्य करता है।
हल: क्लोरोजाइलिनॉल तथा टर्पीनिऑल।
हल: आयोडीन (2-3 प्रतिशत) का एथेनॉल में बना तनु विलयन आयोडीन का टिंक्चर कहलाता है। यह घावों के लिए एक प्रबल पूतिरोधी है।
हल: वे रासायनिक पदार्थ जो सूक्ष्मजीवों जैसे जीवाणु, यीस्ट, कवक आदि की वृद्धि के कारण खाद्य पदार्थों को नष्ट होने से रोकते हैं, खाद्य परिरक्षक कहलाते हैं। उदाहरण सोडियम मेटाबाइसल्फाइट, सोडियम बेन्जोएट आदि। शर्करा, साधारण नमक, वनस्पति तेल भी अच्छे खाद्य परिरक्षक होते हैं।
हल: एस्पार्टेम कृत्रिम मधुरक है। यह खाना पकाने के तापमान पर विघटित हो जाता है तथा सही प्रकार से कार्य नहीं करता है। अतः, कृत्रिम मधुरक के रूप में इसका प्रयोग केवल ठंडे खाद्य एवं पेय पदार्थों तक ही सीमित है।
हल: कृत्रिम मधुरक वे रासायनिक पदार्थ हैं जो शरीर की कैलोरी को बढ़ाए बिना खाद्य को मिठास प्रदान करते हैं। उदाहरण ऐस्पार्टेम, सैकरीन, सूक्रालोस, ऐलिटेम आदि।
हल: सूक्रालोस (सूक्रोस का ट्राइक्लोरो व्युत्पन्न) अथवा सैकरीन।
हल: ऐलिटेम अधिक प्रबल मधुरक है। यह इक्षु शर्करा से लगभग 2000 गुना अधिक मीठा होता है। अतः इसका प्रयोग करते समय मिठास को नियंत्रित करना कठिन होता है।
हल: संश्लेषित अपमार्जक साबुन की तुलना में श्रेष्ठ शोधक है। इसके निम्न कारण हैं:
हल:
(क) धनात्मक अपमार्जक: ये ऐमीनों के ऐसीटेट, क्लोराइड अथवा ब्रोमाइड के चतुष्क अमोनियम लवण होते हैं।
उदाहरण: सेटिल ट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड [C16H33N+(CH3)3]Br-।
(ख) ऋणात्मक अपमार्जक: ये अपमार्जक अपने अणुओं में एक बड़ा भाग ऋणायन रखते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-
हल:
जैव-निम्ननीकृत अपमार्जक: वे शोधन कारक अथवा अपमार्जक जो सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित हो जाते हैं, जैव-निम्ननीकृत अपमार्जक कहलाते हैं। इनके अणु कम शाखित होते हैं।
उदाहरण: सोडियम डोडेसिल बेन्जीन सल्फोनेट। साबुन भी एक जैव-निम्ननीकृत अपमार्जक (संश्लेषित नहीं) है। इस प्रकार के अपमार्जक जल प्रदूषण उत्पन्न नहीं करते हैं।
अजैव-निम्ननीकृत अपमार्जक: वे अपमार्जक जो सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटित नहीं होते हैं, अजैव-निम्ननीकृत अपमार्जक कहलाते हैं। जब ये जल-स्रोत में जाते हैं, तो जल प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। ये अपनी संरचना में अधिक शाखा रखते हैं।
उदाहरण: अधिकांश संश्लेषित अपमार्जक जिनकी श्रृंखला अत्यधिक शाखित होती है।
हल: कठोर जल में उपस्थित कैल्सियम तथा मैग्नीशियम लवण साबुन के साथ क्रिया करके अविलेय यौगिक बनाते हैं, जो दही के समान सफेद अवक्षेप बनाते हैं तथा कपड़ों से मुश्किल से अलग होते हैं।
हल: साबुन का उपयोग जल की कठोरता ज्ञात करने के लिए किया जा सकता है क्योंकि यह कठोर जल के साथ अविलेय अवक्षेप बनाता है। जबकि यह मृदु जल में विलेय है। परन्तु अपमार्जक दोनों प्रकार के जल में विलेय है। अतः ये जल की कठोरता को ज्ञात करने के लिए उपयोग नहीं किए जा सकते हैं।
हल: साबुन के अणु को निम्न प्रकार से प्रदर्शित कर सकते हैं:
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